शनिवार, 20 जुलाई 2019

।। आर्टिकल 15 ।।


गहरे अनुभव (सिन्‍हा) की फिल्‍म

 


यह एक ऐसी फिल्म देखने का अनुभव है जिसे नहीं देखकर उस यथार्थ से वंचित रहना होता जिसकी हम खूब बातें किया करते हैं प्रसंगवश लेकिन वे वही बातें होती हैं जिनके बारे में कहा जाता है, बातें हैं बातों का क्या? अनुभव सिन्हा ने गौरव सोलंकी के साथ मिलकर एक घटना की परिधि में जिस तरह की सशक्त फिल्म निर्मित और निर्देशित की है वह आँखें खोल देने वाली है। हमारे यहाँ समग्रता में सशक्त या उत्कृष्ट फिल्में बहुत कम बनती हैं जिनमें निर्देशक सभी आयामों के सन्तुलन में कोई बड़ी दृष्टि या चमत्कार पेश कर सके। चूँकि अनुभव सिन्हा, पन्ने पर भी उस फिल्म के दृश्यों और संवादों को लिख रहे हैं लिहाजा परदे पर भी वह उसी प्रभाव के साथ घटित होती है।

जघन्य बलात्कार का शिकार दो नाबालिग लड़कियाँ हैं जिनकी पार्थिव देह गाँव के बाहर एक पेड़ से लटकी हैं, स्याह रात और भोर के बीच बड़ा फासला है जिसमें गहरी धुंध छायी हुई है और यह आकृतियाँ परदे पर प्रकट होती हैं। इसके पूर्व एक दृश्य यह भी है कि भारतीय पुलिस सेवा में सीधी भरती से नियुक्त एक अधिकारी यहाँ अपनी पोस्टिंग पर आया है जो अपने वरिष्ठ को शाम की पार्टी में दबी जुबाँ हँसकर बतलाता भी है कि सजा के रूप में भेज दिया गया हूँ। फिल्म आगे इस झूठ के साथ बढ़ती है कि दोनों लड़कियों के पिताओं ने ऑनर किंलिंग के रूप में यह सजा उनको दी क्योंकि वे समलिंगी थीं। एक तीसरी लड़की और इनके साथ थी जो गायब है। उसकी तलाश नहीं की जा रही, यह माना जा रहा है कि वह भी जीवित न होगी। पुलिस की विवेचना हो रही है और अपनी तरह से प्रकरण को बन्द किए जाने लायक फाइल तैयार होती जा रही है।

इसी घटनाक्रम के बीच नायक पुलिस अधिकारी की छानबीन जारी है। समानता की भारतीय संविधान में आर्टिकल 15 के अन्तर्गत दी गयी व्यवस्था, एक विवरण भर है और लालगाँव में दमन, शोषण, भेदभाव, पक्षपात अपने चरम पर है। राजनीति और उसके कुटैव तथा अराजकताएँ आमजन को अपने बर्बर और हिंसक आव्हान और आन्दोलन के नीचे किस तरह खड़े रखते हैं और अपने को सिद्ध करके उन आमजनों को उनके हाल पर छोड़ दिया करते हैं इस पर तीखे संवाद भी फिल्म में है। नायक के अधीन पुलिस अधिकारी प्रकरण को बन्द कर देने पर अमादा हैं वह तीसरी लड़की को ढूँढ़ने की जिद पाले हुए नायक को सचेत भी करते हैं कि साहब आपका तो केवल ट्रांसफर होगा, हम मार डाले जायेंगे। इसी क्रम में सीबीआई की जाँच, नायक को विद्वेषवश कटघरे में खड़ा करने के एजेंसियों, रसूखदारों और राजनैतिक दलों के षडयंत्र परदे पर देखते हैं। अन्त यह है कि नायक को दिल्ली में बैठे अपने वरिष्ठ अधिकारी से हौसला मिलता है और वह गायब हुई तीसरी लड़की भी।


यह जिजीविषा, नैतिकता और दृढ़ आत्मविश्वास की विजय के साथ इस फिल्म का खत्म होना एक बड़ा सन्देश भेजता है। अनुभव सिन्हा की पकड़ इसके एक-एक फ्रेम पर है। वह प्रत्येक दृश्य के साथ पार्श्व संगीत के तरह और प्रकार के साथ-साथ उसकी जरूरत का भी ध्यान रखते और नियंत्रित करते हैं। उनका सिनेमेटोग्राफर (इवान मुल्लिगन) दृश्यों को कैप्चर करने का कुशल सम्पादक भी है जो हवाई शॉट के साथ-साथ दिल को हिला देने वाले, सिहरा देने वाले, प्रेम और करुणा उपजा देने वाले दृश्यों तक बखूबी पहुँचता है। इस टिप्पणीकार के उस समय आँसू छलक आते हैं जब वह बुलबुलाते हुए गटर के भीतर से गटर साफ करने वाले को निकलते देखता है जो भीतर वह तमाम पदार्थ बाहर फेंक रहा है जिसने उसे अवरुद्ध कर रखा है। यह अनुभूति किसी सिहरन से कम नहीं है जो भीतर ही भीतर झिंझोड़कर रख देती है। हमारे सामने डरे हुए कर्मचारी, अन्देशों में रहने वाली स्त्रियाँ, मगरमच्छ से भी अधिक मोटी चमड़ी वाले बुरे, निर्मम और बेईमान पदधारित लोग जिस तरह से आते-जाते हैं, एक तो सब चरित्रों को निबाहने वाले कलाकार बहुत सशक्त हैं, मनोज पाहवा (ब्रम्हदत्त), कुमुद मिश्रा (जाटव), जीशान अयूब (निशाद), सयानी गुप्ता (गोरा), नासेर (सीबीआई अधिकारी) को परदे पर देखकर लगता है कि इन सबके लिए चरित्र हो जाना जैसे जीवन-मरण का प्रश्न हो गया होगा। मनोज पाहवा का खासतौर पर आपा खो बैठने पर दाँत मिलाकर ओंठ खोलकर बोलने का ढंग, नासेर (साउथ के एक बड़े स्टार) का आयुष्मान खुराना (अयान रंजन) के सामने जाँच करना और बयान लेने का लम्बा दृश्य सब कुछ हमारी व्यवस्था में व्याप्त उन विसंगतियों को उजागर करते हैं जो सदैव से किसी भी बदलाव के रास्ते पर रोढ़ा बनकर रहा करती हैं। 

इस फिल्म में दो जोड़ रोमांस के एक-एक दृश्य भी क्या हैं जो मन को छू जाते हैं, एक गोरा और निषाद का आखिरी दृश्य जिसमें निषाद अपनी अधूरी कामनाओं के रूप में छोटी-छोटी ख्वाहिश व्यक्त करता है और दूसरा नायक के साथ नायिका अदिति (ईशा तलवार) अन्त में जब उसके हाथ में उसके निलम्बन का कागज है और वह उसके साथ घर लौटता है तब देखता है कि वह वहाँ मौजूद है। अलग-अलग शहरों में दोनों रहते हुए फोन पर विचारों और असहमतियों पर प्रायः झुंझलाने और लड़ने लगने वाले नायक-नायिका एक कठिन वक्त पर एक-दूसरे के पास। 

आयुष्मान खुराना इस फिल्म के नायक हैं जिनकी सारी खूबी संयम के साथ हर दृश्य में, हर संवाद में और हर फ्रेम में उपस्थिति है। निर्देशक ने उनके माध्यम से किंचित उस युवा को भी साहस के साथ प्रस्तुत कर दिया है जो अपनी स्वाभाविकता में यदि लोगों से उसकी जात-बिरादरी पूछता है तो वह उसके गुनाह के रूप में दर्ज किया जाने लगता है (सीबीआई इन्वाक्यरी के दृश्य) लेकिन इस जिज्ञासा की सहजता और दुराग्रहरहितता फिल्म के आखिरी दृश्य में तब पता चलती है जब मिशन की सफलता के बाद सड़क के किनारे एक वृद्ध महिला की छोटी सी दुकान के पास जमीन पर सब बैठकर उसकी बनायी रोटी-सब्जी खाते हैं और यही सवाल नायक उस वृद्ध महिला के साथ करता है।

हमारा बॉलीवुड बहुधा मनोरंजन का सामान हो गया है। वह फिल्म ही प्रायः व्यर्थ हो जाती है जो मनोरंजन नहीं करती। दर्शक भी उस सिनेमा का पक्षधर है जिसमें सिनेमाघर में प्रवेश से पहले दिमाग बाहर रख जाओ और आनंद लो। इसी बहुधा अवधारणा के बीच यह सिनेमा फलीभूत होता है जो आपको सवा दो घण्टे सजग रखता है, एक-एक दृश्य का मूल्य समझने की सीख देता है, उस सच के सामने ला खड़ा करता है जो अखबार या चैनलों में सनसनी या टीआरपी से अधिक कुछ नहीं हो पाता। यह आर्टिकल 15 जैसी फिल्म आपको डिस्टर्ब करे, बेचैन करे, चैन से बैठने न दे और सिनेमाघर से निकलने के बाद आपके दिमाग में इस तरह चले कि आपको अपने किस कदर और बेवजह आश्वस्त होने या बने रहने के भ्रम से आजाद होने का मौका मिले तो उसकी यह बड़ी सफलता है। इन मायनों में निर्देशक, लेखक, निर्माता अनुभव सिन्हा की यह एक सशक्त और महत्वपूर्ण फिल्म है। ध्यान दीजिएगा, यह उतनी सफल भी है कि लागत का तीन गुना से ज्यादा अर्जित भी कर चुकी है।

मंगलवार, 21 मई 2019

जातक कथा आधारित नाटक - वृत्ति नाशक

प्राणी आचरण वृत्तियों के विपरीत 

पर मनुष्य वृत्तियों की शिकस्त में

 


तथागत बुद्ध के अनन्य जन्मों के साथ जुड़ी जातक कथाओं का संसार विहँगम है। वे इनके माध्यम से आदिकाल से मनुष्य के लिए कोई न कोई सीख, कोई न कोई प्रेरणा देते है। मनुष्य जीवन की निष्फलता के पीछे कितने कारण, कैसी स्थितियाँ, कैसा स्वभाव उत्तरदायी है, इसका नैतिक बोध मनुष्य को कभी नहीं होता। यदि होता तो अपना जीवन संवारने के लिए महापुरूषों का जीवन, उनकी वाणी, उनके आचरण को नजरअंदाज न किया जाता। तथागत बुद्ध ने सृष्टि में विचरण करने वाले अनेक हिसंक जीवों की योनि में भी जन्म लिया लेनिक वह प्राणी जीवन जीते हुए उन्होंने वृत्ति प्रवृत्ति के विपरीत संत और ऋषि मुनियों सा आचरण प्रस्तुत किया जो आज भी प्रेरणीय है।

जनजातीय संग्रहालय, भोपाल में तथागत बुद्ध की जातक कथाओं पर आधारित नाट्य प्रयोगों का समारोह यशोधरा का आज समापन चुलनन्दीय जातक पर आधारित नाट्य वृत्ति नाशक के मंचन से 20 मई को हुआ। इस प्रस्तुति में लगभग तीस से अधिक कलाकारों ने हिस्सा लिया। आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आयोजित यशोधरा समारोह में यह प्रस्तुति बैले नाट्य की प्रतिष्ठित संस्था अर्घ्य कला समिति ने एक माह से अधिक समय के पूर्वाभ्यास में तैयार की थी। 

वृत्ति नाशक नृत्य नाट्य प्रस्तुति की कोरियोग्राफिक परिकल्पना व निर्देशक वैशाली गुप्ता ने किया था जबकि मूल जातक कथा का बैले नाट्य रूपान्तर सुनील मिश्र ने किया था। यह प्रस्तुति वाराणसी में ब्रम्हदत्त के राज्य के समय हिमालय में नन्दीय एवं चुलनन्दीय नाम के दो बन्दर भाइयों की कहानी है जो अस्सी हजार बन्दरों के राजा थे और अपनी वृद्ध माँ के साथ जंगल में रहकर प्रजा का पालन करते थे। जब रहने वाले स्थान में भोजन और पानी का संकट आया तो वे अपनी माँ को हिफाजत से एक जगह छुपाकर दूर दूसरे स्थान पर सबको ले गये जहाँ खाने-पीने के लिए अथाह प्राकृतिक और वानस्पतिक सम्पदा थी। 

दोनों भाई अपनी प्रजा के तीन-चार साथियों के माध्यम से नियमित रूप से अपनी माँ के लिए खाद्य सामग्री, फल वगैरह भेजकर निश्चिंत हो जाया करते थे। उनको नहीं पता था कि वे दुष्ट बन्दर रास्ते में सबकुछ खा जाते हैं और माँ भूखी-प्यासी हड्डी का ढांचा बनकर रह गयी है। एक दिन जब वे इस बात को जान पाते हैं तो अपने साथियों से अलग हो जाते हैं और दल को छोड़ देते हैं और अपनी माँ की सेवा का संकल्प करते हैं। कुछ दिन अच्छे से व्यतीत होते हैं कि एक व्याघ्र, शिकारी की दृष्टि उन पर पड़ती है। वह नन्दीय और चुलनन्दीय की माँ को मारकर शिकार करना चाहता है। इस पर नन्दीय आकर उसको रोकता है और कहता है कि बूढ़ी, रुग्ण और अंधी माँ को मारकर क्या होगा, उसे जीवित रहने दो भले मुझे मार लो। व्याघ्र नन्दीय पर तीर चलाकर उसे मार देता है और फिर बूढ़ी माँ पर तीर तान देता है। तब चुलनन्दीय आकर अपने को प्रस्तुत करता है। निर्मम व्याघ्र उसे भी मारकर फिर वृद्ध बन्दरिया को भी मार देता है। जब वह तीनों को मारकर घर ले जाता है जो अपने घर में हुए वज्रपात से उसका दिल काँप उठता है, वह देखता है कि घर जलकर खाक हो गया है और आग में परिवार भी समाप्त हो गया, वह बचाने गया तो वह भी। यह शिकारी वाराणसी का छात्र था जो तक्षशिला में ज्ञान प्राप्त करने गया था मगर अपने दुष्ट आचरण की वजह से निष्काषित कर दिया गया था। उसके बाद वह ऐसी हिंसक वृत्ति का हो गया। लेकिन उसको अपनी करनी का फल मिला। 

जातक कथाओं की प्रेरणाएँ अनन्त हैं। तथागत बुद्ध के अनेक जन्मों की कथा जिनमें वे अलग-अलग प्राणी के रूप आये, अनेक हिंसक प्राणियों की योनि में जन्म लेकर भी वृत्ति के विपरीत करुणा, संवेदना और आपसी साहचर्य का स्वभाव और जीवन जीकर आदर्श स्थापित किया और कृतघ्न मनुष्य को सीख दी। मनुष्य इन जातक कथाओं के मर्म को जाने तो वह आज भी अपने जीवन को सँवार सकता है और अपने होने को धन्य कर सकता है। वैशाली गुप्ता ने इस प्रस्तुति का तानाबाना बड़े और बाल कलाकारों के साथ मिलकर कुशलता के साथ बुना और अनेक सुन्दर और मर्मस्पर्शी दृश्यबन्धों के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया। जंगल में विभिन्न प्राणियों के बीच आपसी प्रेम, सद्भाव और समरसता को नाटक में प्रस्तुत किया गया। नन्दीय और चुलनन्दीय के पिता महानन्दीय और उनके मित्र घोटक (वनमानुष) की परिकल्पना व्याघ्र की प्रवृत्ति का घोर प्रतिवाद है जिसने प्रस्तुति को एक अलग प्रभाव दिया। 

कलाकारों में प्रथम भार्गव नन्दीय, समक्ष जैन चुलनन्दीय, मेघा ठाकुर बूढ़ी माँ, भगत सिंह घोटक, हर्ष राव व्याघ्र, निधि वत्स व्याघ्र की पत्नी के रूप में प्रमुख भूमिकाओं में हैं जबकि पक्षियों और प्राणियों की भूमिकाओं में कृष्णा, किरण, हनी, अमृत कौर, देवांग, निमित, आनंदी, हितैषी, निमित आदि। संगीत परिकल्पना सुश्रुत गुप्ता की है। गीत संयोजन भी उन्हीं का। यह नाटक समान रूप से बड़ी उम्र के दर्शकों के साथ बच्चों के लिए भी प्रेरक है। 

#वृत्तिनाशक #जातककथाऍं  

शुक्रवार, 17 मई 2019

परदे का समाज हो जाना और नायक का यथावत् बने रहना


राजनीति में सितारे


बात ऐसी कोई बहुत नयी तो नहीं ही हुई जिसकी बात करने जा रहे हैं लेकिन विषय हमेशा ही ज्वलन्त है। जो नायक लम्बे समय हमारे बीच रहकर सिनेमा के माध्यम से अपनी एक छबि स्थापित करता है, एक समय बाद या उत्तरार्ध में तेजी से समाज की सेवा के लिए उत्कट हो उठता है। अचानक ऐसा लगता है कि जैसे एक तरह की उद्विग्नता उसे जनता के बीच सेवा के लिए ले आयी है। पूरे देश में सिनेमा की व्यापकता जहाँ-जहाँ है, वहाँ-वहाँ देर-सवेर नायकों को, नायिकाओं को, खलनायकों को, निर्देशकों को यह उद्विग्नता हुई है। इसका सबसे बड़ा आकर्षण हमारे सामने दक्षिण से ही आता है जहाँ से बहुत बड़े-बड़े नाम समय-समय पर उभरे और स्थापित हुए। ऐसे भी नाम हुए जो राज्य के मुखिया के रूप में स्थापित हुए बल्कि लम्बे समय स्थापित रहे और कीर्तिमान बनाया।

यह कम रोचक और दिलचस्प नहीं था कि एक तरफ जनता ने जिस महानायक को परदे पर लम्बे समय विभिन्न सकारात्मक चरित्रों को निबाहते हुए देखा, बात-बात पर जनता के हित के लिए खड़े होते और लड़ते देखा वही महानायक जब ग्लैमर और सारी चकाचौंध को छोड़कर जनता के बीच हाथ जोड़ता हुआ समाज सेवा के संकल्प से समर्थन मांगने आया तो जनता ने उसको उसी तरह का प्रतिसाद दिया जिस तरह का प्रतिसाद परदे पर नायक रहते हुए वह टिकिट खिड़की पर दिया करती थी।


यह सचमुच बहुत गहरी चीज है कि कैसे हम सबके बीच कोई नायक या महानायक बनता है और अपनी जगह बनाता है। हमको परदे पर उसका चरित्र भाता है, हम उसको अपने मन में जगह देते हैं, हमारी वही उदारता उसके लिए और अधिक अनमोल बन जाती है जब उसको अपनी भूमिका का विस्तार करना होता है। दक्षिण के राज्यों में जब-जब सितारे राजनेता बने और जनता के समर्थन में बड़े-बड़े पोर्टफोलियो सम्हालने लायक सौभाग्य प्राप्त कर सके, उनको इस बात का निरन्तर भान रहा कि वे इसी तरह के आमजन के नायक या महानायक हैं जिनको परदे पर देखने आम आदमी, गरीब और अभाव से भरा आदमी टिकिट खिड़की पर बड़े से बड़ा संघर्ष करने पर उतारू हो जाता है। दर्शक पौराणिक फिल्म में किसी भी अभिनेता को महान चरित्र का निर्वाह करते देखता है तो उसकी श्रद्धा का वजन वही का वही रहता है जब उसका महानायक अपने आपको समाज सेवा के रूप में प्रस्तुत करता है तब भी वह सब कुछ उस पर उड़ेल देना चाहता है।

दर्शक के लिए तो उसका महानायक, परदे का देवता मर्यादा पुरुषोत्तम या योगेश्वर से कम न होगा और उसको लगने लगेगा कि अब उसका कल्याण हो जायेगा क्योंकि परदे का महानायक अब समाज नायक है, वह ंउसके दुख दर्द समझेगा और उनसे निजात दिलायेगा। आज के समय में भी दक्षिण के तीन बड़े सितारे इस समय चुनाव और राजनीति के वातावरण में अपने आपको आजमाने में लगे हैं। कभी ये सितारे सत्ता कौन सम्हालेगा, इसकी हवा बनाने का काम किया करते थे। ये जिसकी तरफ जाकर खड़े हो, इनके वे सीनियर को गद्दी मिलना तय हो जाता था। बाद में इस तरह की भूमिका से ये सितारे ऊब गये और समय के साथ वे सितारे राजनेता भी आपस की कलह और कुटैव में एक-दूसरे के विरुद्ध अपनी लड़ाइयों को दूर तक लग गये। दक्षिण में दृश्य ऐसा है कि एक बार फिर सत्ता, विपक्ष और राजनीति सिताराविहीन है ऐसे में बड़े और अपेक्षाकृत अपनी पारी लगभग पूरी कर चुके सितारे खाँटी राजनीतिज्ञों के सामने मैदान में आ गये हैं।


इधर उत्तर भारत सहित शेष भारत में मुम्बइया सितारों का आकर्षण हिन्दी दर्शकों में एक अलग तरह की दीवानगी का सबब बना रहता है। हमारा दर्शक अब आटोग्राफ से हटकर सेल्फी की ललक और ख्वाहिशों में भर गया है। सितारे यह तो चाहते हैं कि दर्शक उनकी फिल्म जमकर देखे, जमकर कमायी दे लेकिन वे दर्शक से मौका पड़ने पर संवाद नहीं करना चाहते। हिन्दी सिनेमा के कलाकारों को समाज के बीच जाते ही अपने दर्शक से आँखें न मिलाना पड़ें उससे पहले काला चश्मा चढ़ा लेते हैं। लालायित दर्शक पीछे-पीछे चलने लगता है तो सितारों को नागवार गुजरता है, इच्छा के विपरीत सेल्फी लेने लगता है तो उसके साथ जो व्यवहार होता है, वह दर्शक का अप्रिय अनुभव होता है। ऐसे सितारे जब राजनीति में आते हैं तो राजनीति के गैरसिनेमायी वज्र पुरुष उनको यही समझाने की कोशिश करते हैं कि काला चश्मा उतार कर अपने दर्शकों को देखो, वही जनता है। लेकिन तब भी हमारे दर्शक के अनुभव, अपने उसी अभिनेता से बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहते जो परदे पर आता है तो वे सीटियाँ बजाते हैं, तालियाँ बजाते हैं, आँसू बहाते हैं।


हमारे हिन्दी के महानायक भी अपनी सारी की सारी साख दाँव पर लगाकर राजनीति करने पहुँचे थे लेकिन उसके बाद जिस तरह उन्होंने राजनीति से किनाराकशी की, उस पर बात करने के लिए शायद उनको किताब ही लिखनी पड़े लेकिन अपने परिवार से कोई राजनीति में बना रहे इससे परहेज नहीं है। इस बार हम और भी चेहरे देख रहे हैं जो लगभग इस पल राजनीति में आते हैं और अगले ही पल नामांकन भर रहे होते हैं। परदे और समाज का सामना और फर्क भी कम विचित्र नहीं है। नायक को परदे और समाज का फर्क कितना मालूम है, यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि नायक की जिन्दगी स्टूडियो से लेकर आउटडोर तक इतनी व्यस्त हो गयी है कि वह समाज का हिस्सा ही नहीं रह गया है। भीड़ उसके प्रति आसक्त भी है और धीरज छूटने पर आक्रामक भी इसीलिए वह छत, छज्जे और काँच की दीवार के पीछे से अपने चाहने वालों को टा टा करता हुआ मिलता है।

नायक वही रहता है लेकिन परदा कब समाज हो जाता है पता नहीं चलता। परदे पर विविध चरित्रों को निबाहते हुए लेकिन सड़क और समाज में उतने ही अन्तर्मुखी और लगभग नीची निगाह किए एयरपोर्ट से निकलकर दौड़कर गाड़ी में बैठ हवा हो जाने वाले, बाउन्सरों के समर्थन से ही सड़क पर चार कदम चल पाने वाले जब खुली गाड़ियों में हजारों की भीड़ के बीच हाथ हिलाते, टा टा करते दिखायी देते हैं तब लगता है कि परदे का नायक न जाने कैसे समाज के नायक की भूमिका का निर्वाह कर सकेगा?

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

Film Review / kalank

।। अब कलंक धोने का जिम्‍मा बेचारे दर्शकों पर ।।



अभिषेक वर्मन, करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शन में कुछ समय पहले टू स्टेट्स निर्देशित करने आये थे। करण ने उनको कलंक निर्देशित करने का एक बड़ा जिम्मा देकर इस दौर में मल्टी स्टार कास्ट फिल्मों के दौर की व्यतीत स्मृति को भरपूर बजट के साथ बड़े लाभ के रूप में लौटा लाने का विफल प्रयत्न किया है। आज इस फिल्म को देखकर यह लगा कि हमारे निर्माता एक साथ इकट्ठा होकर कुछ चिट फण्ड टाइप का पैसा बहाऊ खेल भरपूर धन कमाने के लिए खेलते हैं लेकिन उनके पास वह दृष्टि और समझ नहीं है जिसकी वजह या सहायता से फिल्में हिट होती हैं।

कलंक आधा दरजन सितारों से लदी-फँदी फिल्म है, संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, वरुण धवन, आदित्य रॉय कपूर, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, कुणाल खेमू वगैरह। कहानी जिस तरह शुरू होती है, आरम्भ में दुनिया भर के स्पष्टीकरण के साथ जिसमें यह सबसे बड़ा कि काल्पनिक कहानी है। हम और हमारे पूर्वज विभाजन और बँटवारे के बारे में जितना जानते हैं और उससे जुड़े अप्रिय घटनाक्रम, उसकी ही छाया में यह कहानी कुछ अजीब ढंग से घटित होती है जिसमें भयावह बीमारी से मृत्यु के मुख में जाती सोनाक्षी सिन्हा, एक गरीब गुणी गायक पिता की तीन बेटियों में से एक को अपने पति के साथ विवाह के लिए राजी करने चली आयी है। गरीब पिता की बड़ी बेटी आलिया भट्ट अपनी उम्र को जीती, बहनों के साथ शरारत करती, पतंग उड़ाती और लूटती पाँच मिनट में एक गम्भीर चेहरा और त्याग से भरी हो जाती है। 

लाहौर के हुस्नाबाद में उसका उस महलनुमा घर में कुछ समय सोनाक्षी के साथ रहना, फिर सोनाक्षी की मृत्यु उसके बाद आलिया भट्ट का अचानक संगीत की तरफ रुझान होना, शहर की बड़ी तवायफ माधुरी दीक्षित की सोहबत और फिर उसी की सन्तान वरुण धवन से मोहब्बत हो जाना कहानी के मूल में है। आलिया का पति आदित्य और ससुर संजय दत्त कुछ चार लोगों के साथ अखबार किस तरह चलाते हैं जिसके नागरिक ही खिलाफ हैं। इसी में अदावत, हिसाब चुकाने के लक्ष्य, दबे षडयंत्र आदि के साथ अन्त में वरुण का मोहब्बत पर कुरबान होना ही लाजमी था। माधुरी दीक्षित के नाचते-गाते जिस तरह फिर हिंसक अन्त को परवान चढ़ती है वह अकल्पनीय है। अन्त में एक अनगढ़ सी पूर्वदीप्ति का दृश्य भी अंजाम पाता है क्योंकि आलिया किसी लेखक को अपनी कहानी सुना रही है। इस समय केवल आलिया, आदित्य और संजय ही जीवित हैं और आदित्य ने पिता संजय को माफ कर दिया है। आखिरी में जिस तरह से दुपट्टा हटाकर माधुरी हँसकर नाचती-गातीं है और और बूढ़े संजय दत्त अपनी प्रेमिका को याद करके मुस्कराते हैं, लगता है प्रेम इनका ही अमर हुआ है, शेष सब फनाह हो गये।

कलंक, आराम से एक खूबसूरत कहानी हो सकती थी, वरुण धवन और आलिया भट्ट की लेकिन निर्देशक जो पटकथाकार भी है, उसने इनके आसपास जिस तरह के चरित्र खड़े कर दिए उससे पूरी कहानी बोझिल हो गयी। शुरू में जिस तरह आलिया भट्ट का घर, पिता और बहन नजर आये थे, वो बाद में दोबारा नहीं आते, जिनके लिए आलिया ने यह त्याग किया है। सोनाक्षी अपने पति पर यह उपकार और आलिया के गरीब पिता और उनके अच्छे संसार पर यह वज्रपात करने क्यों आयी है यह भी पता नहीं। इधर वरुण धवन दृश्य में आये तो एकदम लेडी किलर की तरह जो सोने और सुलाने के हुनर को अपनी वीरता की तरह प्रदर्शित करता है। वह माधुरी और संजय का बेटा है यह रहस्य जल्दी ही खुल जाता है। अखबार मालिक संजय और उनके बेटे का शहर में जीना क्यों दूभर है इसको ढंग से निर्देशक स्थापित नहीं कर पाया। यह बात गले नहीं उतरती कि अखबार मशीनों के आने से विकास की सम्भावना देखता है और लाहौर के लोहारों को यह उनके रोजगार पर हमला लगता है। यह भी दिलचस्प है कि लोहारों के काम के प्रतीक के रूप में वरुण और उसके चार सहयोगी लोहा पीटते रहते हैं और चाकू, छूरी और तलवार ही बनाया करते हैं। 

कमजोर पटकथा पर तार्किक और दार्शनिक संवाद अपना असर उस तरह नहीं छोड़ पाते जैसी उम्मीद की जाती है। गाने अच्छे हैं, संगीत भी अच्छा है पर फिर भी याद न रहेंगे। चूँकि फिल्म प्रभावहीन है इसलिए उसका लम्बा होना अखर जाता है। वरुण धवन की माँ बनी अधेड़ माधुरी दीक्षित को खुश करने के लिए अन्त में उनको भरपूर स्पेस दिया गया है। भारी हिंसा के बीच उनका अपनी सखियों के साथ प्यार मोहब्बत के फलसफे को गा-गाकर उच्श्रृंखल होना शोभा नहीं देता क्योंकि उस समय एक नायक मारा जा रहा है, आग लगी हुई है, मारकाट मची है और बीच-बीच में माधुरी बुझे चेहरे के साथ नाचे जा रही हैं। संजय दत्त थके हुए लगते हैं। सधकर संवाद बोलते हैं, चेहरा तो जाहिर है उनका कुछ बोलता भी नहीं और अब उम्र भी खूब दीखती है। फिल्म वरुण धवन को बेहतर ढंग से पेश करती है, उन्होंने मेहनत भी की है, उनके साथ आलिया का कण्ट्रास्ट मैच करता है। आदित्य रॉय कपूर के लिए भी फिल्म व्यर्थ ही है।

भव्य सेट्स, आसपास का वातावरण, कलात्मक वैभव ऐसा कि अतिरेक ही होता चला गया है। बाग-तड़ाग-पक्षी-सरोवर-कमल-पत्ते-झूमर-आभूषण-वस्त्र सबको डेढ़ सौ परसेण्ट महकता हुआ कर दिया है यही इस फिल्म का ड्रा-बैक है। फिल्म के चरित्रों में से कितने कलंक मिटा सके, कितने कलंकित रह गये वह बात और है लेकिन दर्शकों के लिए आखिरी आधे घण्टे का अनुभव बहुत बुरा रहा होगा।

मित्रों से.......................तब भी फिल्म देखिए और सहिए क्योंकि एक बुरी फिल्म को बनाने में भी कितने सारे मस्तिष्क काम करते हैं और कोई भी आपस के किसी को भी सावधान नहीं करता, समझाता या सही राह नहीं दिखाता। हमारे सिनेमा की यही विडम्बना है। #filmreviewkalank

मंगलवार, 26 मार्च 2019

27 मार्च : विश्व रंगमंच दिवस





रंगमंच को चाहिए एक सार्थक आकलन

 

हमारे देश में रंग सक्रियता हाल के कुछ वर्षों में एक नयी करवट लेकर देखने में आयी है। जीनियस निर्देशकों की पीढ़ी उम्र के उस दौर में है जब ऊर्जा, सक्रियता और क्षमता के मान से उनका काम लगभग पूरा हो चुका है। वे अपनी क्षमताओं का श्रेष्ठ अर्जित भी कर चुके हैं और प्रदर्शित भी। वे अब अपने सुनहरे समय के स्मरण या संस्मरण के साथ आज सक्रिय पीढ़ी के कामकाज को देख रहे हैं, संवाद कर रहे हैं और अपने अनुभव साझा करने को उपलब्ध हैं। नयी पीढ़ी भी गुरु-शिष्य परम्परा और रचनात्मक तथा सर्जनात्मक क्षेत्र में अनुभवसिद्ध और गुणी पुरुषों का यथासम्भव मान किया करती है और उनके अनुभवों, आशीर्वाद और मार्गदर्शन से जुड़ी रहना चाहती है। कल तक वे जीनियस मंच पर थे और उनके पास अपने समय के सापेक्ष परिस्थितियाँ थीं। अवसरों में सीमाएँ थीं और मेहनत भी उतनी ही ज्यादा थी। सामूहिक रंगमंच को अपनी श्रेष्ठता और उत्कृष्टता के अनुरूप अपने-अपने योगदान से बनाये रखने और श्रेष्ठ को प्रकाशित या मंचित किए रहने की निरन्तरता में बहुत सारे नाम देश भर से हमारे बीच साधक के रूप में, धुनी और जुनूनी की तरह सामने आते रहे हैं। फिर भी भारतीय रंगमंच जिन महान रंगकर्मियों का ऋणी रहेगा उनमें इब्राहिम अल्काजी, शौकत आजमी, बलराज साहनी, पृथ्वीराज कपूर, कावलम नारायण पणिक्कर, रतन थियम, एम एस सथ्यू, रेखा जैन, नीलम मानसिंह चौधरी, ऊषा गांगुली, उत्त्रा बावकर, के.वी. सुब्बन्ना, श्यामानंद जालान, तापस सेन, विजया मेहता, ब व कारन्त, हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर, शंभु मित्र, गिरीश कर्नाड, सत्यदेव दुबे, जोहरा सहगल आदि अनेक नाम प्रमुख रूप से कौंधते हैं।

तत्काल स्मरण में सम्भव है और बड़े मूर्धन्य रंगसाधकों का उल्लेख न हो पाये, उससे उनके योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता। दरअसल जो एक धरातल, जो एक आत्मविश्वास, एक जमीन या कह लें पटरी अथवा सड़क ऐसे मूर्धन्य संघर्षशील सृजनधर्मियों ने रंगसमाज और आने वाली पीढ़ियों को उपलब्ध करायी वह बड़ी पक्की है। उसके बाद की धारा जिसमें प्रौढ़ और युवा रंगकर्मियों की भागीदारी ने एक अलग सा दृश्य हमारे सामने उपस्थित किया है। स्थूल रूप से हम इस सदी के रंगकर्म की बात कर सकते हैं जिसके माध्यम से करीब-करीब दो दशक बराबर समय के परिदृश्य पर विचार किया जा सकता है। इन सारी बातों को करते हुए हमें इस बात को प्राथमिकता के साथ ही जोड़ लेना चाहिए कि बहुत सारे उतार-चढ़ावों के बावजूद आधुनिक भारतीय रंगमंच की प्रामाणिक जगह को लेकर बात करने लायक बेहतर अवसर जुटाने में देश के लोक मंच की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके लिए हम बाकायदा कावलम नारायण पणिक्कर से लेकर ब व कारन्त, हबीब तनवीर और रतन थियम की भूमिकाओं का स्मरण कर सकते हैं। इसके साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों में अनेक मुश्किलों और कठिनाइयों के साथ संघर्ष करते हुए भी अपनी अस्मिता बचाये रखने में माच, नाचा, नौटंकी, तमाशा, ख्याल, जात्रा, चिण्डू भागवतम, यक्षगान, कथकली आदि का योगदान रहा है। न तो इनको छोड़ा जा सकता है और इनके उल्लेख के बिना भारतीय रंगमंच को शहरी और आधुनिक पहचान वाले रंगमंच को अवदान से बढ़कर चमकाये जाने की जरूरत भी नहीं है। 



भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की परिकल्पना अंधेर नगरी से होते हुए रंगमंच पारसी थिएटर के रास्ते रामलीला, रासलीला के समृद्ध परम्परा वाली पगडण्डी से सदियों की एक लम्बी यात्रा करके हम तक उसी तरह आया है जिस तरह हम किसी कालजयी नदी के उद्गम की अवधारणा को पुराणकथा से जोड़ते हैं और फिर उसकी अन्तहीन और अनन्त यात्रा को रेखांकित करते हैं जिसमें न तो एक बार उद्गम की चर्चा करने से बात समाप्त होती है और न ही उसके हिन्द महासागर में मिल जाने की बात कहकर इतिश्री की जा सकती है क्योंकि यह सदियों की अनवरत परम्परा है और सदियों ही चलती भी रहने वाली है।

लम्बे समय तक भारतीय कलाएँ, स्वाभाविक रूप से जिसमें रंगमंच भी शामिल है, अपने स्थापत्य को लेकर संघर्षरत रहा है। अभाव, खतरे और मुश्किलों के बीच रंगमंच को जिन्दा रखे रहने की अनेक सच्ची कहानियाँ हैं जिनको सुनकर सचमुच यह अचरज होता है कि इतने के बाद भी रंगमंच होता रहा तो इसके पीछे जरूर आदमी की जिजीविषा काम कर रही होगी। संघर्ष और जिजीविषा की स्थितियाँ तो आज भी हैं। रंगमंच के स्वप्न को साकार करने के पीछे जो सबसे बड़ी जरूरत होती है वह धन की है। मनोरंजन का यह ऐसा माध्यम है जिसमें व्यय हुआ धन लौटकर नहीं आता। इसीलिए घर फूँक तमाशा और घर में ही अपने प्रति बनते बढ़ते विरोधी वातावरण के बीच रंगमंच प्रत्येक सक्रिय या काम करने वाले कलाकार-रंगकर्मी से परवान चढ़ता है। ऐसे अनेक रंगकर्मी और रंग संस्थाएँ हैं जो कलाकारों की सामूहिकता और एकजुट होकर निरन्तर काम करते रहने की आदी हो चुके हैं। दूसरे उस तरह के रंगकर्मी हैं जो आवश्यकतानुसार कलाकारों को जोड़ा करते हैं। इन सबके बीच काम करते रहने के लिए अनुदान, मंच प्रदर्शन के पारिश्रमिक या समय-समय पर प्रोत्साहित करते पुरस्कार और स्मृति चिन्हों का अपना महत्व है लेकिन इससे एक अनिश्चितता साथ चला करती है जो रंगकर्मी का कमोवेश चैन छीनकर रखती है।

भारतीय रंगमच के अनेकानेक आयामों के साथ ही उसकी सार्थकता को लेकर हमेशा ही बात की जाती है। हमारी कलाएँ कितनी समाज सापेक्ष हैं, कितना उनका जन सरोकार है इसको लेकर अक्सर विचारों में विविधता से लेकर भेद तक होते हैं। रंगमंच ने किसी आदमी भर की नहीं बल्कि सम्पूर्ण मनुष्यता के स्वर को बहुत साहस के साथ, बहुत निर्भीक होकर अभिव्यक्ति के धरातल पर अपने होने के अर्थ को प्रस्तुत किया है। क्या कारण है कि हमारा दर्शक या रंगप्रेमी जिन्दगी में पच्चीसों नाटक देखने के बाद किसी एक नाटक से ऐसे बिंध जाता है कि उसके साथ ही वह घर भी लौटता है और उद्वेग में लम्बे समय उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता। मंच पर प्रतिबद्ध और सच्चा कलाकार, अपने पात्र को सार्थक करने के लिए जिस तरह रीडिंग से लेकर पूर्वाभ्यास तक और उसके बाद कास्ट्यूम धारण करने से लेकर मेकअप तक आते हुए जब अपनी टाइमिंग पर जाता है उस समय उसके तनाव की कल्पना की जा सकती है। हमारे श्रेष्ठ नाटकों में गहरे सन्देश अन्तर्निहित होते हैं जो आपको सोचने के लिए विवश करते हैं। दर्शक ताली बजायें या कहकहे या उनकी बड़ी हँसी अथवा ठहाके सभागार में गूँजें, वह तारतम्य मंच से ही होकर उन तक आता है। हृदय को झकझोर देने वाले दृश्य में एक कलाकार जब अपने पात्र के साथ पूरे वातावरण को जी रहा होता है तब कैसे गहरी चुप्पी और सन्नाटा खिंचा चला आता है! यह आसान नहीं है। रंगमंच में हर उस एक-एक छोटे से छोटे आदमी का योगदान है जो मंच पर तलुओं से कंकर का आभास होने पर उसे उठाकर दूर फेंककर आता है ताकि किसी दूसरे कलाकार को वह न गड़े। इतने गहरे जाकर हमें इस परम्परा को देखने की जरूरत है।

रंगमंच ने छोटे स्तर की दकियानूसी, ओछी किस्म की क्षुद्रता से लेकर षडयंत्र, कुटैव, विरोधाभासों से लेकर युद्ध तक को लक्षित किया है और सामाजिक सहभागिता में अपनी उत्तरदायी भूमिका का निर्वहन किया है। भारतीय मानस समय के साथ पतित होते समय, समाज, राजनीति, अपराध, दुनिया के देशों में आपसी वैमनस्य, एक-दूसरे को हराने, एक-दूसरे से जीतने की खूँखार महात्वाकांक्षा और उसके दुष्परिणामों को भी रंगमंच पर जिस तरह से समय-समय पर देखा गया है, वह उसकी प्रशंसनीय और साहसिक भूमिका को रेखांकित करता है। स्मरण हो आते हैं रतन थियम के नाटक जो महाभारत काल से लेकर आज तक मानवीयता पर मण्डराते युद्ध के खतरे और युद्ध से होने वाले विनाश की बात करते हुए केन्द्रित करते हैं स्त्रियों और बच्चों को जो कि इसका सबसे बुरा खामियाजा भुगतने को विवश होते हैं और उनकी परवाह कोई नहीं करता। हम कल्पना कर सकते हैं शहीद फौजियों के घर-परिवारों की स्त्री, बच्चों, बुजुर्गों की जो किसी न किसी रिश्ते में बंधे हुए हैं और ऐसी शहादत के बाद उनके घर जाकर देखने वाला कोई नहीं है। रंगमंच आपको झकझोरता है, घोर निर्मम और अमानवीय होते समय में आपकी सुप्त चेतना पर थप्पड़ देने का साहस रखता है। हर काल में, हर समय में रंगमंच को इतना ही जिम्मेदार और साहसी होने की जरूरत भी है।

नयी पीढ़ी के लिए संसार खुला हुआ है। अलग-अलग संस्थाओं, कलाकारों और संस्थानों में अब रंगमंच का प्रशिक्षण राज्यों के लिए भी आकर्षण हो गया है। भले ही पूर्वाभ्यास की समस्या का रंगकर्मियों और रंग संस्थाओं के लिए कोई स्वाभाविक समाधान न निकल सका हो लेकिन प्रदर्शन के कोई न कोई अवसर मिला करते ही हैं। इसी बीच आपस में एक साथ काम करते, परस्पर या समानान्तर रूप से संस्था के साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते समूहों में आपसी दूरियाँ भी खूब हैं। एक-दूसरे का काम देखने, सच्चे मन से अपना पक्ष रखने, सराहना या आलोचना करने की स्थितियाँ अच्छी नहीं हैं। इसी प्रकार स्वाभाविक आकलन का क्षेत्र एक अलग तरह की उदारता देने में लगा है। बेहतर समीक्षा या आलोचना लगभग अनुपस्थित है। हर काम श्रेष्ठ है। समीक्षक हैं नहीं और हैं तो किसी भी नाटक का धैर्यपूर्वक आकलन करने और विश्लेषण करने के लिए समय नहीं मिलता। समीक्षक और विश्लेषक के नाम पर उच्च कोटि में भी एक अजीब सा अनुराग, विराग, प्रतिराग और खुंदक चल रही है कि लगभग आशीर्वचन की तरह चाहने वाले के प्रति न तो वह समीक्षा कोई काम आने वाली है और खुंदक में लपेट दी गयी, निपटा दी गयी या खारिज कर दी गयी भाषावली का कोई नुकसान या दूरगामी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि बहुत से राडार निष्पक्ष नहीं रह गये हैं और शायद ऐसा भी कि वे अब अपने ही तरीके का एक सा कहते-कहते थक भी गये हैं।

ऐसे में फिर बात वही रंगमंच पर उसकी स्थितीयता पर आकर ठहर जाती है कि दो दशक में हमारा रंगमंच आधुनिक तकनीक, प्रचार-प्रसार, वेबसाइट, सोवेनियर, ब्रोशर, स्मारिका, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, ट्विटर और वाट्सएप के साथ हर मस्तक पर दस्तक तो हो गया है पर इस सबके बीच सशक्त रंगमंच, सशक्त कलाकार, दाँतों तले उंगली दबा लेने वाली या चकित करके रख देने वाली रंग-अभिव्यक्ति और वैसे जीनियस जिनका आरम्भ में जिक्र हुआ, अब के दौर में फिर उभरकर सामने आयेंगे, इसका भरोसा जरा मुश्किल ही लगता है।
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बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

गली बॉय

झेंपते हुए युवक की जिन्‍दगी से......

 

क्या किसी फिल्म को उसकी श्रेष्ठता में अनगढ़ तरीके से देखा जा सकता है! क्या एक जगह बैठकर हम उस जीवन की कल्पना कर सकते हैं जहाँ बहुत सारी कठिनाइयाँ हैं, दुख हैं, पीड़ाएँ हैं, घुटन दिखायी देती है, असहनीयता धुँआ धुँआ दीखती है! क्या हमें उम्मीद होती है कि कोई रास्ता वहाँ की घोर बेचैनी के बीच से भी निकल सकता है! बहुत सारे नकारात्मक उत्तरों के बावजूद कोई फिल्म हमको बांधकर रखती है। बांधकर रखती इसलिए है क्योंकि अनचाहे ही बेखबरी में हम उस फिल्म के किरदारों में अपने को पहचान जाते हैं और उनका हाथ थामकर चल पड़ते हैं। यही किसी फिल्म की सच्ची सफलता भी है बल्कि सराहना पहले है, सफलता बाद में है।

लेखक और शायर पिता, लेखिका और निर्देशिका माँ की बेटी जोया अख्तर अपनी यह तीसरी अहम फिल्म गली बॉय को एक निर्देशक के रूप में, रीमा कागती के साथ एक पटकथाकार के रूप में बहुत कोमलता से बुनकर प्रस्तुत करती हैं। रीमा कागती से उनकी पिछले रचनात्मक सरोकार हैं, दोनों ने मिलकर तलाश फिल्म की रचना की थी जिसे आमिर खान की एक खास फिल्म कहा जाता है। यह गली बॉय मुम्बई महानगर की एक बड़ी झोपड़पट्टी में एक छोटे से घर, गलियों और मोहल्ले में घटती है। बड़े सजीव और वास्तविक सेट्स के बीच कम से कम जगह में नियति से अधिक से अधिक उदारता लेकर जीने के जज्बे को यहाँ देखा जा सकता है।

यहीं एक युवा सपना देख रहा है। प्रेम कर रहा है। डरता है मगर छोटे-मोटे गुनाह भी कर रहा है। पारिवारिक स्थितियों, अख्खड़ पिता की एकतरफा आक्रामकता, दूसरा विवाह और हिंसा को स्वयं भी सह रहा है, माँ को भी सहते देख रहा है। आधुनिक संसार में तकनीकी आविष्कार, विकास, आकर्षण, ग्लैमर के रास्ते बाकी दकियानूसी पूछताछ या आधारकार्ड नहीं देखा करते। कोई-कोई जगह किस्मत का जादू बस्ती के बीच से अचानक प्रकाशित होने वाले रॉकेट की तरह आवाज करता है और ऊँचा उड़ जाता है। यह राकेट मुराद अहमद किस तरह है, यह देखना ही गली बॉय फिल्म के अर्थ को समझना है। मदद करने वाले दोस्तों का भी संसार खूब होता है। अपराधी दोस्त अपनी ही भाषा में पुलिस के द्वारा खूब तोड़ा जाता है लेकिन नायक का नाम नहीं लेता। नायक जब सफल हो जायेगा, पैसा बना लेगा तब जमानत भी ले लेगा, यह भरोसा है।

रणवीर सिंह के जीवन और कैरियर की पहली अच्छी फिल्म है जिसमें न वह सिम्बा टाइप छिछोरा है और न ही खिलजी जैसा वीभत्स। वह एकदम मुराद अहमद है। दब्बू, झेंपू, डरने वाला, सहमा सा लेकिन एक अजीब सी सनकी लड़की से प्यार करने वाला जो आये दिन शक-शुबहा में नायक के जीवन में आने वाली लड़कियों से मारपीट किया करती है। वह अपनी होने वाली सास को यह पूछने पर कि खाना बनाना जानती हो, उत्तर देती है कि एक घण्टे में आपका लिवर ट्रांसप्लाण्ट कर सकती हूँ। फिल्म में अच्छे मानवीय रंग हैं सौतेली माँ को नायक का गाना पसन्द आना, माँ को बेटे का गाना पसन्द आना जैसे कई अच्छे पंच हैं।

सपनों को साकार करने का संघर्ष एक अलग ही पथ का रागी बनाता है मनुष्य को। नकारात्मकता अतिरेक से पहले ही परास्त हो जाती है दृढ़ इच्छाशक्ति और हौसले के आगे। आत्मबल और जुनून जीवन में बदलाव के मील के पत्थर ठहर-ठहर कर गाड़ते हैं, दूरी-दूरी पर गाड़ते हैं पर उन तक पहुँचने का पथ भी प्रशस्त करते हैं, गली बॉय यही बात अपने आपमें एक फिल्म की तरह एक प्रतिभाशाली निर्देशक के माध्यम से सफलतापूर्वक कह जाती है.............

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

कुम्भ में कलार्चन

पवित्र भूमि और पवित्र अवसर का आतिथेय होना.... 

 


मकर सक्रान्ति से प्रयागराज में आयोजित हो रहा कुम्भ महाशिवरात्रि तक चलता रहेगा। उत्तरप्रदेश सरकार का यह एक बड़ा आनुष्ठानिक उपक्रम है जिसके माध्यम से उसके सामने आतिथेय होने के बड़े अवसर हैं। स्वाभाविक रूप से सरकार की ऐसे पर्व-उत्सवों में एक बड़ी भूमिका होती है और सरकार इस दायित्व को स्वीकार भी करती है लिहाजा आतिथेय स्वरूप में उसका होना बड़ा मायने रखता है। देश दुनिया से श्रद्धालु और आमजन इस अवसर पर पधारते हैं। ऐसे आयोजन के पूरे अवसर का साक्षी हर मनुष्य होना चाहता है। यह एक तरह से आस्था का पर्व होने के साथ-साथ दुनिया का मेला भी होता है जब प्रत्येक पग पर आदमी होता है, शहर आगन्तुकों की बाट जोहता है। एक नदी शहर के अन्दर होती है और एक जनप्रवाह की नदी। जनप्रवाह की नदी से प्रेरित सब के सब चुम्बकीय आकर्षण से बंधे ऐसे बहे चले आते हैं कि उनकी सामूहिकता, वेग, अनुशासन और पुरुषार्थ देखते ही बनते हैं। 

सरकार और आयोजक ऐसे आमजन के लिए, ऐसे श्रद्धालुओं के लिए गन्तव्य से मन्तव्य तक किये जाने वाले परिश्रम, उठाये जाने वाले कष्ट और अनेक प्रकार की शारीरिक, व्यवहारिक और मानसिक व्याधियों के बावजूद जो कि स्वाभाविक रूप से परिस्थितिजन्य होती हैं, के बीच उनके विश्राम के क्षणों में, उनकी सहजता के साथ उपलब्ध समय में उनके आनंद, मनबहलाव और इस पवित्र तीर्थ में आने को सांस्कृतिक पक्ष से सार्थक बनाने के लिए अनेक गतिविधियाँ आयोजित करते हैं। ऐसे अवसरों पर देश भर से कलाकार आते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये कलाकार गायन, वादन, नृत्य, नाटक के आयामों में आधुनिक, शास्त्रीय, लोक और पारम्परिक कलाओं के गुणी साधन, प्रतिभासम्पन्न हस्ताक्षर और सम्भावनाशील आमद की तरह अनेक पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकार, उनके अनुषंग और उनके लिए काम कर रही संस्थाओं के लिए भी इस तरह के अवसरों को जुटाना और उसके लिए सारे प्रबन्ध करना एक बड़ा दायित्व होता है। कुम्भ और महाकुम्भ जैसे पर्वों पर सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकिन एक पूरा का पूरा वातावरण ही तैयार करना होता है। यह बात बहुत महत्व की है कि आनुष्ठानिक अवसरों पर सारा वातावरण आध्यात्म से रचित और प्रेरित रहता है। वह पूरा स्थल जहाँ का यह पर्व आकर्षण होता है, उद्घोषणाओं, उच्चारणों, प्रवचनों, आध्यात्मिक उद्बोधनों, भजन, कीर्तन और भक्ति के विभिन्न अनुषंगों को प्रसारित और प्रचारित किया करता है और इसी बहुविध अनुभूतियों के बीच दर्शकों-श्रोताओं के लिए सांस्कृतिक उपक्रमों को संयोजित करना होता है और ये गतिविधियाँ प्रायः रात्रि में ही आयोजित हुआ करती हैं। 

वर्ष 2016 में उज्जैन में सिंहस्थ महाकुम्भ आयोजित हुआ था। समय भीषण गर्मी का था। तारीखें थीं 21 अप्रैल से 21 मई तक। इस अवसर पर संस्कृति विभाग ने देश के लगभग 42 हजार कलाकारों को प्रस्तुति के लिए निमंत्रित किया था। प्रस्तुति के लिए अलग-अलग विशाल मंच बनाये गये थे जिनके नाम थे, भरतमुनि मंच, भर्तृहरि मंच, विक्रमादित्य मंच, कालिदास मंच और भोज मंच। इसके अलावा वाराहमिहिर मंच और त्रिवेणी मंच भी थे। इन सभी मंचों पर प्रतिदिन शाम सात बजे से देर रात लगभग एक बजे या कतिपय परिस्थितियों में उसके उपरान्त भी गतिविधियाँ हुआ करती थीं। प्रस्तुतियाँ गायन, वादन, नृत्य, नाट्य, पौराणिक फिल्मों का प्रदर्शन, कवि सम्मेलन, रामलीला, रासलीला, चित्र एवं शिल्पकला कार्यशाला एवं प्रदर्शनियाँ आदि के रूप में शास्त्रीय, आधुनिक, लोक एवं जनजातीय क्षेत्रों से समृद्ध होती थीं। टिप्पणीकार को इस वृहद आयोजन के नोडल अधिकारी के रूप में काम करने का अवसर संस्कृति विभाग की सेवा में होने के नाते मिला था। मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग ने इसे भारतीय परम्परा के महान पर्व के रूप में विन्यस्त किया था और समय से काफी पहले सक्रिय होकर भारत सरकार के संस्कृति विभाग, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, सीसीआरटी, भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद, आलियांस फ्रांसेस और इसके अलावा भारत सरकार के छहों सांस्कृतिक जोन के माध्यम से कला और संस्कृति के भी महाकुम्भ की तरह इसका आयोजन किया जा सका। 

एक माह की अवधि में बयालीस हजार कलाकारों की भागीदारी उनका अपने-अपने शहरों से उज्जैन शहर आना और सकुशल लौट जाना एक बड़ी जिम्मेदारी थी जिसे बहुत संवेदनशीलता के साथ, अपनत्व और सदाशयता के साथ निबाहे जाने के निर्देश सरकार ने दिये थे। उज्जैन के महाकुम्भ में पण्डित जसराज, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, पण्डित राजन साजन मिश्र, पण्डित अजय चक्रवर्ती, गीता चन्द्रन, मीरा दास, मंगला भट्ट, उमा डोगरा, संध्या पुरेचा, पण्डित नित्यानंद हल्दीपुर, पण्डित छन्नूलाल मिश्र, आरती अंकलीकर, कमला शंकर, प्रभाकर कारेकर, रोनू मजूमदार, विश्वमोहन भट्ट, मालिनी अवस्थी, मंजू मेहता, गुन्देचा बन्धु, उदय भवालकर आदि कितने ही मूर्धन्य, प्रतिभासम्पन्न और गुणी कलाकारों ने स्वर, संगीत और नृत्यार्चनाएँ की थीं। पूरे एक माह तक चलने वाली रंगरेज कला संस्कार उज्जैन ग्रुप की परिष्कृत रामलीला तीन आवृत्तियों में महाकुम्भ में आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। वाराणसी से प्रतिभाशाली रंगकर्मी एवं कवि व्योमेश शुक्ल ने राम की शक्तिपूजा, पंचरात्रम और रश्मिरथी का मंचन बड़ी कम उम्र के किशोर और युवा प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ किया था। दक्षिण भारत की पारम्परिक नृत्य नाट्य विधाएँ कथकली, चिण्डू भागवतम, यक्षगान यहाँ निमंत्रित थे। 

कलाओं की सहभागिता, कलाकारों की भागीदारी किसी भी उत्सव का एक बड़ा सांस्कृतिक आकर्षण होती है। महाकुम्भ या कुम्भ जैसे आयोजनों से ऐसे अवसरों या उपक्रमों का जुड़ना उन मायनों में बड़ा महत्व रखता है कि कलाकार की प्रतिभा एक विराट जनसमुदाय के अवलोकन और प्रतिक्रिया की साक्षी होती है। हमारे कलाकारों के भी जीवन का यह विलक्षण अवसर होता होगा जब उनकी कला को देखने वाला वह समाज प्रेक्षक होता है जो प्रायः किसी भी सभागार, ऑडिटोरियम, खुले मंच या स्टेडियम में आकर नहीं जुटता। आखिर कला और हमारे सर्जनात्मक सांस्कृतिक आयामों की सार्थकता भी सही अर्थों में वही जनसमाज है जो दरअसल वर्षों से इस अभिजात्य होते चले जा रहे सांस्कृतिक अभिरूप से दूर होता चला जा रहा है क्योंकि संस्कृति में सम्मोहन के तत्व तलाश करना कठिन है दूसरे अपसंस्कृति ने रचनाशीलता और रचनात्मकता की सारी कोमल और सात्विक सम्भावनाओं को अपने नुकीले और विषाक्त नखों से नोचकर रख दिया है। ऐसे में यदि भारतीय परम्परा के महान उत्सवों और पर्वों में कलाएँ एक कदम आगे बढ़ाकर यदि खुद ही वृहद जनसमाज के सामने उपस्थिति होती हैं तो यह कितनी बड़ी सांस्कृतिक उदारता होगी!

कलाकार और जनसमुदाय के बीच सांस्कृतिक तादात्म्य का स्थापित होना, एक-दूसरे के बीच परम्परा और ज्ञान की जिज्ञासा का सेतु बनना प्रयागराज के कुम्भ की भी एक उपलब्धि हो सकती है लेकिन कार्यक्रमों का आयोजन करा लेना, कलाकार की प्रस्तुति करा देना, उनको बुलाना और भेज देना भर काम नहीं है। यह एक बड़ा टीम वर्क है जिसके लिए व्यवस्था से जुड़े, सूत्रधार की तरह काम करने वाले, उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने वाले लोगों के लिए यह सब काम एक बड़ी चुनौती की तरह होते हैं जिसमें प्रत्येक क्षण जाग्रत रहकर काम करना होता है। कलाकारों के लिए उत्तरदायी व्यवस्था को सबसे पहले तो अपनी ही सुख-सुविधा का त्याग करना होता है। अपने आराम की फिक्र छोड़नी होती है। अपनी नींद को जागते हुए लेने के लिए तैयार होना होता है। कलाकारों के यथाक्षमता आराम और विश्राम की चिन्ता करनी होती है। कलाकार को ऐसा भोजन उपलब्ध कराया जाना होता है जो उसका स्वास्थ्य न बिगाड़े। उसके रहने की जगह ऐसी हो कि वह ठीक से आराम कर सके और मंच पर प्रस्तुति के समय उसका मन बना रहे। इसके लिए कलाकार के साथ आत्मीय और संवेदनशील व्यवहार की भी अपेक्षा की जाती है। कलाकार की सुरक्षा, उसके सामान की सुरक्षा, उसकी सेहत की चिन्ता, चिकित्सा और अन्य आकस्मिक आपदाओं का सामना करने में सक्षमता और प्रत्युत्पन्नमति का प्रयोग बहुत मायने रखता है। मुझे याद है सीसीआरटी ने प्रस्तुति के लिए दिव्यांग एवं विशेष बच्चों के समूह की प्रस्तुतियाँ भेजी थीं तो हमने उनके साथ अतिरिक्त सावधानी बरती थी क्योंकि उनको सदैव अपने हर काम में सहायता चाहिए होती थी जो आवश्यक भी थी और अपेक्षित व्यवस्था अपरिहार्य भी। 

उज्जैन में सिंहस्थ महाकुम्भ के समय भोज्य पदार्थों के सम्बन्ध में अतिरिक्त सावधानी रखना पड़ती थी क्योंकि भीषण गर्मी के कारण खाना खराब होने लगता था। इसी प्रकार एक दिन अचानक अपरान्ह में मौसम ने अपने तेवर दिखाये, देखते ही देखते घटा छा गयीं, बादल गरजने लगे और तेज तूफान-आंधी के साथ बेतहाशा ओले गिरने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि भर्तृहरि मंच देखते ही देखते धराशायी हो गया और कई कलाकारों के प्राण संकट में आ गये। तत्परतापूर्वक किए गये उपायों के कारण किसी को शारीरिक नुकसान नहीं हुआ तथापि देर तक सभी भयाक्रान्त रहे। जहाँ तक मंच का सवाल था, अगले दिन फिर उसी रूप में तैयारकर खड़ा कर दिया गया और कार्यक्रम प्रारम्भ हो गये। लेकिन ऐसे हादसे सबक की तरह होते हैं।

प्रयागराज का कुम्भ भी आस्थाओं के हिन्द महासागर के रूप में अतिशीघ्र अपने विराट स्वरूप को प्राप्त करेगा। उत्तरप्रदेश सरकार के लिए सत्ता में आने के बाद पहला बड़ा आनुष्ठानिक पर्व यह कुम्भ का मेला है जिसमें उसने भी मध्यप्रदेश सरकार की तरह तो नहीं लेकिन फिर भी यथाकल्पना और आकलन सांस्कृतिक उपक्रमों को विन्यस्त किया है। यह कामना है कि यह समारोह बिना किसी बाधा और व्याधि के सम्पन्न हो और श्रद्धालुओं से लेकर कलाकारों और कलाभिव्यक्तियों के लिए एक प्रेरणा, एक मिसाल के रूप में जाना जाये। स्वाभाविक रूप से इसके लिए वे सब सावधानियाँ रखनी होंगी जिनके अभाव में मानवीय सभ्यता को मुसीबतों, हादसों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हम यही आशा करते हैं कि उत्तरप्रदेश शासन इसके लिए तत्पर भी है और सक्षम भी।

लेखक उज्जैन महाकुम्भ 2016 में सांस्कृतिक गतिविधियों के नोडल अधिकारी रहे हैं.





मंगलवार, 8 जनवरी 2019

सिम्‍बा

एक निरर्थक किन्‍तु बाजार कब्‍जायी फिल्‍म पर  


" सिम्‍बा का नायक बड़े संघर्षशील जीवन से बड़ा हुआ एक डेशिंग पुलिस अधिकारी है जिसके भाग्‍य में बड़ा आधुनिक थाना है, आय पी एस के टक्‍कर का वाहन है, आसपास चाटुकारिता और चापलूसी करता स्‍टाफ है, रोमांस के लिए थाने के सामने ही रेस्‍त्रॉं और उसकी मालकिन है."
" लेकिन मुझे यह भी लगा कि बचपन में उसको रात्रिकालीन स्‍कूल में जो शिक्षा मिली वह इतनी प्रभावहीन हुआ करती थी कि सुबह उठते ही वह टिकिट की ब्‍लैक मार्केटिंग में लिप्‍त हो जाया करता था। रोहित शेट्टी की कहानी में यह दिलचस्‍प विरोधाभास है........"



अगर सिनेमाहॉल में भरपूर उपस्थिति हो, इतवार के दिन सिंगल स्क्रीन थिएटर में भी भीड़भाड़ दिखायी दे तो उस फिल्म को सुपरहिट मान लेना चाहिए। यदि न मानों तो वो सब लोग जरूर बेवकूफ कहेंगे जो माउथ पब्लिसिटी के साथ औरों को भी सिम्बा देखने को प्रेरित कर रहे हैं और जो प्रेरित है, वो औरों को प्रेरित कर रहे हैं। बहरहाल रोहित शेट्टी की इस साधारण सी बनी फिल्म को फिलहाल दर्शकों की कोई कमी नहीं है और यह सप्ताह भी बॉक्स ऑफिस की गणितबाजी और उसकी बाजीगरी से करोड़ों का कलेक्शन घोषित करते-करते निकल जायेगा।
अब आप रोहित शेट्टी से कोई संवेदनशील या मन में पैठ कर लेने वाली फिल्म की उम्मीद तो वैसे भी नहीं करते। तो वे भी आपसे उस तरह की फिल्म बनाने के लिए कहीं वचनबद्ध नहीं हैं। ये सिम्बा तीसरी फिल्म होगी जो उनके गोवा प्रेम का प्रमाण है। इसके पहले की दो सिंघम वहीं बनायीं थीं उन्होंने। इधर उनको तेलुगु की तीन साल पहले आयी सुपरहिट टेम्पर की कहानी हासिल हुई तो उन्होंने दबंग का कुछ मसाला इस्तेमाल करते हुए सिम्बा बना डाली है।
अजय देवगन के परम मित्र रोहित शेट्टी ने पिछली फिल्मों से अपेक्षाकृत नये सितारे रणवीर सिंह पर दाँव आजमाते हुए भी बॉक्स ऑफिस का कोई जोखिम नहीं लिया है और देवगन के लिए आखिरी पन्द्रह मिनट बाकायदा दर्शक का तेवर बदलने के लिए रखे हैं, यहीं वे निरीह रणवीर सिंह के साथ धोखा कर देते हैं। शुरू से ही कहानी को गड्डमड्ड करते चले रोहित ने आखिरकार इस नायक को अन्त में ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया कि वहाँ वह खुद न समझ पायें कि आगे किया क्या जाये! ऐसे में यह जगह अजय देवगन को हीरो बना देने के लिए काम में ले जी गयी। इन बाद के दृश्यों में रणवीर सिंह का चेहरा अभिनय करते हतोत्साहित दीखता है। ऐसा लगता है कि गन्तव्य तक रेल ले आने वाले ड्रायवर को हटाकर दूसरा ड्रायवर बैठा दिया गया कि अब यार्ड में गाड़ी वह ले जायेगा।
आरम्भ में जिस तरह के संकेत लिखते हुए दिये, सिम्बा ऐसा पूत बताया गया है जिसके पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। छः-सात साल के लड़के का आत्मविश्वास गजब का है और अभय भी ऐसा कि सब बस उसे उसकी उम्र से बड़े डायलॉग बोलते देखकर हतप्रभ टाइप रह जाते हैं। यही फिल्म का नायक है जो इन्स्पेक्टर बन गया है और पैसों के लेनदेन और अपनी बेईमानी से कुख्यात है। औपचारिकता के लिए नायिका भी है सारा अली जो केदारनाथ में फिर भी कुछ करती दिखायी देती हैं, यहाँ उनकी ताजगी और क्षमता का उपयोग किया ही नहीं गया। सोनू सूद एक बुरे आदमी के किरदार में पूरे समय अविश्वसनीय और भ्रमित ही लगे हैं। अमर मोहिले का बैकग्राउण्ड म्युजिक सब मूर्खताओं और फूहड़ताओं को दर्शकों के मस्तक पर सील-ठप्पे की तरह जड़ता चलता है। बोझिल भावनात्मकता और निर्भया काण्ड से जुड़ी मानवीय दलीलें देकर किसी तरह फिल्म को पूरा कर लिया गया है।
सिम्बा के नायक के रूप में रणवीर सिंह अण्डरएस्टीमेटेड हीरो साबित हुए हैं। उनका अपीयरेंस, कॉमेडी दृश्य और डाँस उनको कुछ अधिक सड़कछाप चरित्र के नजदीक ले जाते हैं जबकि इतना ज्यादा किरदार हो जाने की जरूरत है नहीं। आशुतोष राणा हवलदार की भूमिका में थके थके से लगते हैं। थाने में साथियों को ललकारने के उनके दृश्य भी बड़े कमजोर साबित होते हैं। दर्शकों की आँखों को रंगीन ठहराव देने के लिए रखे गये गाने में बहुत सारी महिलाएँ कलरफुल साड़ी पहनकर डाँस करती हैं और इसी तरह धोबी घाट का दृश्य भी नायक की आमद को बचकाना साबित करता है।
निर्देशक बहुत सारे कलाकारों को बतौर अतिथि यहाँ पिछली दूसरी फिल्मों के गानों के दोहराव में ले आता है जैसे करण जौहर, तुषार कपूर, अरशद वारसी, श्रेयस तलपड़े आदि। अन्त में अक्षय कुमार के साथ अन्तिम दृश्य भी कमजोर विद्यार्थी के लिए लगाये गये अनेक सोर्स से आगे का एक सोर्स साबित होता है। हिन्दी के दुश्मन मुम्बइया फिल्मकार अक्षय कुमार को एटीएस चीफ प्रोजेक्टर कर रहे हैं लेकिन बैच पर नाम में सरनेम सूर्यवंशी की जगह सुर्यवंशी लिखा है। अब जब यह फिल्म आयेगी तब बार-बार अक्षय कुमार की छाती पर लगे इस बैच में प्रूफरीडर स्वभाव के कारण करेक्शन करने का मन करेगा।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

नदी की सन्निधि में.........

लगता है वो मुझे अपने में एकाग्र होने नहीं देतीं। वो जहाँ पर हैं वहाँ वे इस बात का प्रयत्न करने में और आसानी से सक्षम हैं। धीरे-धीरे दिन सालों में बदलते जा रहे हैं। मैं काँच में अपना चेहरा हर दिन ही देखा करता हूँ। जान नहीं पाता, बड़े आघात कहाँ से क्या कुछ छुड़ाकर अपने साथ ले जाते हैं। ऊपर से कुछ समझ में नहीं आता। भीतर से भी कितना आता है, कहना मुश्किल है। 

स्मृतियों में कौंधता है, एफ टाइप दो मकानों में लगने वाला वह स्कूल जिसमें मैंने पढ़ना शुरू किया था। पहले दिन मुझे अच्छा तैयार किया गया था और बस्ता, जूता-मोजा, हाफ पैण्ट, बुशर्ट आदि पहनाकर वो मुझे स्कूल छोड़ने आयीं थीं। टीचर से भीतर बात की थी और थोड़ी देर में जब प्रार्थना की घण्टी बजी तो बाहर बच्चों की लाइन लगने लगी जिसमें मैं भी खड़ा कर दिया गया। प्रार्थना हो रही थी और लाइन में खड़े मैं उनको देख रहा था। आधी प्रार्थना हो चुकी तो वे मुझे देखते हुए मुस्कराकर जाने लगीं। उनको जाते देखकर मैं रो कर उनकी ओर दौड़ पड़ा और पीछे से जाकर उनकी साड़ी पकड़ ली, कहने लगा घर जाना है। उनको हँसी आ गयी पर मेरा रोना बन्द नहीं हुआ। 

बड़े होते हुए पता नहीं कितने ऐसे अवसर आये होंगे जब उनकी तबियत खराब हुई, वे बीमार पड़ीं पर साथ बनी रहीं। पिछली बार फिर उनको मैं पकड़ न सका, वो एकदम अन्तर्ध्यान हो गयीं अपने भीतर से। ओर-छोर हम कुछ भी न समझ पाये। अब वे बहुत सारी फोटुओं में हैं जिन्हें देख पाना सहज नहीं होता, जिन्हें देखते हुए अपने आपको सह पाना भी सहज नहीं होता। वे अक्सर अपनी माँ, हमारी नानी को याद करके कहा करती थीं, नहीं रहने के बाद अम्माँ हमें कभी सपने में भी नहीं दीखीं। कभी-कभी वे बतलाती थीं कि तुम्हारी नानी को सपने में देखा, उन्होंने कहा, मुनियाँ, हम अकेली हैं। अब हमारे पास घर भी बड़ा है, तुम भी वहीं चलो। इस पर मैं उनके हाथ जोड़ लिया करता था, यह कहते हुए कि ऐसे सपने मत देखा करो। और नानी की बात भी मानने की जरूरत नहीं है तब वे शरारतन हँसने भी लगतीं, वे हम सबकी घबराहट को भाँप जातीं थीं। त्यौहारों को लेकर उनके अपने सिद्धान्त बड़े स्पष्ट और साफ से थे। हम लोगों के प्रायः अलसाये रहने पर वे कहा करती थीं, सब दिन चंगे, त्यौहार के दिन नंगे। वे चाहती थीं घर के लोग तीज-त्यौहार के दिन सुबह से ही तैयार हो जायें और घर को भी उसी तरह व्यवस्थित करें। 

अब उनके बिना ये त्यौहार पूरे दिन सहना बड़ी हिम्मत का परिचय देने जैसे हैं जिसमें संयत बने रहना ही सबसे बड़ी परीक्षा होती है। पीर-पके मन में बहुत उथल-पुथल मचती है। कोई कोना-छाता समझ में नहीं आता जहाँ दो पल अपने में उसी व्यथा के साथ रहा जा सके। चारों तरफ ऐसे व्यवधान हैं जो पूरे जीवनभर भ्रमित करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। दीपावली पर उनको अनार बहुत पसन्द थे। पटाखों के साथ अनार उनकी इच्छा से चार-पाँच जरूर लाये जाते। उन अनारों को छुटाने (जलाने) के समय उनको बाहर बुला लिया करते थे। अनारों का भरपूर दम भर ऊपर जाना और एकदम से दानों का बिखर जाना उनको बहुत सुहाता। उतना देखकर वे भीतर चली जातीं हम लोगों का खाना बनाने के लिए। 

पिछले साल मन किया, उनकी आभासी सन्निधि में कुछ अनार जलाऊँ। नर्मदा, गंगा, संगम और शिप्रा में उनकी आभासी सन्निधियाँ हैं क्योंकि उनके दिव्यांश वहाँ प्रवाहित किए थे। साँझ को इन्हीं इरादों के साथ अपनी व्यथा का मलहम लिए दीपावली के दिन रामघाट पहुँच गया। माँ शिप्रा अपने पूरे ठहराव में थीं किन्तु उनका स्पन्दन महसूस किया जा सकता था। दोनों ओर कुछ दिये जल रहे थे। इक्का-दुक्का लोग। मेरे अनुज से मित्र अमित वहाँ मेरे पास थे। हम लोगों ने वहीं किनारे अनार जमाये। अनार जलाने के लिए फुलझड़ी का प्रयोग ज्यादा सहज है। हमने जलायीं, तभी वहीं एक बच्चा कहीं से आ पहुँचा, आठक साल का जिसने कहा, अंकल मैं जलाऊँ अनार, हमने कहा, बेटा क्यों नहीं। वह खुश हुआ। हमने फिर मिलकर एक-एक करके सभी अनार जलाये। अनार जल चुके, फुलझड़ी के चार पैकेट बचे थे, इस बीच तीन बच्चे-बच्चियाँ वहाँ से निकले गरीब परिवार के जो दोने में आटे की गोली मछलियों को डालने के लिए बेच रहे थे मगर वहाँ उनका कोई गाहक नहीं था। उनको पास बुलाकर एक-एक पैकेट फुलझड़ी का दिया, एक जो बचा वो अनार चलाने वाले बच्चे को। सबके चेहरे पर जो खुशी आयीं वह अनूठी, प्रीतिकर और सुखकारी थी। सबने अपने विवेक से जले हुए अनार कचरे के डब्बे में डाले और हम लोगों को हैप्पी दीवाली अंकल कहते हुए दौड़ते-भागते अपने घर को चले गये। इस बार भी यही किया। दीपावली के दिन तीन बजे दोपहर को उज्जैन की ओर चल पड़ा। बीते साल की तरह रामघाट जैसे बुला रहा था। इस साल भी ऐसा ही। लोग घरों में थे, त्यौहार की तैयारी करते, घाट सूना था। वही इक्के-दुक्के लोग, बच्चे, एक-दो मांगने वाले। इस बार भी अमित और आदित्य मेरे आने से पहले आ गये। हम सबने अनार जलाये, वहाँ घूम रहे बच्चों को भी बुलाकर। आधे घण्टे ठहराव के बाद फिर भोपाल वापसी। 

मैं जानता था कि यह मेरा अपना हठ, अपने आप से है, मुझे लगा कि शायद इसमें मैं अकेले ही शामिल हो सकता हूँ। इसलिए मैंने अपनी निजता में यह कर लिया। लौटते हुए रामघाट पर बिताया समय मेरे लिए अपने मन को जीने का मेरा हठ थे, जिन पर मैं अपना दृश्यबोध छोड़ आया था। शिप्रा का ध्यान करते हुए मोक्षदायिनी नदियों के विषय में मैं सोचने लगा, लाखों-करोड़ों लोगों की पीड़ा और बहते हुए आँसुओं को ये नदियाँ कितनी उदारता से अपने आँचल में समेट लेती हैं। उतना ही सच यह भी है कि इतनी पीर अपने में सहेजे-समेटे वे स्वयं कितनी पीर से भरी रहा करती होंगी। शायद यही कारण है कि नदी के किनारे थमकर बैठना, जीवन के अर्थ का सात्विक और सच्चा व्याकरण ग्रहण करने के बराबर है। हमारे पूर्वज नदी की धरोहर हैं और नदी हमारी समूची मानवीय अस्मिता की.................

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

।। केदारनाथ ।।

एक प्रेमकहानी में कुछ प्रेमरस

 



केदारनाथ उस तरह से कोई साधारण फिल्म नहीं है जैसी प्रत्युत्पन्नमति समीक्षकों ने आनन-फानन उसे देखकर समीक्षा कर डाली है। कुछ वर्षों से इन्स्टेण्ट समीक्षा का अजीब सा कायदा बन गया है हमारे यहाँ मीडिया में जिसमें देखने के लिए भी वक्त नहीं है और सोचने के के लिए भी। लिख देने की जल्दी है, दौड़कर आगे निकल जाने की भी जल्दी है भले ही ठहरकर विचार भी न कर पाये हों। केदारनाथ अभिषेक कपूर निर्देशक एक अच्छी प्रेमकथा है जिसकी पृष्ठभूमि में शीर्षक अनुरूप केदारनाथ में पाँच साल पहले आयी आपदा लगातार साथ चलती है लेकिन आप उसको उस स्थान, उस कस्बे की एक काल्पनिक कहानी मानकर देखो, जैसा कि फिल्म के शुरू में स्पष्ट भी किया गया है, तो उसे एक सुरम्य स्थल पर युवा प्रेमकहानी के रूप में देखना अच्छा लगता है। मैंने यह फिल्म कल रात में देखी और आधा हॉल भरा भी पाया, यह दूसरे सप्ताह की स्थिति है जो बाजार की दृष्टि से भी बुरी नहीं है।

केदारनाथ तीर्थ में मन्दिर तक पहुँचने में असहाय और असमर्थ श्रद्धालुओं को अपनी पीठ पर बैठाकर मन्दिर की चौखट तक छोड़ने वाला नायक है जिसके पिता भी यही काम करते थे लेकिन एक दुर्घटना में, जब वह छोटा था, चल बसे थे। माँ और एक शायद भांजा उसके साथ, यही परिवार है। नायिका, दो बहने हैं, माँ और पिता। इनकी अलग कहानी है, नायिका छोटी बहन है जिसके लिए जिन्दगी का उस समय तक अर्थ उच्छश्रृंखलता है जब तक वह नायक से नहीं मिलती। नायक से मिलने के बाद फिर प्रेमकहानी है, मिलना है, नायक का नायिका को पिट्ठू पर बैठाकर घुमाना फिराना और गाना गाना भी।

नायक-नायिका के प्रेम के फलीभूत होने की अपनी बाधाएँ हैं, विशेषकर आसपास, समाज, धर्म यही सब। इसके बीच नायक बहुत विनम्रता और आत्मविश्वास के साथ मनुष्यता के पक्ष में अच्छे तर्क रखता है। फिल्म में नायक की माँ का अन्देशों और डर से भरा हुआ होना, नायक का अपने आपमें नायिका के प्रति, प्रतिबद्ध होना कहानी के महत्वपूर्ण पक्ष हैं। फिल्म में सहायक अभिनेता अपनी तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, वे सीमित भी हैं। प्राकृतिक संकट और विनाश की भयाक्रान्तता क्लाइमेक्स में बखूबी प्रस्तुत की गयी है। एक बड़े सजीव से सेट पर यह फिल्म चरितार्थ होती है। खूबसूरत गानों और उनके संगीत के साथ। विशेषकर आरम्भ में शिव की वन्दना का जो गीत है, संगीतकार अमित त्रिवेदी का ही गाया हुआ, पूरे परिवेश और भव्यता में गजब का लगता है। यह जितनी सुशान्त की फिल्म है उतनी ही सारा की भी।

सुशान्त के चेहरे पर प्रकृतिप्रदत्त सौम्यता बहुत सुहाती है। संवेदनशील और कोमल भावों की अभिव्यक्ति में वे मन को छूते हैं। सारा को देखते हुए अमृता याद आती हैं बेताब की। मिलता हुआ चेहरा, दुस्साहसी और चंचल चरित्र में वे जितना कमाल करती हैं भावनात्मक दृश्यों में वे उतनी ही प्रीतिकर भी। बहन की भूमिका में पूजा गोर का किरदार सीमित होते हुए भी रेखांकित होता है। फिल्म के अन्त में जब विनाशलीला समाप्त होने के कुछ वर्षों बाद का केदारनाथ दिखाया जाता है, तब अपने प्रेमी की याद में रेडियो में उस गाने की फरमाइश के साथ फिल्म का खत्म होना मन को छू जाता है जो पिछले किसी एक क्षण में नायक, नायिका के सामने गाता हैं। यह एक नम अनुभूति के साथ दर्शकों को सिनेमाहॉल से विदा करना है।

बड़े दिनों बाद किसी फिल्म में गीत के नाम पर गीत और संगीत के नाम पर माधुर्य का एहसास हुआ है। आज के समय में लम्बे समय तक गीत याद नहीं रहते मगर हमारे मन में इस फिल्म के गानों को लेकर एक सकारात्मक राय तो बनती ही है। फिल्म की मूल कहानीकार कनिका ढिल्लन हैं, खूबसूरती से उन्होंने एक मर्मस्पर्शी कथा रची है, अभिषेक कपूर एक नाम की तरह यहाँ उनके साथ श्रेय लेते हैं, वे निर्देशक जरूर अच्छे हैं, रॉक ऑन और काय पो छे के बाद इसमें वे प्रमाणित करते हैं।

तुषारकांत राय की सिनेमेटोग्राफी बहुत खूबसूरत है। कला निर्देशन में भी अच्छी कल्पनाशीलता के लिए आर्ट डायरेक्टर संजय कुमार चौधरी की सराहना की जानी चाहिए।
#kedarnath @kedarnath #filmreview @sushantsinghrajpoot @saraalikhan 

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018



फिल्‍म - गुलामी
एक सशक्‍त सीन

एक जमींदार और एक किसान के बेटे के बीच सशक्‍त संवाद। 
गिरवीं जमीन और उसका कर्ज क्‍या एक किसान को 
पीढ़ी दर पीढ़ी चुकाना होता है.........?

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

निर्द्वन्‍द्व (नाटक)


तथागत बुद्ध की जातक कथा पर आधारित एक नाटक जिसका प्रथम मंचन सांची के महाबोधित महोत्‍सव में 25 नवम्‍बर 2018 को हुआ था। इस नाटक के लेखक सुनील मिश्र हैं तथा निर्देशक के.जी. त्रिवेदी। नाटक में संगीत दिया है सुरेन्‍द्र वानखेड़े ने। यह नाटक एक गरीब लकड़हारे के सच्‍चे मन और संकल्‍प की कथा कहता है, जिसकी मदद आत्मिक विपदा में फँसने पर तथागत करते हैं।