शुक्रवार, 27 मई 2016

आगे रास्ता बन्द है..............


कई बार ऐसा होता है, उस रास्ते पर हम चलते चले जाते हैं जो आगे जाकर बन्द हो जाता है। बहुधा पता नहीं होता इसलिए ही ऐसा होता है। कितने ही लोग ऐसा पथ चुनते हैं जो आगे चलकर एक जगह पर अनेक रुकावटों में बदल जायेगा। सड़क हमें वहाँ ठहरा देगी। हम भी ठिठक कर रह जायेंगे क्योंकि इस रास्ते पर हमारा पहले चलकर कभी आना नहीं हुआ। आसपास के अनेक मार्गों को देख लेने के बाद भी हमने उस रास्ते से आगे जाना तय किया जो कुछ समय बाद पूरा हो जाने वाला है।

जब हम जा रहे थे तब उसी रास्ते से हमें लौटते हुए लोग भी मिले जिनको हम पहचानते नहीं थे। जिस तरह हमने, उसी तरह उन्होंने भी एक निगाह तो कम से कम देखा ही लेकिन वे हमको रास्ते के अधूरे होने के बारे में बता नहीं पाये। हो सकता है उनका यह सोचना रहा हो कि इनकी जगह थोड़ा पहले हो सकती है और अगर ऐसा हुआ तो इनको बन्द रास्ते का मुँह देखना नहीं पड़ेगा। हम लेकिन यह सोच सकते हैं कि ऐसा मार्ग जो आगे चलकर बाधित हो गया है, उस मार्ग से लौटते हुए ये हमें सचेत कर सकते थे। उस अन्तिम छोर पर हम भी औरों की तरह जाकर ठहर ही गये।

वैसे कितना भी दूर चले जाते यदि रास्ता बाधित न होता लेकिन एक व्यवधान देह और मन से अचानक ही बहुत कुछ झटकार कर छुड़ा लेता है। इसी बीच हमारी निगाह एक-दो और ऐसे लोगों पर जाती है जो हमसे पहले यहाँ तक आकर हमारी ही तरह अपने आपको खासा थका हुआ मानकर खड़े-खड़े सुस्ता से रहे हैं। अपने रुमाल ही को पंखा बनाकर झलते हुए वो लगभग पहचान वाले हो गये। कहने लगे, अगर रास्ता बन्द है तो पहले ही लिखा होना चाहिए। सब उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं। मुझे लगता है कि सही कह रहे हैं। इस रास्ते पर न जाइये, यह पहले ही लिख दिया जाना चाहिए।

उस सिरे के एकान्त में तीन-चार लोग इसी बन्द रास्ते से अनेक बन्द रास्तों की बात करने लगे, बतलाने लगे कि कहाँ-कहाँ रास्ते बन्द हो चुके हैं, स्वस्थ बने रहने के, दो रोटी चैन से खा सकने के, सड़क पर सुरक्षित चल पाने के, रोजी-रोजगार के, महँगाई से बचने के, आगे बढ़ने के, प्रेम करने के, इस भीषण गरमी से निजात पाने के................इसके आगे भी...........

यही चार-पाँच लोग फिर आपस में एक-दूसरे से इसी तरह की बातचीत करते हुए वापस लौटे और उस जगह पर आकर फिर खड़े हो गये जिस जगह से आगे चलकर यह बन्द हो जाने वाला रास्ता शुरू हो रहा था। सबने मिलकर आपस में बात की और वहीं आसपास जमीन पर पड़े कागजों, लकड़ी की तख्तियों और बाँस को जुटाकर सबके लिए एक सूचना लिखकर लगायी - आगे रास्ता बन्द है..............

शनिवार, 21 मई 2016

काला पत्थर (1979)


मुझे विजयपाल सिंह का स्मरण अक्सर हो आता है। जीवन की एक विफलता और उसके प्रायश्चित को जीता हुआ कोयले की खदान का एक मजदूर। एक आदमी अपनी चुप्पी में क्या कुछ बोलता है, उसको उसकी दिनचर्या से जानने की कोशिश होती है। खदान के मजदूरों के काम पर आने का समय बतलाने वाला सायरन उसे जगाता है। जागने से पहले उसका सोये होना, जागने पर अपने फावड़े के साथ घर से निकल पड़ना, खदान में उतरना, पूरा समय काम करना, खाने का समय, आसपास दुर्घटनाएँ, नियति और अनेक नियोजित, अनियोजित दुश्वारियाँ उसके बीच लम्बे सन्नाटे से भरे समय में पूर्वदीप्ति जिसमें कोर्टमार्शल और अपने आसपास के अपमानित करते लोगों के बीच पदच्युत होना, उस पूरे समय और समाज से बहिष्कृत कर दिया जाना जिसका हिस्सा बगैर जी पाना असम्भव होता है। अनन्त लम्हा अपनी पहचानहीनता के साथ व्यतीत करना एक बड़ी चुनौती। विफलताएँ मानस पटल से मिटती नहीं, पराजय अनन्त काल तक पीछा छोड़ती नहीं और हतप्रभता के साथ साँसों के चलने की आवाज भी सुनायी नहीं देती।
काला पत्थर (1979) फिल्म kala patthar (1979) जैसे मेरे मन में रखी रहती है। विफलताएँ नियति के साथ लेकर चलती हैं। प्रायः शब्द धुंधले नजर आते हैं जब आँखों में आँसू भरे होते हैं। इस फिल्म में कम से कम तीन नायक याद आते हैं। इनमें से एक नायक अपने पछतावे को, बड़े ही कठिन समय में लिए अपने निर्णय को गलत सिद्ध होते देखता है। सलीम-जावेद ने इस फिल्म को लिखते हुए नायक के पलायन और उसके सुदूर कठोर और लगभग आत्महीन संसार में होने को रेखांकित किया है। विजय की सारी चेष्टाओं को देखते हुए लगता है कि कैसे मानस में मनुष्य अपनी थकन से बाहर आना नहीं चाहता, अपनी उदासी को दूर करना नहीं चाहता, अपने हाल से बाहर आना नहीं चाहता। अनेक प्रश्न और भी लेकिन वे तभी जब काला पत्थर को एक बार फिर से देखा जाये।
काला पत्थर का संगीत, गीत मुझे एक अलग अनुराग से जोड़ता है, उसके साथ एक बड़ा प्रीतिकर निजी एहसास जुड़ा हुआ है जो मेरा अपना है। जिससे जुड़ा है उसको कभी पहली बार बतलाया था। काला पत्थर में एक अहम नैरार्श्य के बावजूद जीवन के रंग हैं। प्रेम है, अल्हड़ता है, अक्खड़ता है और भी बहुत कुछ। काला पत्थर के नायक से जीवन के सबक सीखने को मिलते हैं। आपका निर्णय, आपकी प्रत्युत्पन्नमति और बहुत ही अच्छी या उत्तरदायी कामनाओं के बावजूद कैसै विफलता में तब्दील हो जाते है, यह इस फिल्म का मर्म है। विफलताएँ किसी भी मनुष्य के पुरुषार्थ पर सन्देह करने की स्वतंत्रता नहीं देतीं।विफलताएँ दरअसल अनेक बार मनुष्य की नियति यदि न भी कहा जाये तो उसको सम्हलने के अवसर जरूर देती हैं, पुनर्विचार के अवसर जरूर देती हैं। कई बार किसी भी मनुष्य को उसका बहुत सारा आसपास भी विफल बनाता है..........................

रविवार, 8 मई 2016

सिंहस्थ महाकुम्भ.............अनूठा, विलक्षण, कल्पनातीत


सिंहस्थ महाकुम्भ में अपने ही रुझानों और कर्तव्यों के साथ एक अच्छा समय व्यतीत करने का अवसर आयेगा, इसकी कल्पना नहीं थी। महाकाल, हरसिद्धी, सान्दीपनि आश्रम और माँ शिप्रा के आशीष और सान्निध्य का ही यह प्रभाव है कि अपने जीवन में पहली बार भारत की अस्मिता के अर्थ, भक्ति परम्परा, आस्था और श्रद्धा के अनेक आयाम, अनेक विस्तारों को देखने का पुण्य है। उज्जैन नगरी में दोपहर जितनी तपती है, सांझ और रात्रि उतनी ही सुरम्य, ठण्डी और अनुभूतिजन्य बयार से भरी हो जाती है। यहाँ आकाश की छत्रछाया में ऐसे अवसरों का सौभागी होना ऐसे आभासों को दर्शन में बदल देता है जो कल्पनातीत है। शहर भर में ध्वनि और स्वर के साथ विद्या और ज्ञान का प्रवाह हो रहा है। देश भर के कलाकार, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी आकर आचमन कर रहे हैं और पुण्यसुख के साथ अपने घर लौट रहे हैं। उज्जैन शहर के आसपास मालवा से लेकर निमाड़, पास में राजस्थान और अन्य अनेक स्थानों से प्रतिदिन लाखों लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं। जो जहाँ थक जाता है, वहीं बैठ जाता है, जिसे जहाँ विश्राम की इच्छा हो, वहीं उसे गहरी नींद आ जाती है। पिता और माता के कंधों पर नन्हें बच्चे हैं, पितृपुरुषों और आदरणीयाओं के सिर पर उनका कम से कम पाँच-सात किलो का सामान है, रेला का रेला चला जा रहा है, सड़कों पर जैसे देश चलायमान हो गया है। गति ऐसी की बहाव को भी चुनौती दे दे। सबकी एक ही आकांक्षा है, शिप्रा में स्नान और प्रभु महाकाल का दर्शन। मन-जीवन को तृप्त करने की आकांक्षा। शिप्रा तट पर पूरी रात उजाला रहता है, प्रकाश रहता है, लोग रहते हैं, देश रहता है। लोग स्नान करते हैं, सिर में माँ शिप्रा के जल की बून्दों से अपने जीवन को धन्य करते हैं। घाट पर घण्टों व्यतीत करते हैं, चलते हुए, टहलते हुए, बैठे हुए। माँ का सान्निध्य ऐसा है कि पास से हटने का मन ही नहीं करता। कितने चेहरे, कितने परिधान, कितने भाव, कितनी चेतना, कितना आत्मविश्वास, कितना जीवट ओह.......हो..............हर दर्शन, हर दृश्य दरअसल इस जीवन में अपने होने के अर्थ को सार्थक करता हुआ, अपने पुरुषार्थ का आदर्श प्रकट करता हुआ, अपने अनुराग में भक्ति को उच्च शिखर पर स्थापित करता हुआ.....................इस तीर्थ में, इस महापर्व में हम मालवा की भूमि में अपने आपमें, उस आध्यात्म बिन्दु में स्वयं को लीन किए हुए लोग दीख रहे हैं। सब कुछ अनूठा है, विलक्षण है, कल्पनातीत है.......................

शुक्रवार, 6 मई 2016

।। चार आँसू विधि के लिए।।

बहुत मन कर रहा है कि चार आँसू उसके लिए रोऊँ आज। हालाँकि उससे अधिक रो भी चुका हूँ जब से बहन ने बताया कि विधि आज हम सबको छोड़कर चली गयी। यह आत्मकथ्य लिखना बहुत मुश्किल हो रहा है लेकिन यह अपने से अपना ही हठ है क्योंकि ग्यारहवीं पास करके अमरपाटन सतना से भोपाल पढ़ने आने वाली विधि का चेहरा भुलाये नहीं भूलता जो बहन की पक्की सहेली बनी। विधि भोपाल में अपने तीन मामाओं के होते हुए भी हमारे घर में रहती थी। हमारे पापा उसके पापा, हमारी मम्मी उसकी मम्मी, मैं उसका दादा जैसे कि अपनी बहनों और भाइयों का हूँ। याद आता है विधि भी बहन के साथ पीएमटी की परीक्षा दिया करती थी। दोनों साथ पढ़ा करतीं थी। आगे चलकर उसका विवाह अच्छे घर परिवार में हुआ और उसका संसार भी सुन्दर सा जिसमें एक बेटा और एक बेटी। विधि को याद करो तो न जाने कितनी बातें, बहन और उसको लूना पर बैठाकर काॅलेज छोड़ने जाना, लिवाकर लाना। जब वो भोपाल आयी थी तब उसके पिता ने उसके रहने का प्रबन्ध होस्टल में कर दिया था। मुझे याद है एक बार लम्बा कफ्र्यू लगा था तब तीन-चार दिन भूखी प्यासी विधि को चलते कफ्र्यू में ही मैं अपनी बहन के साथ उसके होस्टल से घर ले आया था। उसके बाद फिर वह हमारे घर ही रह गयी थी। विधि की खूबी उसकी हँसी थी। सदैव हँसते हुए ही मिलती थी। उसका हँसना दरअसल एक बड़ी और दुर्लभ निश्छलता का परिचायक था जिसकी मिसाल वो सैकड़ों-हजारों में रही। साल भर पहले ही शायद इस लड़की का कर्क रोग की पहचान हुई और उसके बाद से उसकी सेहत में गिरावट, लगातार चिकित्सा के बाद भी सुधार न होना और उसके बाद भी उसका मिलना उसी बालसुलभ हँसी सा। आज दोपहर में बहन ने एक वाक्य के सन्देश में सूचित किया है कि विधि आज हम सबको छोड़कर चली गयी। मैं उसके लिए रोने का एकान्त नहीं ढूँढ़ पा रहा हूँ, उससे जुड़ी हर बात मेरी आँखें छलकाये दे रही है। उसके नहीं होने के सच को सहन कर पाना मुझे मुश्किल हो रहा है। ईश्वर की ये क्या महिमा है, मैं ही नहीं कोई समझ नहीं पाया आज तक। मेरी भीगी आँखों में उसके सज्जन से जीवनसंगी संजय और दोनों बच्चों की छबि धुंधलाती है। मैं उसके चले जाने का विरोध करता हूँ। शाश्वत उत्तर यह है कि जिस पीड़ा को वह असमय अपने शरीर पर झेल रही थी वह उसके साथ ही जाती रही। वह क्यों चली गयी। लगभग साल भर पहले अपनी माँ के बिछोह के घाव जस के तस हैं और ये लड़की इस तरह चली गयी। अपनी बहन की दशा नहीं जानता क्या होगी, आज ही वो भोपाल आयी है और विधि भोपाल सहित संसार से चली गयी है। विधि के साथ विधि के विधान की बात कहते हुए घबराहट होती है। उसकी खिलखिलाहट को अब बस याद ही करूँगा, प्रत्यक्ष देखने से वंचित हो गया सदा के लिए.......

बुधवार, 30 मार्च 2016

चौदह......

अनेक बार अपने लिए सोची और जी हुई सीख के विपरीत होता हूँ। सीख पता नहीं कितने लोगों की है, कही गयी, देखी गयी, महसूस की गयी। शिक्षाएँ घुट्टी में भी पिलायी जातीं हैं। ऐसी पी हुई शिक्षाएँ रक्तकणों में जीवनभर बहा करती हैं। बाद में मिली शिक्षाएँ देह-मानस में धीरे से शामिल होती हैं, वे मानसिक अनुकूलताओं-प्रतिकूलताओं के अनुरूप ठहरे रहती हैं, प्रतीक्षा करती हैं और उनको जब सहज मार्ग मिलता है, तब वे हम में प्रवेश करती हैं। यह एक सोचा हुआ सोच है वह भी अपनी स्वीकार्यता के लिए क्योंकि जीवन और उसकी धारा में दैहिक और मानसिक सन्तुलन की अपनी अवस्थाएँ हुआ करती हैं। मैं कई बार सिरे और छोर में अन्तर नहीं कर पाता, बड़े दिनों बाद पैराग्राफ लिखते हुए यह विफलता मुझे कचोटती है। विफलताएँ आहत नहीं करतीं, विफलताएँ निरन्तर अपने आपमें अनेक प्रतिकूलताओं से अतिक्रमित होने और उसके परिणामों का पर्याय होती हैं। इनसे समय-समय पर थकान महसूस होती है। ऐसा लगता है कि थोड़ा आराम किसी ऐसे पत्थर पर बैठकर किया जाये जिसके चारों ओर दूर-दूर तक मैदान हों या पहाड़ हों। अब यह सब बहुत दूर हो चले हैं। ऐसा समय छूना भी मुश्किल लगता है, ऐसा लगता है जैसे समय को पकड़ने का प्रयत्न भी एक दूसरी तरह की विफलता के सामने लाकर खड़ा करता हो। इत्मीनान का समय, कभी हाथ न आने वाला पंछी है, वह देखता तो रहता है लेकिन आहट होते ही उड़कर थोड़ी और दूर जाकर बैठ जाया करता है, वहाँ से वह फिर निहारा करता है, दुनियाभर की भावशून्यता के साथ । सिरे और छोर एक-दूसरे की ओर पीठ किए हुए हैं, एक धीरज भरे उपन्यास की तरह जीवन सिरे और छोर के बीच अनन्त अस्त-व्यस्त पथ पर पैदल है.....................हाँ पैदल है क्योंकि शेष अब कोई भी पैदल नहीं बचा है....................

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

तेरह


एक पूरा दशक बीत गया लेकिन निदा फाजली के नहीं रहने की खबर के साथ जैसे वह याद बस एक देहरी सामने ही नजर आयी। 2005 की बात थी जब निदा फाजली भोपाल आये थे, शिखर सम्मान ग्रहण करने जो उनको साहित्य के क्षेत्र में सुदीर्घ सृजन के लिए प्रदान किया जाने वाला था। उसी दिन कुछ सम्मानों का अलंकरण और होना था जिनमें एक इकबाल सम्मान भी जो जो शहरयार साहब को दिया जा रहा था। शहरयार साहब से पहले की आत्मीयता के कारण सहजतापूर्वक सान्निध्य सम्भव हुआ और निदा साहब से पहली बार मिलना हो रहा था। मेरे लिए यादगार यह रहा कि मैं शहरयार साहब और निदा फाजली के आपस के रिश्तों से बहुत आनंद प्राप्त करता रहा। शहरयार साहब लगभग हर दूसरी बात निदा साहब को छेड़कर ही करते थे लेकिन निदा साहब उसका जवाब बड़े प्रेम और इत्मीनान से दिया करते। जैसे शहरयार साहब का तैयार होकर निकलने के लिए व्यग्र होना और निदा साहब को अभी समय लगना, तब शहरयार साहब का कहना, उनके सजने-सँवरने में खासा वक्त लगता है........निदा साहब जब होटल की लाॅबी में तैयार होकर आये तब उन्होंने ज्यो का त्यों कह भी दिया जिस पर निदा हँसने लगे। वैसे शायद वह सान्निध्य बहुत बड़ा न होता लेकिन शहरयार साहब सम्मान के अगले दिन जो शायद इतवार था, पुराने भोपाल में रहने वाले एक बड़े शायर मित्र अख्तर सईद खाँ से मिलने जाना चाहते थे। बरसों से आपस में मिले नहीं थे और वह बेचैनी दीख रही थी। इस साथ में निदा भी थे, वे भी चले। हम लोग पुराने भोपाल मेें अख्तर सईद साहब के बड़े से मकान में पहुँचे। मेरे लिए वह दृश्य यादगार था जब शहरयार साहब, निदा साहब से अख्तर सईद खाँ साहब खूब भावुकता में अच्छे से लिपटकर मिले। ये नम आँखों की मुलाकात रिश्तों के नमक को बयाँ करने के लिए काफी थी। मैं यह सब देखता रहा। उस दिन शायद तीन-चार घण्टे सब साथ रहे। मुलाकात एक दिन पहले तय हो गयी थी, अख्तर सईद साहब का ज्यादा चलना-फिरना नहीं हो पाता था, सो मुलाकात के समय मित्रों के लिए उन्होंने घर में क्या कुछ नहीं बनवाया था, वह सब, एक-एक कह कह करके खिलाया। अलीगढ़ की यादें, एक-एक बात ताजा होती रहीं। साथ के दोस्तों, रूठे-बिछड़े लोगों की खूब बातें हुईं। बाद में जब मिलकर विदा हुए तो उसी तरह भाव भरकर गले मिले। आने वाले समय की असहजता, फिर मिल पाने-न मिल पाने के अन्देशों के साथ यह पल उन मित्रों के लिए तो अनमोल थे ही, मेरे जैसे व्यक्ति के लिए भी जिसके मन में वह छाप आज तक है। मैं व्यक्तिशः मुम्बई में भी निदा साहब से कुछेक बार मिला और मंच पर उनकी अनेक रचनाओं जिनमें पिता पर, माँ पर और खास बेटी पर जो उन्होंने उस समय अपनी नन्हीं बेटी को देखते हुए लिखी, भुलायी नहीं जातीं। कुछ ही समय पहले वे ऐसे ही मंच-मुशायरे के मौके पर भोपाल आये थे। भोपाल आकर जाना, फिर आने की उम्मीद थी और यह जाना बड़े सख्त सच के साथ नाउम्मीद कर देता है....................

शनिवार, 16 जनवरी 2016

बारह

ऐसा लगता है कि अपनेे सहेजे एकान्त को मैं खुद ही सुहाने लगा हूँ। कभी मैं अपने लिए एकान्त की तलाश करता हुआ एक जगह पर आकर स्थिर हुआ था। मुझे पता नहीं है कि एकान्त की वास्तविक परिभाषा क्या होती है? ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि आज भी नहीं जान पाया हूँ, तब भी नहीं जान पाया था। यह था कि एकान्त आकाश का, एकान्त धरती का या एकान्त अधर का सबके विषय में अलग-अलग जिज्ञासाएँ थीं। जाकर तो बैठा मैं धरती के ही एकान्त में। फिर वहाँ से अधर और आकाश के एकान्त को निहारते हुए जैसे सदियाँ जी गया। मुझसे बहुत कुछ छूटता चला गया। एकान्त की अपनी आत्मरति होती है जिसका आनंद भले न हो, अवसाद भी उसकी संगत से बाहर नहीं आने देता। मैं उसी परिधि में था। जाने किस क्षण मुझे स्वयं के रचे हुए निर्वात ने पूरी तरह घेर कर एक जगह आपको एकत्र बने रहने के लिए कह दिया हो जैसे। मैं वहीं कितनी बार सूरज उगे, चढ़े और अस्तांचल की ओर चले। मैं सभी का साक्षी था। एक तरह से सभी का साक्षी बना रहा। यह एक छोटा सा ही पैराग्राफ कहा जायेगा, अनेक समतल, रेतीले और भोथरे रस्तों पर चला और गिरा। भौतिकी में हम बहुत कुछ जेब में भर लिया करते हैं। आत्मावलोकन में जेब में भर लिए जाने लायक कुछ भी नहीं होता, यह बड़ा सा सच है............

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

ग्यारह


13 दिसम्बर कई तरह से स्मृतियों को झकझोरने वाली तारीख बन गयी है। इस तारीख में अपने जन्म के साल दर साल सुखद एहसासों पर पिछले ही साल पहला आघात अपने गुरु श्रीराम ताम्रकर का जाना था। श्रीराम ताम्रकर भारतीय सिनेमा ज्ञान के एक गहरे हस्ताक्षर थे। लगभग सत्तर वर्ष के होते आये थे, पिछले ही साल हृदय की शल्यक्रिया करानी पड़ी थी उन्हें पर बावजूद सफल होने के, अत्यन्त संवेदनशील मन के ताम्रकर जी जिन्हें सारा जीवन सुई भी न लगवानी पड़ी हो, ऐसे विच्छेदन से गहरे टूट गये। नहीं रहने के दो महीने पहले ही अपने जीवन का बड़ा काम, बड़ी आकांक्षा उन्होंने पूरी की, हिन्दी में सिनेमा का एनसायक्लोपीडिया तैयार करके जिसे प्रकाशित होना है, प्रकाशित होते वे देख नहीं पाये। कुछ माह पहले ही अपनी माँ के सदैव के लिए छोड़कर चले जाने का दूसरा आघात भी उतना ही असहनीय रहा है मेरे लिए। बेटे का जन्मदिन माँ के लिए त्यौहार होता है। कभी कल्पना भी न की थी कि यह दिन माँ के बिना भी एक दिन आना शुरू होगा। याद पड़ता है, शायद पाँचवीं-छठवीं कक्षा में पढ़ा करता था। उस साल जो 13 दिसम्बर आया तो स्कूल जाने से पहले माँ ने टीका लगाया, गुलगुले (गुड़ के गुलगुले जन्मदिन में बनने की परम्परा है हमारे यहाँ) खिलाये। मैं उसके बाद स्कूल पहुँचा। कक्षा में साथी मुझे टीका लगाये देख जोर-जोर से हँसने लगे। शरमाकर मैंने हाथ से वह टीका पोंछ डाला। बाद में जब माँ ने देखा तो गुस्से से पूछा, क्यों टीका क्यों मिटा दिया? मैं कुछ जवाब न दे पाया। तब रुआँसी होकर बोली ताजा टीका नहीं मिटाते। देख लेना, जब हम न होंगे तब रोओगे...........आज वह बहुत याद आ रहा है। माँ देखने वाली नहीं है, कितना रोता हूँ, कब, कहाँ, कैसे और किस तरह रोता हूँ। वह भूल फिर कभी नहीं की पर वह बात भी नहीं भूल पाया। जन्म की तारीख वही रहेगी, हर साल यह दिन आयेगा लेकिन न ताम्रकर जी का इस दिन जाना भूल सकूँगा और न ही माँ का न होना..............

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

दस

हाशिए हमेशा खाली मिलते हैं। ऐसा लगता है कि सदियों से कोई हाशियों से होकर जाता ही नहीं। उनका इतना उज्‍जवल सा, साफ-सुथरा पथ चकित करता है। पथ की अपनी स्‍वच्‍छता का सिद्धान्‍त है। मनुष्‍य पथगामी है। जो नहीं चलता वो ठहरा हुआ होता है। ठहरे हुए का समय अपनी तरह से आकलन करता है। ठहरे हुए का लोग भी आकलन करते हैं। ठहरे हुए का समाज नहीं होता। उसके आसपास चहल-पहल होते हुए भी एक अलग तरह का एकान्‍त हुआ करता है। वह अपने आसपास की सारी चहल-पहल में भी परायापन महसूस कर सकता है। वह चहल-पहल अपरिचितों की है। कोई उसको पहचान नहीं रहा है जबकि वह प्रत्‍येक में पहचाना जाना चाहता है। ऐसे में उसकी उपस्थिति साफ-सुथरे हाशिए में ऐसे एकाकी की है जो देर तक स्थिर नहीं रह सकता। अपनी बेचैनी बढ़ने से पहले उसे हाशिए के बाहर आना होगा। यह जीते हुए, अपने जिए बने रहने के लिए आवश्‍यक है। हाशिए दूर से खाली मैदान की तरह दीखते हैं पर निश्‍चय ही यह खुला मैदान नहीं होते। खुला मैदान, हाशिए के बाहर होता है। 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

नौ

धरा पर जो भी कालातीत है, वह हमारी धरोहर है। हमारे अपने जीवन और समझ से बहुत पहले, सैकड़ों, हज़ारों साल पहले इसी धरा पर वह सब कुछ रचा और गढ़ा गया है जिसकी स्मृतियाँ आज भी हमारे सामने गौरवशाली और दुर्लभ सम्पदा के रूप में विद्यमान हैं। हम सभी अनेक दुर्गम रास्तों और सुगम दूरियों पर दौड़ते, लाँघते, फलांगते वहाँ जाया करते हैं। समृद्ध इतिहास, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक पूर्वार्द्ध हमें अचम्भित करता है। आज हम जिस अधुनातन युग में हैं, बहुत सारे आविष्कारों, शोधों और तकनीकी चमत्कारों से लैस हैं, बहुत हद तक उसके सम्मोहन में भी हैं और उसकी आसक्ति की कुछ-ब-कुछ प्रामाणिकता के रूप में भी देखे, दिखाये जाते हैं, वास्तव में ऐसे दुर्लभ साक्ष्यों और अचम्भों पर कोई सार्थक अवधारणा और विचार बना नहीं पाते। एक पीढ़ी है जो अपनी विरासत को लेकर जिज्ञासु नहीं है। उसके पास धीरज और धैर्य भी नहीं है। अध्ययन और अध्ययन के प्रति रुचि का भी पता नहीं है। ऐसे मानस के साथ आप भारतीय परम्परा और अस्मिता की धरोहरों के बीच अपनी उपस्थिति भर दर्ज कराते हैं। हमारे लिए सैकड़ों वर्ष पुराना कोई भी बरगद का पेड़ जिसकी जड़ें शाख से झूलती हुईं धरती का स्पर्श करती हैं, झूला झूलने के अलावा कोई महत्व नहीं रखता। हम अपने होने की सार्थकता को ऐसे स्थानों और अवसरों पर किस तरह प्रमाणित करते हैं, इसके ऐसे अनेक उदाहरण प्रायः दिखायी पड़ते हैं..............

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

आठ

गहरी नींद में निरन्तर जागते रहने की अवस्था का पता नहीं है लेकिन ऐसा लगा करता है कि बहुत जागकर नींद में सपनों के साथ रहना असहज बनाये रखता है। न जाने कौन कितनी तरहों के चेहरों के साथ सामने आता है और उसकी उपेक्षा करना सम्भव नहीं हो पाता। उसको देखते रहना, कितनी ही कठिनाई से उसको सहन करना होता है प्रायः। वह करना पड़ता है। सपनों में कई बार चरित्र किले से धराशायी हो जाया करते हैं। सपनों में आगे बढ़ती कथा, व्यतीत को विस्मृति में धकेलकर आगे बढ़ जाती है। यह सब अपने सामने घटित होता देखना होता है। मैं अक्सर तुमको याद करके नहीं सोया करता हूँ लेकिन तुम्हारा आना, अपनी गहरी नींद में बखूबी जागते हुए इसी विरोधाभास से जूझना और इसे हल करने का विफल प्रयत्न करना होता है। स्मृतियों के किवाड़ और कुण्डियाँ जैसे खुले पड़े होते हैं। ऐसा लगता है कि कोई चटखनी लगाना भूल गया है। आले में कुछ सामान रखा हुआ है। अल्मारियों में पुरानी किताबों के भीतर अब भी मोर पंख और तुम्हारी तस्वीर रखी है। वही सीढि़याँ भूल आया हूँ जिनके सहारे यहाँ तक चढ़कर आया था। अब यहाँ से लौटना चाहता हूँ और वे सीढि़याँ दिखायी नहीं देतीं। इन्हीं बेचैनियों में जैसे एक चरम पर जाकर कहानी अधूरी रहेगी और नींद खुल जायेगी। नींद खुलने के बाद इत्मीनान से कौन सोया है भला......................!!!

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

सात


यह आभास कर पाना या अनुमान लगा पाना किसी के लिए भी मुश्किल होगा कि कैसा हूँ? इस प्रश्न का वही उत्तर सहजतः स्वीकार होता है जो दिया जाता है। सभी दिये गये उत्तर को मान्य करते हैं। इस उत्तर को प्राप्त करने के बाद वे तत्परतापूर्वक विषय पर आते हैं। दरअसल विषय ही आजकल ओट में हो गया है। वह धीरे से प्रकट होता है, दो औपचारिक लफ़्ज़ों के बाद। ये ही औपचारिक प्रश्न और उसके उत्तर एक-दूसरे को आश्वस्त कर दिया करते हैं। आज के समय में यह पूछना कि कैसे हैं, कैसा हूँ इसकी ध्वनि भीतर से हँसाती भी है और अब के समय के दस्तूर का पर्याय भी बन गयी लगती है। लम्बे समय से चेहरे के साथ न होना अनेक स्मृतियों में आपको ठीक ही धीरे-धीरे धूमिल करता चला जाता है। चेहरे के साथ उपस्थिति का अपना सरोकार है और चेहरे के बिना आप भले छः महीने न दीखें, संज्ञान में नहीं आते। कोई नहीं जान पाता कि बिना चेहरे के आप कैसे हैं? समय ने आपको कैसा कर दिया है? आपकी देह में कहाँ-कहाँ विपत्तियाँ आयीं हैं? शरीर का नमक घट गया है? अब मिले तो पहचानेंगे कैसे अथवा पहचान में आयेंगे भी कि नहीं? ऐसे अनेक आदि, आदि हैं। चेहरा विस्मृत हो जाने के बाद उसका आकलन कल्पनाभर है, उसमें सुनिश्चित या सच वह नहीं जो सोचा गया है। दूरियाँ जो विस्मृति गढ़ती हैं वह प्रतिकूलताओं के विस्तार में सारी प्रश्नाकुलताओं को भी धीरे-धीरे समाप्त करती जाती है। खालीपन भौतिकी का अपना सच है..................

शनिवार, 7 नवंबर 2015

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अभी चार दिन पहले ही राजेश रोशन का संगीत उनकी ही अगुवाई में लगभग बीस से ज्यादा संगीत सहयोगियों एवं चार या पाँच कलाकारों के साथ सुनने का अवसर आया था तो जैसे अपनी स्मृतियों के चालीस साल ताजा हो गये। वे सब गाने जो अलग-अलग समय में अनेक फिल्मों में सुनते रहे, उनको यहाँ सिलसिलेवार सुनना अन्त:स्फुरण से कम न था। कितने ही गाने, एक रास्ता है जिन्दगी, तुझ संग प्रीत लगायी सजना, तुमसे बढ़कर दुनिया में न देखा कोई और, नजर लगे न साथियों, थोड़ा है थोड़े की जरूरत है, आ री आ जा निंदिया तू ले चल कहीं, छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा, सारा जमाना हसीनों का दीवाना वगैरह, वगैरह। इन सारे ही गानों के संगीत के विवरण जब स्म तियों के आधार पर जाग्रत होने लगे तो लगने लगा जैसे अलग-अलग, उन-उन उम्रों में पहुँच गया हूँ जो किशोर अवस्था की थीं, युवाअवस्था की थीं। वे सब ध्वनियाँ फिर से कौंधी जब तब सुनी थीं, जैसे तुझ संग प्रीत गाने में, तूने मुझे चोरी से अपना बनाया  या तुम से बढ़कर दुनिया में गाने में की शुरूआत चंदू आत्मा की दो पंक्तियों से ग्रामोफोन रेकॉर्ड में चलते हुए बजना और फिर उस गाने को किशोर कुमार द्वारा उठा लेना जिसमें एक लाइन आती है, क्या खूब आँखें हैं तेरी..............जलतरंग भी कमाल का बजा है इसमें। एक रास्ता है जिन्दगी तो मेरा प्रिय गाना, फिल्मी काला पत्थर का, यह बात और है कि यह फिल्म ही मेरी प्यारी स्मृतियों से जुड़ी है, इस गाने में लता जी का स्वर दो बार, ओ जाते राही और ऐसा गजब नहीं ढाना पिया मत जाना बिदेसवा रे, ओह क्या‍ अनुभूति है, एक गाना और सोचा था पर वह उनकी सूची में नहीं था, इस फिल्म का, बाँहों में तेरी मस्ती के घेरे । राजेश रोशन हिन्दी सिनेमा में माधुर्य के उस दौर के सम्राट रहे हैं जब सम्भवत: वे अकेले ही मूल वाद्यों के साथ संगीत रचना कर रहे थे। कोयला में उनका एक गीत देखा तुझे तो हो गयी दीवानी, तबले पर क्या उठता चला जाता है, शीर्ष तक, अन्त तक तबला ही उस गाने को निभाता है। एक और फिल्म लावारिस, अक्षय खन्ना वाली जिसमें आ कहीं दूर चले जायें हम, इसमें बाँसुरी कमाल की बजती है, एक खास मोड़ पर। बहरहाल, इन सब गानों के साथ राजेश रोशन की जीवन्त प्रस्तुति देखते हुए दिमाग में अपनी क्षतियों का भारी द्वंद्व भी साथ चला, एक वक्त जमकर आँखें छलक आयीं, गहरे बिछोह को याद करके, फिर पोंछ-पाँछ कर मंच देखने लगा, आगे-पीछे की व्यवस्थाएँ, और भी तमाम कुछ। स्मृतियों का सन्दूक जब भी खुलता है, जाने क्या‍-क्या देने-दीखने लगता है, सच में..............