मंगलवार, 19 जुलाई 2016

फिर आग बिरहा की मत लगाना

संगीतकार रोशन की जन्‍मशती - 14 जुलाई 2016 - 2017


हिन्दी सिनेमा का इतिहास सौ साल पार कर गया है। हमारे सामने देखते ही देखते ऐसे गुणी कलाकारों की जन्मशताब्दी का वह समय भी आता चला जा रहा है जब हम उनको बीसवीं सदी की सबसे चमत्कारिक विधा में उनके अविस्मरणीय योगदानों के लिए याद कर सकते हैं। यह ऐसे समय में और महत्वपूर्ण और रचनात्मक दृष्टि से अपरिहार्य लगता है जब हमारे आसपास समकालीन के ही विस्मरण का एक अजीब सा, संवेदनात्मक दृष्टि से यदि कहें तो निर्मम सा सिलसिला चल पड़ा है जब आज को आज की खबर नहीं है। ऐसे में एक बड़े संगीतकार रोशन music director roshan को कैसे याद किया जायेगा, जब उनकी जन्मशताब्दी का साल 14 जुलाई से शुरू हो रहा हो। रोशन का याद आना एक बार फिर से अपने समय की उन महत्वपूर्ण फिल्मों का उनकी समग्रता में याद आना है जिसमें उन्होंने संगीत दिया था। रोशन सरोकारों और विशिष्टताओं में कुछ खास गुणों के साथ जाने, जाने वाले संगीतकार थे जिनके समय सिनेमा में बेशक एक से एक श्रेष्ठ संगीतज्ञों के योगदान ने एक स्वस्थ किस्म की स्पर्धा खड़ी की थी लेकिन उनके बीच रोशन का रास्ता भी उजासभरा था। 

कुछ समय पहले ही उनके गुणी बेटे और अब तक के समय के शायद आखिरी मौलिक संगीतकार राजेश रोशन rajesh roshan से कुछ मुलाकातें हुईं हैं। अपने पिता के बारे में उन्होंने कहा था कि बेहद सादगी, मैत्रीपूर्ण व्यवहार और बिना किसी नाज-नखरों अथवा आवश्यकताओं की मांग किए बिना ही पिताजी को श्रेष्ठ रचने का शगल था। वे अपनी धुनों, अपनी रचनाओं को अन्तिम निर्णय पर तब तक नहीं ले जाते थे जब तक उनके पाश्र्व गायक और वे कलाकार जिन पर उनके गीत फिल्माये जाने हैं, उनके साथ अनेक बैठकें नहीं हो जाती थीं और वे परस्पर सन्तुष्ट नहीं हो जाते थे। रोशन को विविध वाद्यों, विशेषकर दुर्लभ वाद्यों के साथ काम करने की चुनौतियाँ उठाने में बहुत आनंद आता था। वे स्वयं इसराज बहुत अच्छा बजाते थे। चालीस के दशक में भातखण्डे संगीत संस्थान लखनऊ में उन्होंने इस साज को साधने की तालीम ली थी और अपने आपको परिष्कृत भी किया था। उस समय के उनके गुरु पण्डित श्रीकृष्ण नारायण रातजनकर जो कि भातखण्डे के प्रमुख थे, उनसे बहुत प्रभावित रहते थे। 

रोशन का पूरा नाम रोशनलाल नागरथ roshanlal nagrath था। पंजाब के गुजरांवाला में उनका जन्म 14 जुलाई 1917 को हुआ था। संगीत के प्रति उनका लगाव शुरू से था, इसका कारण उनके परिवेश का आंचलिक संगीत था। धीरे-धीरे उनकी शास्त्रीय संगीत के प्रति भी गहरी रुचि बनती गयी। ऐसे समय में जब कला के विस्तार के लिए अपने आसपास के विश्व में रेडियो और सिनेमा दोनों का ही आकर्षण संगीत और अभिनय में रुचि रखने वाले युवा के लिए खासा आकर्षण रखता हो, रोशन को लखनऊ का मार्ग अपने लिए ज्यादा उपयुक्त लगा और वहीं से उनकी आगे की यात्रा मुम्बई की ओर होती है। उनको आॅल इण्डिया रेडियो नई दिल्ली में संगीतज्ञ के रूप में काम कर रहे ख्वाजा खुर्शीद अनवर की शागिर्दी भी हासिल हुई जो दरअसल मुम्बई की ओर रुख करने में अनुसरण बनी। रोशन को राजकपूर के गुरु किदार शर्मा एक प्रोत्साहक और यथापूरक भगीरथ की तरह मिले। इसके बाद रोशन की अपनी यात्रा अनेक उतार-चढ़ावों भरी है। 

एकाध फिल्म में छोटे-मोटे किरदार करते हुए वे अपने आपको एक संगीतकार के रूप में बड़ी मेहनत से साबित करने धीरे-धीरे कामयाब हुए। उनकी आरम्भिक फिल्में बावरे नयन, मल्हार, हम लोग, नौबहार, बाप बेटी, चांदनी चैक, बराती, घर घर में दिवाली, दो रोटी, अजी बस शुक्रिया, हीरा मोती से उनको काम करने की निरन्तरता तो मिली लेकिन इतनी फिल्मों में काम करने के तजुर्बे के बाद वह सब बड़ा सुखद और चकित कर देने वाला आया जब उनकी फिल्म बरसात की रात प्रदर्शित हुई। जिन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात और न तो कारवाँ की तलाश है न तो हमसफर की तलाश है जैसे गानों ने जब धूम मचायी तब लोगों ने उसके पीछे संगीत रचयिता रोशन को लाना। इन गीतों के सफल होने के बाद ही दर्शकों को फिर नौबहार में लता मंगेशकर से उनका गवाया गीत, ऐ री मैं तो प्रेमदीवानी मेरा दरद न जाने कोय याद आया। भारतीय दर्शकों के मन-मस्तिष्क में रोशन एक सम्भावनाभरे संगीतकार के रूप में दर्ज हुए। न तो कारवाँ की तलाश है एक लम्बी कव्वाली थी और बाद में रोशन इस बात के लिए भी ख्यात हुए कि उनसे बेहतर कव्वाली कोई और संगीत-संयोजित नहीं कर सकता।

रोशन की ही एक फिल्म आरती का मीना कुमारी पर फिल्माया गीत, कभी तो मिलेगी कहीं तो मिलेगी, बहारों की मंजिल राही लता मंगेशकर के स्वर का एक अविस्मरणीय गीत है जिसका फिल्मांकन और संगीत रचना कमाल की है। बाद में उन्होंने सूरत और सीरत, ताजमहल, दिल ही तो है, चित्रलेखा, नयी उमर की नयी फसल, भीगी रात, बेदाग, ममता, देवर, दादी माँ, बहू बेगम, अनोखी रात आदि फिल्मों की भी संगीत रचना की। वे अपने समय के सभी श्रेष्ठ गायक-गायिकाओं के साथ काम करते थे जिनमें लता मंगेशकर, आशा भोसले, हेमन्त कुमार, मुकेश, मोहम्मद रफी आदि। सभी से उनका अपनापा था, इसलिए भी क्योंकि वे तटस्थ थे और अपने काम के अलावा व्यक्तिगत रागद्वेष और खेमों से दूर रहा करते थे। राजेश रोशन अपना बचपन याद करके बताते हैं कि हम बहुत छोटे थे, घर में उस समय एयरकण्डीशन या कूलर की स्थितियाँ नहीं थीं। छत पर पंखा रहता था और पिताजी कलाकारों के साथ रियाज और अभ्यास में दिन-रात एक कर दिया करते, बिल्कुल पसीने से लथपथ और बड़ी बात यह भी कि बैठक में सहयोगी कलाकार भी उतना ही सहयोग करते और उदारतापूर्वक अपेक्षा किए जाने पर हर समय आ जाया करते। 

न तो कारवाँ की तलाश है कव्वाली के जिक्र के समय यह बात आयी थी कि रोशन कव्वाली तैयार करने में बड़ी दिलचस्पी लेते थे। दिल ही तो है फिल्म में निगाहें मिलाने को जी चाहता है की बात इससे जुड़ती है। उनकी अनेक फिल्में ऐसी हैं जिनके गाने हमारी संवेदना को सीधे जाकर छूते हैं। ताजमहल, जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा या पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी, प्रेम में वचन के निबाह और पैरों की नजाकत को फूलों से बढ़कर ठहराते हैं। चित्रलेखा का गाना मन रे तू काहे न धीर धरे, शास्त्रीय राग पर आधारित है वहीं अनोखी रात के गाने ओह रे ताल मिले नदी के जल में गहरा दार्शनिक, खुशी खुशी कर दो विदा गहन उद्वेलन से भरा भावपूर्ण गाना है। देवर में आया है मुझे फिर याद वो जालिम गुजरा जमाना बचपन का, बहारों ने मेरा चमन लूटकर, दुनिया में ऐसा कहाँ सबका नसीब है भावपूर्ण और मन को गहरे छू लेने वाले गाने हैं। असित सेन निर्देशित फिल्म ममता में उनके गाने छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा और रहते थे कभी जिनके दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह प्रेम की महानता और अनुभूतियों के चरम उत्कर्ष के गाने हैं। रोशन ऐसे गीतों का संगीत रचकर आज भी अमर संगीतकार की तरह याद आते हैं।

राजेश रोशन rajesh roshan अपने पिता को याद करते हैं तो स्मृतियों में बड़े पीछे जाते हैं। वे लगभग दस-बारह वर्ष के रहे होंगे जब रोशन साहब का पचास वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। उन्होंने अपने पिता को अपनी चेतना में बहुत सक्रिय और धुनी स्वरूप में देखा था। बड़े भाई पहले नायक और बाद में निर्देशक बने लेकिन राजेश रोशन ने संगीत निर्देशक ही बनना चाहा। वे बताते हैं कि भैया राकेश रोशन भी संगीत की गहरी समझ रखते हैं, यह पिता का ही संस्कार है और यही कारण है कि उनकी फिल्मों का संगीत तैयार करते हुए मेरे उनसे रचनात्मक द्वन्द्व खूब चलते हैं लेकिन श्रेष्ठता के धरातल पर हम आकर एक हो जाते हैं। अपने पिता के योगदान को राजेश रोशन कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं और कहीं न कहीं अपने आपको गहरी अन्तरात्मा के साथ मौलिकता और माधुर्य के गुणों का बोध बनाये रखने के पीछे पिता के संस्कारों का स्मरण करते हैं। संगीतकार रोशन की आभा रोशनी को उनके अभिनेता और निर्देशक बेटे राकेश रोशन और पोते हि‍ृतिक रोशन ने और समृद्ध किया है। राजेश रोशन का संगीत आज भी जीवन की लय और माधुर्य की असीम अनुभूतियों का अनूठा साक्ष्‍य और उदाहरण माना जाता है।

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रविवार, 10 जुलाई 2016

सुल्तान (Film Review : Sultan)



अली अब्बास जफर (Ali Abbas Zafar) ने लम्बे समय यशराज फिल्म्स में सहायक निर्देशकी की है। उनको शाद अली, संजय गढ़वी और विजय कृष्ण आचार्य के साथ काम करने का लम्बा अनुभव है। मेरे ब्रदर की दुल्हन और गुण्डे उनको स्वतंत्र रूप से निर्देशित करने को मिलीं और सुल्तान (Sultan) उनकी तीसरी फिल्म जिसके लेखक, पटकथाकार, संवाद लेखक और निर्देशक वे हैं। बाजार देखकर कहें तो फिल्म सफल है, सबसे लम्बा सप्ताहान्त फिल्म को मिला है। आकलन करें तो अनेक खूबियों के साथ एक बेहतर फिल्म है। सम्पादन के स्तर पर और सम्हाल लिया जाता तो साढ़े तीन अन्यथा तीन सितारों वाली फिल्म है सुल्तान।

यशराज फिल्म्स (Yash Raj Films) के मूल स्वभाव में पंजाब और हरियाणा के परिवेश, वहाँ की बोली-बानी और नैसर्गिकता को किसी फिल्म की पृष्ठभूमि बनाने का चलन शुरू से है। सुल्तान में हरियाणा है। निश्चित रूप से सुल्तान की कहानी और पटकथा तैयार करते वक्त नायक के रूप में सलमान (Salman) तय हो गये थे लिहाजा उसी हिसाब से चरित्र रचा गया है। मनुष्य को जीवन में लक्ष्य किसी न किसी तरह की चोट खाकर ही दिखायी देता है। यहाँ भी नायक के गाल पर नायिका की हथेली है। एक दिलचस्प फिलाॅसफी है, डाॅक्टर की शादी डाॅक्टर के साथ, इंजीनियर की शादी इंजीनियर के साथ तो पहलवान की शादी भी पहलवान के साथ।

सफलता और लोकप्रियता के साथ अपनी जमीन से उखड़ना, टूटना और अहँकार ओढ़ लेना फिल्म का मोड़ है। यहीं पर एक घटना, दुर्लभ श्रेणी का खून न मिलने की समस्या, ब्लड बैंक स्थापित करने के लिए मंत्री की बरसों से भेजी फाइल के लौटकर न आने की विडम्बना। घोर नैराश्र्य के बाद फिर अपनी शक्तियों को संचित करना, जूझना और जीतना फिल्म का सार है। अनिल शर्मा की अपने, राकेश ओमप्रकाश मेहरा की भाग मिल्खा भाग आदि बीच-बीच में याद आती हैं। हमारे यहाँ पूर्णतः मौलिकता हमेशा समस्या है। प्रेरित या प्रभावित किसी से भी हुआ जा सकता है।

देसी पहलवानी से आधुनिक कुश्ती तक एक माहौल फिल्म में है। एक ऐसा खेल जिसका हीरो एक ही होता है जो जीतता है। फिल्म के दो भाग हैं, एक नायिका को पाने के लिए विजेता बनना जिसमें प्रेम और ख्वाहिशें चरम पर हैं दूसरी ओर दोबारा अपनी पत्नी के हृदय में अपना वही स्थान बनाना जिसे खोया जा चुका है। निर्देशक दोनों जगहों पर अपनी क्षमताओं का परिचय देता है लेकिन पहले भाग में उसकी कल्पनाशीलता निखर कर आती है। हालाँकि पतंग लूटने की दक्षता और उसके प्रसंग आवश्यक नहीं लगते लेकिन रखे गये हैं। इसी प्रकार बाद में भी अप्रासंगिक गाने फिल्म के लिए कोई मददगार नहीं होते। जितनी देर नायक नासमझ दीखता है, उतने समय में सुल्तान अपनी खूबियों के साथ स्थापित होता है। पत्रकारों से बात करते हुए पहले और दूसरे भाग के दृश्य और प्रसंग किसी भी लोकप्रिय या प्रतिष्ठित इन्सान के विवेक को जाँचने के लिए काफी हैं। उत्तरार्ध में कुश्ती में जीतने के जुनून और उसमें हर अगले पल के प्रति अनिश्चितता वह रोमांच खड़ा नहीं करती जो फिल्म को सार्थक रूप से अन्त तक ले जाये। उसमें जितनी देर, कैमरे के जितने नजदीक से सलमान की छबि को लिया गया है, उम्र नजर आती है। यदि पहले भाग की खूबसूरत रूमानी कहानी को ही उत्तरार्ध में भी संवेदनशील विस्तार देते हुए समाधान निकाल लिया जाता तो फिल्म यशराज का एक और बड़ा और इस दौर का अच्छा उदाहरण बन जाती। 

सलमान खान, स्वाभाविक रूप से अपने पहले भाग में खूब जँचते और फबते हैं। अंग्रेजी न जानना, अंग्रेजी में की गयी फजीहत को भी अपने लिए पुरस्कार मानकर उसे अपने लिए दोहराना दिलचस्प है। बड़ी उम्र तक जीवन के अर्थ को न समझना, परिवार में बच्चा बने रहना, मोहल्ले और आसपास भी गम्भीरता से न लिया जाना, बहुतों का बचपन रहा है लेकिन यह भी उदाहरण हैं कि अनेक ऐसों को जीवन एक दिन समझ में खूब आया है। इस फिल्म का खूबसूरत पक्ष यह भी है कि इसमें कोई खलनायक नहीं है, गुण्डे नहीं हैं, उस तरह की मारपीट नहीं है। फिल्म को सीधे-सीधे जीवन और लक्ष्यों के साथ-साथ प्रेम और निष्ठा पर केन्द्रित किया गया है। सलमान इन जगहों पर अपनी क्षमताओं का परिचय देते हैं। झूले पर पदक छोड़ आना और आखिरी लड़ाइयों में वह स्मृतियों में कौंधना प्रभावी लगता है। अपने स्पर्धी को पछाड़ने के बाद नमस्कार करके क्षमा मांगना भी दिलचस्प है। अनुष्का शर्मा यशराज कैम्प की नायिका हैं। सलमान पहली बार उनके साथ हैं। उनको एक पहलवान की बेटी और संस्कार में कुश्ती की दक्षता एक अच्छी स्थापना है। वे मेकअपरहित हैं लेकिन भावपूर्ण दृश्यों में अपनी छाप छोड़ती हैं। उनका अपने नायक से रूठना और बड़ी मुश्किल से माफ करना दोनों गहरे हैं। 

यह फिल्म वास्तव में सहयोगी कलाकारों के अच्छे और आश्वस्त काम से और बेहतर लगती है जिसमें अनुष्का के पिता के रूप में कुमुद मिश्रा, सलमान के मित्र गोविन्द के रूप में अनंत शर्मा, छोटी सी भूमिका में परीक्षित साहनी, दोबारा कुश्ती की दुनिया में लेकर आने वाले परीक्षित के बेटे की भूमिका में अमित साध के किरदारों को याद रखना चाहिए। कुमुद मिश्रा का बांदर वाला संवाद दिलचस्प है। फिल्म के गीत इरशाद कामिल ने खूब लिखे हैं। विशाल-शेखर ने संगीत अच्छा तैयार किया है। राहत फतेह अली, सुखविन्दर सिंह, मीका सिंह और स्वयं शेखर का तैयार किया हुआ पाश्र्व गीत खून में तेरे मिट्टी प्रभावित करते हैं। सुल्तान को आॅर्टर जुराव्स्की की सिनेमेटोग्राफी  के लिए भी प्रशंसा की जानी चाहिए। यह पोलिश सिनेछायाकार मर्दानी से रानी मुखर्जी के सम्पर्क में आये और उनको सुल्तान की सिनेमेटोग्राफी मिली। सुल्तान आॅर्टर की कल्पनाशीलता और जोखिमपूर्ण सिनेछायांकन से ही रोमांचक बनी है। रामेश्वर एस. भगत को सम्पादन करने की थोड़ी स्वतंत्रता और मिलती या वे इसे कसी हुई ढाई घण्टे की फिल्म बनाते तो बात कुछ और होती। सलमान के लिहाज से कहें तो अब भी बजरंगी भाई जान उनकी सुल्तान से श्रेष्ठ फिल्म है। जोड़ने की बात यह भी है कि सुल्तान को इसके बावजूद दर्शक दोबारा देखना चाहेंगे अर्थात इस फिल्म की फिलहाल रिपीट वैल्यू भी है...............

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सोमवार, 20 जून 2016

पचास साल पहले तीसरी कसम



हिन्दी सिनेमा चमत्कार और त्रासदियों के सैकड़ों किस्सों का बिम्बीय साक्ष्य है। ऐसी अनेक कहानियाँ हैं जिनकी स्मृतियाँ सच्चाइयों से बढ़कर हैं, अनेक सच्चाइयाँ हैं जो कहानियों की तरह हमारे जहन में आज तक बैठी हैं। यह साल हिन्दी सिनेमा के विख्यात लेखक, पटकथाकार, शौकिया अभिनेता और एक पूरी तथा एक अधूरी फिल्म के निर्देशक नवेन्दु घोष की जन्मशताब्दी है। नवेन्दु घोष की बेटी वरिष्ठ पत्रकार और सिनेमा आलोचक रत्नोत्तमा सेनगुप्ता अपने पिता के जन्मशताब्दी वर्ष में अनेक उपक्रम कर रही हैं जिसकी शुरूआत वे आज रविवार को कोलकाता से कर रही हैं। इस अवसर पर उनके पिता का आखिरी उपन्यास कदम कदम का लोकार्पण हो रहा है। इसी अवसर पर एक लघु फिल्म मुकुल भी जो उनके पिता, पिता की लिखी एक महत्वपूर्ण फिल्म तीसरी कसम और गीतकार-निर्माता शैलेन्द्र का स्मरण करती है, दिखायी जा रही है। भावुक स्मृतियों में ये सतत संयोग हैं कि नवेन्दु घोष की जन्मशताब्दी के साल ही तीसरी कसम के पचास साल पूरे हो रहे हैं। 1966 में इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ था और यही त्रासद साल फिल्म के निर्माता शैलेन्द्र के निधन का भी है, इस साल फिल्म के साथ ही शैलेन्द्र के निधन को भी पचास साल हो गये हैं।

तीसरी कसम को लेकर उसके प्रदर्शन के बाद, उसकी विफलता और विफलता से आहत होकर शैलेन्द्र के देहावसान के बाद जिस तरह से चर्चा होनी शुरू होती है, वो अपनी तरह का अचरज है। सिनेमा को बहुत गहराई से जानने वाले, सिनेमा के प्रदर्शन और उसके परिणामों का आकलन करने वाले कई बार श्रेष्ठ और उत्कृष्ट फिल्मों के बुरे परिणामों को लेकर चर्चा करते हैं। हम सभी के सामने किसी भी अच्छी या उत्कृष्ट फिल्म का असफल हो जाना कई तरह से चिन्तित भी करता है। हम उसके कारणों में जाना चाहते हैं। कहानी से लेकर पटकथा तक, कलाकारों के अभिनय से लेकर एक-एक दृश्य के निर्वाह तक, चुस्त और कसे हुए सम्पादन, मन को छू लेने वाली गीत रचना, कर्णप्रिय संगीत और आत्मा तक तरलता से बह जाने वाले स्वरों में पगे होने के बावजूद तीसरी कसम का विफल हो जाना वाकई एक गहरी चोट ही कही जाती है जो फिल्म के गीतकार और निर्माता शैलेन्द्र को लगी थी।

तीसरी कसम के बारे में कहा जाता है कि इस फिल्म में काम करते हुए राजकपूर ने निर्माता से एक भी पैसा नहीं लिया था। बासु भट्टाचार्य जो कि बिमल राॅय स्कूल के प्रशिक्षित निर्देशक थे, तीसरी कसम के एक-एक दृश्य, एक-एक फ्रेम पर घण्टों बहस करने और उसके बाद उसे अनुमोदित करने की जिद के साथ आगे बढ़ने वाले फिल्मकार थे। यह उनकी अपनी संवेदनशील सर्जना थी जिसमें उनके लिए पटकथा लेखन का काम नवेन्दु घोष ने किया था जो बिमल राॅय के लिए परिणीता, बिराज बहू, परख, बन्दिनी, देवदास आदि अनेकों श्रेष्ठ फिल्में लिख चुके थे। उनके लिए फणीश्वरनाथ रेणु की यह कहानी, फिल्मांकन के लिए गढ़ना एक बड़ी चुनौती रही है। तीसरी कसम पर बात करते हुए नवेन्दु घोष की बेटी रत्नोत्तमा सेनगुप्ता बतलाती है कि नवेन्दु दा को बचपन से अभिनय का शौक था। वे एक लेखक, कहानीकार होने के साथ-साथ छोटी भूमिकाओं के लिए लगभग लालायित रहते थे। उनके निर्देशक इस बात को जानते थे। यही कारण रहा कि बिमल राॅय, हृषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य आदि की फिल्मों में वे छोटी मगर किसी न किसी उद्देश्य के लिए गढ़े गये किरदार के रूप में दीखते थे। तीसरी कसम में वे उस शराबी की भूमिका में हैं जो नौटंकी प्रदर्शन के समय हीराबाई के लिए बुरे शब्दों का इस्तेमाल करता है और इसके बदले उसकी हीरामन से हाथापाई हो जाती है। इस छोटी सी भूमिका को करने के लिए नवेन्दु दा ने अपने को खूब तैयार किया था। राजकपूर उनसे हँसते थे, आपके साथ झूमा-झटकी का, मारपीट का दृश्य करना कठिन है, मेरे नायक के स्वभाव में भी लड़ाई-झगड़ा किसी फिल्म में नहीं रहा है लेकिन हीराबाई के मोह में मेरे चरित्र का यह उग्र पक्ष भी आपने ही लिख दिया है। सेनगुप्ता जोड़ती हैं कि दृश्य की गम्भीरता और बासु दा के निर्देशन ने पूरी फिल्म को ही एक यादगार बिम्बीय अनुभूति में बदलकर रख दिया था।

तीसरी कसम की सीधी-सच्ची कहानी है जिसका नायक हनुमान चालीसा पढ़ता है, गरीब गाड़ीवान है, बुद्धू सा जिसे जमाने की अकल नहीं है। कैसे वह एक के बाद एक मुसीबत में पड़ता है और चोरी की ढुलाई में पुलिस से पकड़ा जाना, बाँस ढोने से होने वाली दुर्घटना और पिटने पर कसमे खाता है। ये दो कसमें फिल्म के शुरू होने के बीस मिनट के अन्दर हीरामन खाता है। वह दृश्य भुलाये नहीं भूलता जब अपनी भाभी दुलारी से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगता है कि अब ऐसी गलती कभी नहीं करेगा, भाभी का उसके प्रति स्नेहिल होना, हिन्दी सिनेमा का मन को छू जाने वाला मार्मिक दृश्य है। उसकी तीसरी कसम के साथ ही फिल्म का अन्त होता है। एक कथा सी चलती है, उसे एक सवारी मिलती है जिसे उसको चालीस मील दूर के एक गाँव तक छोड़कर आना है। एक अच्छी सी बैलगाड़ी है, स्वस्थ सलोने से बैल हैं, घुंघरू बंधे हैं और हीरामन चला जा रहा है। हीरामन पहले नहीं जानता है कि बैलगाड़ी के भीतर जो भी है वो कौन है? एक स्त्री है, वह कौन है, कैसी है! कल्पनाओं के साथ वह स्मृतिलोक में है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है, सजनवा बैरी हो गये हमार, दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी.......सारे गाने शैलेन्द्र के लिखे हुए, शंकर-जयकिशन संगीत रचनाकार, मुकेश गायक.............गानों का एक-एक शब्द गहरे अर्थों से भरा हुआ, सारा का सारा जीवन दर्शन, जीवन की क्षणभंगुरता का सन्देश, नैतिकता और चरित्र के विरोधाभासों पर बात। 

तीसरी कसम के बारे में इतने वर्षों में कितनी ही बार सोचने का अवसर आया है। अनेक बार इस फिल्म को देखना हुआ है, जितनी परिपक्वता में यह फिल्म देखी है, उतना ही ज्यादा विचलन बढ़ता गया है। इस फिल्म को बनाते हुए शैलेन्द्र इसकी सफलता की कामना के विपरीत परिणामों से छार-छार होकर चले गये लेकिन बाद में जैसे हर कोई इस फिल्म की संवेदना और मर्म की पड़ताल करने लगा। शैलेन्द्र के जीवन के बाद तीसरी कसम जैसे आत्मोत्सर्ग से परिणाम प्राप्त करने वाली उत्कृष्ट फिल्म के रूप में स्थापित हो गयी। राजकपूर और वहीदा रहमान का श्रेष्ठ अभिनय इस फिल्म को दर्शन और अनुभवों में कहाँ से कहाँ ले जाता है। श्वेत-श्याम फिल्म और खूबसूरत छायांकन कमाल है, विशेष रूप से सुब्रत मित्रा के सिने-छायांकन की यह अद्भुत फिल्म है, विशेष रूप से जिस प्रकार हीरामन और हीराबाई की चालीस किलोमीटर की यात्रा को यह फिल्म परदे पर सजीव करती है, ऐसा लगता है कि दर्शक आप इस यात्रा का हिस्सा है, वह अपने आपको डूबा हुआ महसूस करता है जब हीरामन गाते हुए कहता है, चिठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग न बाँचे कोय....................

और भीगी आँखों और हृदय में भरे गुस्से से हीरामन जब बैल को चाबुक मारकर स्टेशन से चल पड़ता है, तीसरी कसम खाते हुए कि अब किसी नाचने-गाने वाली बाई को बैलगाड़ी में नहीं बिठायेगा तो उसके साथ हमारी आँखें भी नम हो जाती हैं......................क्योंकि हीरामन का गुस्सा उन बैलों पर उतरा है जिनको वह बहुत प्यार करता था।

Keywords - Teesri Kasam, Raj Kapoor, Waheeda Rehman, Shailendra, Snunil Mishr, Ratnottama Senguta, तीसरी कसम, राजकपूर, वहीदा रहमान, शैलेन्‍द्र गीतकार, सुनील मिश्र, रत्‍नोत्‍तमा सेनगुप्‍ता

शनिवार, 18 जून 2016

चर्चा / उड़ता पंजाब : ठहरने को कहती एक फिल्म............


अभिषेक चौबे Abhishek Chaubey ने इसके पहले डेढ़ इश्किया फिल्म विशाल भारद्वाज के लिए बनायी थी। उड़ता पंजाब ने उनको यकायक सुर्खियाँ और चर्चा प्रदर्शन से पहले जिन कारणों के चलते दिला दीं, वह आप सभी को पता है, दोहराने का अर्थ नहीं है। उड़ता पंजाब फिल्म दो सप्ताह करीब जिन कारणों से चर्चा में रही, उसने हमेशा की तरह एक काम किया कि सिनेमाघरों में भीड़ भेज दी। यकायक सभी के संज्ञान में आ गयी इस फिल्म के साथ अनुराग कश्यप जो कि इस फिल्म के अनेक निर्माताओं में से एक हैं, लड़े और अखबारों के पहले पेज की सुर्खियाँ भी बने रहे, खैर फिल्म प्रदर्शन से दो दिन पहले वायरल होने के बाद अब सिनेमाघर में है, लोग देख रहे हैं, अपने आकलन कर रहे हैं, राय दे रहे हैं................
उड़ता पंजाब (Review : udta punjab by sunil mishr) एक स्थान पर पीढ़ी विशेष की ही बात नहीं करता बल्कि वह सारे वातावरण को देखता है जिसमें बचपन से लेकर प्रौढ़ता तक हानिकारक नशे का शिकार है, लत में है। बात इस तरह से ज्यादा जोर से की गयी है कि एक जनप्रतिनिधि इसके नेपथ्य में है जिसके प्रभाव से बड़ी आसानी से सारी व्यवस्था अनेक लाभों के चलते इस कारोबार में सहायक है। व्यवस्था में तंत्र से लेकर मनुष्य तक स्थूल और लचर अराजकताएँ कही-सुनी जाती हैं, सिनेमा में अनेक बार दिखायी गयी हैं, यहाँ भी उसी तरह से हैं। निर्देशक, अपनी पटकथा और कसे हुए सम्पादन से छोटे-छोटे दृश्यों में अपनी बात कहता, खत्म करता पूरे विषय को शुरू में ही उसकी भयावहता के साथ स्थापित करता है।
एक सिनेमा बनाते हुए दरअसल दिखाये जाने के उद््देश्यों और उसकी सार्थकता को लेकर हमारा दर्शक बहुत गम्भीर नहीं रहता, इसीलिए वह निर्देशक से भी कोई मांग नहीं करता। हमारे आसपास प्रायः कूड़ा फिल्में इसीलिए बहुतायात में आती हैं। सशक्त विषय और परिश्रमपूर्वक निर्वाह कई बार कुछ फिल्मों को अचानक से सुर्खियों में लाता है, उड़ता पंजाब के बारे में यही कहा जा सकता है। फिल्म में व्यवस्था, अनुशासन, प्रशासन और दायित्व की जगहों पर बैठे लोगों को उनकी जिम्मेदारियों के प्रति आगाह किया गया है। एक घातक नशा केवल घर या परिवार ही नहीं, राज्य और देश को भी किस तरह आर्थिक, सामाजिक और व्यवहारिक दृष्टि से ध्वस्त करता चला जाता है, यह चेतावनी फिल्म का सन्देश है।
यह फिल्म अपने सम्पादक के कौशल, निर्देशक की सूझबूझ और दृश्य गढ़ने की समझ, सधे हुए सिने-छायांकन, पटकथा और संवादों से दर्शकों से सीधे जुड़ती है। उड़ता पंजाब दूसरी साधारण फिल्मों की श्रेणी की फिल्म नहीं है। निर्देशक, पटकथा में मूल लेखक का सहयोगी होते हुए अनेक विवरणों तक जाता है। कई बार किसी गहरे दर्शक को फिल्म विचलित करती है तो आप उसकी सार्थकता का अन्दाज लगा सकते हैं। शाहिद कपूर, करीना कपूर, आलिया भट्ट, दिलजीत जोसांझ, सतीश कौशिक और अनेक सहयोगी कलाकारों के बेहतर काम के कारण आकृष्ट करती है लेकिन आलिया भट्ट और पहली बार परदे पर परिचित हुए दिलजीत जोसांझ के अभिनय की लम्बे समय याद दिलाती है।
आलिया भट्ट ने अपनी उम्र से बहुत आगे जाकर बेहद आश्वस्त होकर अपनी भूमिका निभायी है। दिलजीत तो खैर पूरी तरह किरदार लगते भी हैं। शाहिद कपूर रातोंरात ऊँचाई पर पहुँचे, एक साधारण युवा से बड़े गायक बने शाहिद की पूरी प्रतिभा दायीं आँख से जिस तरह व्यक्त होती है, निर्देशक और इस सितारे ने इस बात को समृद्ध किया है आपस में, दर्शक शाहिद के चरित्र निर्वाह को इस नजरिए से देखें, लोकप्रियता का अहँकार, पराभव की कुण्ठा, भय, चिढ़, गुस्सा और भीतरी पराजय को वे मेहनत से सामने लाते हैं। करीना की भूमिका सीमित है। फिल्म में उनका मारा जाना सहानुभूति प्राप्त करता है, उसी दृश्य को दिलजीत के छोटे भाई के हाथ हुई दुर्घटना से मजबूत किया गया है। सतीश कौशिक ने इस फिल्म में एक दिलचस्प किरदार निभाया है जो बाजार और संवेदना की लोटपोट के साथ धन लगाने और चौगुना करने के कारोबार में बाजार साधने में लगे तथाकथित हितैषियों की छबि को सामने लाता है। सतीश कौशिक, पंकज कपूर के अच्छे मित्र हैं और शाहिद के अंकल भी। दोनों के बीच अनेक बार ऐसे दृश्य घटित होते हैं जो बाजार के गणित को बखूबी जाहिर करते हैं।
गाने-वाने तो खैर ठीक हैं, एक गायक की जिन्दगी से बात ली गयी है पर पाश्र्व संगीत को लेकर इधर युवा प्रतिभाशाली निर्देशक अच्छी मेहनत करते हैं। वातावरण में दृश्य के लिए उतनी ही ध्वनि या प्रभाव जितना उसको सहयोग करे।
फिल्म को समीक्षकों ने भी अपनी-अपनी तरह से देखा है।अलग-अलग सितारे बाँटे हैं जो शायद तीन के भीतर ही हैं। मुझे लगता है कि यह तीन से अधिक सितारे देने वाली फिल्म है...................दर्शक* भी प्रदर्शन के इन तीन-चार दिनों में अपनी उपस्थिति से कुछ कहेंगे ही..................हाँलाकि फिल्म में भी बीच-बीच में दर्शक अनेक गम्भीर दृश्यों, चिन्ताजनक परिस्थितियों को हँसकर या ठिठोली करते हुए प्रतिक्रियित हो रहे थे
*कल दो बजे रात फिल्म देखकर निर्गम द्वार से बाहर निकला तो तीन-चार प्रौढ़ता की ओर बढ़ते युवाओं ने एकदम मुझे पकड़ लिया, पूछने लगे, अंकल आपको फिल्म कैसी लगी............और फिर सभी समवेत खिलखिलाते हुए बोले, डिस्प्रिन के लायक न................मैं उनको चकित भाव से देखता हुआ बिना कुछ कहे आगे चला गया...................हमारे दर्शक वर्ग......

Keywords - Udta Punjab, Anurag Kashyap, Abhishek Chaubey, Sunil Mishr, उड़ता पंजाब, अनुराग कश्‍यप, अभिषेक चौबे, सुनील मिश्र
+Sunil Mishr 

मंगलवार, 14 जून 2016

सदियॉं और समय


नहीं पता होता कि कभी-कभी समय सदियों की तरह व्यतीत होता है। ऐसा लगता है कि एक बार हाथ से छूटा फिर हाथ में आकर इकट्ठा हो गया है। उसको देखने की कोशिश करता हूँ। छूने या स्पर्श करने से पहले अजीब सा भय सताता है। समय अपना चेहरा उस ओर मोड़े हुए है, मैं उसको बिना बाधित किए उसकी ही ओर से जाकर उसे देखना चाहता हूँ। मैं समय में प्राणों का स्पन्दन देखता हूँ। मुझे फिर छूने की इच्छा होती है। कुछ भय मेरे साथ चलते हैं और थोड़ी ही देर में उनको मुझमें आकर ही मर जाना होता है। पता नहीं कितने भय, कब-कब आकर मर गये। साँस अपनी तरह की एक अलग ही घड़ी है। उसकी सेकेण्ड की सुई पता नहीं कौन छेड़ दिया करता है। वह हमेशा एक स्पर्श के साथ समरस होती है। अनेक बार ऐसा होता है कि स्पर्श कामनाओं के पक्षी के पंख मारे डर के मजबूती से थामे एक देश से दूसरे देश उड़ा चला जाता है। स्पर्श का छूटना, सपनों का टूटना होता है। सपनों के टूटने पर नींद खुल जाती है। नींद खुलती है तो सच दिखायी देने लगता है। स्वप्न अपने भरम है, जागे यथार्थ मेरा अपना साधारण सा चेहरा.............................प्रयत्नपूर्वक मैं उसी चेहरे के साथ मुस्कुराकर अच्छा लगने की कोशिश करता हूँ......................निष्फल कोशिश...........

शनिवार, 11 जून 2016

तीन : स्‍थूल पटकथा, ईमानदार निर्वाह और महानायक के लिए............



एक नाना, अपनी नातिन की आठ साल पहले हुई हत्या के बाद से ही एक-एक दिन हत्यारे के पकड़े जाने, उसका कुछ सुराग मिलने, कुल मिलाकर इन्साफ के लिए हर दिन भटक रहा है। वह रोज पुलिस स्टेशन जाता है, आता है। महिला थानेदार, फिल्म की नायिका विद्या बालन जिनकी छोटी भूमिका है, वो बड़े हल्के ढंग से उससे कहती हैं कि अपनी सुन्दर बीवी को छोड़कर क्यों भटका करते हो या यहाँ आ जाया करते हो, तो वह बताता है कि उसी के लिए यहाँ रोज आता हूँ। रिभु दासगुप्‍ता की नयी फिल्‍म तीन (film review : Te3n by Sunil Mishr) पर चर्चा करते हुए बात इस सन्‍दर्भ से इसलिए शुरू कर रहेे हैंं क्‍योंकि इस फिल्‍म के दफ्तर, सार्वजनिक सुविधा सहूलियतों के स्‍थान, पुलिस स्‍टेशन में एक आदमी रोज अपनी घुटन और बेचैनी में चक्‍कर लगा रहा है, दरअसल वह सोयी और उदासीन मानसिकताओं को जगाने की कोशिश में है...............
अमिताभ बच्चन Amitabh Bachchan फिल्म के केन्द्र में हैं। जब नातिन को दफनाया जा रहा था तब दामाद ने जाॅन पर आरोप लगाया था कि तुम्हारी वजह से वो मारी गयी। जाॅन यही सब क्लेश लिए भटकता है। वह घर में खाना भी पकाता है, व्हील चेयर पर पत्नी है, उसको परोसता भी है। बाजार भी जाता है, मछली खरीदने। महँगे सौदे के खिलाफ बहस भी करता है। पुलिस से पादरी हो गये मार्टिन दास से वह निरन्तर मिलता है और अब भी मदद मांगता है। यह दिलचस्प है कि एक दिन अपने ही जुनून में वह अपराधी तक पहुँच जाता है और वही घटना दोहरायी जाती है। इस बार अपराधी के नाती का अपहरण जाॅन ने किया है, लक्ष्य है अपराधी पकड़ा जाये। अन्ततः अपराधी को ऐसा बेबस कर देता है कि वो पहले के साथ दूसरा अपराध भी अपने सिर ले लेता है।
सिनेमाघर में ऐसी गम्भीर फिल्म के दर्शक बहुत ज्यादा नहीं होते। धोखे से कुछ आ भी गये तो जल्दी चले जाते हैं, कई बार निस्तब्धता में खर्राटों की आवाज भी सुनायी देती है। फिर भी सिनेमा में बुनी गयी कथा, उसके साथ किया गया, कलात्मक और तकनीकी बरताव, गीत-संगीत, यहाँ तक कि पाश्र्व संगीत और कलाकारों का अभिनय आदि इतने सब के साथ जो फिल्म देखना चाहते हैं उनको यह फिल्म एक हद तक बांधती है।
निर्देशक रिभु दासगुप्ता, सुजाॅय घोष के शिष्य हैं। सुजाॅय जिन्होंने कहानी फिल्म बनायी थी, रिभू को एक बड़ा चैलेन्ज देते हैं। रिभु इसके पहले युद्ध धारावाहिक कर चुके हैं।
अमिताभ बच्चन और नवाजउद्दीन के साथ वे सूझबूझ के साथ काम करते हैं। नवाज का किरदार अमिताभ बच्चन के दृश्य और संवादों के बीच बहुत ज्यादा अर्थपूर्ण नहीं हो पाता लेकिन अलग से उनके दृश्य अच्छे हैं। बेडौल होती विद्या बालन एक अच्छी पुलिस इन्सपेक्टर भी साबित नहीं हो पातीं, यह अनेक बार दिखायी देता है। रिभु ने बंगला सिनेमा के सब्यसाची मुखर्जी और दक्षिण से पद्मावती राव को लिया है। इधर हिन्दी सिनेमा के दर्शकों के लिए ये चेहरे उतने परिचित न हों पर गुणी कलाकार हैं। अमिताभ बच्चन जिस तरह से इस फिल्म में दिखायी देते हैं, ऐसा लगता है कि पूरी पटकथा को उनको ही केन्द्र में रखकर लिखा गया है। निर्देशक-निर्माता की पहले ही यह स्वीकारोक्ति ईमानदार है कि उन्होंने कोरियन फिल्म मोंताज को इस रूप में बनाया है बजाय इसके कि खोजी समीक्षक यह बात कहीं से ढूँढ़कर लिखा करें।
अमिताभ बच्चन की पूरा व्यक्तित्व कैमरे की खासी पहुँच के कारण उस उम्र को प्रकट करता है, जितने के वे हैं, वे अपनी उम्र के विपरीत हौसले का परिचय देकर बहुत ज्यादा आकृष्ट करते हैं। किरदार पर की जाने वाली मेहनत का कुछ बार प्रत्यक्षदर्शी मैं भी हूँ, लगता है कि कैसे एक वृद्ध आदमी, एक गहरी व्यथा मन में लिए अपने आसपास से जूझ रहा है, आठ साल से पुलिस स्टेशन रोज जा रहा है, सुराग मिलने पर कब्रिस्तान दो महीने से रोज चक्कर लगा रहा है, सरकारी दफ्तरों में जाकर परिणाम प्राप्त करने की कोशिश हैं। इन सबके बीच में बाबू तंत्र, काम टालने की प्रवृत्तियाँ, फरियादी को चक्कर लगवाने का शगल और अन्य सामाजिक-व्यवहारिक व्याधियाँ भी इस फिल्म में देखने को मिलती हैं। फिल्‍म में अमिताभ का सड़क पर स्‍कूटर पर होना, पीछे नवाज के साथ एक जगह से दूसरी जगह जाने के दृश्‍य उल्‍लेखनीय हैं। उल्‍लेखनीय यह भी है कि नातिन के कातिल को तलाशते हुए वे दुखी, हारे-थके और व्‍यथा से भरे दीखते हैं मगर जब वे कातिल के नाती को अपहरित कर उसके साथ खेल रहे होते हैं तो नवाज से बातचीत करते हुए उनका विजयी सा व्‍यक्तित्‍व अलग ही दिखता है, यहाँ वे उस तरह से शिथिल या दीनहीन नहीं दिखायी देते।
निर्देशक और उसका सिनेछायाकार तुषार कांति रे बखूबी अपनी कथा को स्‍थानों और दृश्‍यों में सार्थक करते हैं। कोलकाता है तो वहाँ का परिवेश है, पुराने से पुराने और अजाने स्थानों का प्रकट और प्रतीक दीखता है, ट्राम हैं तो उनके पुराने डिपो हैं जिनको पुराने वृक्षों की जड़ों ने जकड़ रखा है। पाश्र्व संगीत की अपनी ट्यून है, जितना जरूरी है, उतना ही, मुम्बइया कर्कशाँय नहीं। इन सबके बावजूद पटकथा के स्तर पर काम स्थूल जान पड़ता है। मध्यान्तर के पहले का भाग अधिक लम्बा हो गया है, रहस्य भी देर तक रहस्य नहीं रह पाता इसीलिए सवा दो घण्टे की फिल्म भी बड़ी लगती है। इन सबके बावजूद फिल्म को देखा जाना चाहिए। वो सिनेमा जो मेहनत से किया गया हो, उस तक जाना अच्छे दर्शक का फर्ज भी है, यही...................

।। लिखे-बोले के प्रूफ़।।



उस रात जब नींद नहीं आ रही थी, तब पड़े-पड़े मैं यही सोचता रहा कि लिखे हुए पैराग्राफों और कम्पोज़ की हुई कितनी ही किताबों के प्रूफ़ पढ़ने में अपनी दक्षता हासिल करने के बाद भी बहुत सी बातें मैं खुद न समझ पाया। जब नया-नया सीखा था तब प्रायः गल्तियाँ छूट जाया करती थीं। उन छूटी हुई गल्तियों को मुझे बड़े पकड़ लिया करते थे जो स्वाभाविक रूप से मुझसे ज़्यादा ज्ञानी थे। वे मुझे उन गल्तियों का एहसास कराया करते थे। अधिकतर तो मेरे साथ यही हुआ कि जब-जब गल्तियाँ चिन्हित हुईं, मुझे उन्होंने इंगित करते हुए यही बताया कि इस सही शब्द का ज्ञान तुम्हें अब हो जाना चाहिए और अगली बार जब यह शब्द तुम्हारी निगाह से गुजरे तब सही-सही ही जाये। मैं एक तरह से, इसे अपने बच जाने का एक अवसर ही माना करता था। हाँ लेकिन वह भी सोच लिया करता था कि अब की बार यह शब्द उस ही सच की तरह जायेगा जैसा बता दिया गया है। अगर नहीं गया तो शायद लज्जित होना पड़ेगा।

कुछ डर कह लीजिए और कुछ अपने लिए सबक भी कह सकते हैं कि धीरे-धीरे वे गल्तियाँ सुधारता गया जो किया करता था। तब मैं यह भी सोचता था कि जिस तरह से जानकार और मेरी गल्तियों पर पेंसिल रखकर जताने वाले मुझे सही का ज्ञान कराया करते हैं, जब मैं इन सब बातों को अच्छी तरह समझने लगूँगा और फिर मुझे किसी की गल्ती जाँचने का मौका मिलेगा तो मैं भी इसी तरह उन्हें चिन्हित करूँगा और जिससे गल्ती हुई होगी, वह आगे चलकर उन्हें ठीक करने के अवसर पाये, इतनी उदारता रखूँगा।

यह भी कहने की बात ही है कि एक समय बाद वह दौर भी आ गया। पढ़ा हुआ इस बात का भी प्रूफ़ होता था कि कोई सी भी प्रूफ मिस्टेक नहीं है। लेकिन इधर यह भी देखने का बोध नहीं हो पाया कि अपने कहे-बोले में कितने प्रूफ सुधार की गुंजाइश है? बरसों ही बीत गये, कहिए तब यह बात प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर लिख पा रहा हूँ। ऐसा लगता है कि जीवन में प्रूफ की गल्तियाँ कभी भी हो जाया करती हैं। समय के साथ मैं यह उदारता बरत रहा हूँ कि छपे हुए में प्रूफ की भूलों को देखकर कुछ नहीं कहता। एकाध बार इस तरह का उत्तर मिला कि मैंने देखा तब सही था या सही तो लिखा था, पता नहीं कैसे हो गया? अबोध उत्तरों पर यही लगा कि व्यवहार में अब इसकी बहुत जरूरत नहीं रह गयी है। प्रूफ़ की भूलों से तैयार छपे हुए का भी स्वागत किया जाना चाहिए। 

देखता हूँ कि अब अपनी ज़िन्दगी में सब लिखे, अधलिखे फलसफों के प्रूफ ठीक से देखे जाना चाहिए। बहुत जल्दी हुआ करती है लिखने की, पन्नों को भरते रहने की और पता नहीं इसी में शब्दों का हिसाब-किताब गलत हो जाता है। हिसाब-किताब शब्द का अर्थ गुणा-भाग सा नहीं है, ज़ाहिर है पर मन करता है, फिर जैसे पन्ने उलटने की कोशिश करूँ। अब तक सारी आपाधापी पन्ने पलटने की रही है। मन करता है कि ठहर जाऊँ और पलटना बन्द करके, पन्ने लिखने के बजाय पन्ने उलटकर ध्यान से प्रूफ देखूँ। व्यवहार और चलन दोनों के ही इस बदल चुके ज़माने में उन सारी पटरियों को, जितना बन सके, दूर तक देख लेना चाहता हूँ, मुड़ने के बाद जिनका पता नहीं चलता। मुझे मोड़ के पश्चात उस अदृश्य से घबराहट महसूस होती है। 

रात गहराती है, वे पंछी अपनी आवाज़ से भ्रम पैदा करते हैं जो सुबह-सुबह आकाश में उड़ते हुए अपने पुरुषार्थ को समूह में जाया करते हैं। भौंकते हुए कुत्ते अचानक रोने लगते हैं, उनके रूदन पर न गुस्सा आता है और न ही डर लगता है। नींद में ही समझने की कोशिश करता हूँ कि वे जरूर पीड़ा महसूस कर रहे होंगे, असहृय पीड़ा जिस बर्दाश्त न कर पाने के कारण वो रो रहे हैं....................

शुक्रवार, 10 जून 2016

अपने हिस्से का सच

अपने हिस्से का सच बताना मुश्किल होता है। कहना मुश्किल है कि कई बार या हमेशा ही पर मुश्किल तो होता है। अपने हिस्से का स्वार्थ छुपाया नहीं जाता, अपने हिस्से की नफरत छुपायी नहीं जाती, अपने हिस्से का प्रेम छुपाया नहीं जाता, अपने हिस्से की ईष्र्या छुपायी नहीं जाती, बहुत कुछ ऐसा जो अपने हिस्से का प्रकट हो ही जाया करता है। पता नहीं क्यों बिना कहे अपने हिस्से का झूठ जाना जाता है, सच जाने, जाने से रह जाता है। स्वप्न अक्सर आधे रास्ते में छोड़ दिया करते हैं। नींद कई बार नहीं आती। नींद का आधा होना कौन जानता होगा? नींद का टूटना और फिर न आना सब जानते हैं। अधूरी इच्छाएँ और कामनाएँ लिए हम नींद की खोह में चले जाते हैं। नींद में हमारे लिए वही स्वप्न रचे रखे रहते हैं जो साकार के प्रतिपक्षी हैं फिर भी हमें स्वप्न चाहिए। बिना स्वप्न के नींद व्यर्थ है। स्वप्न जीवन को सिलसिला देते हैं और जीवन स्वप्न को बार-बार नींद में आने का अवसर। जागते हुए दिन में हम मन के सन्दूक से बहुत सा मस्तिष्क के सन्दूक में और मस्तिष्क के सन्दूक से बहुत सा मन के सन्दूक में उठाया-धरा किया करते हैं। हमारी चेष्टाएँ नींद के साथ ही मूच्र्छित हो जाया करती हैं। उसके बाद हम स्वप्नकथाओं में अपने आपको ही घटित होते देखा करते हैं। देखे हुए स्वप्न अधूरे सिनेमा की तरह होते हैं और बहुत दिनों तक उत्तरार्ध की बाट जोहते हुए हम नींद की खोह में जाया करते हैं पर हमारे हाथ एक और अधूरा सिनेमा लगता है। कई बार समझ में आता है कि नींद से जागना और उठना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं। हम जागे होते हैं मगर उठे नहीं होते, प्रायः हम उठ गये होते हैं पर कितने जागे हैं, यह पता नहीं चल पाता। सच इन सारी चेष्टाओं के बीच एक अन्तहीन धागा है जिसे हम विश्वास रूपी एक विराट बरगद के तने पर जीवनभर लपेटकर परिक्रमा सी किया करते हैं अपने को साबित या प्रमाणित किया करने की। न तो धागा खत्म होता है और न ही परिक्रमा। अपने हिस्से का सच अनन्तकाल तक अव्यक्त ही बना रहता है....................... 

सोमवार, 30 मई 2016

।। कटहल का स्वाद।।


आज शाम फेबु मित्र भारती जायसवाल Bharti Jaiswal ने अपने घर में कटहल बनाते हुए उसकी लज्जत और स्वाद पर दो बातें कहीं तो मेरा भी कटहलप्रेम जाग्रत हो गया। मैंने उनको लिखा कि कटहल की सब्जी पर मैं अपनी भी कुछ बातें रखूंगा।
कटहल का स्वाद मैंने अपनी नानी के हाथ की बनायी सब्जी से जाना। कानपुर में बड़े फलक वाले कटहल की स्मृतियाँ हैं बचपन की। नानी को बहुत पसन्द था। वे तरीदार, सूखा सब तरह का बनाती थीं। यहाँ तक कि कटहल का दो तरीके का अचार भी, एक मसाले वाला और दूसरा सिरके वाला। बड़े पहले कटहल को सब्जी बेचने वाला तौल कर दे दिया करता था। आजकर उसका छिलका उतार देता है तो बड़े सधे हुए चाकू से खटाखट टुकड़े कर के भी। तब कटहल को घर में ही लाकर छीला और काटा जाता था। घर में काटने से नानी और माँ उसको इस तरह टुकड़े करती थीं कि बीज आधा अधूरा न कट जाये। कटहल खाते हुए उसका बीज निकालकर, छिलका दांत से ही छीलकर भीतर का गूदा खाना और भी अच्छा लगता था, वैसा जैसा उबल सिंघाड़े का स्वाद।
अब बाजार से खरीद और कटवाकर लाया कटहल सुडौल कटा नहीं होता। उसके बीज भी पूरे खाने में नहीं आते। दुकानदार एक सीध में रखकर खटाखट बहुत बड़े-बड़े क्योंकि वे जल्दी में रहते हैं और टोक दो तो छोटे-छोटे टुकड़े काटे, थैली में भरकर पकड़ा देते हैं। आपके पास उसी को बनाने के अलावा विकल्प नहीं क्योंकि उसको घर में छीलना-काटना बहुत मुश्किल और समयसाध्य काम है। कटहल को प्याज-लहसुन के मसाले में भूनकर बनाने का स्वाद ही अलग है। सूखा बनाओ तो दाल-चावल के साथ। तरीदार कटहल, मोटी रोटी या टिक्कड़ के साथ सुहाता है, गेहूँ-चने की रोटी के साथ भी और मोटे परांठे के साथ भी। तरीदार कटहल के साथ चावल खाना भी आनंददायक है। नानी और मम्मी जब कटहल बनातीं थीं तो थाली में कैरी की चटनी या सिरके में डूबे प्याज के साथ बहुत मजा आता था।
कटहल अब भी घर में उसी तरह खाते हैं। नानी का हुनर माँ के पास, माँ का हुनर बहन-बहुओं-बेटियों के पास, जो जितना ग्रहण कर ले लेकिन हर समय अलग-अलग समय में उन स्वादों की स्मृतियाँ बनी न रहें तो कैसे एक कटहल भर पर चार सौ शब्द लिख पाते भारती जी....................... आशा है आपने कल के लिए सब्जी बचा ली होगी। जरूर उस सब्जी को हमारी सुझायी सहायक खाद्य सामग्री से खाकर देखिएगा।

शुक्रवार, 27 मई 2016

आगे रास्ता बन्द है..............


कई बार ऐसा होता है, उस रास्ते पर हम चलते चले जाते हैं जो आगे जाकर बन्द हो जाता है। बहुधा पता नहीं होता इसलिए ही ऐसा होता है। कितने ही लोग ऐसा पथ चुनते हैं जो आगे चलकर एक जगह पर अनेक रुकावटों में बदल जायेगा। सड़क हमें वहाँ ठहरा देगी। हम भी ठिठक कर रह जायेंगे क्योंकि इस रास्ते पर हमारा पहले चलकर कभी आना नहीं हुआ। आसपास के अनेक मार्गों को देख लेने के बाद भी हमने उस रास्ते से आगे जाना तय किया जो कुछ समय बाद पूरा हो जाने वाला है।

जब हम जा रहे थे तब उसी रास्ते से हमें लौटते हुए लोग भी मिले जिनको हम पहचानते नहीं थे। जिस तरह हमने, उसी तरह उन्होंने भी एक निगाह तो कम से कम देखा ही लेकिन वे हमको रास्ते के अधूरे होने के बारे में बता नहीं पाये। हो सकता है उनका यह सोचना रहा हो कि इनकी जगह थोड़ा पहले हो सकती है और अगर ऐसा हुआ तो इनको बन्द रास्ते का मुँह देखना नहीं पड़ेगा। हम लेकिन यह सोच सकते हैं कि ऐसा मार्ग जो आगे चलकर बाधित हो गया है, उस मार्ग से लौटते हुए ये हमें सचेत कर सकते थे। उस अन्तिम छोर पर हम भी औरों की तरह जाकर ठहर ही गये।

वैसे कितना भी दूर चले जाते यदि रास्ता बाधित न होता लेकिन एक व्यवधान देह और मन से अचानक ही बहुत कुछ झटकार कर छुड़ा लेता है। इसी बीच हमारी निगाह एक-दो और ऐसे लोगों पर जाती है जो हमसे पहले यहाँ तक आकर हमारी ही तरह अपने आपको खासा थका हुआ मानकर खड़े-खड़े सुस्ता से रहे हैं। अपने रुमाल ही को पंखा बनाकर झलते हुए वो लगभग पहचान वाले हो गये। कहने लगे, अगर रास्ता बन्द है तो पहले ही लिखा होना चाहिए। सब उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं। मुझे लगता है कि सही कह रहे हैं। इस रास्ते पर न जाइये, यह पहले ही लिख दिया जाना चाहिए।

उस सिरे के एकान्त में तीन-चार लोग इसी बन्द रास्ते से अनेक बन्द रास्तों की बात करने लगे, बतलाने लगे कि कहाँ-कहाँ रास्ते बन्द हो चुके हैं, स्वस्थ बने रहने के, दो रोटी चैन से खा सकने के, सड़क पर सुरक्षित चल पाने के, रोजी-रोजगार के, महँगाई से बचने के, आगे बढ़ने के, प्रेम करने के, इस भीषण गरमी से निजात पाने के................इसके आगे भी...........

यही चार-पाँच लोग फिर आपस में एक-दूसरे से इसी तरह की बातचीत करते हुए वापस लौटे और उस जगह पर आकर फिर खड़े हो गये जिस जगह से आगे चलकर यह बन्द हो जाने वाला रास्ता शुरू हो रहा था। सबने मिलकर आपस में बात की और वहीं आसपास जमीन पर पड़े कागजों, लकड़ी की तख्तियों और बाँस को जुटाकर सबके लिए एक सूचना लिखकर लगायी - आगे रास्ता बन्द है..............

शनिवार, 21 मई 2016

काला पत्थर (1979)


मुझे विजयपाल सिंह का स्मरण अक्सर हो आता है। जीवन की एक विफलता और उसके प्रायश्चित को जीता हुआ कोयले की खदान का एक मजदूर। एक आदमी अपनी चुप्पी में क्या कुछ बोलता है, उसको उसकी दिनचर्या से जानने की कोशिश होती है। खदान के मजदूरों के काम पर आने का समय बतलाने वाला सायरन उसे जगाता है। जागने से पहले उसका सोये होना, जागने पर अपने फावड़े के साथ घर से निकल पड़ना, खदान में उतरना, पूरा समय काम करना, खाने का समय, आसपास दुर्घटनाएँ, नियति और अनेक नियोजित, अनियोजित दुश्वारियाँ उसके बीच लम्बे सन्नाटे से भरे समय में पूर्वदीप्ति जिसमें कोर्टमार्शल और अपने आसपास के अपमानित करते लोगों के बीच पदच्युत होना, उस पूरे समय और समाज से बहिष्कृत कर दिया जाना जिसका हिस्सा बगैर जी पाना असम्भव होता है। अनन्त लम्हा अपनी पहचानहीनता के साथ व्यतीत करना एक बड़ी चुनौती। विफलताएँ मानस पटल से मिटती नहीं, पराजय अनन्त काल तक पीछा छोड़ती नहीं और हतप्रभता के साथ साँसों के चलने की आवाज भी सुनायी नहीं देती।
काला पत्थर (1979) फिल्म kala patthar (1979) जैसे मेरे मन में रखी रहती है। विफलताएँ नियति के साथ लेकर चलती हैं। प्रायः शब्द धुंधले नजर आते हैं जब आँखों में आँसू भरे होते हैं। इस फिल्म में कम से कम तीन नायक याद आते हैं। इनमें से एक नायक अपने पछतावे को, बड़े ही कठिन समय में लिए अपने निर्णय को गलत सिद्ध होते देखता है। सलीम-जावेद ने इस फिल्म को लिखते हुए नायक के पलायन और उसके सुदूर कठोर और लगभग आत्महीन संसार में होने को रेखांकित किया है। विजय की सारी चेष्टाओं को देखते हुए लगता है कि कैसे मानस में मनुष्य अपनी थकन से बाहर आना नहीं चाहता, अपनी उदासी को दूर करना नहीं चाहता, अपने हाल से बाहर आना नहीं चाहता। अनेक प्रश्न और भी लेकिन वे तभी जब काला पत्थर को एक बार फिर से देखा जाये।
काला पत्थर का संगीत, गीत मुझे एक अलग अनुराग से जोड़ता है, उसके साथ एक बड़ा प्रीतिकर निजी एहसास जुड़ा हुआ है जो मेरा अपना है। जिससे जुड़ा है उसको कभी पहली बार बतलाया था। काला पत्थर में एक अहम नैरार्श्य के बावजूद जीवन के रंग हैं। प्रेम है, अल्हड़ता है, अक्खड़ता है और भी बहुत कुछ। काला पत्थर के नायक से जीवन के सबक सीखने को मिलते हैं। आपका निर्णय, आपकी प्रत्युत्पन्नमति और बहुत ही अच्छी या उत्तरदायी कामनाओं के बावजूद कैसै विफलता में तब्दील हो जाते है, यह इस फिल्म का मर्म है। विफलताएँ किसी भी मनुष्य के पुरुषार्थ पर सन्देह करने की स्वतंत्रता नहीं देतीं।विफलताएँ दरअसल अनेक बार मनुष्य की नियति यदि न भी कहा जाये तो उसको सम्हलने के अवसर जरूर देती हैं, पुनर्विचार के अवसर जरूर देती हैं। कई बार किसी भी मनुष्य को उसका बहुत सारा आसपास भी विफल बनाता है..........................

रविवार, 8 मई 2016

सिंहस्थ महाकुम्भ.............अनूठा, विलक्षण, कल्पनातीत


सिंहस्थ महाकुम्भ में अपने ही रुझानों और कर्तव्यों के साथ एक अच्छा समय व्यतीत करने का अवसर आयेगा, इसकी कल्पना नहीं थी। महाकाल, हरसिद्धी, सान्दीपनि आश्रम और माँ शिप्रा के आशीष और सान्निध्य का ही यह प्रभाव है कि अपने जीवन में पहली बार भारत की अस्मिता के अर्थ, भक्ति परम्परा, आस्था और श्रद्धा के अनेक आयाम, अनेक विस्तारों को देखने का पुण्य है। उज्जैन नगरी में दोपहर जितनी तपती है, सांझ और रात्रि उतनी ही सुरम्य, ठण्डी और अनुभूतिजन्य बयार से भरी हो जाती है। यहाँ आकाश की छत्रछाया में ऐसे अवसरों का सौभागी होना ऐसे आभासों को दर्शन में बदल देता है जो कल्पनातीत है। शहर भर में ध्वनि और स्वर के साथ विद्या और ज्ञान का प्रवाह हो रहा है। देश भर के कलाकार, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी आकर आचमन कर रहे हैं और पुण्यसुख के साथ अपने घर लौट रहे हैं। उज्जैन शहर के आसपास मालवा से लेकर निमाड़, पास में राजस्थान और अन्य अनेक स्थानों से प्रतिदिन लाखों लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं। जो जहाँ थक जाता है, वहीं बैठ जाता है, जिसे जहाँ विश्राम की इच्छा हो, वहीं उसे गहरी नींद आ जाती है। पिता और माता के कंधों पर नन्हें बच्चे हैं, पितृपुरुषों और आदरणीयाओं के सिर पर उनका कम से कम पाँच-सात किलो का सामान है, रेला का रेला चला जा रहा है, सड़कों पर जैसे देश चलायमान हो गया है। गति ऐसी की बहाव को भी चुनौती दे दे। सबकी एक ही आकांक्षा है, शिप्रा में स्नान और प्रभु महाकाल का दर्शन। मन-जीवन को तृप्त करने की आकांक्षा। शिप्रा तट पर पूरी रात उजाला रहता है, प्रकाश रहता है, लोग रहते हैं, देश रहता है। लोग स्नान करते हैं, सिर में माँ शिप्रा के जल की बून्दों से अपने जीवन को धन्य करते हैं। घाट पर घण्टों व्यतीत करते हैं, चलते हुए, टहलते हुए, बैठे हुए। माँ का सान्निध्य ऐसा है कि पास से हटने का मन ही नहीं करता। कितने चेहरे, कितने परिधान, कितने भाव, कितनी चेतना, कितना आत्मविश्वास, कितना जीवट ओह.......हो..............हर दर्शन, हर दृश्य दरअसल इस जीवन में अपने होने के अर्थ को सार्थक करता हुआ, अपने पुरुषार्थ का आदर्श प्रकट करता हुआ, अपने अनुराग में भक्ति को उच्च शिखर पर स्थापित करता हुआ.....................इस तीर्थ में, इस महापर्व में हम मालवा की भूमि में अपने आपमें, उस आध्यात्म बिन्दु में स्वयं को लीन किए हुए लोग दीख रहे हैं। सब कुछ अनूठा है, विलक्षण है, कल्पनातीत है.......................

शुक्रवार, 6 मई 2016

।। चार आँसू विधि के लिए।।

बहुत मन कर रहा है कि चार आँसू उसके लिए रोऊँ आज। हालाँकि उससे अधिक रो भी चुका हूँ जब से बहन ने बताया कि विधि आज हम सबको छोड़कर चली गयी। यह आत्मकथ्य लिखना बहुत मुश्किल हो रहा है लेकिन यह अपने से अपना ही हठ है क्योंकि ग्यारहवीं पास करके अमरपाटन सतना से भोपाल पढ़ने आने वाली विधि का चेहरा भुलाये नहीं भूलता जो बहन की पक्की सहेली बनी। विधि भोपाल में अपने तीन मामाओं के होते हुए भी हमारे घर में रहती थी। हमारे पापा उसके पापा, हमारी मम्मी उसकी मम्मी, मैं उसका दादा जैसे कि अपनी बहनों और भाइयों का हूँ। याद आता है विधि भी बहन के साथ पीएमटी की परीक्षा दिया करती थी। दोनों साथ पढ़ा करतीं थी। आगे चलकर उसका विवाह अच्छे घर परिवार में हुआ और उसका संसार भी सुन्दर सा जिसमें एक बेटा और एक बेटी। विधि को याद करो तो न जाने कितनी बातें, बहन और उसको लूना पर बैठाकर काॅलेज छोड़ने जाना, लिवाकर लाना। जब वो भोपाल आयी थी तब उसके पिता ने उसके रहने का प्रबन्ध होस्टल में कर दिया था। मुझे याद है एक बार लम्बा कफ्र्यू लगा था तब तीन-चार दिन भूखी प्यासी विधि को चलते कफ्र्यू में ही मैं अपनी बहन के साथ उसके होस्टल से घर ले आया था। उसके बाद फिर वह हमारे घर ही रह गयी थी। विधि की खूबी उसकी हँसी थी। सदैव हँसते हुए ही मिलती थी। उसका हँसना दरअसल एक बड़ी और दुर्लभ निश्छलता का परिचायक था जिसकी मिसाल वो सैकड़ों-हजारों में रही। साल भर पहले ही शायद इस लड़की का कर्क रोग की पहचान हुई और उसके बाद से उसकी सेहत में गिरावट, लगातार चिकित्सा के बाद भी सुधार न होना और उसके बाद भी उसका मिलना उसी बालसुलभ हँसी सा। आज दोपहर में बहन ने एक वाक्य के सन्देश में सूचित किया है कि विधि आज हम सबको छोड़कर चली गयी। मैं उसके लिए रोने का एकान्त नहीं ढूँढ़ पा रहा हूँ, उससे जुड़ी हर बात मेरी आँखें छलकाये दे रही है। उसके नहीं होने के सच को सहन कर पाना मुझे मुश्किल हो रहा है। ईश्वर की ये क्या महिमा है, मैं ही नहीं कोई समझ नहीं पाया आज तक। मेरी भीगी आँखों में उसके सज्जन से जीवनसंगी संजय और दोनों बच्चों की छबि धुंधलाती है। मैं उसके चले जाने का विरोध करता हूँ। शाश्वत उत्तर यह है कि जिस पीड़ा को वह असमय अपने शरीर पर झेल रही थी वह उसके साथ ही जाती रही। वह क्यों चली गयी। लगभग साल भर पहले अपनी माँ के बिछोह के घाव जस के तस हैं और ये लड़की इस तरह चली गयी। अपनी बहन की दशा नहीं जानता क्या होगी, आज ही वो भोपाल आयी है और विधि भोपाल सहित संसार से चली गयी है। विधि के साथ विधि के विधान की बात कहते हुए घबराहट होती है। उसकी खिलखिलाहट को अब बस याद ही करूँगा, प्रत्यक्ष देखने से वंचित हो गया सदा के लिए.......