बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

गली बॉय

झेंपते हुए युवक की जिन्‍दगी से......

 

क्या किसी फिल्म को उसकी श्रेष्ठता में अनगढ़ तरीके से देखा जा सकता है! क्या एक जगह बैठकर हम उस जीवन की कल्पना कर सकते हैं जहाँ बहुत सारी कठिनाइयाँ हैं, दुख हैं, पीड़ाएँ हैं, घुटन दिखायी देती है, असहनीयता धुँआ धुँआ दीखती है! क्या हमें उम्मीद होती है कि कोई रास्ता वहाँ की घोर बेचैनी के बीच से भी निकल सकता है! बहुत सारे नकारात्मक उत्तरों के बावजूद कोई फिल्म हमको बांधकर रखती है। बांधकर रखती इसलिए है क्योंकि अनचाहे ही बेखबरी में हम उस फिल्म के किरदारों में अपने को पहचान जाते हैं और उनका हाथ थामकर चल पड़ते हैं। यही किसी फिल्म की सच्ची सफलता भी है बल्कि सराहना पहले है, सफलता बाद में है।

लेखक और शायर पिता, लेखिका और निर्देशिका माँ की बेटी जोया अख्तर अपनी यह तीसरी अहम फिल्म गली बॉय को एक निर्देशक के रूप में, रीमा कागती के साथ एक पटकथाकार के रूप में बहुत कोमलता से बुनकर प्रस्तुत करती हैं। रीमा कागती से उनकी पिछले रचनात्मक सरोकार हैं, दोनों ने मिलकर तलाश फिल्म की रचना की थी जिसे आमिर खान की एक खास फिल्म कहा जाता है। यह गली बॉय मुम्बई महानगर की एक बड़ी झोपड़पट्टी में एक छोटे से घर, गलियों और मोहल्ले में घटती है। बड़े सजीव और वास्तविक सेट्स के बीच कम से कम जगह में नियति से अधिक से अधिक उदारता लेकर जीने के जज्बे को यहाँ देखा जा सकता है।

यहीं एक युवा सपना देख रहा है। प्रेम कर रहा है। डरता है मगर छोटे-मोटे गुनाह भी कर रहा है। पारिवारिक स्थितियों, अख्खड़ पिता की एकतरफा आक्रामकता, दूसरा विवाह और हिंसा को स्वयं भी सह रहा है, माँ को भी सहते देख रहा है। आधुनिक संसार में तकनीकी आविष्कार, विकास, आकर्षण, ग्लैमर के रास्ते बाकी दकियानूसी पूछताछ या आधारकार्ड नहीं देखा करते। कोई-कोई जगह किस्मत का जादू बस्ती के बीच से अचानक प्रकाशित होने वाले रॉकेट की तरह आवाज करता है और ऊँचा उड़ जाता है। यह राकेट मुराद अहमद किस तरह है, यह देखना ही गली बॉय फिल्म के अर्थ को समझना है। मदद करने वाले दोस्तों का भी संसार खूब होता है। अपराधी दोस्त अपनी ही भाषा में पुलिस के द्वारा खूब तोड़ा जाता है लेकिन नायक का नाम नहीं लेता। नायक जब सफल हो जायेगा, पैसा बना लेगा तब जमानत भी ले लेगा, यह भरोसा है।

रणवीर सिंह के जीवन और कैरियर की पहली अच्छी फिल्म है जिसमें न वह सिम्बा टाइप छिछोरा है और न ही खिलजी जैसा वीभत्स। वह एकदम मुराद अहमद है। दब्बू, झेंपू, डरने वाला, सहमा सा लेकिन एक अजीब सी सनकी लड़की से प्यार करने वाला जो आये दिन शक-शुबहा में नायक के जीवन में आने वाली लड़कियों से मारपीट किया करती है। वह अपनी होने वाली सास को यह पूछने पर कि खाना बनाना जानती हो, उत्तर देती है कि एक घण्टे में आपका लिवर ट्रांसप्लाण्ट कर सकती हूँ। फिल्म में अच्छे मानवीय रंग हैं सौतेली माँ को नायक का गाना पसन्द आना, माँ को बेटे का गाना पसन्द आना जैसे कई अच्छे पंच हैं।

सपनों को साकार करने का संघर्ष एक अलग ही पथ का रागी बनाता है मनुष्य को। नकारात्मकता अतिरेक से पहले ही परास्त हो जाती है दृढ़ इच्छाशक्ति और हौसले के आगे। आत्मबल और जुनून जीवन में बदलाव के मील के पत्थर ठहर-ठहर कर गाड़ते हैं, दूरी-दूरी पर गाड़ते हैं पर उन तक पहुँचने का पथ भी प्रशस्त करते हैं, गली बॉय यही बात अपने आपमें एक फिल्म की तरह एक प्रतिभाशाली निर्देशक के माध्यम से सफलतापूर्वक कह जाती है.............

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

कुम्भ में कलार्चन

पवित्र भूमि और पवित्र अवसर का आतिथेय होना.... 

 


मकर सक्रान्ति से प्रयागराज में आयोजित हो रहा कुम्भ महाशिवरात्रि तक चलता रहेगा। उत्तरप्रदेश सरकार का यह एक बड़ा आनुष्ठानिक उपक्रम है जिसके माध्यम से उसके सामने आतिथेय होने के बड़े अवसर हैं। स्वाभाविक रूप से सरकार की ऐसे पर्व-उत्सवों में एक बड़ी भूमिका होती है और सरकार इस दायित्व को स्वीकार भी करती है लिहाजा आतिथेय स्वरूप में उसका होना बड़ा मायने रखता है। देश दुनिया से श्रद्धालु और आमजन इस अवसर पर पधारते हैं। ऐसे आयोजन के पूरे अवसर का साक्षी हर मनुष्य होना चाहता है। यह एक तरह से आस्था का पर्व होने के साथ-साथ दुनिया का मेला भी होता है जब प्रत्येक पग पर आदमी होता है, शहर आगन्तुकों की बाट जोहता है। एक नदी शहर के अन्दर होती है और एक जनप्रवाह की नदी। जनप्रवाह की नदी से प्रेरित सब के सब चुम्बकीय आकर्षण से बंधे ऐसे बहे चले आते हैं कि उनकी सामूहिकता, वेग, अनुशासन और पुरुषार्थ देखते ही बनते हैं। 

सरकार और आयोजक ऐसे आमजन के लिए, ऐसे श्रद्धालुओं के लिए गन्तव्य से मन्तव्य तक किये जाने वाले परिश्रम, उठाये जाने वाले कष्ट और अनेक प्रकार की शारीरिक, व्यवहारिक और मानसिक व्याधियों के बावजूद जो कि स्वाभाविक रूप से परिस्थितिजन्य होती हैं, के बीच उनके विश्राम के क्षणों में, उनकी सहजता के साथ उपलब्ध समय में उनके आनंद, मनबहलाव और इस पवित्र तीर्थ में आने को सांस्कृतिक पक्ष से सार्थक बनाने के लिए अनेक गतिविधियाँ आयोजित करते हैं। ऐसे अवसरों पर देश भर से कलाकार आते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये कलाकार गायन, वादन, नृत्य, नाटक के आयामों में आधुनिक, शास्त्रीय, लोक और पारम्परिक कलाओं के गुणी साधन, प्रतिभासम्पन्न हस्ताक्षर और सम्भावनाशील आमद की तरह अनेक पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकार, उनके अनुषंग और उनके लिए काम कर रही संस्थाओं के लिए भी इस तरह के अवसरों को जुटाना और उसके लिए सारे प्रबन्ध करना एक बड़ा दायित्व होता है। कुम्भ और महाकुम्भ जैसे पर्वों पर सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकिन एक पूरा का पूरा वातावरण ही तैयार करना होता है। यह बात बहुत महत्व की है कि आनुष्ठानिक अवसरों पर सारा वातावरण आध्यात्म से रचित और प्रेरित रहता है। वह पूरा स्थल जहाँ का यह पर्व आकर्षण होता है, उद्घोषणाओं, उच्चारणों, प्रवचनों, आध्यात्मिक उद्बोधनों, भजन, कीर्तन और भक्ति के विभिन्न अनुषंगों को प्रसारित और प्रचारित किया करता है और इसी बहुविध अनुभूतियों के बीच दर्शकों-श्रोताओं के लिए सांस्कृतिक उपक्रमों को संयोजित करना होता है और ये गतिविधियाँ प्रायः रात्रि में ही आयोजित हुआ करती हैं। 

वर्ष 2016 में उज्जैन में सिंहस्थ महाकुम्भ आयोजित हुआ था। समय भीषण गर्मी का था। तारीखें थीं 21 अप्रैल से 21 मई तक। इस अवसर पर संस्कृति विभाग ने देश के लगभग 42 हजार कलाकारों को प्रस्तुति के लिए निमंत्रित किया था। प्रस्तुति के लिए अलग-अलग विशाल मंच बनाये गये थे जिनके नाम थे, भरतमुनि मंच, भर्तृहरि मंच, विक्रमादित्य मंच, कालिदास मंच और भोज मंच। इसके अलावा वाराहमिहिर मंच और त्रिवेणी मंच भी थे। इन सभी मंचों पर प्रतिदिन शाम सात बजे से देर रात लगभग एक बजे या कतिपय परिस्थितियों में उसके उपरान्त भी गतिविधियाँ हुआ करती थीं। प्रस्तुतियाँ गायन, वादन, नृत्य, नाट्य, पौराणिक फिल्मों का प्रदर्शन, कवि सम्मेलन, रामलीला, रासलीला, चित्र एवं शिल्पकला कार्यशाला एवं प्रदर्शनियाँ आदि के रूप में शास्त्रीय, आधुनिक, लोक एवं जनजातीय क्षेत्रों से समृद्ध होती थीं। टिप्पणीकार को इस वृहद आयोजन के नोडल अधिकारी के रूप में काम करने का अवसर संस्कृति विभाग की सेवा में होने के नाते मिला था। मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग ने इसे भारतीय परम्परा के महान पर्व के रूप में विन्यस्त किया था और समय से काफी पहले सक्रिय होकर भारत सरकार के संस्कृति विभाग, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, सीसीआरटी, भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद, आलियांस फ्रांसेस और इसके अलावा भारत सरकार के छहों सांस्कृतिक जोन के माध्यम से कला और संस्कृति के भी महाकुम्भ की तरह इसका आयोजन किया जा सका। 

एक माह की अवधि में बयालीस हजार कलाकारों की भागीदारी उनका अपने-अपने शहरों से उज्जैन शहर आना और सकुशल लौट जाना एक बड़ी जिम्मेदारी थी जिसे बहुत संवेदनशीलता के साथ, अपनत्व और सदाशयता के साथ निबाहे जाने के निर्देश सरकार ने दिये थे। उज्जैन के महाकुम्भ में पण्डित जसराज, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, पण्डित राजन साजन मिश्र, पण्डित अजय चक्रवर्ती, गीता चन्द्रन, मीरा दास, मंगला भट्ट, उमा डोगरा, संध्या पुरेचा, पण्डित नित्यानंद हल्दीपुर, पण्डित छन्नूलाल मिश्र, आरती अंकलीकर, कमला शंकर, प्रभाकर कारेकर, रोनू मजूमदार, विश्वमोहन भट्ट, मालिनी अवस्थी, मंजू मेहता, गुन्देचा बन्धु, उदय भवालकर आदि कितने ही मूर्धन्य, प्रतिभासम्पन्न और गुणी कलाकारों ने स्वर, संगीत और नृत्यार्चनाएँ की थीं। पूरे एक माह तक चलने वाली रंगरेज कला संस्कार उज्जैन ग्रुप की परिष्कृत रामलीला तीन आवृत्तियों में महाकुम्भ में आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। वाराणसी से प्रतिभाशाली रंगकर्मी एवं कवि व्योमेश शुक्ल ने राम की शक्तिपूजा, पंचरात्रम और रश्मिरथी का मंचन बड़ी कम उम्र के किशोर और युवा प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ किया था। दक्षिण भारत की पारम्परिक नृत्य नाट्य विधाएँ कथकली, चिण्डू भागवतम, यक्षगान यहाँ निमंत्रित थे। 

कलाओं की सहभागिता, कलाकारों की भागीदारी किसी भी उत्सव का एक बड़ा सांस्कृतिक आकर्षण होती है। महाकुम्भ या कुम्भ जैसे आयोजनों से ऐसे अवसरों या उपक्रमों का जुड़ना उन मायनों में बड़ा महत्व रखता है कि कलाकार की प्रतिभा एक विराट जनसमुदाय के अवलोकन और प्रतिक्रिया की साक्षी होती है। हमारे कलाकारों के भी जीवन का यह विलक्षण अवसर होता होगा जब उनकी कला को देखने वाला वह समाज प्रेक्षक होता है जो प्रायः किसी भी सभागार, ऑडिटोरियम, खुले मंच या स्टेडियम में आकर नहीं जुटता। आखिर कला और हमारे सर्जनात्मक सांस्कृतिक आयामों की सार्थकता भी सही अर्थों में वही जनसमाज है जो दरअसल वर्षों से इस अभिजात्य होते चले जा रहे सांस्कृतिक अभिरूप से दूर होता चला जा रहा है क्योंकि संस्कृति में सम्मोहन के तत्व तलाश करना कठिन है दूसरे अपसंस्कृति ने रचनाशीलता और रचनात्मकता की सारी कोमल और सात्विक सम्भावनाओं को अपने नुकीले और विषाक्त नखों से नोचकर रख दिया है। ऐसे में यदि भारतीय परम्परा के महान उत्सवों और पर्वों में कलाएँ एक कदम आगे बढ़ाकर यदि खुद ही वृहद जनसमाज के सामने उपस्थिति होती हैं तो यह कितनी बड़ी सांस्कृतिक उदारता होगी!

कलाकार और जनसमुदाय के बीच सांस्कृतिक तादात्म्य का स्थापित होना, एक-दूसरे के बीच परम्परा और ज्ञान की जिज्ञासा का सेतु बनना प्रयागराज के कुम्भ की भी एक उपलब्धि हो सकती है लेकिन कार्यक्रमों का आयोजन करा लेना, कलाकार की प्रस्तुति करा देना, उनको बुलाना और भेज देना भर काम नहीं है। यह एक बड़ा टीम वर्क है जिसके लिए व्यवस्था से जुड़े, सूत्रधार की तरह काम करने वाले, उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने वाले लोगों के लिए यह सब काम एक बड़ी चुनौती की तरह होते हैं जिसमें प्रत्येक क्षण जाग्रत रहकर काम करना होता है। कलाकारों के लिए उत्तरदायी व्यवस्था को सबसे पहले तो अपनी ही सुख-सुविधा का त्याग करना होता है। अपने आराम की फिक्र छोड़नी होती है। अपनी नींद को जागते हुए लेने के लिए तैयार होना होता है। कलाकारों के यथाक्षमता आराम और विश्राम की चिन्ता करनी होती है। कलाकार को ऐसा भोजन उपलब्ध कराया जाना होता है जो उसका स्वास्थ्य न बिगाड़े। उसके रहने की जगह ऐसी हो कि वह ठीक से आराम कर सके और मंच पर प्रस्तुति के समय उसका मन बना रहे। इसके लिए कलाकार के साथ आत्मीय और संवेदनशील व्यवहार की भी अपेक्षा की जाती है। कलाकार की सुरक्षा, उसके सामान की सुरक्षा, उसकी सेहत की चिन्ता, चिकित्सा और अन्य आकस्मिक आपदाओं का सामना करने में सक्षमता और प्रत्युत्पन्नमति का प्रयोग बहुत मायने रखता है। मुझे याद है सीसीआरटी ने प्रस्तुति के लिए दिव्यांग एवं विशेष बच्चों के समूह की प्रस्तुतियाँ भेजी थीं तो हमने उनके साथ अतिरिक्त सावधानी बरती थी क्योंकि उनको सदैव अपने हर काम में सहायता चाहिए होती थी जो आवश्यक भी थी और अपेक्षित व्यवस्था अपरिहार्य भी। 

उज्जैन में सिंहस्थ महाकुम्भ के समय भोज्य पदार्थों के सम्बन्ध में अतिरिक्त सावधानी रखना पड़ती थी क्योंकि भीषण गर्मी के कारण खाना खराब होने लगता था। इसी प्रकार एक दिन अचानक अपरान्ह में मौसम ने अपने तेवर दिखाये, देखते ही देखते घटा छा गयीं, बादल गरजने लगे और तेज तूफान-आंधी के साथ बेतहाशा ओले गिरने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि भर्तृहरि मंच देखते ही देखते धराशायी हो गया और कई कलाकारों के प्राण संकट में आ गये। तत्परतापूर्वक किए गये उपायों के कारण किसी को शारीरिक नुकसान नहीं हुआ तथापि देर तक सभी भयाक्रान्त रहे। जहाँ तक मंच का सवाल था, अगले दिन फिर उसी रूप में तैयारकर खड़ा कर दिया गया और कार्यक्रम प्रारम्भ हो गये। लेकिन ऐसे हादसे सबक की तरह होते हैं।

प्रयागराज का कुम्भ भी आस्थाओं के हिन्द महासागर के रूप में अतिशीघ्र अपने विराट स्वरूप को प्राप्त करेगा। उत्तरप्रदेश सरकार के लिए सत्ता में आने के बाद पहला बड़ा आनुष्ठानिक पर्व यह कुम्भ का मेला है जिसमें उसने भी मध्यप्रदेश सरकार की तरह तो नहीं लेकिन फिर भी यथाकल्पना और आकलन सांस्कृतिक उपक्रमों को विन्यस्त किया है। यह कामना है कि यह समारोह बिना किसी बाधा और व्याधि के सम्पन्न हो और श्रद्धालुओं से लेकर कलाकारों और कलाभिव्यक्तियों के लिए एक प्रेरणा, एक मिसाल के रूप में जाना जाये। स्वाभाविक रूप से इसके लिए वे सब सावधानियाँ रखनी होंगी जिनके अभाव में मानवीय सभ्यता को मुसीबतों, हादसों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हम यही आशा करते हैं कि उत्तरप्रदेश शासन इसके लिए तत्पर भी है और सक्षम भी।

लेखक उज्जैन महाकुम्भ 2016 में सांस्कृतिक गतिविधियों के नोडल अधिकारी रहे हैं.





मंगलवार, 8 जनवरी 2019

सिम्‍बा

एक निरर्थक किन्‍तु बाजार कब्‍जायी फिल्‍म पर  


" सिम्‍बा का नायक बड़े संघर्षशील जीवन से बड़ा हुआ एक डेशिंग पुलिस अधिकारी है जिसके भाग्‍य में बड़ा आधुनिक थाना है, आय पी एस के टक्‍कर का वाहन है, आसपास चाटुकारिता और चापलूसी करता स्‍टाफ है, रोमांस के लिए थाने के सामने ही रेस्‍त्रॉं और उसकी मालकिन है."
" लेकिन मुझे यह भी लगा कि बचपन में उसको रात्रिकालीन स्‍कूल में जो शिक्षा मिली वह इतनी प्रभावहीन हुआ करती थी कि सुबह उठते ही वह टिकिट की ब्‍लैक मार्केटिंग में लिप्‍त हो जाया करता था। रोहित शेट्टी की कहानी में यह दिलचस्‍प विरोधाभास है........"



अगर सिनेमाहॉल में भरपूर उपस्थिति हो, इतवार के दिन सिंगल स्क्रीन थिएटर में भी भीड़भाड़ दिखायी दे तो उस फिल्म को सुपरहिट मान लेना चाहिए। यदि न मानों तो वो सब लोग जरूर बेवकूफ कहेंगे जो माउथ पब्लिसिटी के साथ औरों को भी सिम्बा देखने को प्रेरित कर रहे हैं और जो प्रेरित है, वो औरों को प्रेरित कर रहे हैं। बहरहाल रोहित शेट्टी की इस साधारण सी बनी फिल्म को फिलहाल दर्शकों की कोई कमी नहीं है और यह सप्ताह भी बॉक्स ऑफिस की गणितबाजी और उसकी बाजीगरी से करोड़ों का कलेक्शन घोषित करते-करते निकल जायेगा।
अब आप रोहित शेट्टी से कोई संवेदनशील या मन में पैठ कर लेने वाली फिल्म की उम्मीद तो वैसे भी नहीं करते। तो वे भी आपसे उस तरह की फिल्म बनाने के लिए कहीं वचनबद्ध नहीं हैं। ये सिम्बा तीसरी फिल्म होगी जो उनके गोवा प्रेम का प्रमाण है। इसके पहले की दो सिंघम वहीं बनायीं थीं उन्होंने। इधर उनको तेलुगु की तीन साल पहले आयी सुपरहिट टेम्पर की कहानी हासिल हुई तो उन्होंने दबंग का कुछ मसाला इस्तेमाल करते हुए सिम्बा बना डाली है।
अजय देवगन के परम मित्र रोहित शेट्टी ने पिछली फिल्मों से अपेक्षाकृत नये सितारे रणवीर सिंह पर दाँव आजमाते हुए भी बॉक्स ऑफिस का कोई जोखिम नहीं लिया है और देवगन के लिए आखिरी पन्द्रह मिनट बाकायदा दर्शक का तेवर बदलने के लिए रखे हैं, यहीं वे निरीह रणवीर सिंह के साथ धोखा कर देते हैं। शुरू से ही कहानी को गड्डमड्ड करते चले रोहित ने आखिरकार इस नायक को अन्त में ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया कि वहाँ वह खुद न समझ पायें कि आगे किया क्या जाये! ऐसे में यह जगह अजय देवगन को हीरो बना देने के लिए काम में ले जी गयी। इन बाद के दृश्यों में रणवीर सिंह का चेहरा अभिनय करते हतोत्साहित दीखता है। ऐसा लगता है कि गन्तव्य तक रेल ले आने वाले ड्रायवर को हटाकर दूसरा ड्रायवर बैठा दिया गया कि अब यार्ड में गाड़ी वह ले जायेगा।
आरम्भ में जिस तरह के संकेत लिखते हुए दिये, सिम्बा ऐसा पूत बताया गया है जिसके पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। छः-सात साल के लड़के का आत्मविश्वास गजब का है और अभय भी ऐसा कि सब बस उसे उसकी उम्र से बड़े डायलॉग बोलते देखकर हतप्रभ टाइप रह जाते हैं। यही फिल्म का नायक है जो इन्स्पेक्टर बन गया है और पैसों के लेनदेन और अपनी बेईमानी से कुख्यात है। औपचारिकता के लिए नायिका भी है सारा अली जो केदारनाथ में फिर भी कुछ करती दिखायी देती हैं, यहाँ उनकी ताजगी और क्षमता का उपयोग किया ही नहीं गया। सोनू सूद एक बुरे आदमी के किरदार में पूरे समय अविश्वसनीय और भ्रमित ही लगे हैं। अमर मोहिले का बैकग्राउण्ड म्युजिक सब मूर्खताओं और फूहड़ताओं को दर्शकों के मस्तक पर सील-ठप्पे की तरह जड़ता चलता है। बोझिल भावनात्मकता और निर्भया काण्ड से जुड़ी मानवीय दलीलें देकर किसी तरह फिल्म को पूरा कर लिया गया है।
सिम्बा के नायक के रूप में रणवीर सिंह अण्डरएस्टीमेटेड हीरो साबित हुए हैं। उनका अपीयरेंस, कॉमेडी दृश्य और डाँस उनको कुछ अधिक सड़कछाप चरित्र के नजदीक ले जाते हैं जबकि इतना ज्यादा किरदार हो जाने की जरूरत है नहीं। आशुतोष राणा हवलदार की भूमिका में थके थके से लगते हैं। थाने में साथियों को ललकारने के उनके दृश्य भी बड़े कमजोर साबित होते हैं। दर्शकों की आँखों को रंगीन ठहराव देने के लिए रखे गये गाने में बहुत सारी महिलाएँ कलरफुल साड़ी पहनकर डाँस करती हैं और इसी तरह धोबी घाट का दृश्य भी नायक की आमद को बचकाना साबित करता है।
निर्देशक बहुत सारे कलाकारों को बतौर अतिथि यहाँ पिछली दूसरी फिल्मों के गानों के दोहराव में ले आता है जैसे करण जौहर, तुषार कपूर, अरशद वारसी, श्रेयस तलपड़े आदि। अन्त में अक्षय कुमार के साथ अन्तिम दृश्य भी कमजोर विद्यार्थी के लिए लगाये गये अनेक सोर्स से आगे का एक सोर्स साबित होता है। हिन्दी के दुश्मन मुम्बइया फिल्मकार अक्षय कुमार को एटीएस चीफ प्रोजेक्टर कर रहे हैं लेकिन बैच पर नाम में सरनेम सूर्यवंशी की जगह सुर्यवंशी लिखा है। अब जब यह फिल्म आयेगी तब बार-बार अक्षय कुमार की छाती पर लगे इस बैच में प्रूफरीडर स्वभाव के कारण करेक्शन करने का मन करेगा।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

नदी की सन्निधि में.........

लगता है वो मुझे अपने में एकाग्र होने नहीं देतीं। वो जहाँ पर हैं वहाँ वे इस बात का प्रयत्न करने में और आसानी से सक्षम हैं। धीरे-धीरे दिन सालों में बदलते जा रहे हैं। मैं काँच में अपना चेहरा हर दिन ही देखा करता हूँ। जान नहीं पाता, बड़े आघात कहाँ से क्या कुछ छुड़ाकर अपने साथ ले जाते हैं। ऊपर से कुछ समझ में नहीं आता। भीतर से भी कितना आता है, कहना मुश्किल है। 

स्मृतियों में कौंधता है, एफ टाइप दो मकानों में लगने वाला वह स्कूल जिसमें मैंने पढ़ना शुरू किया था। पहले दिन मुझे अच्छा तैयार किया गया था और बस्ता, जूता-मोजा, हाफ पैण्ट, बुशर्ट आदि पहनाकर वो मुझे स्कूल छोड़ने आयीं थीं। टीचर से भीतर बात की थी और थोड़ी देर में जब प्रार्थना की घण्टी बजी तो बाहर बच्चों की लाइन लगने लगी जिसमें मैं भी खड़ा कर दिया गया। प्रार्थना हो रही थी और लाइन में खड़े मैं उनको देख रहा था। आधी प्रार्थना हो चुकी तो वे मुझे देखते हुए मुस्कराकर जाने लगीं। उनको जाते देखकर मैं रो कर उनकी ओर दौड़ पड़ा और पीछे से जाकर उनकी साड़ी पकड़ ली, कहने लगा घर जाना है। उनको हँसी आ गयी पर मेरा रोना बन्द नहीं हुआ। 

बड़े होते हुए पता नहीं कितने ऐसे अवसर आये होंगे जब उनकी तबियत खराब हुई, वे बीमार पड़ीं पर साथ बनी रहीं। पिछली बार फिर उनको मैं पकड़ न सका, वो एकदम अन्तर्ध्यान हो गयीं अपने भीतर से। ओर-छोर हम कुछ भी न समझ पाये। अब वे बहुत सारी फोटुओं में हैं जिन्हें देख पाना सहज नहीं होता, जिन्हें देखते हुए अपने आपको सह पाना भी सहज नहीं होता। वे अक्सर अपनी माँ, हमारी नानी को याद करके कहा करती थीं, नहीं रहने के बाद अम्माँ हमें कभी सपने में भी नहीं दीखीं। कभी-कभी वे बतलाती थीं कि तुम्हारी नानी को सपने में देखा, उन्होंने कहा, मुनियाँ, हम अकेली हैं। अब हमारे पास घर भी बड़ा है, तुम भी वहीं चलो। इस पर मैं उनके हाथ जोड़ लिया करता था, यह कहते हुए कि ऐसे सपने मत देखा करो। और नानी की बात भी मानने की जरूरत नहीं है तब वे शरारतन हँसने भी लगतीं, वे हम सबकी घबराहट को भाँप जातीं थीं। त्यौहारों को लेकर उनके अपने सिद्धान्त बड़े स्पष्ट और साफ से थे। हम लोगों के प्रायः अलसाये रहने पर वे कहा करती थीं, सब दिन चंगे, त्यौहार के दिन नंगे। वे चाहती थीं घर के लोग तीज-त्यौहार के दिन सुबह से ही तैयार हो जायें और घर को भी उसी तरह व्यवस्थित करें। 

अब उनके बिना ये त्यौहार पूरे दिन सहना बड़ी हिम्मत का परिचय देने जैसे हैं जिसमें संयत बने रहना ही सबसे बड़ी परीक्षा होती है। पीर-पके मन में बहुत उथल-पुथल मचती है। कोई कोना-छाता समझ में नहीं आता जहाँ दो पल अपने में उसी व्यथा के साथ रहा जा सके। चारों तरफ ऐसे व्यवधान हैं जो पूरे जीवनभर भ्रमित करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। दीपावली पर उनको अनार बहुत पसन्द थे। पटाखों के साथ अनार उनकी इच्छा से चार-पाँच जरूर लाये जाते। उन अनारों को छुटाने (जलाने) के समय उनको बाहर बुला लिया करते थे। अनारों का भरपूर दम भर ऊपर जाना और एकदम से दानों का बिखर जाना उनको बहुत सुहाता। उतना देखकर वे भीतर चली जातीं हम लोगों का खाना बनाने के लिए। 

पिछले साल मन किया, उनकी आभासी सन्निधि में कुछ अनार जलाऊँ। नर्मदा, गंगा, संगम और शिप्रा में उनकी आभासी सन्निधियाँ हैं क्योंकि उनके दिव्यांश वहाँ प्रवाहित किए थे। साँझ को इन्हीं इरादों के साथ अपनी व्यथा का मलहम लिए दीपावली के दिन रामघाट पहुँच गया। माँ शिप्रा अपने पूरे ठहराव में थीं किन्तु उनका स्पन्दन महसूस किया जा सकता था। दोनों ओर कुछ दिये जल रहे थे। इक्का-दुक्का लोग। मेरे अनुज से मित्र अमित वहाँ मेरे पास थे। हम लोगों ने वहीं किनारे अनार जमाये। अनार जलाने के लिए फुलझड़ी का प्रयोग ज्यादा सहज है। हमने जलायीं, तभी वहीं एक बच्चा कहीं से आ पहुँचा, आठक साल का जिसने कहा, अंकल मैं जलाऊँ अनार, हमने कहा, बेटा क्यों नहीं। वह खुश हुआ। हमने फिर मिलकर एक-एक करके सभी अनार जलाये। अनार जल चुके, फुलझड़ी के चार पैकेट बचे थे, इस बीच तीन बच्चे-बच्चियाँ वहाँ से निकले गरीब परिवार के जो दोने में आटे की गोली मछलियों को डालने के लिए बेच रहे थे मगर वहाँ उनका कोई गाहक नहीं था। उनको पास बुलाकर एक-एक पैकेट फुलझड़ी का दिया, एक जो बचा वो अनार चलाने वाले बच्चे को। सबके चेहरे पर जो खुशी आयीं वह अनूठी, प्रीतिकर और सुखकारी थी। सबने अपने विवेक से जले हुए अनार कचरे के डब्बे में डाले और हम लोगों को हैप्पी दीवाली अंकल कहते हुए दौड़ते-भागते अपने घर को चले गये। इस बार भी यही किया। दीपावली के दिन तीन बजे दोपहर को उज्जैन की ओर चल पड़ा। बीते साल की तरह रामघाट जैसे बुला रहा था। इस साल भी ऐसा ही। लोग घरों में थे, त्यौहार की तैयारी करते, घाट सूना था। वही इक्के-दुक्के लोग, बच्चे, एक-दो मांगने वाले। इस बार भी अमित और आदित्य मेरे आने से पहले आ गये। हम सबने अनार जलाये, वहाँ घूम रहे बच्चों को भी बुलाकर। आधे घण्टे ठहराव के बाद फिर भोपाल वापसी। 

मैं जानता था कि यह मेरा अपना हठ, अपने आप से है, मुझे लगा कि शायद इसमें मैं अकेले ही शामिल हो सकता हूँ। इसलिए मैंने अपनी निजता में यह कर लिया। लौटते हुए रामघाट पर बिताया समय मेरे लिए अपने मन को जीने का मेरा हठ थे, जिन पर मैं अपना दृश्यबोध छोड़ आया था। शिप्रा का ध्यान करते हुए मोक्षदायिनी नदियों के विषय में मैं सोचने लगा, लाखों-करोड़ों लोगों की पीड़ा और बहते हुए आँसुओं को ये नदियाँ कितनी उदारता से अपने आँचल में समेट लेती हैं। उतना ही सच यह भी है कि इतनी पीर अपने में सहेजे-समेटे वे स्वयं कितनी पीर से भरी रहा करती होंगी। शायद यही कारण है कि नदी के किनारे थमकर बैठना, जीवन के अर्थ का सात्विक और सच्चा व्याकरण ग्रहण करने के बराबर है। हमारे पूर्वज नदी की धरोहर हैं और नदी हमारी समूची मानवीय अस्मिता की.................

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

।। केदारनाथ ।।

एक प्रेमकहानी में कुछ प्रेमरस

 



केदारनाथ उस तरह से कोई साधारण फिल्म नहीं है जैसी प्रत्युत्पन्नमति समीक्षकों ने आनन-फानन उसे देखकर समीक्षा कर डाली है। कुछ वर्षों से इन्स्टेण्ट समीक्षा का अजीब सा कायदा बन गया है हमारे यहाँ मीडिया में जिसमें देखने के लिए भी वक्त नहीं है और सोचने के के लिए भी। लिख देने की जल्दी है, दौड़कर आगे निकल जाने की भी जल्दी है भले ही ठहरकर विचार भी न कर पाये हों। केदारनाथ अभिषेक कपूर निर्देशक एक अच्छी प्रेमकथा है जिसकी पृष्ठभूमि में शीर्षक अनुरूप केदारनाथ में पाँच साल पहले आयी आपदा लगातार साथ चलती है लेकिन आप उसको उस स्थान, उस कस्बे की एक काल्पनिक कहानी मानकर देखो, जैसा कि फिल्म के शुरू में स्पष्ट भी किया गया है, तो उसे एक सुरम्य स्थल पर युवा प्रेमकहानी के रूप में देखना अच्छा लगता है। मैंने यह फिल्म कल रात में देखी और आधा हॉल भरा भी पाया, यह दूसरे सप्ताह की स्थिति है जो बाजार की दृष्टि से भी बुरी नहीं है।

केदारनाथ तीर्थ में मन्दिर तक पहुँचने में असहाय और असमर्थ श्रद्धालुओं को अपनी पीठ पर बैठाकर मन्दिर की चौखट तक छोड़ने वाला नायक है जिसके पिता भी यही काम करते थे लेकिन एक दुर्घटना में, जब वह छोटा था, चल बसे थे। माँ और एक शायद भांजा उसके साथ, यही परिवार है। नायिका, दो बहने हैं, माँ और पिता। इनकी अलग कहानी है, नायिका छोटी बहन है जिसके लिए जिन्दगी का उस समय तक अर्थ उच्छश्रृंखलता है जब तक वह नायक से नहीं मिलती। नायक से मिलने के बाद फिर प्रेमकहानी है, मिलना है, नायक का नायिका को पिट्ठू पर बैठाकर घुमाना फिराना और गाना गाना भी।

नायक-नायिका के प्रेम के फलीभूत होने की अपनी बाधाएँ हैं, विशेषकर आसपास, समाज, धर्म यही सब। इसके बीच नायक बहुत विनम्रता और आत्मविश्वास के साथ मनुष्यता के पक्ष में अच्छे तर्क रखता है। फिल्म में नायक की माँ का अन्देशों और डर से भरा हुआ होना, नायक का अपने आपमें नायिका के प्रति, प्रतिबद्ध होना कहानी के महत्वपूर्ण पक्ष हैं। फिल्म में सहायक अभिनेता अपनी तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, वे सीमित भी हैं। प्राकृतिक संकट और विनाश की भयाक्रान्तता क्लाइमेक्स में बखूबी प्रस्तुत की गयी है। एक बड़े सजीव से सेट पर यह फिल्म चरितार्थ होती है। खूबसूरत गानों और उनके संगीत के साथ। विशेषकर आरम्भ में शिव की वन्दना का जो गीत है, संगीतकार अमित त्रिवेदी का ही गाया हुआ, पूरे परिवेश और भव्यता में गजब का लगता है। यह जितनी सुशान्त की फिल्म है उतनी ही सारा की भी।

सुशान्त के चेहरे पर प्रकृतिप्रदत्त सौम्यता बहुत सुहाती है। संवेदनशील और कोमल भावों की अभिव्यक्ति में वे मन को छूते हैं। सारा को देखते हुए अमृता याद आती हैं बेताब की। मिलता हुआ चेहरा, दुस्साहसी और चंचल चरित्र में वे जितना कमाल करती हैं भावनात्मक दृश्यों में वे उतनी ही प्रीतिकर भी। बहन की भूमिका में पूजा गोर का किरदार सीमित होते हुए भी रेखांकित होता है। फिल्म के अन्त में जब विनाशलीला समाप्त होने के कुछ वर्षों बाद का केदारनाथ दिखाया जाता है, तब अपने प्रेमी की याद में रेडियो में उस गाने की फरमाइश के साथ फिल्म का खत्म होना मन को छू जाता है जो पिछले किसी एक क्षण में नायक, नायिका के सामने गाता हैं। यह एक नम अनुभूति के साथ दर्शकों को सिनेमाहॉल से विदा करना है।

बड़े दिनों बाद किसी फिल्म में गीत के नाम पर गीत और संगीत के नाम पर माधुर्य का एहसास हुआ है। आज के समय में लम्बे समय तक गीत याद नहीं रहते मगर हमारे मन में इस फिल्म के गानों को लेकर एक सकारात्मक राय तो बनती ही है। फिल्म की मूल कहानीकार कनिका ढिल्लन हैं, खूबसूरती से उन्होंने एक मर्मस्पर्शी कथा रची है, अभिषेक कपूर एक नाम की तरह यहाँ उनके साथ श्रेय लेते हैं, वे निर्देशक जरूर अच्छे हैं, रॉक ऑन और काय पो छे के बाद इसमें वे प्रमाणित करते हैं।

तुषारकांत राय की सिनेमेटोग्राफी बहुत खूबसूरत है। कला निर्देशन में भी अच्छी कल्पनाशीलता के लिए आर्ट डायरेक्टर संजय कुमार चौधरी की सराहना की जानी चाहिए।
#kedarnath @kedarnath #filmreview @sushantsinghrajpoot @saraalikhan 

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018



फिल्‍म - गुलामी
एक सशक्‍त सीन

एक जमींदार और एक किसान के बेटे के बीच सशक्‍त संवाद। 
गिरवीं जमीन और उसका कर्ज क्‍या एक किसान को 
पीढ़ी दर पीढ़ी चुकाना होता है.........?

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

निर्द्वन्‍द्व (नाटक)


तथागत बुद्ध की जातक कथा पर आधारित एक नाटक जिसका प्रथम मंचन सांची के महाबोधित महोत्‍सव में 25 नवम्‍बर 2018 को हुआ था। इस नाटक के लेखक सुनील मिश्र हैं तथा निर्देशक के.जी. त्रिवेदी। नाटक में संगीत दिया है सुरेन्‍द्र वानखेड़े ने। यह नाटक एक गरीब लकड़हारे के सच्‍चे मन और संकल्‍प की कथा कहता है, जिसकी मदद आत्मिक विपदा में फँसने पर तथागत करते हैं।

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

49वाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह

विश्व का श्रेष्ठ सिनेमा क्यों नहीं बन सका हमारा मानक?


गोवा में 20 नवम्बर से शुरू हुआ 49वाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह इस संकल्प के साथ सम्पन्न हो गया कि अगले साल नवम्बर 2019 में 50वाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह इस तैयारी के साथ मनाया जायेगा जिसमें पिछली बार की अनेक खामियों के लिए पहले से ही सावधान रहा जायेगा, अच्छी तैयारी की जायेगी और जिन त्रुटियों के लिए हमेशा समारोह की आलोचना की जाती है, वे नहीं दोहरायी जायें, इसका प्रयत्न किया जायेगा। भारत में होने वाला सिनेमा का यह सबसे प्रमुख और सबसे पुराना फिल्म समारोह है जिसमें विश्व के अनेक देशों की भागीदारी हुआ करती है। दुनिया के लोग जो भारत के इस विश्व स्तरीय फिल्म समारोह के बारे में जानते हैं या वे फिल्मकार, कलाकार जो लम्बे समय से किसी न किसी रूप में इस समारोह का हिस्सा रहे हैं, वे पूरे साल इसके प्रति जिज्ञासा और कौतुहल बनाये रखते हैं। भारत में भी इसका वही आकर्षण है। यह बात उल्लेखनीय है कि इसी सदी की शुरूआत के तीसरे वर्ष 2003 से यह समारोह स्थायी रूप से गोवा में होने लगा है अन्यथा इसके पहले अन्तर्राष्ट्रीय समारोह एक साल दिल्ली में हुआ करता था और एक साल इसका मेजबान कोई एक राज्य हुआ करता था जिसकी राजधानी में यह आयोजित हुआ करता था। भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, उसका फिल्म समारोह निदेशालय इसके प्रमुख आयोजकों में से हैं तथापि अनुषंग रूप में पत्र सूचना कार्यालय, राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम, फिल्म प्रभाग, फिल्म एवं टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान तथा राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार आदि विभाग भी आयोजन अवधि में इस रौनकमन्द माहौल में अपनी-अपनी सार्थकता और कर्तव्य का परिचय देने के लिए सक्रिय दिखायी देते हैं। 

गोवा की गर्मजोशी मेहमानवाजी के कारण इस फिल्म को पिछले वर्षों में एक अलग आकर्षण प्राप्त हुआ है तथापि इस वर्ष राज्य के मुख्यमंत्री की अस्वस्थता का प्रभाव इस समारोह में दिखायी दिया। इस बार स्मृति ईरानी का सूचना एवं प्रसारण मंत्री न होना भी समारोह की फीकी आभा में प्रकट होता रहा। इस बार के समारोह के लिए दुनिया भर से लगभग 220 से अधिक फिल्में समारोह के लिए जुटायी गयी थीं जिनका प्रदर्शन दो-तीन प्रमुख स्थानों आयनॉक्स, कला अकादमी सभागार और अन्य जगहों पर होता रहा। इस समारोह में दुनिया की वे फिल्में भी शामिल की गयी जिनको अवार्ड प्राप्त हुए हैं। इजराइल को विशेष रूप से फोकस किया गया। अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा और भारतीय सिनेमा की श्रेणियों में विविधता के साथ होते रहे इस बार के समारोह में प्रतिदिन सुबह लगभग 9 बजे से प्रदर्शन शुरू हो जाया करते थे और रात लगभग 1 बजे तक फिल्में देखने के अवसर लोगों को हासिल थे। 

अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह की शुरूआत बहुत फीके ढंग से हुई। इसके चमकदार मेहमान अक्षय कुमार और करण जौहर औपचारिक शुभारम्भ हो जाने के बड़ी देर बाद कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे। अवसर कुछ था, होने लगा कुछ और जिसमें सबसे हास्यास्पद काफी विद करण टाइप करण जौहर ने स्टेज पर कुर्सियाँ जमवाकर अक्षय कुमार और सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को बैठाकर उनकी मौखिक परीक्षा ली अति साधारण किस्म के सवालों के साथ। इसी समारोह में सिनेमा की भव्यता को कुछ विदेशी फिल्मों के दृश्यों के साथ प्रकट करने की कोशिश की गयी। सोनू सूद अपना डांस ग्रुप लेकर आये थे, एक साधारण सा प्रदर्शन करके चले गये। ऐसे ही देहगतियों और मलखम्भ टाइप के करतब से एक रोमांच पैदा करने की कोशिश की गयी लेकिन वह फिल्म समारोह के लिए आदर्श प्रस्तुति नहीं थी। 

समारोह की उद्घाटक फिल्म वेनिस की फिल्म द एस्पर्न पेपर्स थी जिसका निर्देशन प्रतिभाशाली युवा फिल्मकार  जूलियन लैण्डेस ने किया था। यह निर्देशक की पहली फिल्म के रूप में प्रदर्शित की जाने वाली विश्वस्तरीय फिल्म थी। उन्नीसवीं सदी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म की मूल प्रेरणा हेनरी जेम्स का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। इसी प्रकार समापन फिल्म के रूप में विश्व प्रीमियर का अवसर जर्मनी की फिल्म सील्ड लिप्स के साथ जुटाया गया। बर्न्ड बोलिच की फिल्म सील्ड लिप्स कम्युनिस्ट आन्दोलन को लेकर आकर्षण और उसकी प्रत्यक्षता का साक्षी होने के बाद सोच में बदलाव और मोहभंग की एक कहानी पर आधारित थी जिसमें कैरोलिन इच्छार्न, अलेक्जेण्ड्रा मालिया लारा, रॉबर्ट स्टेंडलोबर आदि ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभायी। इसके अलावा प्रतियोगी खण्ड जिसमें कि सर्वोत्कृष्ट फिल्म को स्वर्ण मयूर और चालीस लाख रुपयों का पुरस्कार दिया जाता है, के लिए दस से अधिक भारतीय एवं विदेशी फिल्में शामिल की गयी। इनमें 53 वार्स, द ट्रांसलेटर, एज, इडिवाइन विंड, ए फेमिली टूर, हियर, डॉनबास, अवर स्ट्रगल्स, द मेन्सलेयर, द अनसीन, वेन गॉग्स, व्हेन द ट्रीस फाल, टू लेट, भयनाकम आदि प्रमुख थीं। दिलचस्प यह है कि भारतीय फिल्मों में तमिल फिल्म टू लेट और मलयालम फिल्म भयनाकम फिल्म सम्मिलित थीं, बॉलीवुड की कोई फिल्म इस योग्य शायद नहीं पायी गयी हो या यहाँ तक आने में विफल रही हो। यह प्रसंगवश इसलिए भी लिखना पड़ रहा है कि हाल ही में प्रदर्शित ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान की भारी विफलता से बॉलीवुड छटपटाया हुआ है। काश नकलची और आयडिया चुराऊ फिल्मकार दुनिया के प्रासंगिक, ज्वलन्त और संवेदनशील सिनेमा से थोड़ा-बहुत भी कुछ सीख सकते।


इजराइल की दस से अधिक फिल्मों का प्रदर्शन यहाँ किया गया जिनमें द बबल, फुटनोट, लांगिंग, फ्लोच, द अदर स्टोरी, रेड काऊ, शालोम बॉलीवुड, द अनार्थोडॉक्स, वर्किंग वूमन आदि शामिल थीं। इनमें फ्लोच एक ऐसे बुजुर्ग की कहानी है जिसका बेटा, दामाद और पोता एक दुर्घटना में मारे जाते हैं, इससे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। वह दूसरी शादी और संतान पैदा करने के लिए व्याकुल है। एक फिल्म लांगिंग एक बड़े अमीर व्यक्ति को ऐसे समय के सामने ला खड़ा करती है जब लम्बे अन्तराल बाद अपनी प्रेमिका से मिलने पर उसको पता चलता है कि उसकी प्रेमिका ने बीस साल पहले उसके बेटे को जन्म दिया था जो हाल ही दुर्घटना में मारा गया है। रेड काऊ का फलसफा दो स्कूली छात्राओं के बीच अन्तरंगता का पनपना है जो आगे चलकर बड़ी घटना को जन्म देती है क्योंकि उसका एक लड़की का विधुर पिता अपनी बेटी को निरन्तर चेताया करता है। शालोम बॉलीवुड- द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इण्डियन सिनेमा को देखना दिलचस्प अनुभव इसलिए था क्योंकि यह फिल्म दो हजार साल पुराने यहूदी सम्प्रदाय की पिछली पीढ़ी के बॉलीवुड में योगदान को सन्दर्भ के साथ रेखांकित करती है और हम सुलोचना रूबी मेयर्स, जॉन डेविड, नादिरा, प्रमिला आदि कलाकारों के भारतीय सिनेमा में अविस्मरणीय अवदान से अवगत होते हैं। 

फिल्म समारोहों की प्रमुख आलोचना फिल्मों के चयन को लेकर होती है जबकि यह कठिन काम है। लेकिन इसके बावजूद यदि दर्शकों के हिस्से में दो सौ पच्चीस में से पच्चीस-तीस फिल्में ही हिस्से में आयें तो विषय जरा निराशाजनक हो जाता है। इसके बावजूद महान स्वीडिश फिल्मकार इंगमार बर्गमैन की यादगार फिल्मों का पुनरावलोकी समारोह उत्सव का एक बेहतरीन हिस्सा था जिसमें परसोना, फनी एण्ड अलेक्जेण्डर, द सेवन्थ सील, समर विद मोनिका, वाइल्ड स्ट्राबेरीज के प्रदर्शन याद रखे जायेंगे। फेस्टिवल केलिडोस्कोप में कोल्डवार, द गिल्टी जैसी फिल्में समय की गति और यथार्थ को मानवीय समझ और कुण्ठाओं की अलग सतह पर परीक्षा लेती दिखायी देती हैं। वर्ल्ड पैनोरमा में डॉटर्स ऑफ माइन, द हैप्पी प्रिंस, द ब्रा, ब्रदर्स, मग, माय मास्टरपीस, हाई लाइफ, फोनिक्स, द प्राइज, द सीन एण्ड द अनसीन, विण्टर फाइल्स, द ओल्ड रोड, एन एलीफेण्ट सिटिंग स्टिल की देखने वालों ने सराहना की। विशेष प्रदर्शन श्रेणी में ट्यूनीशिया की तीन फिल्में ब्यूटी एण्ड द डॉग्स, डियर सन और व्हिस्परिंग सैण्ड्स का प्रदर्शन किया गया। 


व्हिस्परिंग सेण्ड्स अरब मूल की एक कनाडाई महिला की भावपूर्ण यात्रा पर आधारित थी जो एक संवेदनशील कारण से ट्यूनीशिया आती है। वह स्मृतियों में है, उसके पास राख का एक पात्र है जो वह स्थान विशेष में विसर्जित करना चाहती है। इस यात्रा में उसको वाहन से लेकर चल रहा गाइड दरवेशी अस्तित्व और परम्परा के बारे में अपना दृष्टान्त बतला रहा है जो प्राकट्य स्मृतियों का हिस्सा भी हैं। इस फिल्म को देखकर सिनेमा में सार्थक परम्परा का निर्वहन करने वाले फिल्मकारों को दाद देने को जी चाहता है। इस फिल्म का निर्देशन नासेर खेमीर ने किया था जो कहानीकार, चित्रकार और नैरेटर भी हैं। अपनी अनेक फिल्मों के जरिए उनको दुनिया में ख्याति मिली है। 

अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिवंगत कलाकारों को याद किया गया, यह समारोह की परम्परा का हिस्सा है। इस बार विशेष रूप से श्रीदेवी और विनोद खन्ना को उनकी कुछ चुनिन्दा फिल्मों मोम एवं अचानक, लेकिन, अमर अकबर अंथनी के माध्यम से श्रद्धांजलि देने की कोशिश की गयी वहीं शशि कपूर, एम. करुणानिधि, कल्पना लाजमी को भी एक-एक फिल्मों के माध्यम से याद किया गया। करुणानिधि की तमिल फिल्म मलईकल्लन और कल्पना लाजमी की रुदाली फिल्में समारोह के श्रद्धांजलि खण्ड का हिस्सा थीं।
#iffi2018 #iffigoa2018 



बुधवार, 28 नवंबर 2018

Donbass wins the Golden Peacock at IFFI 2018



Donbass wins the Golden Peacock at IFFI 2018

Donbass’ directed by Sergei Loznitsa has won the coveted Golden Peacock Award at the 49th International Film Festival of India (IFFI), which concluded in Goa on November 28, 2018. The Golden Peacock Award carries a cash prize of Rs 4 million (Rs 40 lakhs) to be shared equally between the Producer and the Director, Trophy and the citation.
Donbass tells the story of a hybrid war taking place in a region of Eastern Ukraine, involving an open armed conflict alongside killings and robberies perpetrated on a mass scale by separatist gangs. In Donbass, war is called peace and propaganda is uttered as truth. A journey through Donbass unfolds as a series of curious adventures. This is not just a tale of one region or a political system; it is about a world lost in post-truth and fake identities.
Donbass is the official submission of Ukraine for the 'Best Foreign Language Film' category at the 91st Academy Awards in 2019. It was selected as the opening film in the Un Certain Regard section at the 2018 Cannes Film Festival. At Cannes, Sergei Loznitsa won the ‘Un Certain Regard’ Award for Best Director.
Lijo Jose Pellissery conferred Best Director Award for Ee.Ma.Yau
Lijo Jose Pellissery won the Best Director Award for his 2018 film ‘Ee.Ma.Yau’. The film is a stunning satire on death and how it affects human lives. Set in Chellanam, a coastal village in Kerala, the film shows the plight of a son who tries to arrange a worthy funeral for his father; he is however met with unpredictable obstacles and reactions from different quarters. The Best Director gets the Silver Peacock Award and a cash prize of Rs 1.5 million (Rs 15 lakhs).
He also won the Best Director Award at the 48th Kerala State Film Awards for Ee.Ma.Yau.
Chemban Vinod is the Best Actor
The Best Actor (Male) Award has gone to Chemban Vinod for his portrayal in Ee.Ma.Yau of ‘Eeshi’, a son who tries to arrange a worthy funeral for his father but is met with unpredictable obstacles and reactions from different quarters.
Anastasiia Pustovit gets Best Actor (Female) Award
The Best Actor (Female) Award has gone to Anastasiia Pustovit  for her portrayal of a ‘Larysa’, a teenage girl in the Ukrainian film ‘When the Trees Fall’.
Both Best Actor (Male) and Best Actor (Female) are honoured with the Silver Peacock Trophy and a cash prize of Rs 1 million (Rs 10 lakhs) each.
Special Jury Award for Milko Lazarov’s Aga
Milko Lazarov walked away with the Special Jury Award for his film ‘Aga’; the film focuses on the story of Sedna and Nanook, an elderly couple from Yakutia, and the particular challenges they face in the midst of a frigid landscape. The Special Jury Award carries a cash prize of Rs 1.5 million (Rs 15 lakhs), a Silver Peacock Award and a citation.
Alberto Monteras II receives ‘Best Debut Feature Film of a Director’ for Respeto
Alberto Monteras II received the Centenary award for ‘Best Debut Feature Film of a Director’ for his Filipino Movie ‘Respeto’. 'Walking with the Wind', directed by Praveen Morchhale, won The ICFT –UNESCO Gandhi Medal instituted by the International Council for Film, Television and Audiovisual Communication, Paris and UNESCO. The criteria for the Gandhi Medal reflect UNESCO’s fundamental mandate of building peace in the mind of men and women, particularly human rights, intercultural dialogue, promotion and safeguard of diversity of cultural expressions.
’Walking with the Wind’ tells the story of a 10 year old boy in Himalayan Terrain, who mistakenly breaks his friend’s school chair. His daily seven km long journey to school in mountainous terrain on a donkey, turns mammoth and challenging when he decides to bring the chair to his village.
‘Los Silencios’, the Portuguese, Spanish movie directed by Beatriz Seigner got the special mention under ICFT-UNESCO Gandhi medal category.
Salim Khan, the celebrated actor, story-screenplay-dialogue writer of Hindi films was honoured with the IFFI 2018 Special Award for his Lifetime Contribution to Cinema. The prestigious award consisting of a cash prize of Rs 1 million (Rs 10 lakhs), Certificate, Shawl and a Scroll has been conferred upon the master filmmaker for his outstanding contribution to cinema.
Salim Khan revolutionized Indian cinema in the 1970s, transforming and reinventing the Bollywood formula, pioneering the Bollywood blockbuster format, and pioneering genres such as the masala film and the Dacoit Western.
Donbass wins the Golden Peacock at IFFI 2018

Donbass’ directed by Sergei Loznitsa has won the coveted Golden Peacock Award at the 49th International Film Festival of India (IFFI), which concluded in Goa on November 28, 2018. The Golden Peacock Award carries a cash prize of Rs 4 million (Rs 40 lakhs) to be shared equally between the Producer and the Director, Trophy and the citation.

Donbass tells the story of a hybrid war taking place in a region of Eastern Ukraine, involving an open armed conflict alongside killings and robberies perpetrated on a mass scale by separatist gangs. In Donbass, war is called peace and propaganda is uttered as truth. A journey through Donbass unfolds as a series of curious adventures. This is not just a tale of one region or a political system; it is about a world lost in post-truth and fake identities.

Donbass is the official submission of Ukraine for the 'Best Foreign Language Film' category at the 91st Academy Awards in 2019. It was selected as the opening film in the Un Certain Regard section at the 2018 Cannes Film Festival. At Cannes, Sergei Loznitsa won the ‘Un Certain Regard’ Award for Best Director.
Lijo Jose Pellissery conferred Best Director Award for Ee.Ma.Yau
Lijo Jose Pellissery won the Best Director Award for his 2018 film ‘Ee.Ma.Yau’. The film is a stunning satire on death and how it affects human lives. Set in Chellanam, a coastal village in Kerala, the film shows the plight of a son who tries to arrange a worthy funeral for his father; he is however met with unpredictable obstacles and reactions from different quarters. The Best Director gets the Silver Peacock Award and a cash prize of Rs 1.5 million (Rs 15 lakhs).
He also won the Best Director Award at the 48th Kerala State Film Awards for Ee.Ma.Yau.
Chemban Vinod is the Best Actor
The Best Actor (Male) Award has gone to Chemban Vinod for his portrayal in Ee.Ma.Yau of ‘Eeshi’, a son who tries to arrange a worthy funeral for his father but is met with unpredictable obstacles and reactions from different quarters.
Anastasiia Pustovit gets Best Actor (Female) Award
The Best Actor (Female) Award has gone to Anastasiia Pustovit  for her portrayal of a ‘Larysa’, a teenage girl in the Ukrainian film ‘When the Trees Fall’.
Both Best Actor (Male) and Best Actor (Female) are honoured with the Silver Peacock Trophy and a cash prize of Rs 1 million (Rs 10 lakhs) each.
Special Jury Award for Milko Lazarov’s Aga
Milko Lazarov walked away with the Special Jury Award for his film ‘Aga’; the film focuses on the story of Sedna and Nanook, an elderly couple from Yakutia, and the particular challenges they face in the midst of a frigid landscape. The Special Jury Award carries a cash prize of Rs 1.5 million (Rs 15 lakhs), a Silver Peacock Award and a citation.
Alberto Monteras II receives ‘Best Debut Feature Film of a Director’ for Respeto
Alberto Monteras II received the Centenary award for ‘Best Debut Feature Film of a Director’ for his Filipino Movie ‘Respeto’. 'Walking with the Wind', directed by Praveen Morchhale, won The ICFT –UNESCO Gandhi Medal instituted by the International Council for Film, Television and Audiovisual Communication, Paris and UNESCO. The criteria for the Gandhi Medal reflect UNESCO’s fundamental mandate of building peace in the mind of men and women, particularly human rights, intercultural dialogue, promotion and safeguard of diversity of cultural expressions.

’Walking with the Wind’ tells the story of a 10 year old boy in Himalayan Terrain, who mistakenly breaks his friend’s school chair. His daily seven km long journey to school in mountainous terrain on a donkey, turns mammoth and challenging when he decides to bring the chair to his village.

‘Los Silencios’, the Portuguese, Spanish movie directed by Beatriz Seigner got the special mention under ICFT-UNESCO Gandhi medal category.
Salim Khan, the celebrated actor, story-screenplay-dialogue writer of Hindi films was honoured with the IFFI 2018 Special Award for his Lifetime Contribution to Cinema. The prestigious award consisting of a cash prize of Rs 1 million (Rs 10 lakhs), Certificate, Shawl and a Scroll has been conferred upon the master filmmaker for his outstanding contribution to cinema.

Salim Khan revolutionized Indian cinema in the 1970s, transforming and reinventing the Bollywood formula, pioneering the Bollywood blockbuster format, and pioneering genres such as the masala film and the Dacoit Western.

सोमवार, 24 सितंबर 2018

।। मनमर्जियाँ ।।

तनमर्जियाँ न हुई, किसी हद तक मनमर्जियाँ, ठीक है.....



सिनेमा एक अलग धरातल पर निर्देशक देख रहे हैं पिछले कुछ दिनों से। कुछ आश्वस्त लेखकों, पटकथाकारों और संवाद लेखकों ने आज के समय, आज की पीढ़ी और समकालीन चुनौतियों के साथ सिनेमा को देखना और लिखना शुरू किया है। काबिल निर्देशक इस पर अपना काम बखूबी कर जाता है। मनमर्जियाँ लगभग ऐसे ही ऊर्जावान लोगों का एक आकृष्ट किया जाने वाला प्रयोग है जो सफल हुआ है। पहले तो यह फिल्म अनुराग कश्यप को इस बात की मान्यता देती है कि यदि वे आगे भी कोई रूमानी विषय हाथ में लेंगे तो उसे आन्तरिक धरातल पर गहरी पड़ताल के साथ ही परिणाम तक लायेंगे। इसके बाद कागज पर फिल्म रचने वाले लोग, स्वाभाविक रूप से लेखिका कनिका ढिल्लन, गीतकार शैली, गानों के साथ पार्श्व संगीत भी तैयार करने वाले संगीतकार अमित त्रिवेदी, सम्पादक आरती बजाज, सिनेमेटोग्राफर सिल्वेस्टर फॉन्सिका की भागीदारी को फिल्म में बखूबी देखा जा सकता है। 

प्रायः दर्शकों की निगाह में सिनेमा परदे पर दीख रहे चेहरों-चरित्रों का ही हुआ करता है। लेकिन दृश्य में जो दिख रहा होता है उसके पीछे बरसों जो लोग काम करते रहे, अन्ततः उनका काम इतना बोलने लगता है कि वे भी नेपथ्य से बाहर दीखने लगते हैं। इसीलिए आरम्भ में ही उनकी दक्षता का जिक्र कर दिया है। कहानी यह है कि विकी और रूमी दो युवक-युवती हैं, एक-दूसरे पर बेतरह मोहित हैं। प्यार करते हैं यह कहना इसलिए मुश्किल लगता है क्यों विकी छत फलांगकर जब भी रूमी से मिलने आता है तो दोनों अन्तरंगता की इच्छा पूर्ति में जी-जान से जुट जाते हैं। कई-कई बार विकी पकड़ा भी जाता है लेकिन बहुत ही मूर्खतापूर्ण हास्यप्रसंगों के साथ रूमी के परिवारजनों द्वारा जाने दिया जाता है। कहने का अर्थ यह कि सब कुछ आपत्तिहीन है। 

रूमी का रॉबी भाटिया के साथ ब्याह हो जाना एक बहुत ही निरर्थक किस्म की चुनौती-चैलेन्ज की परिणति लगती है। मध्यान्तर के पहले लगभग पैंतालीस मिनट से ज्यादा फिल्म को जमाने में लगा है तब तक दर्शक घर में बनी रहने वाली दुस्साहसी नायिका और डीजे में अपनी जिन्दगी का आदि-अन्त तलाशने वाला सड़कछाप नायक है और उसके दोस्त भी उसी तरह के, जिसका पिता एक दिन बचपन से ही उसकी मानसिकता के अस्थिर होने के कुछ प्रमाण सन्दूक से निकालता है। कहानी दरअसल मध्यान्तर के बाद अपनी राह पर आती है जब रॉबी और रूमी साथ होते हैं। रॉबी व्यक्तित्व के अनुरूप गम्भीर है और जमाने के चलन के अनुरूप पत्नी हो चुकी रूमी की रग-रग से दिनोदिन वाकिफ होता चलता है। रूमी को पूरी तरह समझ पाने में उसे वक्त नहीं लगता। पति कब अच्छा पहले लगता है और हॉट बाद में या कब हॉट पहले लगता है और अच्छा बाद में इसकी दिलचस्प फिलॉसफी है। तलाक हो जाना और कोर्ट से पैदल रूमी को उसके घर तक रॉबी का छोड़ने जाना, इस दस-पन्द्रह मिनट में फिल्म अपने अर्थ को ग्रहण करती है। 

मनमर्जियाँ अपने परिवेश, घने शहर, घनी बस्ती, छतों की एक-दूसरे से सम्बद्धता और उसके रोमांटिक प्रयोग की वजह से दर्शक को भी दृश्यों का नजदीक से साक्ष्य बनाती है। सँकरी गलियाँ, घर के भीतर घर, संयुक्त परिवार, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ ये सब वातावरण का हिस्सा हैं। पहले भाग में जब सम्बन्धों से रूमी और विकी को निर्देशक स्थापित करने में लगा है, पूरा किस्सा इतना अव्यवहारिक लगता है कि आँखों में पट्टी बांधे ऐसे परिवार शायद ही कहीं हो। यह सब हँसी में घटित होता जाता है और दर्शक भी इस ओछेपन पर खूब हँसता है। मध्यान्तर बाद की कसावट ही आरम्भ की खामियों को भुलाने का काम करती है। 

कलाकारों में यह फिल्म अभिषेक बच्चन को शायद पहली बार चरित्र के उस तरह के निर्वाह के लिए प्रशंसा के धरातल पर लाती है जो उन्होंने इस अन्तराल में अपने आपको परिपक्व करते हुए निभाया है। रॉबी भाटिया की भूमिका में वे अमिताभ बच्चन की छाया या प्रभाव से बहुत हद तक मुक्त होकर अपने को आजमाते हैं, यही उनकी विशेषता है। उनकी भूमिका जितनी खूबी के साथ अनुराग कश्यप ने लेखिका से विकसित करायी है, निर्वाह भी उसी तरह का है। तापसी पन्नू हाल ही कुछ फिल्मों से एक खिलन्दड़ स्वभाव की नायिका के रूप में पहचानी जा रही हैं, यह भूमिका उनको पहले नायक विकी कौशल की ही बौद्धिक धरातल का सिद्ध करती है। मनमर्जियाँ सम्बन्धों में अतिरेक और सामंजस्य में उदारता का सधा हुआ साम्य होने की कोशिश करती है और काफी हद तक सफल भी होती है। फिल्म के दो-तीन गाने बहुत स्पर्शी हैं, सच्ची मोहब्बत, चोंच लड़ियाँ, जैसी तेरी मरजी। 

इस फिल्‍म का एक दिलचस्‍प आकर्षण दो किशोरी हैं जो पूरी फिल्‍म में गानों के बीच, बाद में दृश्‍यों के बीच अपने नृत्‍य, एक जैसा पहनावा और उपस्थिति में खूब आ‍करती हैं। ऐसे ही दो युवक जो हनीमून पर गये रॉबी और रूमी को। दर्शक अन्‍त तक इनके तार जोड़ने की कोशिश करता है और हॉल के बाहर चला जाता है।
मनमर्जियाँ, देखी जा रही फिल्म है, देखी जाने वाली भी फिल्म है.....................

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

परिवार होने के अर्थ को प्रकट करने वाली एक संवेदनशील फिल्‍म

सूरमा




शाद अली की फिल्म सूरमा देखकर आया हूँ। ट्विटर में सुप्रतिष्ठित सिने विश्लेषक भावना सोमैया ने इस फिल्म को लेकर जो पहला विचार दिया था, वही मुझे थिएटर तक ले गया।

इधर पिछले दो-तीन सप्ताहों में अनेक फिल्में रिलीज हुई हैं, उनमें सूरमा एक फिल्म ऐसी है जिसे देखना चाहिए। जिन्होंने देखा होगा, बात से सहमत होंगे, अब चूँकि फिल्म हटने को है, इक्के-दुक्के शो कहीं लगे हुए हैं, फिर भी हॉल का दर्शकों से भरा होना इस बात का संकेत है कि अच्छा सिनेमा बहुत सारे आडम्बरों का मोहताज नहीं होता।

सूरमा एक हॉकी खिलाड़ी सन्दीप सिंह की जिन्दगी और जीवट की कहानी है। यह एक सच्ची घटना से प्रेरित है। यह निर्देशक की प्रतिभा है कि उन्होंने इसमें अनावश्यक मसाला नहीं लगाया है। एक सरल प्रवाह की तरह इस फिल्म को प्रस्तुत कर दिया गया है जिसके कारण ही यह आपके मन तक आ जाती है और खिड़की पकड़कर खड़ी हो जाती है। एक परिवार है जिसमें दो भाई हैं, बड़ा हॉकी सीख रहा है, छोटे का उससे कोई लेना-देना नहीं है सिवाय भाई के संग बने रहने और उसको कम्पनी देने या अपनी अलाली काटने के। हॉकी खिलाड़ी नायिका से एक बार का मिलना उसे हॉकी में ले आता है, अब बड़ा भाई इस रुझान से हटता है और खिलाड़ी बनाने में भाई की मदद करता है।

नायक का हॉकी खिलाड़ी बन जाना, प्रसिद्ध हो जाना दिलचस्प किस्से की तरह है। परिवार में बड़े भाई के आश्रित छोटा भाई और उसके ये दोनों बेटे, इन सबका प्रेमभरा रिश्ता और एकजुटता बहुत सहजता के साथ घटित होती है जिसमें नायक के पिता जिनकी भूमिका सतीश कौशिक ने निभायी है, अपनी भावाभिव्यक्ति और संवादों में कमाल करते हैं। लगता तो यह है कि सतीश कौशिक के पास उनकी कोई स्क्रिप्ट न होगी, गहरी बात कितने धीमे से वो दूसरे किरदार और दर्शक के मन तक भेजते हैं, चकित कर देता है। बेटे जीतकर आना और पिता अपनी नौकरी से इस्‍तीफा दे देना अौर बेटे के दुर्घटनाग्रस्‍त होने के बाद वापस उसी नौकरी पर जाना भावविव्‍हल कर देता है।


एक तरफ नायक के ताऊ का जज्बा कमाल का है। नायक को अचानक गोली लगना कोई षडयंत्र नहीं है, असावधानी भरी घटना है लेकिन रेल में उस दुर्घटना के दुर्योग कैसे काम करते हैं, नायक का सीट बदलना, पीछे कान्स्टेबल की गोली चल जाना और नायक के शरीर के नीचे के हिस्से का लकवाग्रस्त हो जाना सभी को बहुत वास्तविकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। नायिका का सम्मोहन कमाल का दिखाया गया है जो नायक के सामने आती है तो वह रोमांटिकली विचलित हो जाता है, गलत खेल बैठता है, ये प्रसंग दिलचस्प हैं। 

नायक की चिकित्सा के लिए परिवार का घर बेच देना, किराये के घर में रहना और बड़े इलाज की जद्दोजहद के दृश्य देखकर मानवीय जीवन के वो संघर्ष हमें विचलित करते हैं जो अपने आसपास की चमक-दमक में हमें आभासित ही नहीं हुआ करते। खुशी के पलों को जीने का जज्बा कमाल का दिखाया गया है एक-दो अवसरों पर वहीं नायक के दोबारा उठ खड़े होने को जरा भी ग्लैमराइज नहीं किया गया। उसका फिर से मैदान में आना और जीतना सुखान्त है।

निस्सन्देह दिलजीत दोसांझ अपनी सल्तनत के सुपर स्टार हैं, एक बार उनको उड़ता पंजाब में देखकर ही भूलना सम्भव न हुआ था, यह दूसरी फिल्म देखकर और उनकी क्षमताओं ने आश्वस्त किया है। नायिका की भूमिका में तापसी पन्नू को बहुत प्रीतिकर संवाद बोलने को मिले हैं जो वे अपनी सुन्दरता के साथ बोल भी जाती हैं। यह फिल्म वास्तव में चरित्र भूमिकाओं को जीने वाले, सहायक भूमिकाओं को जीने वाले कलाकारों की एक बड़ी रेंज को बखूबी पेश करती है जिसमें भाई बने अंगद बेदी, पिता बने सतीश कौशिक, माँ बनी सीमा कौशल, ताऊ बने महावीर भुल्लर, कोच बने विजय राज, चेयरमेन बने कुलभूषण खरबन्दा मन को छू जाते हैं वहीं कोच बने दानिश हुसैन आज के समय के नकारा और दुर्भावना रखने वाले कोच की कलई खोलते हैं। 


फिल्म का सम्पादन कुशल और दक्ष है जिसके लिए फारुख हुण्डेकर की सराहना की जानी चाहिए। शंकर एहसान लॉय का संगीत इस फिल्म को अनुभूतियों में सकारात्मक बनाये रखता है। सूरमा टाइटिल गीत मस्त और जोशीला है। सुयश त्रिवेदी और शिवा अनंत की पटकथा पर शाद का नियंत्रण आपसी सामंजस्य का सराहनीय परिचय है। कुल मिला सूरमा एक ऐसी फिल्म है जिस तरह की फिल्म का यदाकदा बनकर आते रहना, सिनेमा की सात्विकता के उस पक्ष को जान पाना है जो अब बेहद दुर्लभ हो चला है, उस नाते शाद अली सराहना और बधाई के पात्र हैं।