बुधवार, 8 अप्रैल 2020

पीयूष मिश्रा की तीन लघु फिल्‍में


इन दिनों लघु सिनेमा का एक आकर्षण बना है। अंग्रेजी मदिरा का एक ब्राण्‍ड और दूसरी संस्‍थाऍं अनेक प्रतिभाशाली निर्देशकों, लेखकों और कलाकारों को ऐसी फिल्‍मों के लिए सहायता दे रहा है। इनमें से ऐसी कई फिल्‍में ध्‍यान आकृष्‍ट करती हैं और हमारे सामने संक्षिप्‍त या संक्षेप में सशक्‍त कथ्‍य की जगह को स्‍थापित करती हैं........


कतरन




प्रेम सिंह निर्देशित इस फिल्‍म में पीयूष मिश्रा और अलका अमीन प्रमुख कलाकार हैं पति-पत्‍नी की भूमिका में। रिटायरमेंट के बाद पति के गुस्‍से, झगड़े और हस्‍तक्षेप से त्रस्‍त पत्‍नी, दोनों तलाक के लिए वकील से मिलने जा रहे हैं। रास्‍तें में दोनों ही के पास बच्‍चों के फोन आ रहे हैं, पापा/मम्‍मी, मान जाओ, ये मत करो, मैं आ रहा हूँ/ आ रही हूँ। सब ठीक हो जायेगा। वकील के सामने काऊंसिलिंग। शिकवे शिकायतें। अन्‍तत: वकील कहता है, ठीक है, तलाक हो जायेगा, कुछ दिन लेकिन अभी साथ रहना होगा। दोनों साथ लौटते हैं, अलग-अलग कमरे में बैठे हैं कि अचानक किचन में कुछ गिरने की तेज आवाज आती है, एक-दूसरे के अन्‍देशे में दोनों दौड़ते हैं। आटे का डिब्‍बा और अन्‍य सामान जमीन पर गिरकर फैल गया है। दोनों नीचे देर तक देखते हैं, फिर आपस में एक-दूसरे की ओर देखते हुए सिर उठाते हैं, दोनों की डबडबायी ऑंखें, जीवन इस तरह बिखर रहा है....। पीयूष मिश्रा के चेहरे पर रोते और सुबकते हुए भाव गहरे बिंध जाते हैं। अलका अमीन जीवनभर परिवार और चौके में खटने वाली उम्रदराज स्‍त्री की अब आराम की चाह की सात्विक कामना को व्‍यक्‍त करती है। दोनों में किसका दोष है? मन को छू जाने वाली फिल्‍म। 



कथाकार




सिंगल स्‍क्रीन सिनेमाघरों की जगह पर मल्‍टीस्‍क्रीन सिनेमाघर बनाये गये थे तब ऐसे बहुत से लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट आ गया था जो मशीन पर रीलें चढ़ाकर प्रोजेक्‍टर चलाया करते थे। ऐसे ही एक प्रोजेक्‍टर ऑपरेटर की कहानी जो प्रोजेक्‍टर से परदे पर रोशनी फेंकने वाली खिड़की से हॉल का क्राउड और दर्शकों का शोर सुन-सुनकर अपना खून बढ़ाया करता है। वह दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्‍चन और सलमान खान तक की एंट्री पर बजने वाली तालियों का गवाह है। अब इसे नौकरी से निकाला जा रहा है क्‍योंकि लम्‍बे समय बाद जब नया मल्‍टीस्‍क्रीन सिनेमाघर तैयार होगा तब नयी टेक्‍नीक वाले, युवा कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। उम्र के उत्‍तरार्ध में यह हारा हुआ उदास आदमी अपने गॉंव लौटता है। वह क्‍या करे? आखिर एक दिन उसे जीने का जरिया, अपने ही अब तक के अनुभवों से सूझता है। वह कहानी नैरेट करना शुरू करता है। पहले बच्‍चों को कहता है, कहानी सुनोगे? तब बच्‍चे भाग जाते हैं। फिर एक-एक करके बच्‍चे, फिर समूह, फिर परिवार, फिर गॉंव......उसकी सुनायी कहानी के लिए भीड़ जुटती है। हारा हुआ गॉंव लौटा आदमी अपने ही गॉंव में जीने का लक्ष्‍य फिर प्राप्‍त करता है। गॉंव की खूबसूरत संरचना के बीच पीयूष मिश्रा की यह अकेली बहुआयामी प्रतिभा को व्‍यक्‍त करने वाली सराहनीय फिल्‍म है। इसका निर्देशन अभिमन्‍यु कनोडिया ने किया है। 



ग्‍लू


ग्‍लू के निर्देशक शरद दासगुप्‍ता हैं। इस फिल्‍म में पीयूष मिश्रा दृश्‍य में नहीं हैं बल्कि स्‍वर में हैं या यों कहिए कि फिलॉसफी में हैं। फिल्‍म बच्‍चे और पति के लिए टिफिन तैयार करती स्‍त्री के किचन में किए जा रहे उपक्रम से शुरू होती है। छोटा बच्‍चा जमीन पर बिछी दरी में पेट के बल लेटा हुआ सुपरमैन के उड़ने के एक्‍शन कर रहा है। जल्‍दी जल्‍दी से स्‍त्री पति और बेटे को टिफिन पकड़ाती है, बेटा पिता के साथ ही निकल जाता है और वह थकी मुद्रा में बैठ जाती है। स्‍कूल का दृश्‍य जिसमें बच्‍चा सुपरमैन का चित्र बनाने में तल्‍लीन है और पीछे उसका एक सहपाठी साथी उसको तंग कर रहा है। नहीं रहा जाता तो बच्‍चा उससे हाथापाई करने लगता है। मास्‍टर जी तंग कर रहे सहपाठी के बजाय बच्‍चे को सजा देते हैं। मेज पर उसका बनाया सुपरमैन का चित्र देखकर कहते हैं इसी तरह बाहर एक्‍शन में खड़े रहो। बच्‍चा समय पास कर रहा है। इस बीच खिड़की से जाते हुए चींटे को हाथ में लेकर खेलता भी है। एक और दिन के घर से बाहर निकलते हुए प्रसंग के पहले बच्‍चे के पिता से मछली का जार गिरकर टूट जाता है, वह पत्‍नी से झगड़ा करता है। पत्‍नी भी। शाम को बच्‍चा अकेला लौटता है। देखता है उसके माता-पिता फिर झगड़ रहे हैं। वह स्‍नेहिल हस्‍तक्षेप करना चाहता है अपने आपको सुपरमैन कहते हुए पिता से कहता है कि आप मम्‍मी को मत डॉंटा करो। वह सुपरमैन की मम्‍मी है, नहीं तो सुपरमैन गुस्‍सा हो जायेगा। इस पिता बोलते हैं सुपरमैन हो तो ऊपर जाकर उड़ो.......। बच्‍चा टूटकर सीढि़यॉं चढ़ता हुआ ऊपर चला जाता है जिसके बाद एक बड़ी दुर्घटना हो जाती है। लड़ते हुए पति-पत्‍नी को इसका आभास न रहा होगा शायद। इसी आखिरी छोर पर पीयूष मिश्रा की आवाज में गरिमा ओबराह का गीत सुनता हूँ.....अब तू किसे पुकारे....। यह एक भारी फिल्‍म है मगर कलह से अशान्‍त घर-गृहस्‍थी के दोनों चरित्रों पति और पत्‍नी को सचेत करने वाली। यह फिल्‍म राजनांदगॉंव में फिल्‍मायी गयी है।


मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

जिम्‍मेदारियों की उपेक्षा करती पीढ़ी का सच

लघु फिल्‍म/ अधीन 


 
यश वर्मा निर्देशित शॉर्ट फिल्‍म अधीन देखी। लगभग बीस-पच्‍चीस मिनट अवधि की। एक पिता है जिसने अपने बेटे-बेटियों को बुलाया है मिलने। एक ही शहर में रहते हैं सब लेकिन महीनों से आपस में मिलना नहीं हो पाता। घर आते ही पिता से दोनों झुंझलाकर झगड़ने लगते हैं कि आप तो ठीक दिख रहे हो फिर हमें क्‍यों परेशान किया। दोनों ही अपनी व्‍यस्‍तताऍं। पिता बतलाता है कि वह अपना मकान बेच रहा है। बीमार पत्‍नी की सेवा करते हुए अकेला थक चुका है। वह कहीं और रहने लगेगा। दोनों में से कोई एक मॉं को रख ले। बेटे-बेटी को साँप सूंघ जाता है। बिस्‍तर पर ही बीमारी से निढाल मॉं के सभी काम कैसे कौन करेगा?

एक बार फिर आपस में बहस। अब पिता बतलाता है कि उसने अपनी पत्‍नी को दवा में ऐसा पदार्थ दे दिया है कि आठ घण्‍टे बाद वह नहीं रहेगी। बेटे‍-बेटी में अफरा-तफरी। फिल्‍म का अन्‍त यह है कि एकाकी पिता दालान में झाडू लगा रहा है अकेला।

फिल्‍म का अन्‍त संकेतों में है। बदलती जीवनशैली और महानगरीय सभ्‍यता में सम्‍बन्‍धों और दायित्‍वों की निराशाजनक स्थिति को बयॉं करती है फिल्‍म। पिता की भूमिका में संजय मिश्रा हैं। एक कुशल काबिल अभिनेता और इस समय खासे लोकप्रिय भी। वे लगभग फिल्‍म में दर्शायी जाने वाली स्थितियों को बयान की तरह पेश करते हैं। बेटा नीरज प्रदीप पुरोहित और बेटी अनुप्रिया गाेयनका के आपसी संवाद और पिता से बहसों में संजय मिश्रा लगभग उनको एक तारतम्‍य में रखते हैं। मॉं भीतर कमरे में है और बाहर उसकी तस्‍वीर। बड़ी अभिनेत्री सुहासिनी मुले का निर्देशक ने इतने के लिए आरम्‍भ में धन्‍यवाद कर दिया है। अन्‍त में आते आते फिर बिखर जाती है।

लघु फिल्‍मों के पिछले कुछ समय से निरन्‍तर निर्माण और यूट्यूब पर प्रदर्शन ने काबिल निर्देशकों और कलाकारों को आकृष्‍ट किया है। यहॉं पन्‍द्रह-बीस मिनट से लेकर आधे घण्‍टे तक की कई बार अच्‍छी और दिलचस्‍प फिल्‍में मिल जाती हैं।
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बुधवार, 18 मार्च 2020

ताल से ताल मिला........


पुनरावलोकन / ताल (1999)

 

सुभाष घई को राजकपूर के बाद फिल्‍म इण्‍डस्‍ट्री का दूसरा शोमैन माना जाता है। वे सिनेमा में हीरो बनने की चाहत लिए पुणे फिल्‍म इन्‍स्‍टीट्यूट गये थे। प्रशिक्षण प्राप्‍त करने के बाद दो-एक फिल्‍में मिलीं, एकाध में खलनायक भी बने लेकिन फिर लगा कि अपने को साबित करने के लिए कैमरे के पीछे जाना होगा। शत्रुघ्‍न सिन्‍हा दोस्‍त थे, साथी। उनको लेकर कालीचरण और विश्‍वनाथ फिल्‍में बनायीं और फिर एक निर्देशक के रूप में स्‍थापित हो गये। बाद में कर्ज, क्रोधी, विधाता, हीरो आदि अनेक फिल्‍में बनाते हुए उनकी पहचान इन मायनों में भी हुई कि दृश्‍यों को बांधने में इस फिल्‍मकार को जितनी महारथ हासिल है, ड्रामा रचने में भी उतनी ही दक्षता और संगीत की बहुत खास किस्‍म की समझ। वे किंगमेकर भी प्रसिद्ध हुए और जैकी श्रॉफ सहित माधुरी, मनीषा, महिमा आदि को अपनी फिल्‍मों में अच्‍छे अवसर देने के लिए भी।

ताल उनकी क्‍लैसिक फ़िल्म है। इसको एक बहुत साधारण सी कहानी के साथ उन्‍होंने गढ़ा है लेकिन संगीत को लेकर अपनी दृष्टि के साथ ए आर रहमान से मिलकर जो उन्‍होंने गीतों, संगीत, पार्श्‍व संगीत के साथ जो वातावरण खड़ा किया है वह अनूठा है। जिस समय यह फिल्‍म रिलीज हुई थी उस समय तत्‍काल ही हिट हो गयी हो ऐसा नहीं है। सुभाष घई ने चार-पॉंच हफ्ते दर्श्‍कों को विश्‍वास में लेकर इस फिल्‍म के अच्‍छे अच्‍छे विज्ञापन प्रसारित करके इसे लगभग दर्शकों के सामने इस तरह ला दिया कि आपके जमाने का म्‍युजिक सेंस दरअसल ये है, रहमान ने इस फिल्‍म के गानों के संगीत को बैकग्राउण्‍ड म्‍युजिक में इस तरह सदुपयोग किया कि पूरी फिल्‍म आपको जाग्रत करती हुई प्रतीत होती है और जैसा कि शुरू में लिखा, एक साधारण सी कहानी भी प्रेम, आत्‍म सम्‍मान, स्‍वाभिमान, समझौता, त्‍याग आदि के धरातलों पर मन को छूती हुई चली जाती है।

इस फिल्‍म को आये बीस वर्ष करीब हो गया है लेकिन जिस तरह एक अच्‍छी किताब आप अपने संग्रह से किसी वक्‍त विशेष पर निकाल कर फिर पढ़ने को होते हैं तो जिज्ञासा बनती और बढ़ती है। छोटी सी कथा है। हिमाचल के एक गॉंव में एक संगीत शिक्षक अपनी आर्थिक सीमाओं के साथ परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। संगीत की पवित्रता और उसके प्रति उनकी श्रद्धा है। शहर से रईस और व्‍यावसायी खानदान की टोली अपना कुछ बाजार खड़ा करने गॉंव आ गयी है। शहरी चतुर चालाक हैं और गॉंव वाले भोलेभाले। दरअसल फिल्‍मी कहानी में यह लाइन खूब चलती है। शिक्षक तारा बाबू की एक बेटी मानसी और रईस शहरी जगमोहन का बेटा मानव कुछ छोटे-मोटे घटनाक्रमों के साथ एक-दूसरे के प्रेम में हैं। शहरी रईस शिलान्‍यास करके चले जाते हैं बाद में तारा बाबू अपनी बेटी के साथ शहर में जाकर जब इनसे मिलते हैं तो उनका बरताव अपमानजनक होता है और सहन न कर पाने पर तारा बाबू भी अपना आपा खो बैठते हैं लिहाजा मानसी और मानस के बीच गरीब और अमीर, मान और अपमान की बड़ी खाई खड़ी हो जाती है। 

बाद की फिल्‍म ड्रामेटिक है। मानसी, विक्रान्‍त जो कि शहर में आंचलिक संगीत के रीमिक्‍स रचकर बड़ा आयकॉन बन गया है उसके साथ मानसी प्रसिद्धि के रास्‍ते चल पड़ती है। मानव उसको भुला नहीं पाता। रईसों के घर अग्निकाण्‍ड जिसमें कूदकर मानव वह मफलर निकालकर ले आता है जिसमें मानसी ने नाम लिख रखा है। रईस जगमोहन करुणा से भर गया है अपने बेटे के इस दुस्‍साहस से। अब प्रेम चढ़ाव से उतार की ओर बहता है। अन्‍त में विक्रान्‍त प्रेम का प्‍याला पीकर के भी प्‍यासा रह जाता है और मानव तथा मानसी प्रेम के उस मर्म को पा लेते हैं जिसकी ताल दोनों की पहली मुलाकात पर ही मोहब्‍बत रच देती है। अक्षय खन्‍ना, ऐश्‍वर्य, आलोकनाथ और अमरीश पुरी के साथ मीता वशिष्‍ठ और अनिल कपूर फिल्‍म के प्रमुख पात्र हैं। ऐश्वर्या राय खूबसूरत गुड़िया की तरह हैं। द्वन्द्व के दृश्यों में क्लोज शॉट में प्रभावित करतीं हैं। फिल्‍म में इसलिए नहीं कि त्‍यागी हैं, अनिल कपूर बहुत तरीके से मध्‍यान्‍तर से पूरी फिल्‍म अपने साथ लेकर चलते हैं। उनके सामने अक्षय खन्‍ना साधारण मजनू के ज्‍यादा कुछ नहीं लगते। आलोकनाथ का किरदार बहुत ही विचित्र किस्‍म की भावुकता का शिकार दिखाया गया है जिसे समझना कठिन है। अमरीश पुरी जरूर दृश्‍य में होते हैं तो उस दृश्‍य के बादशाह ही लगते हैं। जलकर अस्‍पताल में इलाज करा रहे बेटे से उनका डायलॉग भावुक है जब मानव मफलर छुपाता है और वे देख लेते हैं। उस समय वह बोलते हैं, बेटा मैं तुम्‍हारा बाप हूँ।  


एक चरित्र अभिनेता के रूप किसी भी फिल्‍म में अमरीश पुरी की उपस्थिति हमेशा एक वज्र के रूप में लगती रही है। उनके बाद इस प्रकार का सशक्‍त कलाकार अब तक नहीं आया। सुभाष घई अपनी फिल्‍म में भावनात्‍मक स्‍पर्श के कुछ एंगल बहुत सूझपरक ढंग से रखते हैं। एक ये ताल और दूसरी फिल्‍म युवराज के सन्‍दर्भ में देखो तो अमीर-रईस चरित्र आत्मिक दृष्टि से बहुत निर्मम होते हैं उनके। वे परिवार के कुटिल और दुष्‍ट रिश्‍तेदारों के किरदार भी खूब खड़े करते हैं जो किसी भी सुखद अवधारणा में चतुर-चालाक षडयंत्रकारी के रूप में परदे पर आते हैं। ताल में नायक के परिवार में इस तरह के लोग हैं जो मानव और मानसी के प्रेम और आकांक्षा के बीच खुरदुरे पत्‍थर की तरह चेहरे पर चाशनी चढ़ाये नजर आते हैं। 

ताल के गीत आनंद बख्‍शी ने अस्‍सी साल की उम्र में लिखे थे। इस उम्र में भी वे गुड़े से मीठा और इमली से खट्ठा इश्‍क लिखकर अपने लिखे गानों को आज भी याद में बनाये हुए हैं। ए आर रहमान का संगीत तो खैर इस फिल्‍म की नब्‍ज में बहता है। तबला, बॉंसुरी, वायोलिन, गिटार आदि वाद्यों की स्‍वतंत्र माधुरी अनुभवों में जान डाल देती है। सुखविंदर, उदित नारायण, आशा भोसले, अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति की आवाजों की सराहना किए बिना ताल पर लिखना पूरा नहीं हो सकता। खूबसूरत दृश्‍यों में फिल्‍म बहुत रोमांटिक लगती है लेकिन जब कहानी शहर आ जाती है तो उसका अंजाम लगभग पता ही होता है। फिर भी ताल से दर्शकों को कन्‍वीन्‍स कराने में प्रदर्शन के समय सुभाष घई ने जो प्रचार-प्रसार का तरीका अपनाया था वह कामयाब था। तीसरे-चौथे हफ्ते में फिल्‍म तक दर्शक पहुँचना शुरू हो गये थे और आखिरकार दर्शकों की राय में ताल एक अच्‍छी फिल्‍म कहलायी भी।
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गुरुवार, 12 मार्च 2020

फिर भी शैलेन्‍द्र जैसे लोग विस्‍मृत नहीं हो पाते.....


गीतकार शैलेन्‍द्र की याद किस रूप में करूँ यह सोच नहीं पाता हूँ ठीक से। मेरे जैसे भावुक व्‍यक्ति के लिए एक भावुक और संवेदनशील का स्‍मरण बहुत कुछ वेदना से भर देता है क्‍योंकि अक्‍सर मेरे मन में यह ख्‍याल आता है कि बहुत से गुणी लोगों, कोमल हृदय और संवेदनशीलों पर समय का ऐसा अचूक प्रहार होता है जहॉं पर थोड़ा सा भी कमजोर पड़ जाने या हार जाने-हताश हो जाने वालों के लिए इस दुनिया में ही रहना कठिन हो जाता है। मैं यहॉं ऐसे लोगों के नाम गिनाने नहीं जा रहा हूँ नहीं तो अवसाद अनुभूति की एक टाटपट्टी ही ऐसी बिछ जायेगी जिसमें अनेक विलक्षण लोग बैठे हमें दिख जायेंगे और हमारी ऑंखों के सामने चलचित्र की तरह उनकी छबियॉं आयेंगी और चली जायेंगी। समय, समाज और लोग हश्र सभी का एक सा ही करते हैं भूल जाने के मामले में फिर चाहे वह कोई भी हो। हम हृदयहीन इतना हो गये हैं कि बाद में याद करके भी याद नहीं आता कि कौन हमारी चेतना या प्रेरणा का हमारी दुनिया से इस तरह चला गया जिस तरह जाने के लिए वह कभी बना ही नहीं था।

शैलेन्‍द्र इसी तरह के इन्‍सान थे जो समय के आगे हार गये अन्‍यथा उनकी क्षमताओं का कुछ भी नहीं बिगड़ा था और न ही गीतात्‍मक संवेदन सृजन प्रक्रिया का। सिनेमा की विफलता क्‍या गुरुदत्‍त और शैलेन्‍द्र जैसों के लिए जानलेवा हो सकती हैं यह प्रश्‍न इसी बात से कौंध उठता है। कहॉं एक समय वह था जब वे सिनेमा के प्रति नितान्‍त उपेक्षा का भाव रखते थे। यह एक अजीब सी विरक्ति कही जायेगी जिसमें अचरज इस बात का भी भरा हुआ है कि आगे चलकर वे उसी सिनेमा का एक मनभावन लिरिकल हिस्‍सा भी बनते हैं। विभाजन बाद के पाकिस्‍तान (रावलपिण्‍डी) में जन्‍मे शैलेन्‍द्र का परिवार जब मथुरा आकर बस गया था उस समय कौटुम्बिक सरोकारों के कारण वे वहीं रह गये थे और अपनी पढ़ाई-लिखाई को भी वहीं अंजाम दिया था। साहित्‍य के बीच उनकी देह, मन और मस्तिष्‍क में अपनी फसल को एक तरह से सहेज रहे थे। यह शख्‍स वास्‍तव में कविताऍं, गीत और रचनाऍं लिखते हुए औरों की तरह काम नहीं कर रहा था बल्कि एक जमीन तैयार कर रहा था अपनी। बिमल रॉय की अविस्‍मरणीय फिल्‍म दो बीघा जमीन में एक गाना है, धरती कहे पुकार के, बीच उगा ले प्‍यार के, मौसम बीता जाये, अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा, कौन कहे इस ओर, तू फिर आये न आये, मौसम बीता जाये......। इस तरह का गीत लिखते हुए एक रचनाकार भी अपने अल्‍कालिक जीवन के आभासों या आगे चलकर आने वाली दुश्‍वारियों के बीच अपने भी आकस्मिक प्रस्‍थान की किसी भावभूमि से अवगत होगा, इसके बारे में हम क्‍या सोचते हैं.......मुझे लगता है कि जीवन की क्षणभंगुरता को लेकर शैलेन्‍द्र के दार्शनिक मन्‍तव्‍य बहुत स्‍पष्‍ट या साफ होंगे जिसे जीना और गाना दोनों ही आसान नहीं है।

एक गीतकार है जो मथुरा में गंगा सिंह के छोटे से मकान में सामूहिक परिवार का हिस्‍सा बना रहा जो धौली प्‍याऊ की गली में बना रहा होगा। वहॉं से एक दिन रेल्‍वे की नौकरी का स्‍थानान्‍तरण इस गीतकार को मुम्‍बई की तरफ ले जाता है, वह मुम्‍बई जो खूब सारे सपने सजाकर ले जाने वाले का नेपथ्‍य ही विस्‍मृत कर देती है। मुम्‍बई जहॉं सफलता और विफलता के लाख सच्‍चे किस्‍से हैं। लोगों ने इस जगह पर फॉंकामस्‍ती को भी अपनी क्षमताओं की हद तक जाकर महसूस किया है और पलायन भी किया है। लोगों ने इस जगह के वैभव और भाग्‍य तथा पुरुषार्थ के साथ अपने में घटित होते समय को भी जिया है और उसमें मरे भी हैं। लेकिन मुम्‍बई तो मुम्‍बई है, उसी यही खूबी भी है। भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर और शैलेन्‍द्र का रिश्‍ता जौहरी और हीरे का रिश्‍ता ही कहा जायेगा। यह‍ रिश्‍ता साफगोई और साफबयानी के बीच ही तो बनकर चला आया जब सीधे और सधे हुए इस गीतकार को फिल्‍मी दुनिया के प्रति ही जरा सा भी आकर्षण न था। राजकपूर ने शैलेन्‍द्र को रचनापाठ करते हुए सुना था। हमारे लिए तो यह भी आश्‍चर्य का विषय ही होगा कि उस समय के प्रतिभाशाली युवा फिल्‍मकार और नायक का साहित्‍य और लिरिकली ग्रेट के प्रति ऐसी कोई खोजबीन या हासिल की स्थितियॉं रहती होंगी। बहरहाल खरा सोना किसको, कब और कहॉं मिल जाये, कौन कब उसकी परख कर ले और कैसे उसके उत्‍कृष्‍ट को अपनी मान्‍यता के साथ जगत भी मान्‍यता बना दे, ऐसे उदाहरण राजकपूर ही थे जो अपने पिता को थिएटर के लिए देश-देश घूमते न केवल देखते थे बल्कि उनके साथ जाया करते थे। पृथ्‍वीराज कपूर के समकालीन इप्‍टा से जुड़े अनेक लेखक, कलाकार, रंगकर्मी पारस्‍परिक सान्निध्‍य में रहा करते थे और सब तरह के संघर्ष में रचनात्‍मक एकजुटता के साथ प्रसतुत होते थे। राजकपूर के मन में अपने पिता के साथ-साथ ऐसे लोगों के लिए भी बहुत इज्‍जत रहा करती थी। यह जो रचनात्‍मक उदारता उनमें आयी, उसी से उनको शैलेन्‍द्र, मुकेश, शंकर और जयकिशन जैसे लोग मिले जिन्‍होंने खुद राजकपूर की क्षमताओं को प्रकाशित करने में अपना बड़ा योगदान किया। शैलेन्‍द्र भी इप्‍टा के मंच की प्रतिभा थे।

राजकपूर जिस समय आग बना रहे थे उसी समय वे शैलेन्‍द्र से मिल चुके थे और वे चाहते भी थे कि शैलेन्‍द्र उनकी फिल्‍मों के लिए लिखें लेकिन वे किसी तरह अपने आपको फिल्‍मों से बचाये हुए थे। फिल्‍म आग के समय दोनों का परिचय हुआ था लेकिन एक दिन जरूरत ही शैलेन्‍द्र को राजकपूर के पास ले आयी। यह और बाद का समय था और तब राज बरसात फिल्‍म बना रहे थे। एक तरफ राज, अब फिल्‍मों में सफलता के दरवाजे की तरफ जा रहे थे। यह सन्‍दर्भ कुछेक जगह लिखा है कि राजकपूर के घर जाने के‍ लिए शैलेन्‍द्र निकले थे। उनके पास उनको देने के लिए कुछ गीत भी साथ थे, इस बीच रास्‍ते में पानी बरसने लगा। मुसलाधार बरसात में उनको मुखड़ा याद आया, बरसात में हम से मिले तुम सजन तुम से मिले हम, बरसात में। राजकपूर से मिलते हुए उन्‍होंने उनको यह मुखड़ा सुनाया और दोनों साथ हो गये। जो और गीत वे उनके लिए ले गये थे वे भी उन्‍होंने अपने पास रख लिए और उनको बरसात, श्रीचार सौ बीस और आवारा में इस्‍तेमाल किया। यह राजकपूर की खूबी थी कि वे अपने साथ बहुत सकारात्‍मक ढंग से अपनी चाह की रचनाओं के लिए गीतकार में भी एक ही समय में हसरत जयपुरी और शैलेन्‍द्र में चयन कर सकते थे जिसका दोनों ही गीतकारों को कोई गुरेज नहीं रहा करता था, इसी प्रकार पार्श्‍व गायन में भी वे जानते थे कि कौन से गाने मुकेश से न गवा कर मन्‍नाडे या मोहम्‍मद रफी से गवाने हैं। एक साथ इतने श्रेष्‍ठ लोगों का सान्निध्‍य भी राजकपूर ने प्राप्‍त किया लेकिन सभी के आपसी सम्‍बन्‍धों की बनक वैसी ही रही, कोई स्‍पर्धा नहीं, किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं।

गीतकार शैलेन्‍द्र का नाम निन्‍यानवे प्रतिशत राजकपूर, शंकर जयकिशन की टीम में बड़े फ्लो के साथ लिया जाता रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि इस टीम से बाहर शैलेन्‍द्र का सृजन ऑंका नहीं गया। उनके भीतर का सच्‍चा इन्‍सान और गीतकार इतना सरल, सहज और सम्‍प्रेषणीय था कि उनकी रचनाओं को फिल्‍म में देखते सुनते मन स्‍वत: ही उसको ग्राह्य किये जाता था। वे बिमल रॉय के भी पसन्‍दीदा गीतकार थे और सचिन देव बर्मन के भी, वे हृषिकेश मुखर्जी के भी पसन्‍दीदा गीतकार थे और विजय आनंद के भी। गुरुदत्‍त के लिए भी उन्‍होंने लिखा और किशोर कुमार के लिए भी। बिमल रॉय की फिल्‍म नौकरी का एक गीत है जो किशोर कुमार पर फिल्‍माया गया है, छोटा सा घर होगा बादलों के छॉंव में, आशा दीवानी मन में बंसरी बजाये। इसी गीत का पहला अन्‍तरा, चांदी की कुर्सी में बैठे मेरी प्‍यारी बहना, सोने के सिंहासन में बैठे मेरी प्‍यारी मॉं, मेरा क्‍या मैं पड़ा रहूँगा मम्‍मी जी के पॉंव में। अपनी मॉं और बहन के लिए देखे स्‍वप्‍न के साथ एक युवा अपने लिए क्‍या जगह सुरक्षित पाता है, मेरा क्‍या मैं पड़ा रहूँगा मम्‍मी जी के पॉंव में। यही किशोर कुमार जब दूर गगन की छॉंव में बनाते हैं तो उनको शैलेन्‍द्र की याद आती है। वे शैलेन्‍द्र को फोन करके बड़े आदर के साथ अपने घर में खाना खाने के लिए आमंत्रित करते हैं, शैलेन्‍द्र पूछते हैं कि और क्‍या बात है, तो किशाेर बतलाते हैं कि एक फिल्‍म बना रहा हूँ दूर गगन की छॉंव में। मन है कि उसके गीत आप लिखें। तब शैलेन्‍द्र, किशोर से कहते हैं कि यह बात समुद्र किनारे टहलते हुए करना ज्‍यादा सार्थक होगा। दोनों मिलते हैं। किशोर बताते हैं कि एक फौजी की कहानी है जो अपने गॉंव लौटता है तो अपना घर तहस नहस पाता है, पत्‍नी मर चुकी है, बेटा गूँगा हो गया है। शैलेन्‍द्र सुनते ही गुनगुना उठते हैं, कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्‍यारे पलछिन। और किशोर कुमार उनको गले लगा लेते हैं। इस तरह शैलेन्‍द्र, किशोर कुमार के भी प्रिय हुए।

शैलेन्‍द्र की पहचान, उनका स्‍मरण और उनके अवदान को सचमुच कबीर, रहीम और रैदास के स्‍मरण के साथ याद किया जाना चाहिए। बिमल रॉय के साथ उनकी फिल्‍मों की बड़ी श्रृंखला है। दो बीघा जमीन से हमने बात शुरू की थी। आगे मधुमति, परख, नौकरी से बन्दिनी तक तक गीतों का समुद्र अनुभूतियों का अथाह है सचमुच। प्रेम को लेकर, विरह को लेकर, स्थितियों को लेकर, विरह को लेकर, सम्‍बन्‍धों और रिश्‍ते-नातों को लेकर वे जिस तरह से विचार करते हैं, वह हमारे मन के कोने-कोने को जाकर छूता है और अपनी इच्छित जगह पर जाकर बैठ जाता है। बन्दिनी के गीत बरबस याद आ जाते हैं, मेरे साजन हैं उस पार………..बर्मन दा ने जिस तरह इसको कण्‍ठ और आत्‍मा से गाया है, गहरे विचलन से भर देने वाली रचना, मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना, गुन तो न था कोई भी अवगुन मेरे भुला देना। कितने सादे सच्‍चे स्‍वीकार हैं। इसी फिल्‍म में बन्दिनियों के बीच का गाना, अब के बरस भेज भैया को बाबुल। बैरन जवानी ने छीने खिलौने, और मेरी गुडि़या चुरायी, बीते रे जुग, कोई चिठिया न पाती, न कोई नैहर से आये रे……..किसी ऑंख भर न आयेगी, इसे सुनकर। शैलेन्‍द्र ऐसे गीतकार थे जिनको आम आदमी के जीवन और सपनों के साथ सीधा जोड़ा जा सकता है। उनके गीत कम से कम तीन पीढ़ियों की चेतना और धरोहर हैं। सचिन देव बर्मन और साहिर की युति जब टूटी थी तो सबसे बड़ा सहारा बने थे बर्मन का शैलेन्‍द्र और जब शैलेन्‍द्र नहीं रहे तो बर्मन एकदम टूट गये थे। जीवन दर्शन को लेकर जो गहरा बोध शैलेन्‍द्र के पास था, उसको और गहराई देकर अपनी आवाज से समृद्ध करना बर्मन दा को बहुत अच्‍छा लगता था। बन्दिनी में उनका गाया गीत मेरे साजन हैं उस पार के बाद विजय आनंद निर्देशित गाइड में वहॉं कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहॉं…………...में उसी जीवन-मरण, उसी क्षणभंगुरता की बात कही गयी है, कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी, पानी पे लिखी लिखायी, है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ‍ किसी के न आयी, कुछ तेरा न मेरा, मुसाफिर जायेगा कहॉं……….।

शैलेन्‍द्र प्रकृति के प्रति असीम अनुराग के गीतकार थे, सुहाना सफर और ये मौसम हँसी। इसी तरह अभावों में सपने तजे नहीं जाते, इस बात को बूट पॉलिश के इस गीत में, चली कौन से देस, गुजरिया तू सज धज के। इस गीत को गाया तलत महमूद ने है पर दिलचस्‍प कि परदे पर यह गीत फिल्‍माया शैलेन्‍द्र पर गया है। शैलेन्‍द्र जिन्‍होंने मित्रता में कुछ भूमिकाऍं भी निभायीं, बूट पॉलिश के अलावा नया घर, मुसाफिर आदि में।

क्‍या तीसरी कसम त्रासदी के जिक्र के बिना शैलेन्‍द्र पर बात पूरी न होगी, बड़ा कठिन लगता है, हालॉंकि बहुत से लोगों ने अपनी टिप्‍पणी में यह बात कही होगी। हमारे सिनेमा के इतिहास में क्‍या वह बात है जब यह निष्‍ठुर समाज किसी के प्राण पखेरू उड़ जाने के बाद संवेदनशील हो उठता है। पाकीजा को सफल होना था मीना कुमारी के न रहने के बाद। प्‍यासा और कागज के फूल की क्‍लैसिकी और उत्‍कृष्‍टता की चर्चा होनी थी, गुरुदत्‍त के चले जाने के बाद। इसी तरह शैलेन्‍द्र भी जब मन और आत्‍मा लगाकर तीसरी कसम बनाकर सबके सामने लाये तो उसको सफलता न मिली। उनके न रहने के बाद आज तक जानकार तीसरी कसम की चर्चा किए बिना अघाते नहीं हैं। एक फिल्‍मकार रवीन्‍द्र धर्मराज की चक्र भी उनके नहीं रहने के बाद प्रदर्शित और चर्चित हुई। तीसरी कसम में निर्देशक का परिश्रम है, अभिनय की श्रेष्‍ठता है, कहानी अनमोल है, फिल्‍मांकन कमाल का है, एक-एक गीत में जीवन दर्शन व्‍याप्‍त है, गायन और संगीत रचना अविस्‍मरणीय है। इसके बाद भी उस समय 1966 में यह ग्राहृय न हुई और शैलेन्‍द्र के अवसाद में जाने, बीमार हो जाने, कर्ज में डूब जाने और अन्‍तत: नहीं रहने के बाद से आज तक हर संजीदा और गम्‍भीर जानकार से लेकर दर्शक तक इसकी प्रशंसा किए नहीं थकता। हमें इस पूरी मन:स्थिति पर दरअसल विचार करने की जरूरत है, शैलेन्‍द्र और उन जैसे प्रतिभाशाली, प्रतिभासम्‍पन्‍न सर्जकों का स्‍मरण करते हुए जिनका अवसान बाद में एक सामाजिक प्रायश्चित की तरह भी याद आता है और हमारे पास इस बात को स्‍वीकार करने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं होता कि दरअसल हम सब लम्‍बे समय से निरन्‍तर चले आ रहे संवेदनहीन समय का ही हिस्‍सा हैं।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

पियानो का जादूगर : ब्रायन सिलायस





एक सौम्य ऋषि


वे एक गोताखोर हैं। बड़े गहरे। डूबकर मोती चुनते हैं और फिर लेकर आते हैं। उनको सुनने का मतलब यह है कि उनको ध्यान से सुनो। ध्यान से सुनो का मतलब है उनके साथ चलो। तैरो, डूबो और फिर मोती पाओ। यह सुख बहुत अनूठा, बहुत अलौकिक है। इस सुख की संगत बड़ी अनमोल, बड़ी दुर्लभ है।
 
ब्राय सिलायस विश्व विख्यात हिंदुस्तानी पियानो वादक हैं। पियानो पर हाथ रखे हुए वे एक सौम्य ऋषि की तरह दिखायी देते हैं। स्वभाव भी उनका ऋषितुल्य ही है। उनके भीतर का संत ही दरअसल उन राग-रागिनियों से अनुरागभरा रिश्ता बनाता है जिसके माध्यम से हम अनुभूतियों की अलौकिकी में आवाजाही करने लगते हैं। वे सादगी से भरे हुए हैं। ब्रायन मंच पर बिना हंगामे के दो शब्दों के प्यार भरे निमंत्रण पर आ जाते हैं। इस बात की कल्‍पना की जा सकती है कि कैसे एक धुनी और गुणी सर्जक की यात्रा संघर्ष से होते हुए यश को छूते हुए परवान चढ़ती है। हम सब देखने, सुनने वालों की निगाह में जब कोई यशस्‍वी कलाकार अचम्भित करता हुआ दीखता है तो हम उसके आज से बहुत मोहित हो जाते हैं। दरअसल महान कलाकारों का स्‍वर्णिम और चमचमाता आज, कल के अनेक ऊहापोह, ऊबड़-खाबड़ पथरीले रास्‍ते, आशा और निराशा के बीच तराजू की सुई की तरह डगमगाता मन और आत्‍मविश्‍वास बहुत बड़ा काम करते हैं। 

ब्रायन सिलायस कानपुर मूल के हैं। बचपन से संगीत के प्रति एक रूमानी आसक्ति रहा करती थी। परिवेश और वातावरण में बहुत कोई ऐसा प्रोत्‍साहक समय नहीं था जो सतत चले लेकिन वे सब तरह के साजों का स्‍पर्श करने और उनके तारों और बोर्ड पर अपनी ऊँगलियों से छूने का अनूठा जिज्ञासाभरा कौशल रखते थे। एक तरह से देखा जाये तो सितार, गिटार, पियानो सभी साजों से उन्‍होंने थोड़ी-थोड़ी बात की उनके मर्म को समझा। ब्रायन कहते हैं कि साज के साथ आत्‍मा का रिश्‍ता होता है जो बनाना पड़ता है। यह बहुत सम्‍वेदनशील और प्रेम करने की तरह अन्‍त:स्‍थल को महकदार बनाता है। यह जुड़ना ही सच्‍चा जुड़ना है। 

ब्रायन इन्‍हीं सर्जनात्‍मक अवधारणाओं से कानपुर से दिल्‍ली चले और उनको ला मे‍रेडियन होटल में पियानो बजाने का अवसर मिला। वे हिन्‍दी सिनेमा में संगीत के मधुरतम युग, उस युग के सर्जको, संगीतकारों और गायकों के साथ गीतकारों के प्रति भी बड़ी श्रद्धा रखते थे। पचास के दशक से उन्‍होंने गीत-संगीत में रूह तक उतर जाने वाले, शिराओं में रक्‍त के साथ अनुभूतियॉं लेकर बहने वाले गीतों को चुन-चुनकर बजाना शुरू किया। मेरेडियन में तो ब्रायन कुछ ही समय रहे लेकिन मौर्या में जब वे गये तो वहॉं उनका व्‍यक्तित्‍व, उनका चेहरा गहरी आश्‍वस्ति से दिपदिपा रहा था। उनकी मुस्‍कराहट में जादू था, यह जादू मुस्‍कराहट में जादुई अँगुलियों की वजह से आया था। धीरे-धीरे उनकी कीर्ति होटलों से बाहर शहरों में और शहरों से बाहर देशों में गयी। ब्रायन के रूप में दुनिया के सामने ऐसा भारतीय कलाकार परिचित हुआ जो भारतीय सिनेमा की मेलोडी के साथ-साथ बजाये जाने वाले गानों की धुन से रसिकों को जोड़ने में अभूतपूर्व रूप से सफल हुआ। 

ब्रायन का पियानो के साथ होना भारत के लिए तो निश्चित ही एक-दूसरे का पर्याय है। भारतीय सिनेमा में यदि इतिहास पर जायें तो सामाजिक फिल्‍मों के दौर में सम्‍भवत: हर पॉंचवीं फिल्‍म में पियानो कहीं न कहीं लगभग एक पात्र की तरह, एक कैरेक्‍टर की तरह मौजूद रहा है। नायक और नायिका ने पियानो के सान्निध्‍य में अपने प्रेम की, अपने विरह की, अपने साथ हुए छल की, दगाबाज़ी की, गिले-शिवके की, उलाहनों की बात की है। कितने ही गाने याद आते हैं, आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है (आपकी परछाइयॉं), दोस्‍त दोस्‍त न रहा प्‍यार प्‍यार न रहा (संगम), आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (राम और श्‍याम), दिल के झरोखे में तुझको बैठाकर (ब्रम्‍हचारी), कोई सोने के दिल वाला कोई चांदी के दिल वाला (असली नकली), तू कहे अगर जीवनभर मैं गीत सुनाता जाऊँ मन बीन बजाता जाऊँ (अन्‍दाज) और भी बहुत सारे। 

प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह, ब्रायन के पियानो के बड़े प्रेमी रहे हैं। उन्‍होंने ब्रायन को पियानो सिंह नाम दिया। एक बार उनका पियानो सुनते हुए महान संगीतका खैय्याम साहब ने कहा, यार तुमने तो हमारी रूह पकड़ ली। सही बात तो यह है कि ब्रायन ने हमारे सिनेमा के विलक्षण संगीतकारों की रूह को नजदीक से छूकर देखा तभी सलिल चौधरी, खैय्याम, ओ.पी. नैय्यर, सचिन देव बर्मन, रवि, मदन मोहन और लक्ष्‍मीकान्‍त-प्‍यारेलाल जैसे सर्जकों के मर्म को समझ पाये। पियानो पर एक पूरा गाना बजा लेना आत्मिक और शारीरिक रूप से बहुत कठिन और जटिल है। ब्रायन बतलाते हैं कि बजाते हुए जितना उनका दिमाग चलता है, उतना ही मन चलता है, उतनी ही अँगुलियॉं चलती हैं और उतने ही पैर चलते हैं। बहुत दार्शनिक भाव से ब्रायन कहते हैं कि किसी भी महफिल या ऑडिटोरियम में बैठकर पियानो बजाते हुए भीतर ही भीतर न जाने कहॉं-कहॉं तक जाना होता है, बता पाना मुश्किल है। 

जब वे पियानो बजा रहे होते हैं, उनके साथ संगी संगतकार बिल्‍कुल ऐसे अनुसरित होते हैं जैसे इस महानदी के बहाव का एक-एक पथ, एक-एक मोड़ उनको पता हो। गिटार पर उनके साथी जयदीप लखटकिया और तबले पर तुलसीराम उतने ही सादे और सहज हैं लेकिन साहब ब्रायन के साथ राग पथ के सहयात्री के रूप में उनका हाल और चाल दोनों कमाल के हैं। संगीत के माधुर्य का यह हंस अपने दोनों पंखों के साथ क्या खूब उड़ चलता है, वाकई विलक्षण। बात पूरी करते-करते यह न लिखा जाये तो बात अधूरी ही रह जायेगी कि ब्रायन की उपलब्धियों और यश की इस यात्रा में उनकी सहधर्मिणी रविन्‍दर कौर सिलास परछाँयीं की तरह उनके साथ होती हैं, स्‍टेज के सामने भी वे ब्रायन पर मुग्‍ध बनी रहती हैं, उनके चेहरे पर ब्रायन के लिए जो प्‍यार दिखायी देता है वो भी किसी प्रेमधुन से कम नहीं है।
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दबंग के सकारात्‍मक पहलू

सिरे से खारिज करने के पहले



हाल ही में प्रदर्शित सलमान खान की नयी फिल्म दबंग तीन को लेकर मेरी टिप्पणी पर मित्रों की निरी असहमतियाँ प्राप्त हुई हैं। कुछेक मित्रों ने मेरे सिनेमा लेखन की समझ और अनुभव को भी आड़े हाथों लिया। मेरा विनम्र उत्तर यही था कि सीख रहे हैं, पारंगत हो गये हैं, यह अभिव्यक्त तो कभी रहा ही नहीं, बहरहाल। 

दबंग को सिने से नकार दिए जाने की कोई बहुत ठोस वजह देखने में नहीं आती। सलमान खान सहित उसके तीन बड़े निर्माता हैं जिन्होंने दक्षिण के एक बड़े सितारे, कोरियोग्राफर और निर्देशक प्रभुदेवा को इस फिल्म के निर्देशन के लिए अनुबन्धित किया। भरपूर धन लगाकर फिल्म बनायी गयी जो अपनी लागत का ठीकठाक अर्जित कर रही है। सितारा उपस्थिति है। बिल्कुल उबा दे, बैठना दूभर कर दे इतनी अप्रिय फिल्म नहीं है दबंग।

माना जा सकता है कि कहानी नहीं है कुछ। पहली दबंग से दूसरी और दूसरी को बनाने पर मिली खूब सफलता ने इस साहस के लिए प्रेरित किया होगा लेकिन यह भी तय मानिए कि इस दबंग पर आम राय बनने के बाद चौथी दबंग तो कम से कम नहीं बनेगी। दस साल की आवृत्ति में यह तीसरी दबंग ही सबसे बड़े अन्तराल के साथ आयी है। 

दबंग तीन आम मसाला और फार्मूला फिल्म है लेकिन उसमें दूसरी मसाला और फार्मूला फिल्मों की तरह बेतरह अनर्गल चीजें नहीं डाल दी गयी हैं। हर तरह के दर्शकों का ध्यान रखते हुए एक ऐसी फिल्म निर्माताओं के बनानी चाही है जो अपने नाम और सफलता के इतिहास के बचे-खुचे प्रभाव में कुछ खींचकर ला सके। बहुत उत्साहजनक ढंग से ये न भी कर पायी तो भी घाटे में फिल्म न रहेगी यह भी तय है।

फिल्म की अच्छाइयों में कई बातें ध्यान आकृष्ट करती हैं। इनमें से एक परिवार के साथ जिन्दगी और दुनिया की कल्पना जिसमें आपसी अनुकूलताएँ, दृश्य और संवाद प्रभावित करते हैं। दिशाहीन नायक का कुछ करने को उदृत होना, जिसे चाहता है उसकी पढ़ाई पूरी हो, अपनी ओर से धन देने की वचन बद्धता सकारात्मक सोच पैदा करते हैं। एक दृश्य वह दिलचस्प है जब वह धोखे से अपनी माँ को ही खुली मालगाड़ी पर पहले छोड़ आता है फिर सच पता चलने पर बचाकर लाता है। मनुष्य की आम बुराइयों को दिखाने में परहेज नहीं किया गया है। अच्छी सिनेमेटोग्राफी, एक्शन, कोरियोग्राफी के साथ संवादों में मर्यादा का प्रदर्शन उल्लेखनीय पक्ष हैं। सलमान खान अपनी लगभग सभी फिल्मों में अच्छी हिन्दी का प्रयोग करते हैं। यहाँ भी की है, विशेषकर ऐसे समय में जब हिन्दी सिनेमा से हिन्दी समाप्त हो रही हो, इस नायक के इस प्रयत्न को नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। 

हिंसक दृश्यों, मारधाड़ के तीव्र प्रदर्शनकारी दृश्यों के बाद भी नायक के चेहरे पर उत्तेजना, आवेग और घृणा या नफरत दिखायी नहीं देती जो एक बैलेन्स और सन्तुलित कलाकार और किरदार को व्यक्त करती है। एक इन्सपेक्टर ऊपर की कमायी से वेल्फेयर सोसायटी भी चला रहा है, सामूहिक विवाह करा रहा है। उसने शादी ब्याह में लूटने वाले को मारपीट कर उसके पुराने व्यावसाय बैण्ड मास्टर के काम से लगा दिया है जो अब उसके साथ हो गया है और फिल्म के अन्त तक दीखता रहता है।

अच्छी सिनेमेटोग्राफी, एक्शन, कोरियोग्राफी के साथ संवादों में मर्यादा का प्रदर्शन, शिष्टता, सभ्यता, मानवीय संवेदना के पक्षों को एक बार फिर याद कर सकते हैं कि कैसे वह कम उम्र की लड़कियों को गलत जगह जाने से बचाता है, कैसे एक इन्स्पेक्टर होने के नाते पल भर में यह निर्णय लेकर लड़कियों से कहता है कि तुम लोग घर जाओ, तुमसे कोई पूछताछ नहीं की जायेगी।

मैं एक फिल्म समीक्षक होकर भी देखता हूँ और दर्शक होकर भी। किसी एक पक्ष का तराजू भारी नहीं हो यह ध्यान रहता है, अन्ततः सन्तुलन सबसे बड़ी चीज है जो सब्जी बनाते समय मसालों की मात्रा के चयन से लेकर जीवन मूल्यों और व्यवहार में भी मायने रखती है, हमारे पास हर बात का सन्तुलन होना चाहिए, व्यग्रता और आवेग ही सब कुछ नहीं, तुरन्त फैसला कर देना, मित्रगण ऐसे भी जिन्होंने बिना देखे ही यह राय कायम कर ली कि फिल्म अच्छी नहीं है, मेरी समझ में फिल्म बनाने वालों से लेकर उसमें छोटी-छोटी भूमिका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निबाहने वालों के परिश्रम के साथ भी न्याय न कहा जायेगा, बाकी कहने, लिखने की स्वतंत्रता सबकी अपनी है, कुछ भी कहा जा सकता है।    

एक सिनेमा से आप यदि एक भी सकारात्मक बात लेकर बाहर निकलते हैं सिनेमाघर से तो वह एक दर्शक, एक मनुष्य की उपलब्धि है, शेष जैसा आपको ठीक लगे, आपकी राय भी तो शिरोधार्य अर्थात सिरमाथे है.............   

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

देखते हुए / फिर फिर दबंग.....दबंग

अपेक्षाओं का कम होते जाना स्‍वाभाविक है.......

(हर बार वही करिश्‍मा कैसे सम्‍भव है)


दबंग, सलमान खान और प्रभुदेवा तीनों का ही ध्यान बना रहता है इस फिल्म को देखते हुए। प्रभुदेवा का सबसे पहले इसलिए कि वाण्टेड निर्देशित करके सलमान खान को बरसों पहले स्टारडम दोबारा लौटाने का श्रेय उन्हीं को है। दबंग सलमान ने पहले अभिनव कश्यप को लेकर बनायी जो सबसे अच्छी थी, दोबारा अरबाज खान ने इसे बनाया तो छायाप्रति में कुछ प्रभाव घटा। इससे सावधानी बरतते हुए तीसरी बार जब दबंग बनने चली तो वाण्टेड प्रभुदेवा को बुला लिया गया। डांसर औ कोरियोग्राफर प्रभु देवा ने इसको बस बना दिया है, अन्यथा यह निर्माता सलमान खान की फिल्म पूरी तरह लगती है और दो दबंग की सफलता के आत्मविश्वास से थोड़ी झूलती हुई भी।

सलमान खान की पिछली किसी फिल्म पर लिखते हुए मेरे लिखने में यह गलत नहीं आया था कि वे बॉलीवुड के रजनीकान्त हो जाना चाहते हैं। अपनी छबि पिछले दस सालों में उन्होंने ऐसी ही बनायी है। यह सही भी है कि फिलहाल तो वे नम्बर वन हैं ही। शेष सब उनके बाद। पहली दबंग से दूसरी दबंग की कहानी कानपुर तरफ चली गयी थी, इस दबंग में भी उत्तरप्रदेश है और वातावरण टुण्डला का है। चुलबुल पाण्डे वही है, उनके मसखरे और हँसोड़ संगी साथी भी उसी तरह जो कंधे पर गोली भी खा लेते हैं, डौल-बेडौल होने के बाद भी गानों में नायक के साथ नाचते भी हैं और सारे पुलिस व्यवहार के यथार्थ का निर्वाह सहजता से करते हैं।

इधर दो दबंग की नायिका से पहले की एक नायिका है नायक की। छेदी सिंह, बच्चा सिंह से होते हुए इस बार खलनायक बाला सिंह है, हिन्दी फिल्मों के लिए नया चेहरा मगर दक्षिण से मजबूत कन्नड़ सिनेमा के लेखक, निर्देशक एवं अभिनेता किच्चा सुदीप। यह रहस्य तीसरी दबंग में खुला कि हमेशा सहज रहते और हँसते-हँसाते रहने वाले नायक का पहला रूमानी दर्द खुशी नाम की लड़की भी है। यह नयी आमद है महेश मांजरेकर की बेटी सई। कुछ दृश्य के लिए है लेकिन कोमल और सॉफ्ट रोमांटिक उपस्थिति में अच्छी लगती है। सोनाक्षी सिन्हा इस तीसरी बार में और भी अधिक आश्वस्त लगती हैं लेकिन श्रेष्ठ नहीं, यह कहा जा सकता है क्योंकि सीमित संवाद और खूब सारी साड़ियाँ बदलते हुए वे अभी कम प्रतिभा के चलते भी चलती रहेंगी। एक गाने के साथ कुछ मादक रूमानी लीलाएँ नायक के साथ उल्लेखनीय हैं जिसमें बाथटब में शराब डालना और अंजुली में भरकर पी लेना शामिल हैं लेकिन यह खूबी है कि नायक ने इस दृश्य को स्तरहीन नहीं होने दिया है।

नायक और नायक का भाई निर्माता है, निर्देशक भी वेल-विशर। लगभग हर दृश्य में सलमान खान हैं लेकिन हमेशा की तरह कई दृश्यों में आदर्शवादिता, सभ्यता और सामाजिकता के पक्ष में बात करने के बावजूद वे निर्देशक के हाथ में नहीं हैं यह साबित हो जाता है। पहली दबंग इसीलिए बहुत बेहतर इस कारण लगती है कि अभिनय कश्यप ने लोकप्रियता के इस फलसफे को मौलिकता में गढ़ा था। चुलबुल पाण्डे के किरदार को पहली बार विकसित किया था। आज उसमें दोहराव और तिहराव है।

फिल्म में खलनायक आपको थोड़ी थोड़ी देर के लिए दूसरी आबोहवा में ले जाता है क्योंकि वह यहाँ अपनी पहली परीक्षा दे रहा है। कन्नड़ फिल्मों के सितारे किच्चा सुदीप एक निर्मम और बर्बर वृत्ति के बुरे आदमी के रूप में आकृष्ट करते हैं पर उनका बाला सिंह नाम एक तरह से मिस मैच है जो देहाती सा लगता है जबकि प्रकट तौर पर इस कलाकार ने अपने आपको हृदयहीन आवेगी की तरह प्रस्तुत किया है। वह दृश्य महत्वपूर्ण है जब क्लायमेक्स में खलनायक को मारते हुए नायक कहता है कि यदि तुम किसी से प्यार करते हो और वह तुमसे प्यार न करती हो तो क्या तुम उसको मार डालोगे, एक बड़ा सवाल है जो सलमान, किच्चा सुदीप को दण्ड देते हुए पूछते हैं। आज के समय में भी यह मौजूँ है।

मित्र सोचते होंगे कि सारी बातें कर दी हैं, कहानी नहीं बतायी। उत्तर है कि कहानी है ही नहीं। क्योंकि दबंग एक के बाद दूसरी बनी और दो के बाद जो तीसरी बनी वह दरअसल दबंग एक के भी पहले की दबंग प्रचारित है। इसी कारण यह अलमारी में कसकर रखी किताबों के बीच में एक किताब यह कहकर खोंस देना है कि इसकी जगह पहले हैं। अब दक्षिण भारत का निर्देशक है, वह रोहित शेट्टी तबीयत की फाइटिंग, स्टंट और गाड़ियों के करतब शामिल हैं। मध्यप्रदेश के महेश्वर और माण्डू में फिल्माये हुए दृश्यों को देखते हुए वातावरण में टुण्डला के यथार्थ पर यकीन करना मुश्किल होता है। इस फिल्म में स्कॉर्पियो वाहन का बढ़िया इस्तेमाल है, काफिले से लेकर लड़ाई-झगड़े और स्टंट के विषयों में सफेद स्कॉर्पियो से दृश्य और प्रसंग की आक्रामकता ज्यादा असर देती है।

इस फिल्म को समीक्षक बड़ी कंजूसी से सितारे प्रदान कर रहे हैं और कोई भी डेढ़ से दो को पार नहीं कर रहा। निजी रूप से मैं सोचता हूँ कि दबंग तीन की तुलना में हमारा दिमाग बार-बार दबंग एक और दो के साथ क्यां हो जाता है? इसे उससे अलग हटकर भी देखा जाये। मेरा ख्याल है कि तीन स्टार उचित है।