शुक्रवार, 1 जून 2018

मध्यप्रदेश में सिनेमा : यहाँ बनी फिल्‍मों से जुड़ा इतिहास और स्‍मृतियाँ



मध्यप्रदेश राज्य नैसर्गिक सम्पदा, ऐतिहासिक विरासत, अमर कथाओं और घटनाक्रमों की अविस्मरणीय और कालजयी थाती को समेटे ऐसे प्रदेश के रूप में अपनी पहचान रखता है जिसकी खूब देश-दुनिया को आकृष्ट करती है। कितने ही कलाकारों ने अपनी सर्जना में मध्यप्रदेश को समाहित किया है। चित्रकारों ने चित्र, शिल्पकारों ने शिल्प, संगीतकारों ने साधना और फिल्मकारों ने यहाँ की धरोहरों और स्थानों को अपने भव्य और महँगे कैमरों से देखा है और फिर यह सब नजारा देश और दुनिया के सामने आया है। यह सचमुच विशिष्ट है कि पिछले पचास से भी ज्यादा वर्षों में मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत अपनी मौलिक छायाछबियों में इस तरह प्रकाशमान हुई है कि दुनिया के अनेक देशों के पर्यटक, सैलानी, संस्कृतिप्रेमी यहाँ वर्ष भर आते-जाते रहते हैं। यह अनूठे सांस्कृतिक संयोग हैं कि मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, पर्यटन स्थलों पर संस्कृति के श्रेष्ठ उपक्रमों की पहचान न केवल जुड़ी हुई है बल्कि बरसों-बरस इतनी समृद्ध हो गयी है लोग ग्वालियर में तानसेन समाधि परिसर से तानसेन समारोह को, खजुराहो के कालजयी स्थापत्य और मन्दिरों को नृत्य समारोह से, मैहर को उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत समारोह से, पचमढ़ी को पचमढ़ी उत्सव से, माण्डू को माण्डू महोत्सव से, भोजपुर को भोजपुर महोत्सव से, साँची को महाबोधि उत्सव से, इन्दौर को अमीर खाँ समारोह से, उज्जैन को अखिल भारतीय कालिदास समारोह से, जबलपुर भेड़ाघाट को नर्मदा महोत्सव से, चित्रकूट को शरदोत्सव से पहचानते हैं, याद करते हैं और ऐसे अवसरों का साक्षी और प्रेक्षक बनने के लिए देश-दुनिया से मध्यप्रदेश आते हैं। 

अभी हाल ही में एक दिलचस्प संयोग देख रहा हूँ। नेशनल फिल्म अवार्डों की घोषणा हुई है। चन्देरी पर बनी श्रेष्ठ प्रमोशनल फिल्म को पुरस्कृत किया गया है जिसे गुणी फिल्मकार राजेन्द्र जांगले ने बनाया है। जांगले पाँचवीं बार अपनी किसी फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित हुए हैं। दिलचस्प यह है कि इसी बीच चन्देरी मुम्बई के बड़े निर्माण घरानों की निगाह में आया है। बैजू बावरा का इतिहास तो चन्देरी के नाम से अमर है ही, यहाँ की साड़ियाँ भारतीय परम्परा में उत्कृष्ट निर्माण और बुनावट के कारण देश-दुनिया में महिलाओं के लिए अनूठा पहनावा और चयन है। अभी पिछले चार माह में चन्देरी में दो फीचर फिल्मों का बड़ा हिस्सा शूट किया गया है। ये फिल्में हैं सुई धागा जो यशराज घराने की एक बड़ी फिल्म है। इसमें वरुण धवन और अनुष्का शर्मा काम कर रहे हैं। शरत कटारिया इसके निर्देशक हैं। दूसरी फिल्म है स्त्री जिसमें राजकुमार राव की अहम भूमिका है जिनको न्यूटन फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया है। स्त्री एक हाॅरर काॅमेडी जिसमें उनके साथ श्रद्धा कपूर काम कर रही हैं। अमर कौशिक इस फिल्म के निर्देशक हैं। इस तरह अचानक फिल्मकारों का चन्देरी को एकाग्र करना जितना दिलचस्प है उतना ही अहम भी। 

भोपाल, मध्यप्रदेश की राजधानी है। राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों में भी लम्बे समय में अनेक महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ। विशेष रूप से दो बड़ी फिल्मों का जिक्र जरूर किया जाना चाहिए जिनमें एक मर्चेण्ट आयवरी प्रोडक्शन्स की इन कस्टडी है जिसको उर्दू में मुहाफिज़ नाम दिया गया था। इस फिल्म में शशि कपूर, शाबाना आजमी, ओम पुरी, नीना गुप्ता आदि ने अहम भूमिकाएँ निभायीं थी। यह गुमनामी के शिकार एक शायर पर केन्द्रित थी। इस फिल्म का प्रदर्शन काल 1993 का है। भोपाल में एक महीने से भी ज्यादा समय तक इस फिल्म का बनना अपने आपमें शहर के लिए उपलब्धि था। पुराने भोपाल के अनेक स्थल गौहर महल, सैफिया काॅलेज, मोती मस्जिद, हाथी खाना आदि स्थानों पर इसका फिल्मांकन हुआ। हास्य अभिनेता जगदीप को एक बड़ी पहचान शोले फिल्म के सूरमा भोपाली किरदार से मिली थी। बाद में उन्होंने 1998 में इसी नाम से एक फिल्म बनायी तो उसके कई हिस्से और एक गाना फिल्माने वे भोपाल आये। इस फिल्म में जगदीप ने अनेक बड़े सितारों को मेहमान कलाकार के रूप में शामिल किया था। इसी प्रकार 2003 में अपनी फिल्म मकबूल बनाने विशाल भारद्वाज भोपाल आये जब रंगकर्मी और प्रसिद्ध आर्ट डायरेक्टर जयन्त देशमुख ने उनको इस फिल्म के मिजाज और व्यवहार के दृष्टिगत लोकेशन भोपाल सुझायी। इम्पीरियल सेब्रे होटल में लम्बे समय इस फिल्म की शूटिंग चली, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, इरफान, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा, तब्बू जैसे कलाकार यहाँ आये और रहे। 

भोपाल में ही गुलजार ने सुनील शेट्टी और तब्बू के साथ हू तू तू फिल्म बनायी। सुधीर मिश्रा ने हजारों ख्वाहिशें ऐसी फिल्म बनायी। विजयपत सिंघानिया ने वो तेरा नाम का एक बड़ा हिस्सा शूट किया। मणि रत्नम ने भी शूल और युवा फिल्मों को शहर में फिल्माया है। समानान्तर सिनेमा आन्दोलन के एक प्रमुख फिल्मकार प्रकाश झा जो दामुल, हिप हिप हुर्रे और मृत्युदण्ड से प्रतिष्ठित हुए, एक समय निर्णय करके भोपाल में 2009 में राजनीति के नाम से अपनी अगली फिल्म बनाने आये। नाना पाटेकर, नसीर, मनोज वाजपेयी, अजय देवगन, रणवीर कपूर, अर्जुन रामपाल, कैटरीना कैफ आदि अनेक बड़े सितारों के साथ उन्होंने यह खर्चीली फिल्म बनायी। इस फिल्म ने उनको जो लाभ दिया उसके बाद वे एक के बाद एक अनेक फिल्में यहाँ रहकर बनाते गये जिनमें आरक्षण, सत्याग्रह, चक्रव्यूह, जय गंगाजल आदि प्रमुख हंै। चक्रव्यूह के बड़े हिस्से के लिए झा ने पचमढ़ी लोकेशन भी चुनी थी। हालाँकि जिस क्रम और हड़बड़ी में वे बाद में काम करते गये, उनकी लगातार विफल होती फिल्मों ने फिलहाल कुछ समय के लिए उनको अवकाश लेने पर भी विवश कर दिया। 2012 के आसपास भोपाल के ही चर्चित फिल्म पटकथाकार और निर्देशक रूमी जाफरी ने अपने शहर में गली गली चोर है नाम की फिल्म का निर्माण किया। इसके बाद अनिल शर्मा एक फिल्म सिंह साहेब द ग्रेट बनाने 2013 में भोपाल आये। सनी देओल, प्रकाश राज इस फिल्म के अहम कलाकार थे। 

इधर एक ओर नासिर हुसैन जैसे एक बड़े निर्माता के नाम से भोपाल शहर की पहचान जुड़ती है, वहीं उनके वंश के होनहार फिल्मकार, अभिनेता आमिर खान ने भोपाल से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव में पीपली लाइव फिल्म का निर्माण किया। इस फिल्म को बड़ी चर्चा मिली थी। राजधानी का सिनेमा के हब के रूप में विकसित होना एक बड़ी बात रही है। राजधानी से आगे चलें तो पूरे मध्यप्रदेश में फिल्म निर्देशकों ने अनेक मनोरम स्थलों का चयन किया जो पर्यटन के लिहाज से भी उल्लेखनीय हैं। मणि रत्नम का दो फिल्में बनाने मध्यप्रदेश आने के बाद रावण बनाने ओरछा आना अहम है। समीर कर्णिक ने महेश्वर आकर यमला पगला दीवाना बनायी जिसमें धर्मेन्द्र, सनी देओल और बाॅबी देओल ने साथ काम किया। पचमढ़ी में प्रकाश झा ने चक्रव्यूह बाद में बनायी पहले प्रदीप कृष्ण नेशनल अवार्ड विनिंग फिल्म मैसी साहब बना चुके थे रघुवीर यादव और अरुंधति राय को लेकर। उन्होंने पचमढ़ी में ही एन इलेक्ट्रिक मून फिल्म भी बनायी। यहीं पर विख्यात अभिनेता, निर्देशक अमोल पालेकर ने थोड़ा सा रूमानी हो जायें फिल्म पूरी ही बनायी जो लगभग एक मर्मस्पर्शी कविता की तरह है। इसमें नाना पाटेकर, विक्रम गोखले, अनिता कँवर ने काम किया था। एन. चन्द्रा की फिल्म नरसिम्हा और सोहेल खान की फिल्म प्यार किया तो डरना क्या के सुपरहिट गाने हम से तुम दोस्ती कर लो और तुझे प्यार है मुझसे बोल दे भी इन्दौर में शूट किए गये। 

पुरानी स्मृतियों में समय-समय पर अनेक यादगार फिल्मों की शूटिंग होने और एक से बढ़कर एक सितारों के मध्यप्रदेश आगमन की बातें स्थायी उल्लेख में मिलती हैं। मध्यप्रदेश के साथ यह भी रहा है कि यहाँ से एक से बढ़कर एक कलाकार सिनेमा और मनोरंजन की दुनिया में समय-समय पर शीर्ष हस्ताक्षर हुए हैं। हम बड़े गौरव के साथ जाॅनी वाकर, सलीम खान, जावेद अख्तर, जया बच्चन, गोविन्द नामदेव, पण्डित रघुनाथ सेठ, किशोर कुमार, लता मंगेशकर आदि का नाम लेते हैं। एक समय में जाॅनी वाकर जो कि इन्दौर से मुम्बई गये थे, गुरुदत्त के निमंत्रण पर, वे अक्सर दिलीप कुमार, नौशाद आदि अपने मित्रों के साथ भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में पिकनिक मनाने आते थे। ऐसी ही एक भोपाल यात्रा में दिलीप कुमार ने शकीला बानो भोपाली कव्वाल का गाना सुना था और उनको मुम्बई फिल्मी दुनिया आने का निमंत्रण दिया था। दिलीप कुमार के साथ भी मध्यप्रदेश की स्मृतियाँ बहुत पुरानी जुड़ी हैं। 1952 में फिल्मकार मेहबूब खान की फिल्म आन के एक गाने का फिल्मांकन इन्दौर में हुआ था, जहाँ एक शानदार बग्गी में दिलीप कुमार और नादिरा के साथ एक गाना, दिल में बसा के प्यार का तूफान ले चले फिल्माया गया था। इसी प्रकार होशंगाबाद के निकट बुदनी में 1957 में नया दौर फिल्म का क्लायमेक्स फिल्माया गया था। साथी हाथ बढ़ाना गाने के साथ हुई तांगा दौड़ में दिलीप कुमार के साथ जीवन, वैजयन्ती माला और जाॅनी वाकर ने भी हिस्सा लिया था। यादगार फिल्म दिल दिया दर्द लिया 1966 में बनी थी। इसकी शूटिंग माण्डू और उसके निकट के अनेक हिस्सों में हुई थी। भारत भूषण और निरुपा राय की फिल्म रानी रूपमति माण्डू में फिल्मायी गयी। माण्डू में ही गुलजार ने किनारा फिल्म के खूबसूरत और मर्मस्पर्शी प्रसंगों का फिल्मांकन किया था वहीं रतलाम के सैलाना में निर्देशक राजकुमार कोहली ने धर्मेन्द्र और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच तलवारबाजी के दृश्य जीने नहीं दूँगा फिल्म के लिए शूट किए थे। 

हम हैं राही प्यार के, हम से कुछ न बोलिए......देव आनंद के इस गाने के फिल्मांकन के साथ ही इन्दौर-महू की याद हो आती है। इस गाने के पहले सवारी के लिए आवाज लगाते इन्दौर रेल्वे स्टेशन के पास देव आनंद, इन्दौर-महू साढ़े छः आना बोल रहे होते हैं। फिल्म नौ दो ग्यारह का यह दृश्य और देव आनंद का अन्दाज, जो भी प्यार से मिला, हम उसी के हो लिए कहाँ भुलाया जा सकता है! 

राजकपूर का मध्यप्रदेश से बड़ा लगाव रहा है। राजकपूर की ससुराल रीवा में थी। उनके ससुर करतारनाथ मल्होत्रा रीवा रियासत के डीआईजी थे। राजकपूर की बारात का रीवा आना और उस बारात में अशोक कुमार का आना, इसके साथ एक दिलचस्प घटना यह कि दुल्हन बनी कृष्णा को जब यह मालूम हुआ कि बारात में अशोक कुमार भी हैं तो उनको देखने के लिए ललक के साथ वे अपनी सहेलियों को लेकर घर की छत पर चली गयीं आती हुई बारात में अशोक कुमार को देखने। राजकपूर की अनेक फिल्मों के फिल्मांकन का साक्ष्य मध्यप्रदेश से जुड़ता है। राजकपूर की फिल्म आह जो 1953 का निर्माण है, आखिरी गाना जिसमें तांगा चलाते हुए पाश्र्व गायक मुकेश, तांगे में रोगी बनकर बैठे राजकपूर और छोटी सी ये जिन्दगानी रे चार दिन की जवानी तेरी, हाय रे.......इस गाने के पहले सतना का रेल्वे स्टेशन है और नायक तांगे में बैठकर रीवा जा रहा है। इसी प्रकार 1955 में श्री चार सौ बीस का, मेरा जूता है जापानी गाना जिसमें सड़क मध्यप्रदेश की है और रास्ता मुम्बई को जा रहा है। बासु भट्टाचार्य की फिल्म तीसरी कसम का नायक भी अपनी बैलगाड़ी के साथ मध्यप्रदेश की सड़कों पर दौड़ता है, राजकपूर को दर्शक देखते हैं बीना स्टेशन के पास छोटा स्टेशन कुरवाई जहाँ वो गाड़ीवान के रूप में सवारी के लिए प्रतीक्षारत हैं। यही नहीं 1960 की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है में भेड़ाघाट की चट्टानंे और नर्मदा नदी गंगा नदी का प्रतीक बनकर दिखायी देती हैं। ओ बसन्ती पवन पागल गाती हुई नायिका जिसकी भूमिका पद्मिनी ने निभायी है। जब दूर-दराज से सैलानी जबलपुर, भेड़ाघाट और नर्मदा नदी को धुँआधार वेग में देखने आते हैं तो जिस देश में गंगा बहती है को याद न करें, ऐसा हो ही नहीं सकता। 

1963 की फिल्म मुझे जीने दो के निर्देशक के रूप में नाम भले मोनी भट्टाचार्य का गया था लेकिन वह थी पूरी तरह सुनील दत्त के नियंत्रण की फिल्म जो कि इसके निर्माता भी थे। इसकी शूटिंग मुरैना और चम्बल के बीहड़ों में हुई थी जो दस्यु जीवन और उसकी विडम्बनाओं के साथ ही परिस्थितियों के शिकार, बेहतर जीवन की चाहत रखने वाले इन्सान की बेबसी को चित्रित करती है। यह एक सशक्त फिल्म थी जिसमें सुनील दत्त ने अपने जीवन की उत्कृष्ट भूमिका निभायी थी। वहीदा रहमान इस फिल्म की गरिमामयी नायिका जिन पर फिल्माये गीत, नदी नारे न जाओ श्याम पैंया पडूँ, रात भी है कुछ भीगी-भीगी में उनकी असाधारण नृत्य प्रतिभा, कथक का प्रभाव और लच्छू महाराज की कोरियोग्राफी भुलाया नहीं जा सकता। 

समृद्ध इतिहास से लेकर उपलब्धियों भरे वर्तमान के बीच भोपाल में 1985 में फिर आयी बरसात फिल्म की शूटिंग के समाचार अखबारों में खूब आया करते थे। यह भी कि नायक सुनील लहरी भोपाल के ही हैं। जयप्रकाश के विनायक इस फिल्म के निर्देशक थे जिसमें नायिका बनी थीं अनुराधा पटेल। बाद में सुनील लहरी रामानंद सागर के बहुचर्चित धारावाहिक रामायण के लक्ष्मण के रूप में खूब चर्चित हुए। शाहरुख खान की अशोका इस सदी की पहली बड़ी और चर्चित फिल्म थी जिसके निर्देशक संतोष सिवन ने जबलपुर, खजुराहो, पचमढ़ी आदि से कुछ स्थानों का चयन फिल्मांकन के लिए किया था। करीना कपूर इस फिल्म की ग्लैमरस नायिका थीं। ऐसे ही दो साल पहले आशुतोष गोवारीकर ने अपनी फिल्म मोहेन्जो दाड़ो की शूटिंग जबलपुर और आसपास की। मध्यप्रदेश के पर्यटन स्थलों में प्रसिद्ध ग्वालियर, ओरछा, खजुराहो, माण्डू, पचमढ़ी, महेश्वर आदि से फिल्मों के अनेकानेक सन्दर्भ जुड़े हैं। कहने का तात्पर्य यह कि भारत का यह हृदयप्रदेश और भारतीय सिनेमा का इतिहास और उसका वर्तमान मिलकर एक ऐसे उल्लेखनीय संयोग को समृद्ध करते हैं जिसका सरोकार हम सबके जीवन और जमीन की उपलब्धियों से जुड़ा हुआ है। अभी हाल ही में लगातार अक्षय कुमार की दो सुपरहिट फिल्में टाॅयलेट एक प्रेमकथा और पैडमेन मध्यप्रदेश में फिल्मांकित हुईं। टाॅयलेट एक प्रेमकथा, सिनेमा के गुणी सम्पादक निर्देशक श्रीनारायण सिंह की पहली निर्देशकीय सफलता थी वहीं पैडमेन, दक्षिण के पारखी फिल्मकार आर. बाल्कि ने बनायी थी। इसके लिए श्रीनारायण सिंह होशंगाबाद, नर्मदा तट, सेठानी घाट आदि जगहों पर होली का एक गाना शूट कर ले गये थे। आर. बाल्कि ने पैडमेन के निर्माण में महेश्वर के नर्मदा तट का खूबसूरत उपयोग किया, वहाँ अक्षय कुमार खूब सायकिल चलाते हुए दिखायी देते हैं। 

देखा जाये तो इस पूरी नयी सदी के ये लगभग दो दशक मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक निर्माण की दृष्टि से बहुमूल्य रहे हैं। जिस तरह से मध्यप्रदेश का विकास किया हुआ है। पथ मार्ग से यह राज्य पास-पड़ोस के सभी राज्यों से सुगमतापूर्वक जुड़ता चला गया है। यहाँ की यात्रा सुगम है, दिन-रात सड़क मार्ग पर लम्बी यात्रा निर्भय होकर की जा सकती है। मध्यप्रदेश के शहर जागते हुए हैं जहाँ लोगों की उपस्थिति से उनको पहचान मिली है। मध्यप्रदेश का आतिथ्य, मनोरम स्थल, आवभगत, सहयोग-सहायता और सांस्कृतिक सहभागिता और सरोकारों में प्रत्येक आने वाले के अनुभव उनकी यादगार रहे हैं। 

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सोमवार, 28 मई 2018

फिल्‍म चर्चा / बायस्‍कोपवाला

काबुलीवाला से अलग बायस्‍कोपवाला पर ही एकाग्र होने पर




बायस्कोपवाला ने ध्यान इसीलिए आकृष्ट किया कि उसमें डैनी को एक पूर्णाकारी भूमिका मिली है। डैनी किरदारों के चयन में सावधानी बरतते हैं और हर अनुबन्ध उनको स्वीकार हों, ऐसा नहीं होता। यह एक छोटी सी, सीमित बजट की फिल्म उन्होंने करनी चाही, इसके पीछे जरूर कुछ बात होगी, भावनात्मक भी शायद। तो पता लगा, वे बिमल राॅय की स्मरणीय फिल्म काबुलीवाला से प्रभावित रहे हैं और निर्देशक ने उनको यह भरोसा दिलाया कि यह कहानी उसने उसी से प्रभावित होकर अब के कोई बीस-तीस साल के कालखण्ड को सोचकर फिल्म बनाने के लिए चुनी है। 

सम्बन्धों में संवेदना का अपना स्थान होता है। बिना संवेदना के सम्बन्ध यांत्रिक हो जाते हैं। यहाँ एक बेटी अपने पिता का फोन व्यस्तता के किसी क्षण में नहीं सुन पाती और पिता का जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। पिता एक यात्रा पर था जो अधूरी रह जाती है और उस यात्रा में एक भावनात्मक संकल्प छिपा होता है। बेटी इस काम को हाथ में लेती है। अपने पिता के द्वारा पनाह पाये एक अफगान से वर्षों पूर्व भारत आ गये और यहाँ बायस्कोप दिखाकर बच्चों का मनोरंजन करने वाले वृद्ध से जुड़कर वो पहले उसके अतीत का पता लगाने निकलती है फिर उसकी बेटी का।

कहानी फिल्म की बहुत सीधी और तरल हो सकती थी लेकिन स्मरणों और अधूरी सूचनाओं की पुष्टि में अनेक बार पूर्वदीप्ति में जाना, कहानी से वर्तमान को जोड़ना और तारतम्यता देने में कहीं-कहीं चूक दिखती है। डैनी के किरदार के नजरिए से देखूँ तो इसमें डैनी के मौन, चुप्पी को बखूबी परदे पर प्रभाव पैदा करने में सफल हुआ है निर्देशक लेकिन एक अशान्त देश से निर्वासित जहाँ से वे छोटे-छोटे हिस्से सहेजे आ गये जो बायस्कोप के भीतर बच्चों की आँखों के सामने कौतुहल रचते हैं लेकिन छोटी उम्मीद से परदेस आ गया एक व्यक्ति फिर अपनी बेटी से मिल नहीं पाता। 

राॅबी बासु अपने आपमें पूरी तरह संवेदनशील व्यक्ति नहीं है तभी वह एक बार पुलिस को रहमत अली के अपने घर में होने की सूचना देकर पकड़वा भी देता है। प्रायश्चितों में पता चलता है कि वह किसी भी प्रकार का अपराधी नहीं है। अविश्वास और उससे उपजा गुनाह और गुनाह का प्रायश्चित अजीब सी तिर्यक रेखाएँ हैं जो किसी भी मनुष्य को अविश्वसनीय बनाती हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने परिवार को खो देता है, मुल्क को खो देता है वह जिस देश में पनाह लेता है वहाँ भी उसकी मुलाकात अपने ही उस गुम आदमी से नहीं हो पाती जो छाया की तरह उसके साथ भी है और उससे परे भी। डैनी अपने को ठीक-ठीक रेखांकित करते हैं इस जगह पर जो उनकी इतने बरसों के अनुभव की सिद्धी है। 

आदिल खान अपनी भूमिका से बहुत सारी जगहों को भरते हैं लेकिन मिनी के रूप में गीतांजलि थापा ने दूसरे क्रम पर प्रभावित करने की कोशिश की है। एकावली खन्ना को हाल में एक फिल्म में बड़ी अच्छी भूमिका में देखा है, यह श्यामला सुन्दर छबि अपने एक संवाद से प्रभावित करती है, मुझे जिन्दगी ने ऐसा दिया ही क्या है जिसके खो जाने का दुख करूँ। वैसे उनकी भूमिका छोटी सी है इसके बावजूद उनका संज्ञान लिया जाता है। भोला, बृजेन्द्र काला इधर निरन्तर अच्छी फिल्मों के अच्छे किरदार हैं, इस फिल्म में भी। फिल्म में आक्रान्त भीड़ के अंधेपन और उससे होने वाले हादसों को भी बखूबी चित्रित किया गया है, इसमें राफे मेहमूद की सिनेमेटोग्राफी का बहुत पास तक जाकर दिखाती है। दीपिका कालरा फिल्म को बहुत अच्छा सम्पादित करती हैं तभी नब्बे मिनट की यह फिल्म एक संवेदनशील अनुभव साबित होती है। 

निर्देशक देव मेढ़ेकर ने रवीन्द्रनाथ टैगोर, काबुलीवाला और उसकी मीठी यादों को बायस्कोप वाला से दर्शकों में ताजा करने, पुनरावलोकन कराने का प्रयत्न किया है पर पटकथा में बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं मिल पायी है उनको बेहतर कर पाने की। गुलजार के गीत को संदेश शाण्डिल्‍य ने कोमलता से निभाया है। बैकग्राउण्‍ड म्‍युजिक में भी वे विष्‍ाय की गम्‍भीरता के खूब समझे हैं। निर्माता सुनील दोशी के साथ मिलकर राधिका आनंद में इसमें मेहनत की है पर बड़ी दर्शक संख्या तक जाने के लिए और सर्जनात्मक परिश्रम आवश्यक था। 




शुक्रवार, 18 मई 2018

फिल्‍म चर्चा / अंग्रेजी में कहते हैं..

एक मध्‍यमवर्गीय जीवन, घर और उसमें रहने वालों से मिलते हुए

 


ऐसे समय में जब हमारे सिनेमा में निरी भव्यता, झूठे और भ्रमित कर देने वाले सपने, अविश्वसनीयता, संवेदनहीनता और भटकाव भलीभांति घर कर गया हो। ऐसे समय में जब सिनेमा महंगे माॅल और उसके लगभग बहलाने वाले आकर्षण में हमको लगभग दो-ढाई घण्टे चपेट लिया करता हो, हमारी जेब को ठिकाने लगाने में निर्मम हो, कोई फिल्मकार मध्यमवर्गीय परिवार और घर की कहानी लेकर उसको उसी वास्तविकता और ईमानदारी से बनाकर प्रस्तुत करने का जतन करेगा तो क्या होगा, बताइये! शायद आप कहने लगें यदि सिनेमा और उसके बाजार के इन्द्रजाल को थोड़ा-बहुत भी जानते हों, कहने लगें कि या तो उसे थिएटर नहीं मिलेगा और यदि मिल भी गया तो दर्शक नहीं मिलेगा................।

अंग्रेजी में कहते हैं, फिल्म बनाने वाले लेखक निर्देशक हरीश व्यास को क्यों यह ख्याल आया यह तो वे ही जाने लेकिन अपने ही शहर में दूरियों और समय की जटिल शर्तों के बीच गिने-चुने शो में प्रदर्शित इस फिल्म को देखने के लिए मैं आठ-दस दिन से प्रतीक्षित था सो चला गया। 

परदे पर इस फिल्म का आरम्भ अपने आपमें ऐसा सम्मोहन है कि पहले दृश्य से ही आप इसके साथ हो लेते हैं। परदे पर गंगा, चलती हुई नाव, नामावली और महुआ चक्रवर्ती के कण्‍ठ से झरता स्‍वर, अब मान जाओ सांवरिया से ही आप फिल्‍म के पक्ष में हो लेते हैं। फिल्म की कहानी एक क्लर्क यशवंत बत्रा की है जो एक आॅफिस में क्लर्क है और छोटे से घर में अपनी पत्नी किरण और बेटी प्रीति के साथ रहता है। प्रीति बहुत मुखर और समझदार है। बत्रा अधेड़ उम्र के मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया की तरह जीवन जी रहा है जिसके जीवन में जीवन का ही आकलन धरातल से नीचे है। पत्नी और बेटी के साथ उसका व्यवहार भी वैसा। बनारस शहर का परिवेश है। बेटी मुहल्ले के युवक से प्रेम करने लगी है, पिता को पता नहीं है और एक दिन वह तब जान पाता है जब वह घर में बिना बताये मन्दिर में शादी कर लेती है।

इधर पिता जिस घर में रह रहा है उसी को बेचकर बेटी की शादी करने के स्वप्न देखता है। वह पत्नी से बात-बेबात झगड़ता भी है और दिन भर की कुण्ठा को दूर करने के लिए रात को शराब भी पीता है। उसका जीवन इतना ही है। पत्नी किरण ने तय कर लिया था कि बेटी की शादी होने के बाद वो भी घर से अपनी मां के घर चली जायेगी। बेटी की शादी हो जाती है और पत्नी भी चली जाती है। बत्रा, उसे रोक नहीं पाता, साथ रहती है तो उसका होकर रह नहीं पाता, उसके प्रति अपना प्रेम नहीं जता पाता। जिस तरह के स्वभाव को वह जीता है, अघा गये आसपास के लोग उसका साथ छोड़ देना चाहते हैं।

अकेले घर में रह रहे बत्रा के जीवन में बेटी और दामाद एक सुखद बदलाव बनकर आते हैं जिसमें दोनों उसकी बेबसी, अपने आपमें गुम रहने की उसकी कुण्ठा से बाहर लाने का प्रयत्न करते हैं। वे उसके कपड़ों को ही नहीं बदलवाते, झेंप, झिझक और बरसों का अकथ जो उसके भीतर राख हो गया है, उसको जिलाने का काम करते हैं। यही बत्रा अब किरण को पटा-फुसलाकर, प्यार का वास्ता देकर ले आना चाहता है...........

फिल्म में एक आप्त वाक्य दिलचस्प है, हर हिट फिल्म के लिए शाहरुख खान का हीरो होना जरूरी नहीं है, यह हीरोशिप हर आदमी के भीतर होती है। रोचक ढंग से इस फिल्म को अन्त तक लाया गया है। उत्तरार्ध में फिरोज के रूप में एक चरित्र भी बत्रा के जीवन में बदलाव लाता है जिसकी पत्नी मृत्यु शैया पर है लेकिन उसको भरोसा है कि एक दिन वह उसे अपने साथ घर ले जायेगा, दोनों में प्रेम विवाह हुआ है।

बत्रा के रूप में संजय मिश्रा उसी तरह किरदार बन जाते हैं जैसे वे अपनी हर फिल्म में होते हैं। फिर उनको परिवेश भी वैसा ही मिला है, बनारस, गंगा, घाट के आसपास पूरी फिल्म किस तरह से अपने आपको तमाम बहकाव से बचाती हुई उपसंहार तक पहुंचती है, देखने योग्य है। संजय की हंसी, उनका रोना, उनकी लम्बी चुप्पी और बोल सब कुछ ऐसे लगते हैं जैसे हम से ही यह सब बुलावाया जा रहा हो। किरण के रूप में इकावली खन्ना ने लगभग उसी प्रत्युत्तर में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। अपने सांवले रंग में वे बड़ी उम्र एक स्त्री के संघर्ष और टूटते मन की वाणी बनकर सामने आती हैं। बेटी की भूमिका में शिवानी रघुवंशी की उपस्थिति को बहुत सकारात्मक और आश्वस्त कहा जाना चाहिए। फिल्‍म में अंशुमान झा की भूमिका बत्रा की बेटी प्रीति के प्रेमी और पति की है, यह युवा भी बड़े आश्‍वस्‍त होकर दृश्‍य में आता है, खासकर संजय मिश्रा के साथ उनके संवाद दिलचस्‍प हैं।

पंकज त्रिपाठी इस फिल्म में अपनी एक मर्मस्पर्शी लघु कथा की तरह अपनी कहानी के साथ दृश्य में आते हैं और उसी संजीदगी के साथ अपने चरित्र को साकार करते हैं जिसकी जरूरत कहानी को होती है। पंकज त्रिपाठी की नायिका की भूमिका में इप्शिता त्रिपाठी ने एक लम्‍बे दृश्‍य में जो ध्‍यान आकृट किया है उसका जिक्र भी जरूरी है। अलग जाति में प्रेमविवाह, पिता की नाराजगी और बाद में अचानक एक जानलेवा बीमारी का शिकार हो जाना, एक ही दृ‍श्‍य जो इस चरित्र की मृत्‍यु से पूर्ण होता है, मन को छू जाता है। पंकज अन्तिम दृश्‍य में असहनीय बिछोह के हीरो बनकर दिखायी देते हैं। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कहीं भी कृत्रिमता, नकलीपन या भ्रमित करने वाला तरीका प्रयोग में नहीं लाया गया है। गरीब बत्रा का पुराना और बरसों से रंग-रोगन को तरसता मकान, शादी के दृश्यों में सात-आठ लोगों भर की उपस्थिति, कोई आडम्बर या विलासिता थोपी नहीं गयी है। निर्देशक ने सचमुच मध्यवर्गीय जीवन को जिस तरह छूते हुए इस बड़े वर्ग की चिन्ताओं और परिस्थितियों को सामने रखा है वह सराहनीय है। 

निर्देशक और पटकथाकार हरीश व्यास की इस बात के लिए भी प्रशंसा की जाना चाहिए कि उन्होंने सिनेमेटोग्राफी से लेकर कला निर्देशन, गीत और संगीत में खूब समरसता निभायी है, कहीं भी समझौता नहीं किया। फिल्म देखते हुए जब हम कहानी का हिस्सा होकर कोई न कोई किरदार में अपने आपको ढूंढ़ने लगते हैं तो ऐसा लगता है जैसे यह हमारे साथ ही घटित हो रहा है। फिल्म का प्रमुख चरित्र बत्रा का गंगा से रिश्ता भी खूब व्यक्त किया गया है, वह अपनी तकलीफ, अपने अव्यक्त, अपने द्वंद्व और अपने अवसाद में किस तरह गंगा के किनारे जा खड़ा होता है, कभी मंदिर के बाहर बैठा है कभी चबूतरे पर, कभी नाव में। 

गंगा नदी के सान्निध्य में जैसे हमारे सारे के सारे आवरण छूट जाते हैं, सारे के सारे पाखण्ड पकड़े जाते हैं, सारी की सारी भूलें हमारे अन्तद्र्वन्द्व में तिर कर उपर आ जाती हैं, ऐसा लगता है कि अपनी विराटता में बहती गंगा एक ऐसा वृहद आत्मावलोकी दर्पण है जिसके सामने कुछ भी छिपा नहीं है। फारुख मिस्त्री की सिनेमेटोग्राफी इन मायनों में कमाल की है। यह ऐसी फिल्म है जिसके गानों को भी कई दिन सुनने की इच्छा बनेगी, गीतों में बनारस घराने की पारम्परिक गायिकी के साथ दूसरे गीतों को शान, मोहित चौहान, वैशाली महादे, अभिजीत घोषाल, महुआ चक्रवर्ती, सत्येन्द्र त्रिपाठी शिराओं में उतर जाने वाली अनुभूति कराने के साथ गाया है। 

अंग्रेजी में कहते हैं के बारे में कहना यही होगा कि अपने जमीर, अपने भीतर के धूमिल होते सच और सीमाओं में छटपटाते सपनों के साथ कुछ देर अपने में होने की इच्छा यदि आपकी बनती है तो यह फिल्म निश्चित ही आपके लिए है। ऐसी फिल्मों को दर्शक समर्थन बड़ी प्रासंगिकता है।  


गुरुवार, 17 मई 2018

फिल्‍म चर्चा : राजी

प्रतिबद्धता और सम्‍बन्‍धों की संवेदना पर महिला फिल्‍मकार की दृष्टि  


राजी देखने के पीछे एक कारण तो यही था कि फिल्म की चर्चा है और दर्शक भी। एक कारण यह था कि गुलजार साहब के गीत बड़े दिन बाद सुनने को मिलेंगे। तीसरा कारण यह भी था कि फिलहाल और तलवार के बाद मेघना गुलजार की इस माध्यम में एक निर्देशक की तरह पकड़ कैसी है, किस तरह भिन्न है या पिता का कितना-कैसा प्रभाव है!

सभी कारणों का कुछ-कुछ समाधान मिलता है। फिल्म देखते हुए न जाने क्यों गुलजार साहब की माचिस का स्मरण हो आता है। बहरहाल राजी की खूबियों पर केन्द्रित करें तो बात आलिया भट्ट से ही शुरू करनी होगी। इस दौर की यह बहुत प्रतिभाशाली लड़की है। अपनी कद-काठी से बहुत छोटी लगती है उम्र में लेकिन उतनी ही परिपक्वता के साथ दृश्य में होती है, उतने ही आत्मविश्वास के साथ अपना चरित्र कहती है जो वह परदे पर निबाह रही होती है।

यह एक कालखण्ड विशेष की फिल्म है जो हरिन्दर सिक्का के उपन्यास काॅलिंग सहमत का फिल्म रूपान्तर है। इसमें मेघना के साथ भवानी अय्यर ने संवादों और पटकथा पर काफी ध्यान दिया है और परिश्रम किया है। मूल में देशभक्ति है, अपने-अपने देश के प्रति लेकिन दोनों ही देशों के प्रतिनिधि दो मित्र किस तरह एक-दूसरे के देश के पक्ष में नहीं है, इस यथार्थ के परिवेश में फिल्म शुरू होती है। दुश्मन देश की तैयारियों, उसकी नीयत और उसके दिखावे के बीच सच की पड़ताल का काम सोचे-समझे ढंग से, बहुत कुछ जोखिम उठाकर, बहुत कुछ दांव पर लगाकर देशप्रेम के सबसे बड़े जज्बे की रक्षा में विफलता सबसे बड़ा जोखिम है जिसमें अकेले पड़ जाने से लेकर जान गंवाने तक की स्थितियां हैं वहीं सफलता हासिल होने पर किए गये बलिदान और बाहरी-भीतरी पराजय के साथ, अपने जमीर के साथ किसी भी तर्क में बिना पड़े हार जाना भी एक पक्ष है सबसे बड़ा। राजी और उसकी नायिका इसी जद्दोजहद का शिकार होती है।

राजी फिल्म का दर्शकों तक ठीक तरह से पहुंचना या दर्शकों का सिनेमाघर चलकर आना, उसकी खूबियों के कारण है जिनमें से कुछेक बड़ी महत्वपूर्ण हैं। खास बात तो यही है कि बनाने से पहले पटकथा और संवाद के स्तर पर उसकी बेहतरीन तैयारी नजर आती है। दूसरी बात दृश्यों की है जो आपको बांधते हैं, हालांकि खुफिया ढंग से अपने उद्देश्य को अंजाम देने का कार्य उसी तरह का है जैसे 1970-71 में तथाकथित जासूसी फिल्में बना करती थीं लेकिन कैसे एक किरदार अपनी उपस्थिति से उस कार्य को चतुराईपूर्वक अंजाम देता है, यह दिलचस्प ढंग से व्यक्त किया गया है। आलिया अपनी पिछली फिल्मों के तजुर्बों और परिश्रम से अच्छी पारंगत होकर इस फिल्म का चरित्र बनती हैं। सम्बन्धों में बंध जाने के बाद निष्ठा और लक्ष्य दोनों में कितने समझौते हैं, यह देखकर अचम्भा होता है। आलिया सब जगह परिपक्वता का परिचय देती हैं।

फिल्म के सहयोगी कलाकारों में बड़े दिनों बाद परदे पर नजर आये जयदीप अहलावत की भूमिका पूरे आकार की है और वे खुफिया अधिकारी के रूप में प्रभावित भी करते हैं। दो अच्छे कलाकारों आरिफ जकारिया और रजित कपूर की भूमिका बहुत छोटी है। इसके विपरीत पाकिस्तानी सेना के अधिकारी के रूप में शिशिर शर्मा ने अपने आपको प्रभावी ढंग से स्थापित किया। राजी की मां की भूमिका सोनी राजदान को मिली है, वे थकी थकी सी लगती हैं और प्रभावहीन भी। कुछेक दृश्य बड़े महत्वपूर्ण हैं जैसे भारत और पाकिस्तान की सीमा में एक गाड़ी से उतरकर दूसरी गाड़ी में बैठना और चेहरे पर अलग-अलग देशों में उपस्थिति के मनोविज्ञान को चेहरे पर लाना, आलिया भट्ट के आरम्भ में मुस्कराने का दृश्य जिसमें उनके गाल खींचे जाते हैं और वे अपनी मुस्कान को वहीं स्थिर कर लेती हैं। इसके अलावा गुप्त रूप से सारी कार्रवाई को अंजाम देने वाले दृश्य जो परिस्थिति के अनुरूप भय पैदा करते हैं। शादी की रात राजी के पति का अलग सोने का फैसला और उसके पीछे के तर्क, नायिका की भारतीय शास्त्रीय संगीत की पसन्दगी पर पति का उस तरह के रेकाॅर्ड्स लाकर भेंट करना, राजी की असलियत सामने आने पर पति का अन्तरंगता और निजता को लेकर संवेदनशील प्रश्न बहुत अहम हैं।

मेघना गुलजार ने पिता गुलजार की रचनाओं, गीतों का बहुत अच्छा प्रयोग किया है। शंकर एहसान लाॅय का संगीत वास्तव में इन रचनाओं के साथ गरिमापूर्ण सावधानी बरतता है और गरिमा के साथ बांधता है। जय आय पटेल की सिनेमेटोग्राफी फिल्म में नयनाभिराम दृश्यों और संवेदनशील दृश्यों को बखूबी बांधने का काम करती है। दूर के भूदृश्य, जाती हुई बस आदि देखना बहुत प्रभावी है। लम्बे समय बाद कंवलजीत सिंह को एक छोटी सी भूमिका करते देखना सुखद यो कि दीदार हुआ और तकलीफदेह इसलिए कि वे इन दिनों फिल्मों से दूर हैं। संजय सूरी भी एक निर्विकार उपस्थिति में जाया हुए हैं। 

संजीदा देखने वालों को इस बात का अचरज जरूर हुआ कि समुद्र में खड़े पानी के जहाज पर आर्मी के जवान और उनको सम्बोधित करता अधिकारी आर्मी से हैं जबकि सिचुएशन में वहां नेवी की उपस्थिति होनी चाहिए। हमारे निर्देशक और उनके सलाहकार ऐसी बारीकी से प्रायः वंचित रह जाते हैं जबकि अधिकतम काम सराहनीय है। 

मेघना, हमारे सिनेमा में अपने पिता की दक्षता और रचनात्मकता की एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित फिल्मकार हैं और उनका काम भी रेखांकित किए जाने योग्य है, अतएव राजी देखना चाहिए, मुझे लगता है।

हां, भोपाल के वरिष्ठ रंगकर्मी कलाकार मित्र बालेन्द्र सिंह ने आलिया के ड्रायवर की भूमिका की है और एक दृश्य में मनोज रावत पान वाले के किरदार में दीखते हैं। दोनों को शुभकामनाओं के साथ देखकर अच्छा तो लगा ही.........

शनिवार, 12 मई 2018

फिल्म चर्चा/ एक सौ दो नाॅट आउट

मृत्यु भी परियों सी होनी चाहिए


एक सौ दो नाॅट आउट, उमेश शुक्ला निर्देशित फिल्म है जिन्होंने अक्षय कुमार के साथ एक व्यंग्यप्रधान सफल फिल्म ओह माय गाॅड बनायी थी। एक सौ दो नाॅट आउट, सौम्या जोशी के लिखे सफल गुजराती नाटक का फिल्मांकन है। उमेश ने दो बड़े सितारों अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के साथ यह प्रयोग किया है जो काफी हद तक मौलिक और देर से पकड़ में आने के बावजूद उत्तरार्ध में प्रशंसनीय हो जाता है। हालाँकि समग्रता में फिल्म को देखा जाये तो इसके अच्छे लगने में प्रमुख रूप से फिल्म के संवाद, अनेक मर्मस्पर्शी दृश्यबन्ध, लक्ष्मण उतेकर का विवरणों तक पहुँच करने वाला छायांकन, बुधादित्य बैनर्जी का सम्पादन अपना योगदान रखते हैं।

अब तक कहानी खूब आम हो चुकी है, पिता एक सौ दो साल के हैं, ठीक-ठाक, पूरी चेतना और उस पूरी स्थूलता से परे जो हम साठ बरस की उम्र में अपने आसपास देखते हैं। बेटा साठोत्तरी है, जैसे अमिताभ बच्चन का व्यक्तित्व है, वे और जैसा ऋषि कपूर का व्यक्तित्व है, वे फिल्म में भी वैसी ही स्फूर्तता और स्थूलता को जीते हुए दिखायी देते हैं। कहानी इतनी सी है कि वयोवृद्ध पिता को बूढ़े होते अपने बैठे का हताश और रुग्ण होना नहीं सुहाता है, वह खासकर अपने पोते से अपने बेटे के रिश्ते और उसमें जमे स्वार्थ का जवाब देना चाहता है। पोता विदेश में रहता है, स्वार्थी, लोभी और मोहरहित है लेकिन वयोवृद्ध पिता अपने बूढ़े बेटे को बहुत चाहता है। पिता-पुत्र के दो स्तरों पर द्वन्द्व हैं लेकिन अमिताभ बच्चन अपने पूरे किरदार को अपनी दक्षताओं से ऋषि कपूर पर इस तरह अधिरोपित कर दिया है कि एक तरह से यह उनकी फिल्म बन गयी है। ऋषि कपूर का व्यक्तित्व और लिखा गया चरित्र दोनों बच्चन साहब से कमतर पड़ते हैं लेकिन फिल्म के अन्त में जिस तरह से हम एयरपोर्ट पर उनका बेटे के साथ संवाद देखते हैं, एक तरह से वे एक बड़ी रेंज लेकर इसमें प्रस्तुत होते हैं।

औलादों का अपने अविभावकों के साथ सलूक, इस पर समय-समय पर अनेक फिल्में बनी हैं। अवतार से लेकर बागबान तक। एक सौ दो नाॅट आउट तक आते-आते बेटे विदेशी नागरिकता लेकर वहाँ नौकरी या व्यावसाय करने लगे हैं। वे जड़ों में सिमट और संकीर्ण हो गये हैं लेकिन भ्रम की अमर बेल उनको एक अलग फंतासी में लिए जा रही है। सम्पत्ति छुड़ाकर सम्बन्धों को समाप्त कर लेने का यह निर्मम दस्तूर भयानक है, जिसकी ओर निर्देशक का इशारा है।

एक सौ दो नाॅट आउट लगभग पौने दो घण्टे की फिल्म है लेकिन मध्यान्तर तक यह फिल्म बिना सशक्त पटकथा के ही चलती है जो बिखरी-बिखरी लगती है। ऐसा लगता है कि स्वयं फिल्म के दो चरित्र, कलाकार इस बात से वाकिफ हैं लेकिन अपनी क्षमताओं के साथ वे मोर्चा मध्यान्तर के बाद ही सम्हालते हैं। आखिरी आखिरी में फिल्म जज्बाती होती है, तब हमारे सामने अचूक कैमरावर्क कुछ खूबियों के साथ हमें फिल्म से जोड़ता है, जैसे बेटे के कमरे में पिता का जाना, बरनी से कंचों का जमीन पर गिरना, गुल्लक हो हिलाकर उसमें भरे सिक्कों की ध्वनि से जुड़ना, बाहर बरसते पानी के दृश्य, कांच से बाहर बहता पानी और भीतर वयोवृद्ध पिता का अपने बेटे को, अल्जाइमर की शिकार होकर तिल तिल करती अपनी बहू की वेदना का याद दिलाना, कमाल का है, सब का सब मन पी जाता है वैसे ही जैसे दरवाजे में लगे कांच पर पानी।

यह सधे हुए, अनुभवी और अनेक बार अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने वाले कलाकारों की फिल्म है। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर अमर अकबर अंथनी, नसीब, अजूबा आदि फिल्मों में साथ आ चुके हैं। लगभग सत्ताइस साल बाद दोबारा दोनों ने साथ कैमरे का सामना किया। शीर्षक से लेकर चरित्र तक अमिताभ बच्चन ने अपना जोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मृत्यु के बारे में उनका कथ्य कि मौत भी परियों की तरह आनी चाहिए, संध्याकाल के मानस की एक बहुत संवेदनशील आकांक्षा होती है। ऋषि अपने चरित्र के हिसाब से बेहतर काम करते हैं, पिता के द्वारा ट्यूमर बताये जाने पर चेहरे पर आयी प्रतिक्रिया बहुत गहरी है। फिल्म का अन्तिम दृश्य यादगार है जहाँ वे धीरू का चरित्र निबाह रहे जिमित त्रिवेदी के साथ समुद्र के पास बैठे टेप रेकाॅर्डर में पिता की आवाज सुनते हुए आकाश में देखते हैं और बादल के एक बड़े से टुकड़े पर सजल नयनों से एकाग्र होते हैं। हाँ, अपनी भूमिका जिमित ने भी बखूबी निभायी है। मध्यान्तरपूर्व दस-पन्द्रह मिनट का सम्पादन मांगती यह फिल्म लोगों को फिर भी स्टार कास्ट, निर्देशक की साख और प्रचार-प्रसार से आकृष्ट कर रही है, यह भी कम बड़ी बात नहीं है।

शुक्रवार, 4 मई 2018

सिनेमा पर सर्वोत्‍तम लेखन के लिए विशेष उल्‍लेख के साथ नेशनल अवार्ड


3 मई को नई दिल्‍ली के विज्ञान भवन में 65वें नेशनल फिल्‍म अवार्ड का समारोह आयोजित हुआ. इस समारोह में सिनेमा पर सर्वोत्‍तम लेखन के लिए विशेष उल्‍लेख के साथ मुझे सम्‍मानित किया गया. यह सम्‍मान केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती स्‍मृति जेड ईरानी द्वारा प्रदान किया गया, साथ में विभाग के राज्‍यमंत्री श्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौड़ भी उपस्थित थे...



रविवार, 29 अप्रैल 2018

तीन दशक बाद नेशनल अवार्ड जीतने वाली दूसरी असमिया फिल्म

विलेज रॉकस्‍टार्स 


इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाली असमिया फिल्म विलेज राॅकस्टार्स एक बहुत प्रेरणीय और मर्मस्पर्शी फिल्म है। आमतौर पर सिनेमा का मतलब मुम्बइया सिनेमा या बाॅलीवुड निकालने वाले दर्शकों तक ऐसी अच्छी फिल्में पहुँचाने के जरूर सार्थक उपक्रम होने चाहिए। हालाँकि दूरदर्शन, नेशनल अवार्ड प्राप्त फिल्मों का प्रसारण बाद में करता है लेकिन उसका भी बेहतर प्रचार-प्रसार हो तो निश्चित रूप से दर्शकों तक अच्छे सिनेमा की पहुँच और भी सुदृढ़ हो सकती है। 

रीमा दास हमारे समय की इस मायने में एक उल्लेखनीय फिल्मकार हैं जिन्होंने इस फिल्म को बनाते हुए निर्माण, निर्देशन, कहानी, सम्पादन और सिने-छायांकन का भी दायित्व निर्वहन करते हुए बड़ी ही सादगी के साथ एक विलक्षण फिल्म अच्छे सिनेमा के चाहने वालों को सौंप दी है। विलेज राॅकस्टार को टोरण्टो इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म के रूप में चुना जा चुका है वहीं कान फिल्म समारोह में इस फिल्म को खासी चर्चा मिली है, इसके अलावा पिछले साल के अन्त में गोवा में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में इस फिल्म को दर्शकों ने बहुत पसन्द किया और इस टिप्पणीकार को भी उसी समय यह अनूठी तथा मन को छू जाने वाली फिल्म देखने का अवसर प्राप्त हुआ। 

युवा उम्र से सिनेमा का लोकप्रिय चेहरा बनने की ख्वाहिश लिए मुम्बई आयीं रीमा दास ने तब यह नहीं सोचा था कि समय आगे चलकर उनको कैमरे के पीछे ले जायेगा और फिर दृश्य वही बनेंगे जो वे गढ़ेंगी। उनको शुरू से ही मुम्बइया सिनेमा देखने का शौक रहा है। लगभग ग्यारह साल पहले वे मुम्बई आ गयीं। लघु फिल्म के निर्माण से उन्होंने अपनी शुरूआत की लेकिन व्यापकता में सिनेमा को देखने के चाव ने उनको दुनिया की अच्छी फिल्मों के नजदीक लाने का काम किया। 2009 में बनायी उनकी फिल्म प्रथा को बड़ी सराहना मिली। जब 2016 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म अन्तर्दृष्टि बनायी तब उनको अच्छे काम और उसके प्रतिसाद दोनों का अवसर प्राप्त हुआ। यह एक ऐसे पिता की कहानी है जिनको रिटायर होने पर उनका बेटा एक दूरबीन भेंट करता है। दूसरी फिल्म विलेज राॅकस्टार्स पहली से एक कदम आगे इस दृष्टि से निकल गयी कि इसमें सुदूर गाँव, पिछड़े और अशान्त राज्य में कहीं बचपन और किशोर उम्र के बच्चों के स्वप्न को पास जाकर, टटोलकर, उसे संवेदनशीलता के साथ छूकर देखने की कोशिश की गयी है। 


रीमा दास जब विलेज राॅकस्टार पर काम कर रही थीं तब बस्ती और छोटे गाँवों को उसकी समूची शाब्दिकता में समझने का प्रयत्न भी कर रही थीं। उन्होंने अपने काम से पहले अनेक फिल्में देखीं और यह महसूस किया कि वे उस छोटे से संसार की बिल्कुल अलग सी कल्पना कर रही हैं जहाँ संघर्ष का पथ बहुत कोमल, बहुत मुश्किलों भरा, बहुत सात्विक और बहुत ही अधिक सीधी राह पर चलने वाला है। विलेज राॅकस्टार्स के कलाकार स्कूली बच्चे थे जिनके लिए पढ़ाई अपनी प्राथमिकता थी। रीमा ने उसके साथ-साथ बच्चों की घरेलू जवाबदारियों के समय को भी छोड़ दिया। इतनी उदारता के बाद नैसर्गिक प्रकाश अभिव्यंजना में उन्होंने विलेज राॅकस्टार्स की शूटिंग की और अपने सन्तोष की फिल्म बनायी। सर्जनात्मक सन्तुष्टि उनको अपने काम के साथ निरन्तर ही मिलती गयी। 

गुवाहाटी के पास रीमा दास का अपना जिया, देखाभाला स्थान छायागाँव जहाँ यह पूरी फिल्म बनायी गयी है, बड़ी ही विनम्र सी प्रतीत होने वाली सादगी के साथ अपनी बात कहती है। यह एक जुझारू लड़की धुनू की कहानी है जिसे अपने साथियों के बीच एक बैण्ड स्थापित करने की ललक है। वो और उसके साथ राॅकस्टार्स बनना चाहते हैं। टीवी और दूसरे साधनों से दूर देश की खबरें गाँव तक आती हैं और धुनू अपने लक्ष्य को पक्का करती चली जाती है। अपनी ही तरह के गरीब बच्चों की संगत में उसका यह स्वप्न शनैः शनैः आकार ले रहा है लेकिन इसमें भी बड़ी बाधाएँ हैं। धुनू की माँ अनेक कठिनाइयों में अपना, उसका और अपने बेटे का पेट भर पा रही है। जिन्दगी के साथ लड़ रही धुनू की माँ को समय ने बहुत मजबूत बना दिया है। धुनू गिटार बजाना सीख रही है, वह अपनी टीम को भी सिखा रही है। कैसे उसके स्वप्न को परिवेश और लोग बाधित करते हैं, कैसे शिक्षा से वंचित सुदूर अंचल में वातावरण और लोगों के मानसिक अभिप्राय इस स्वप्न को पूरा करने में बाधक होते हैं, यह इस फिल्म में बहुत ही सच्चाई के साथ दिखाया गया है। वा़द्यों का टूटना और मन का टूटना या खण्डित होकर रह जाना दौड़ते उत्साह का भरभराकर गिर जाना है। परदे पर ऐसी विडम्बना देखते हुए मन व्यथित होता है। धुनू की भूमिका निबाह रही भनिता दास के चेहरे पर भावों का संचय, आवेग की अभिव्यक्ति और हतोत्साहित किए जाने के बाद भी भाव भंगिमाओं और चेष्टाओं में संयत बने रहना बल्कि अपने लक्ष्यों के लिए और दृढ़ होने का विद्रोह बखूबी आया है। 

रीमा ने विपरीत और विरोधाभासी परिस्थितियों को दृश्यों में जिस तरह बांधा है, देखकर आँखें नम हो जाती हैं। ऐसे हर दृश्य प्रशंसा के लायक हैं जिनमें चरित्रों को टूटने से बचाते हुए भीतर छिपा मनोबल, जिद और आप हठ दिखायी देता है। धुनू की माँ की भूमिका बसंती दास ने निभायी है जो भाई की भूमिका में मानबेन्द्र दास अपनी उम्र और रौ में दीखता है। मल्लिका दास ने बेस्ट लोकेशन साउण्ड रिकाॅर्डिस्ट के रूप में एक-एक सूक्ष्म ध्वन्यात्मक बारीकियों को जिस तरह फिल्म का हिस्सा बनाया है, अनुभव करने लायक है। बसंती दास, मल्लिका दास के साथ ही निर्देशन के अतिरिक्त सम्पादन में भी फिल्म को अवार्ड हासिल हुआ है जो गौर करने लायक है। उल्लेखनीय तो यह भी है कि लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर असमिया फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला है। इसके पहले 1989 मेंजाहनू बरुआ की फिल्म हालोधिया चैराये बाओधान खाई को नेशनल अवार्ड हासिल हुआ था। 
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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

संवेदनशील होना या संवेदनशील होने की बात भर करना.....

।। बियाॅण्ड द क्लाउड्स।।

 


अनोखे और चर्चित माजिद मजीदी विश्व सिनेमा के धरातल पर एक श्रेष्ठ फिल्मकार हैं, यह बात पढ़े-लिखे जाने-जानने से करीब पन्द्रह-बीस साल पहले उनकी दो फिल्में द कलर आॅफ पैराडाइस और चिल्ड्रन आॅफ हैवन देखकर मन में बैठी है। अपने लिए यह विशेष उल्लेख है कि संवेदना की बड़ी सच्ची परख रखने वाला दुनिया का एक फिल्मकार पे भारत में आकर एक फिल्म बनायी है। जब आप दो उत्कृष्ट फिल्मों के सकारात्मक प्रभावों से भरे हो तो एक प्रकार आश्वस्ति तो आपको हो ही जाती है कि कोई निरर्थक काम देखने नहीं जा रहे हो, दूसरे एक जिज्ञासा बनती है कि एक देश का फिल्मकार, दूसरे देश की नब्ज को किस तरह पकड़ पाता है या उसकी कोशिश भी करता है। इस जिज्ञासा के साथ निर्णय यही कर पाता हूँ फिल्म देखकर कि दृष्टि और परख की भी अपनी एक भूमध्य रेखा होती है, उसका तटस्थ या निष्पक्ष होना, एक जैसी संवेदना की तलाश करना एक आदर्श और सार्थक सोच है।

कहानी थोड़े में बता देता हूँ। मादक पदार्थों को छोटे-छोटे छिपे और गुप्त स्थानों पर पुलिस से लेकर आवारा, गुण्डों आदि के जोखिम से बचते हुए पहुँचाने का काम नायक करता है। उसकी एक बहन है जिससे वो दूर रहता है, कारण कि उसका पति उसे बहुत पीटता था और बेहिसाब शराब पीता था। बाद में बहन ने भी इसी कारण से उसे छोड़ दिया और छोटा-मोटा काम करके जीवन व्यतीत कर रही है। भाई, बहन के जीवन में एक दिन फिर दाखिल होता है जब पुलिस उसे और उसके साथी को दौड़ा रही है। भागते-भागते मादक पदार्थ का पैकेट वो बहन को देकर छुप जाता है। इधर उसी धोबी बस्ती, जहाँ उसकी बहन काम करती है, एक अधेड़ अक्शी उसकी इज्जत लूटना चाहता है तो बहन उसके सिर पर भारी पत्थर मारकर बच पाती है। अधेड़ कोमा में चला गया है और बहन को पुलिस जेल ले गयी। कहानी आगे यही है कि भाई, बहन को जेल से निकालना चाहता है और उसको अस्पताल में भरती उसी आदमी को बचाने के लिए दवा आदि का प्रबन्ध करना पड़ रहा है। 

घटनाक्रम आगे इस तरह बढ़ता है कि बहन, जेल में एक और कैदी स्त्री के बच्चे से हिलमिल जाती है जिसकी आगे चलकर मृत्यु हो जाती है और इधर अक्शी की माँ और दो बेटियाँ दक्षिण के गाँव से उसे मिलने चली आती हैं। दो धरातल पर कहानी आगे बढ़ती है, नायक आमिर उस आदमी के बोलने लगने और बयान देने के लिए सारे जतन कर रहा है और साथ में एक बूढ़ी और दो बच्चियों को भी घर ले आता है। 

आगे चलकर अक्शी का मर जाना, बूढ़ी माँ और दोनों बच्चियों का आमिर पर आश्रित हो जाना, आमिर की बहन तारा का जेल का ही होकर रह जाना और मर चुकी कैदी के बच्चे को साथ रखना, एक जगह पर आकर दर्शकों को सोचने के लिए कुछ प्रश्नों के साथ फिल्म खत्म होती है। बीच-बीच में आमिर का पहले निष्ठुर होना, फिर तीनों को पनाह देना, उनके खाने से लेकर जीने का भी प्रबन्ध करना, हताशा में एक क्षण उनको भला-बुरा कहना, बूढ़ी माँ का अपनी ही समभाषी की मदद से अपने अपराधी बेटे की ओर से सारे दोष कुबूल करने वाली चिट्ठी बनवाना आदि प्रसंग हैं। निर्देशक मादक पदार्थों की सप्लाई से घटनाओं के साथ देह व्यापार के अड्डे पर भी दर्शकों को ले जा रहा है जहाँ आमिर के लिए औरतों का एजेण्ट मुसीबतें खड़ी करता है। आमिर के साथी का उसको धोखा देना फिर जमीर जागना मर्मस्पर्शी है। 


निर्देशक पूरी निष्ठा और साफगोई से एक ऐसी दुनिया के यथार्थ से दर्शकों को परिचित कराता है जिसकी होशो-हवास में हमें कल्पना भी न होती होगी। यही कारण है कि निर्देशक, पात्र, कैमरा सब उन स्थानों से होकर निकल आते हैं लेकिन संवेदनशील दर्शक जैसे वहीं भटक कर कहें या खो कर कहें, रह जाता है। किसी भी मनुष्य के भीतर वे क्या प्रवृत्तियाँ होती हैं जो उसकी नीयत बिगाड़ती हैं, क्या वो सकारात्मकता होती है जिसमें वह सम्हल सकता है, अपराधी की बेटी को दलाल के हाथ बेच देने की गरज से निकला आमिर आखिर उसे लौटाकर घर ले आता है। 

माजिद मजीदी एक-एक विवरण पर जाते हैं, आरम्भ में कुछ सेकेण्ड एक मोबाइल सिम कम्पनी के बड़े होर्डिंग पर स्थिर रहकर जब कैमरा नीचे आता है तब हम उस असलयित से रूबरू होना शुरू होते हैं जो पुल, पुलिया के नीचे जिन्दगियों में व्यतीत हो रही होती है। इस फिल्म में कोई भी चीज गढ़ी गयी नहीं है, कुछ भी नकली या फिनिश्ड सा नहीं लगता बल्कि सब कुछ जस का तस। गरीबी, गरीबी के घर, धोबी घाट, अन्दर की संकीर्ण गलियाँ और धोये जाते कपड़ों के एक-दूसरे के ऊपर बर्दाश्त करने वाले छींटे, देह व्यापार की जगह पर बिकने आयी छोटी उम्र की लड़कियों के साथ बोलचाल एक निर्मम सच को आपके सामने रखते हैं। हर पल डरी, सहमी और लगभग मर-मर जाती जिन्दगियों के बीच हँसी-ठिठोली, रुसवायी, मान-मनौव्वल, अच्छा-बुरा सब का सब जस का तस। वैसे ही जेल जिसमें महिला कैदियों की व्यथा, दुर्दशा लगभग अन्ततः उनका क्या हो जाना है, यह जताने के लिए काफी हैं। वहाँ महिला कैदियों के निरीह मासूम बच्चे जो गन्दगी और बदबूदार गड्ढों से निकलकर आते-जाते चूहों को ही दोस्त बनाये हुए हैं। उस छोटे से बच्चे का तारा से पूछना दर्शक के लिए शायद सहन करना आसान न हो कि माँ कहाँ चली गयी तब तारा उससे कहती है कि तेरी माँ आकाश में चांद के घर में रहने लगी है और अब वो बहुत मस्त हो गयी है, खांसती भी नहीं। इस पर बच्चा कहता है कि मुझे चांद को देखना है, माँ का घर। तारा और उस बच्चे का घनघोर बारिश में आकाश की ओर ताकते रहना और इधर आमिर के साथ अक्शी की दोनों मासूम बच्चियों और पत्थर हो गयी माँ की जवाबदारी......फिल्म यहीं खत्म होती है।

एक बात प्रमुखता से उल्लेख कर देना जरूरी लगता है और वह यह कि माजिद मजीदी के इस सर्जनात्मक उपक्रम को भारत के दो प्रमुख निर्देशकों विशाल भाऱ़द्वाज और गौतम घोष ने एक बड़ा समर्थन दिया है। विशाल ने जहाँ इस फिल्म के पूरे हिन्दी संवाद लिखे वहीं गौतम घोष अक्शी की भूमिका में चरित्र और वृत्ति को एकाकार करते हैं। विशाल भाऱद्वाज को सब जानते हैं और गौतम घोष बंगला सिनेमा के शीर्षस्थ निर्देशक हैं। तीसरा बड़ा सहयोग उनको सिनेमेटोग्राफर अनिल मेहता का मिलता है जिन्होंने एक-एक जगह को उसके पूरे अस्तित्व के साथ अपने कैमरे से हमारे लिए देख लिया है। यहाँ कमजोर पड़ते हैं तो केवल ए.आर. रहमान जो संगीत के साथ उस वातावरण का हिस्सा नहीं बन पाते। कलाकारों में आमिर की भूमिका में ईशान खट्टर ने जिस आश्वस्ति के साथ एक-एक शाॅट में अपने होने को साबित किया है, कमाल ही है। 

लोकल ट्रेन के दृश्य, मोटर सायकिल पर आते-जाते अपने हाथ खोल कर खिल जाने और अपना ही अतिरेक करने वाले दृश्य अनूठे हैं। कीचड़ में लड़ाई वाला, देह व्यापार के दलाल से निर्भीक होकर बात करने वाला, धोखा देने वाले एक दुकानदार के हाथ में चाकू गाड़ देने वाला दृश्य, बहन से लड़ने, जिरह करने और अन्त में उसको छुड़ाने की फिक्र करने वाले प्रसंगों में कमाल कर गये हैं वे। इसी तरह तारा की भूमिका में मालविका मोहनन की भूमिका भी मन को छू जाती है। भाई के साथ झगड़ते हुए जब वो अपनी जिन्दगी के बारे में बतलाती है, जेल जाते हुए आमिर का सायकल से पीछा करना और बस के भीतर और बाहर से दोनों का एक-दूसरे को पुकारना विचलित कर देता है। जेल के अन्दर की जिन्दगी तारा की बड़ी परीक्षा है जिसमें माँ को खो देने वाले छोटे बच्चे से उसका जुड़ना अहम है। इधर अक्शी के परिवार में बूढ़ी माँ और दो बच्चियाँ आमिर के पीछे-पीछे घर क्या चली आती हैं, दर्शक को लगता है, वे उसके भीतर चली आयी हैं।

भारत में ऐसे सिनेमा का बनना बड़ा साहसिक है। साहसिक इसलिए है क्योंकि ऐसे सिनेमा को संवेदनशील दर्शक की तलाश या चाहत या अपेक्षा रहती है लेकिन हमारा दर्शक सिनेमा के नाम पर एक अलग तरह की मानसिक विलासिता में खोया रहता है। उस सुरंग में ही वह आनंदित है, बाहर आना या लाना दोनों ही दुरूह है। 

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

एक संवेदनशील फिल्‍म जो अन्‍त में भटक गयी.....

फिल्‍म समीक्षा / अक्टूबर


इस फिल्म के नाम को लेकर प्रदर्शन पूर्व तक अचरज बना रहना स्वाभाविक ही था। दर्शक इसके आगमन की झलकियों से खीज भी सकता था यदि इसमें शूजित सरकार, जूही चतुर्वेदी जैसे सर्जनात्मक नाम न जुड़े होते। यही कारण रहा शायद कि अप्रैल में भी अक्टूबर का दर्शकों ने स्वागत किया। अपनी तरह से यह फिल्म निरर्थक नहीं है, अच्छी बनी है लेकिन देखते हुए दर्शक और समीक्षक भी यदि बहुत ज्यादा भावुक हो रहे हैं तो थोड़ा सजग होकर देखना जरूरी लगता है।

अक्टूबर उन युवाओं में शुरू होती है जो जिन्दगी बनाने, शुरू करने के स्वप्न देख रहे हैं। गनीमत है कि शुरू-शुरू में किसी को भी प्रेम नहीं हुआ है। एक बड़े सितारा होटल का प्रत्यक्ष और नेपथ्य, उसकी हलचल, पूर्वरंग और परोक्ष परिस्थितियाँ हमारे सामने सुरुचिपूर्ण ढंग से घटित होती हैं, खासकर तब जब हमारे अपने अनुभव ऐसे वातावरण में परोक्ष के तो कम से कम न के बराबर हैं।

ऐसे ही माहौल में तीन-चार तरह के स्वभाव, बहुलता वैसी ही जैसी आमतौर पर दिखती है, जिम्मेदारी और खासी चिन्ता के साथ अपने प्रोबेशन को पूरा करने, अच्छी और स्थायी नौकरी तथा अवसर पाने और विरोधाभासों को सहन करने वाले मित्रों के बीच नायक है जिसकी भूमिका शुरू से तय है। नायिका के चौथी मंजिल से गिर जाने के बाद उसकी अस्थिरता संवेदनशीलता में तब्दील हो जाती है। पटकथा में इस बात की उदारता बरती गयी है कि नायक अनेक भूलों, व्यवहार और स्वभाव के बावजूद क्षम्य है, मित्रों में भी प्रिय।

कोमा में चली गयी नायिका की चिकित्सा, चिकित्सालय, चिकित्सक, गहन चिकित्सा इकाइयों का वातावरण, परिस्थितियों से जूझती नर्सें, नायिका की हालत से विचलित परिवार, चिकित्सा खर्च इन सबके साथ-साथ एक रूमानिकता भी घटित होती हुई चलती है जिसमें अक्टूबर माह का मौसम, खास दिल्ली की ठण्ड, सुबह, शाम और रात के दृश्य, कोहरा, मैट्रो, सोता-जागता शहर आदि शामिल हैं। दार्शनिकता में हरसिंगार के फूल, उनकी महक, एक रात का जीवन जैसी क्षणभंगुरता की फिलाॅसफी आपको पूरी तरह बांध लेती है।

दर्शक जितना नायिका की हालत से द्रवित है उतना ही नायक के समर्पण पर वारा गया है। कोमा से लौटती, सकारात्मक संकेत देती और जीवन के प्रति एक आशान्वित भरोसा दिलाती नायिका के प्रति नायक का लगाव, उसके ठीक होने में स्वयं के भी योगदान का निजी आत्मविश्वास यह सब अक्टूबर को एक बेहतर उपसंहार तक ले जाने के बेहतर संकेते हैं लेकिन लेखिका जूही चतुर्वेदी, नायिका की मृत्यु को दिखाकर अन्त को जटिल बनाती हैं और अपने समर्थक दर्शकों को भी असहमत करती हैं। भीगी आँखों के साथ दर्शक सिनेमाघर से इस अन्त को अमान्य करता हुआ निकलता है। यह एक पथ से भटके हुए अन्त का चयन करने वाली लेखिका की फिल्म है।

हालाँकि इसमें वरुण धवन ने अपने अब तक के समय की श्रेष्ठ भूमिका का निर्वहन किया है। ऐसे चरित्र बहुत मेहनत की अपेक्षा करते हैं, वरुण दृश्यों, अपनी उदासी, मन के नायिका की संवेदना और स्थितियों के साथ लगभग एकाकार हो चुके अभिव्यक्त भाव में बहुत आगे जाते हैं। नायिका बनिता संधू ने नियंत्रण रहित लगभग एक देह की तरह उस पार्थिवता को दृश्यों में जिया है जो ऐसी भयानक दुर्घटना की परिणति को साक्ष्य के रूप में हमारे सामने लाती है। माँ का किरदार निबाह रहीं गीतांजलि राव अपनी विवशता को बखूबी जीती हैं। निर्देशक ने फिल्म बनाते हुए पात्रों से अच्छा काम लिया है।

लगभग सत्तर प्रतिशत फिल्म अवसादपूर्ण परिस्थितियों के दृश्यबन्ध हैं, शेष में होटल संस्कृति का ग्लैमर हमारे सामने है जो निर्माता की राहत के लिए होगा, बहरहाल व्यवहारसंगत अन्त न होते हुए भी भावुक दर्शकों के लिए यह फिल्म आकृष्ट करने वाली है। कई बार ऐसे अन्त इसलिए भी गढ़े जाते हैं जिस पर आप असहमत होते हुए भी बात करो लेकिन इसी कारण फिल्म का वो आखिरी दृश्य अपनी संवेदना खो बैठता है जिसमें नायक हरसिंगार का पेड़ लेकर जा रहा है......
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गुणी कलाकार और भ्रमित निर्देशक

।। ब्लैकमेल ।।



अभिनेता इरफान खान की फिल्मों को लेकर दर्शकीय उत्सुकता दूसरे सितारों से बेहद अलग है। सलाम बाॅम्बे से लेकर पान सिंह तोमर के नेशनल अवार्ड प्राप्त करने तक और उसके बाद की भी अनेक फिल्मों से उन्होंने अपने को एक आश्वस्त और आत्मविश्वास से भरे अभिनेता के रूप में साबित किया है। यह नयी फिल्म ब्लैकमेल ऐसे समय में आयी है जब वे अपने स्वास्थ्य के एक बड़े संकट से जूझ रहे हैं। सिनेमाघर में दर्शक इस अतिरिक्त सहानुभूति के साथ भी आ रहा है।

अभिनय देव निर्देशित यह फिल्म दो तरह के विभाजनों में अपनी आवाजाही करते हुए न तो एक गम्भीर फिल्म की तरह आकृष्ट कर पाती है और दृश्यों और संवादों में हास्य के तत्व-पुट शामिल कर देने से कहानी अपनी गम्भीरता खो बैठती है। ब्लैकमेल सम्बन्धों के संसार से एक अलग तरह की कहानी उठाती है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका अलग-अलग शादी हो जाने के बाद तत्काल ही एक-दूसरे के सम्पर्क में आकर विवाहित जैसा जीवन जीने लगते हैं। अमीर स्त्री के साथ विवाह के बाद की जिन्दगी, इधर एक लगभग असहाय किस्म का नौकरीपेशा व्यक्ति, अपनी-अपनी तरह से समय से जूझ रहे हैं। किसी के भी प्रयत्न परिस्थितियों से निजात पाने के नहीं हैं बल्कि उसे एक अलग ढंग से एन्जाॅय कर रहे हैं। 

इस फिल्‍म की खूबियों के रूप में अच्‍छा कैमरा वर्क खासकर वे शॉट जो इरफान के द्वन्‍द्व को दर्शाते हैं, छत पर ऊँचाई में बैठकर उनका सोचना, उत्‍तरार्ध में ऑफिस में साथ काम कर रही लड़की की उसके घर में दुर्घटना मृत्‍यु होना, उस आफत से बचने के लिए मुहल्‍ले और सड़कों पर भागना दिलचस्‍प हैं। इरफान का बॉस बने ओमी वैद्य का अपने प्रोडक्‍ट टॉयलेट पेपर की मार्केटिंग करने के लिए किए जाने वाले उपक्रम मनाेरंजक हैं बल्कि इतने ज्‍यादा मनोरंजक कि सिनेमाघर का दर्शक बाद के दृश्‍यों में भी अकारण हँसता है।

इरफान, कीर्ति, दिव्या, अरुणोदय, अनुजा अपने चरित्रों के साथ हैं लेकिन इस पूरी फिल्म को अपने होने से अर्थ देने का काम ओमी वैद्य ज्यादा अच्छे ढंग से कर जाते हैं। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य और संगीतकार अमित त्रिवेदी इस फिल्म के लिए लगभग मिस मैच गीत-संगीत रचना करते हैं। अरुणोदय सिंह माॅडल पर्सनैलिटी हैं, अच्छे लगते हैं। उनको एक शातिर किस्म का चरित्र दिया है, हालाँकि कई बार वह अस्वाभाविक ढंग से काॅमिक भी लगता है। यह जरूर है कि यह कलाकार अच्छी नकारात्मक भूमिकाओं के लिए बड़ी सम्भावनाशील आमद है।
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सोमवार, 26 मार्च 2018

भारतीय रंगमंच की परम्परा, थाती और वर्तमान

27 मार्च: विश्व रंगमंच दिवस



विश्व रंगमंच दिवस की शुरूआत का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। 1961 में फ्रांस में इसकी पहल की गयी। दुनिया के अनेक देश रंगमंच के माध्यम से अपनी सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली के माध्यम से अपने समकाल की विशिष्ट घटनाओं को प्रस्तुत करते हैं। भारत इस मायने में अग्रणी है कि उसने इस दिवस को मनाये जाने के सदियों पहले से रंगमंच की परम्परा को स्थापित किया। पुराणों में सभ्यता के सबसे पहले नाटक के मंचित होने की कथाएँ मिलती हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम हमारे देश में रंगमंच के देवता के रूप में स्मरण किया जाता है। उनका लिखा नाटक अंधेर नगरी आज भी न केवल किसी वरिष्ठ रंगकर्मी के लिए मंचन और प्रयोग का दिलचस्प विषय होता है बल्कि किसी नवागत का पट्टी पूजन की रंगमंच के क्षेत्र में इस नाटक से कराया जाता है। 

हमारे देश में नाटक की बात करते हुए एक व्यापक दृष्टि और रखने के लिए बड़े हिसाब-किताब की आवश्यकता पड़ेगी। सच बात यही है कि लम्बे समय में हमको यदि चार बातें करने के लिए वाक्य, मुहावरे और सलीके-शऊर आ गये हैं तो उसके पीछे बहुत कर्मठ और प्रतिबद्ध रंगकर्मियों के योगदानों का स्मरण किया जाना आवश्यक है। हमारे यहाँ मुश्किल यही है कि अपने-अपने समय और सक्रियता के साथ रंगमंच के कितने ही विद्वतजन सक्रिय रहे और लम्बी अवधि, कई बार अकस्मात समय से पहले स्मृति शेष हो गये लेकिन हमारे पास उनके किए गये कार्य का, उनकी उपलब्धियों का, उनकी परम्परा का, उनकी धरोहर का न तो कोई साक्ष्य उपलब्ध है और न ही कोई रख-रखाव। 

भारतीय रंगमंच के पितृपुरुष कावलम नारायण पणिक्कर जब नहीं रहे थे तब वरिष्ठ रंगकर्मी एम. के. रैना ने यह बात उठायी थी कि सरकारें बाजारू और फिल्मी कलाकारों के नाच-गाने पर लाखों करोड़ों खर्च कर देती हैं जबकि उससे बहुत कम खर्च करके पणिक्कर जैसे मूर्धन्यों की थाती को संरक्षित किया जा सकता है। यह बात मुझसे कभी बिसरायी नहीं जाती, सच भी है। बड़े-बड़े गुप्तदान होंगे, करोड़ों-अरबों के लेकिन इस परम्परा को बचाने में कोई धनपति आगे नहीं आता। अपनी-अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के महत्व और उसके प्रति पूज्यभाव को रखते हुए कलाकारों ने संघर्ष से उपलब्धियों तक की लम्बी यात्रा की है। देश के अनेक राज्यों में अनेक विसंगतियों, मुश्किलों, अशान्तियों के बावजूद रंगकर्म हो रहा है, यह कम महत्वपूर्ण नहीं है। पृथ्वीराज कपूर, इब्राहिम अल्काजी, विजय तेन्दुलकर, भास्कर चन्दावरकर, सत्यदेव दुबे, शम्भु मित्र, पी.एल. देशपाण्डे, हबीब तनवीर, विजया मेहता, बादल सरकार, ब.व. कारन्त, श्यामानंद जालान, जोहरा सहगल, के.वी. सुब्बन्ना, गुरुशरण सिंह, चन्द्रशेखर कम्बार, डाॅ. श्रीराम लागू, नीलू फुले, अरविन्द देशपाण्डे, सुलभा देशपाण्डे, भालचन्द्र पेंढारकर, नेमिचन्द जैन, गिरीश कर्नाड,  ऊषा गांगुली, नीलम मानसिंह चैधरी, रतन थियम, कन्हाई लाल, तापस सेन, रेखा जैन, कीर्ति जैन जैसे कितने ही नाम होंगे जिनका स्मरण कर हम रंगमंच के देशकाल और उसके यथार्थ से रूबरू होते हैं।  

सक्रिय नाटककारों की एक बड़ी ऊर्जावान पीढ़ी वर्तमान में हमारे बीच काम कर रही है। इस समय युवा और प्रौढ़ उम्र के रंगकर्मियों में समय सापेक्ष नवप्रयोगों और अधुनातन स्थितियों को देखने की अलग दृष्टि विकसित हो रही है। उनके रंगकर्म में वही ताप, वही ऊष्मा दिखायी देती है। हमारे बीच अभी वह पीढ़ी भी सौभाग्य से है जिनके नये काम के प्रति जिज्ञासापरक निगाह हमारी हुआ करती है, नयी पीढ़ी को ऐसे नाट्यकारों की दृष्टि और व्याकरण को देखना और सीखना चाहिए। मोहन महर्षि, महेश एलकुंचवार, नादिरा जहीर बब्बर, गोविन्द नामदेव, राजिन्दर नाथ, रुद्रप्रसाद सेनगुप्त, बंसी कौल, संजय उपाध्याय, मानव कौल, कुमुद मिश्रा आदि ऐसे कितने ही नाम होंगे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व से रंगमंच के व्याकरण को भलीभाँति समझा जा सकता है। 

आधुनिक शास्त्रीय रंगमंच के साथ ही आंचलिक रंगमंच का समृद्ध होना, उसका निरन्तर संघर्ष में बने रहना हमारे देश में कलाओं की बड़ी जिजीविषा का प्रमाण है। कथकली, यक्षगान, चण्डूभागवतम, नौटंकी, नाचा, माच, खयाल, स्वांग, तमाशा आदि लोकनाट्य विधाओं ने ग्रामीण अंचलों में नाट्यकर्म को प्राणवान बनाये रखा है। भारत का लोकव्यापी रंगमंच, आधुनिक शहरी रंगमंच से पृथक ग्रामीण परिवेश में, उसकी सम्पूर्ण आंचलिकता में जो पहचान बनाता है, वह समानान्तर रूप से स्तुत्य है। हालांकि ऐसा संयोग बड़ी मुश्किल से उपस्थित होता है कि जिसमें सभी लोकनाट्य शैलियों या आंचलिक नाट्य परम्परा की भागीदारी हो पाना सम्भव हो सके, उनको देखा जा सके, सीखा और समझा जा सके। जितनी ग्रामीण, विभिन्न राज्यों से जुड़ी रंगप्रस्तुतियों की आमद होती है, हम अपने ही देश के लोकरंग वैभव से परिचित होते हैं। 

अनेकानेक राज्यों में लोकनाट्य परम्परा की एक जैसी स्थिति है। सभी के पास संसाधन सीमित हैं। सभी के पास आर्थिक कठिनाइयाँ हैं जो उनके जीवन के संघर्षों के साथ जुड़ी हैं लेकिन इसके बावजूद यदि ये समूह, ये कलाकार, ये लोकरंगकर्मी अपनी चेतना को, अपने लोक की रंगचेतना को जाग्रत किए रहते हैं तो इनका यह प्रयत्न, इनका यह कर्म, इनका यह पुरुषार्थ स्तुत्य है। 



रविवार, 17 दिसंबर 2017

48वाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह, गोआ

सिनेमा सदैव ही जीवन की संवेदना का हिस्सा रहा है

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गोआ (goa) में विश्व सिनेमा की भागीदारी वाला भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का अड़तालीवाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह सम्पन्न (iffigoa2017) हो चुका है। इस समारोह का शुभारम्भ भारतीय सिनेमा के आज के चर्चित सितारे शाहरुख खान ने किया था। वहीं इसके समापन पर भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार की उपस्थिति और उद्बोधनों ने समारोह को भावनात्मक रूप से समेटने का उपक्रम किया। देश-दुनिया के शीर्षस्थ फिल्मकार और उनका सिनेमा देखने के अवसर यह समारोह पिछले अड़तालीस बार से जुटाया करता है। पहले यह समारोह एक साल दिल्ली और एक साल देश के किसी एक राज्य में हुआ करता था। देश के अनेक राज्यों को इस समारोह का आतिथेय होने का अवसर मिला। सदैव ही इस समारोह को एक ग्लैमर, एक आभा और एक रौनक प्राप्त होती रही है क्योंकि यह देश का अकेला ऐसा समारोह रहा जिसने दुनिया के उत्कृष्ट सिनेमा को एक प्लेटफाॅर्म पर लाने का प्रयास किया, उन फिल्मकारों को हिन्दुस्तान में इस समारोह का हिस्सा बनने को निमंत्रित किया जिनके नाम और व्यक्तित्व का अर्थात ही समृद्ध सिनेमा हुआ करता था। 

आरम्भ के कुछ वर्षों तक यह समारोह बाॅलीवुड के फिल्मकारों और सितारों की बड़ी आमद का केन्द्र बना रहा लेकिन बाद में धीरे-धीरे देश के दूसरे राज्यों के फिल्मकार, कलाकार, दुनिया के अनेक देशों के फिल्मकार और कलाकार आकृष्ट होना शुरू हुए। पिछले एक दशक में इस समारोह को बावजूद एक ही राज्य में सिमटकर रह जाने, शेष देश और उसके राज्यों से बड़ी दूर हो जाने और देखने वालों के लिए अपेक्षाकृत व्ययसाध्य होने के बाद भी स्थापित हुआ कहा जा सकता है। इस बार का अड़तालीसवाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह अपने आपमें अनेक आकर्षण एवं आयाम समेटकर प्रस्तुत हुआ है। इण्टरनेशनल फेडरेशन आॅफ प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के साथ मिलकर 195 फिल्मों के साथ इस समारोह की शुरूआत एक अच्छा संकेत था। इस बार के समारोह में 82 देशों के सिनेमा की भागीदारी हुई। इनमें दस वल्र्ड प्रीमियर्स, दस एशियन एवं इण्टरनेशनल प्रीमियर्स एवं 65 भारतीय प्रीमियर्स शामिल थे। ईरान के शीर्षस्थ फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म बियाॅण्ड द क्लाउड्स से समारोह की शुरूआत तथा समापन अवसर पर पाबलो कैसर की फिल्म इण्डो-अर्जेण्टीनियन फिल्म थिंकिंग आॅफ फिल्म का प्रदर्शन प्रीमियर देखने वालों के लिए रोचक अनुभव रहा। इस बार कनाडा को विशेष रूप से सिनेमा-केन्द्रित किया गया जिसमें श्रेष्ठ फिल्मों के साथ प्रतिष्ठित कलाकारों और फिल्मकारों का भी आना-जाना लगा रहा। 

अड़तालीसवें अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में देश-दुनिया की तकरीबन 30 महिला फिल्मकारों का सिनेमा देखने का अवसर फिल्म समारोह में शामिल होने वाले सिनेप्रेमियों को मिला जो सुखद संकेत है। समारोह का एक बड़ा आकर्षण पिछली सदी के विश्व के दो महान फिल्मकारों फ्रिट्ज लैंग की फिल्म मेट्रोपाॅलिस एवं आन्दे्रई तारकोव्स्की की फिल्म सेक्रीफाइस थीं जो प्रदर्शन के लिए हासिल की गयी। 

विदेशी सिनेमा में जेम्स बाॅण्ड की फिल्मों की समानान्तर सफलता एवं लोकप्रियता का आकर्षण इस बार इस समारोह को भी बचा नहीं पाया है, यही कारण है कि बाॅण्ड की 9 फिल्में इस समारोह का हिस्सा बनी। इनमें शामिल थीं, गोल्डन आई, गोल्ड फिंगर, आॅक्टोपसी, स्कायफाल, आॅन हर मिजेस्ट्रीज़ सीक्रेट सर्विस, इ स्पाय हू लव्ड मी इत्यादि। 

लगभग नौ दिनों के इस समारोह में इतनी सारी फिल्मों का शामिल होना दिलचस्प था, उसकी विविधता उतनी ही आकृष्ट करने वाली भी। एक तरफ अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगी खण्ड में बीट्स पर मिनट, डार्क स्कल, द ग्रेट बुद्धा, कच्चा लिम्बू, शटल लाइफ, विलेज राॅकस्टार जैसी फिल्में थीं तो दूसरी ओर विश्व सिनेमा श्रेणी में ब्लैक लेवल, ब्लडी मिल्क, ब्रीथ, चिल्ड्रन आॅफ द नाइट, डेब्रेक, हाई नून स्टोरी, बैरेज, एलोन डज नाॅट बिलीव इन डेथ, फादर एण्ड सन, लवलेस, मोंपारनास बिएवेन्यू, द स्ट्रेन्ज वन्स आदि। इस बार जैसा कि ऊपर जिक्र आया, कनाडा के सिनेमा को विशेष केन्द्रित किया गया था। द स्टेअर्स, आई आॅन जूलिएट, डोंट टाॅक टू आइरीन, मेडीटेशन पार्क, ओल्ड स्टोन वगैरह। ब्रिक्स फिल्म फेस्टिवल अवार्ड श्रेणी में नीस: द हार्ट आॅफ मेडनेस, अयाण्डा, टर्टल, वेयर हेज़ टाइम गाॅन, द सेकेण्ड मदर आदि को देखना समय के साथ दुर्लभ और दुरूह विषयों पर परिश्रमपूर्वक बने सिनेमा का आस्वादन करना था। 

विश्व सिनेमा के इस बड़े समागम में ब्रिक्स फिल्म फेस्टिवल श्रेणी में नीस: द हार्ट आॅफ मेडनेस देखना संवेदनशील अनुभव था जिसमें चालीस के दशक की एक सच घटना को आधार बनाकर प्रस्तुत किया गया था। यह एक महिला मनोचिकित्सक के साहस और प्रयोगों की कहानी है जो मानसिक रोगियों को करण्ट जैसी चिकित्सा पद्धति के विरुद्ध है और उसे मनुष्य के लिए अत्यन्त पीड़ाजनक और त्रासद मानती है। समकालीन परिवेश और साथी उससे असहमत उसे अलग-थलग कर देते हैं और भयावह रोगियों के बीच काम करने भेज देते हैं जहाँ वह अपनी तरह से अनेक मरीजों को सुधार पाती है, उनको ठीक कर पाती है। राॅबर्टो बर्लिनर की यह ब्राजीलियन फिल्म हमें आज भी सोचने पर विवश करती है। बैरेज(फ्रांस-लोरा स्कोरेडर), फादर एण्ड सन(विएतनाम-लुओंग डिन्ह डुंग), लवलेस(रशिया-एण्ड्री ज्वाइगिनत्सेव) जैसी फिल्मों के मूल में विषय छोटी उम्र के बच्चे हैं जो अलग-अलग कारणों से एकाकीपन, वेदना, उपेक्षा और कठिनाइयाँ झेल रहे हैं। 

आश्चर्य यह होता है कि कैसे अलग-अलग देशों में फिल्मकारों ने यह लगभग एक जैसी मासूम संवेदना और वेदना को अपने सिनेमा का आधार बनाया। बैरेज में एक माँ अपनी बेटी को तब अपने ढंग से परवरिश और सान्निध्य के दबाव डाल रही है जब उसका संसार खुलने को है और वह छोटी ही उम्र से अपनी नानी के पास रह रही है। इस बच्ची की चुप्पी बड़े सवाल खड़े करती है। दूसरी ओर लवलेस जैसी फिल्म जिसमें तलाक लेकर अलग होने को आतुर पति-पत्नी को अपने बच्चे के भविष्य का ख्याल ही नहीं है। वह उसकी उपस्थिति में घर का सौदा कर रहे हैं ताकि घर बेचकर अलग हो जायें। ऐसे में उस बच्चे का एक दिन गायब हो जाने की घटना भी उपेक्षा शिकार हो जाती है। माता-पिता को इतना निर्मम देखना त्रासद लगता है पर यह है दुनिया के ही समाज का सच। तीसरी ओर एक फिल्म फादर एण्ड सन में एक पहाड़ी इलाके में रहने वाले गरीब मछुआरे का अपने बच्चे के साथ कठिन संघर्ष है जो मासूम एक गम्भीर बीमारी का शिकार हो गया है।

भारतीय सिनेमा खण्ड में फीचर फिल्म श्रेणी में कच्चा लिम्बू, कड़वी हवा, क्षितिज-ए होराइजन, पिहू, रुख, टेक आॅफ, वेण्टिलेटर, बिसोर्जन, माछेर झोल, मुरम्बा, न्यूटन और नाॅन फीचर फिल्मों में बलूत, अम्मा मेरी, एपिल, ए वेरी ओल्ड मैन विद एनाॅरमस विंग्स, खिड़की, पलाश, पुष्कर पुराण आदि विषयों की मौलिकता और कथ्य के साथ परदे पर उसके निर्वाह के कौशल और दृष्टिकोण के कारण पसन्द की गयीं। अलावा दादा साहब फाल्के अवार्ड से विभूषित फिल्मकार के. विश्वनाथ की फिल्मों सागर संगमम, शंकराभरणम, स्वाति किरानम को देखा गया। उल्लेखनीय यह भी कि इस साल दिवंगत हुए फिल्मकारों और कलाकारों को श्रद्धांजलि देते हुए सरकार ने ओमपुरी की अर्धसत्य, विनोद खन्ना की अचानक, अब्दुल मजीद की असमिया फिल्म चमेली मेमसाब, टाॅम आल्टर की ओसियन आॅफ एन ओल्ड मैन, रीमा लागू की मराठी फिल्म सवाली, जयललिता की तमिल फिल्म अइयारथिल ओरुवन, कुन्दन शाह की जाने भी दो यारों, दासरि नारायण राव की तेलुगु फिल्म ओसे रामुलम्मा और रामानंद सेनगुप्ता की बंगला फिल्म नागरिक को भी स्थान दिया गया था। हिन्दी मीडियम और सीक्रेट सुपर स्टार जैसी फिल्में भी सुगम और बोधगम्य फिल्मों की श्रेणी में शामिल थीं जो पूर्व प्रदर्शित भी हैं।

समारोह के समापन अवसर पर भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन को साल की इण्डियन फिल्म पर्सनैलिटी के रूप में सम्मानित करने किया गया वहीं लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रसिद्ध कैनेडियन निर्देशक एटाॅम इगोयान दिया गया। समापन अवसर सलमान खान, कैटरीना कैफ और अक्षय कुमार जैसे सितारों की उपस्थिति से और भी यादगार बन गया। कनाडा के सर्वाधिक प्रतिष्ठित फिल्मकार एटाॅम को एक्जोटिका से अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली। उनकी एक फिल्म द स्वीट हेअरआॅफ्टर भी प्रेक्षकों में पसन्द की गयी थी। अरारत, श्लोए, व्हेयर द ट्रुथ लाइज़, अडोरेशन, डेवल्स नाॅट, द केप्टिव, रिमेम्बर इगोयन उनकी अन्य श्रेष्ठ फिल्में हैं। फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान कम्पेनियन आॅफ द आर्डर आॅफ कनाडा से सम्मानित एटाॅम इगोएन विश्व सिनेमा में सर्जनात्मक उपलब्धियों का एक अहम चेहरा हैं। 

गोआ की अनुपम प्रकृति और छटाओं के बीच आयनाॅक्स, कला अकादमी भवन, मेक्विनेज़ भवनों में फिल्मों के प्रदर्शनों ने प्रतिदिन सुबह लगभग नौ बजे से देर रात बारह बजे के बाद तक सिनेमा का ऐसा माहौल बनाया जिसको देखकर लगता था कि दुनिया के सिनेमा को एक जगह पर देख पाने का इससे बेहतर सुअवसर और नहीं है। बड़ी बात यही है कि लगभग पचास साल से यह परम्परा एक बड़े रूप में स्थापित हो चुकी है और दुनिया के फिल्मकारों और सिनेप्रेमियों को इस अवसर का इन्तजार। सिनेमा का वजूद अपने आपमें बहुत मयाने रखता है। उसकी वजहें साफ हैं। सिनेमा का हमारे सपनों से जुड़ा होना, हमारे अचम्भे का हिस्सा होना, हमारी महात्वाकांक्षाओं में शामिल होना और ऐसे अनेक कारण है जो सिनेमा को विशिष्ट बनाते हैं। 

बीसवीं शताब्दी की यह सबसे चमत्कारिक विधा इक्कीसवीं सदी के दो दशकों में आधुनिक तकनीक, संसाधन और क्षण भर में हमसे सम्पर्क कर संवाद स्थापित करने वाली है, निश्चित ही इसकी उतनी ही लाभ-हानियाँ भी हैं लेकिन इसके बावजूद सिनेमा हमारे रोमांच का पर्याय है, हमारी स्फूर्ति का पोषक है, इसे नकारा नहीं जा सकता। 
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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

खूबियाँ जो धर्मेन्द्र को सदाबहार बनाती हैं....

जन्मदिन : 8 दिसम्बर


भारतीय सिनेमा के सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र एक सदैव प्रासंगिक सितारे हैं। 8 दिसम्बर को उनका जन्मदिन है। देश के कोने-कोने से उनके चाहने वाले मुम्बई पहुँचते हैं, यथाक्षमता उपहार, फूल, गुलदस्ता और खूब सारा प्यार लिए। धर्मेन्द्र सबसे मिलते हैं, यह दिन यदि वे मुम्बई में हुए तो उनसे मिलकर जाने वाले के लिए यादगार बन जाता है। बयासी वर्ष की उम्र में वे अनुशासित और अपनी फिटनेस को लेकर सजग रहते हैं। जहाँ तक सक्रियता की बात है तो वे न केवल यमला पगला दीवाना के तीसरे भाग की शूटिंग में व्यस्त हैं बल्कि अपनी भावनात्मक फिल्म अपने का सीक्वेल भी बनाने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी ही देखरेख में उनका पोता और सनी का बेटा राजवीर अपनी पहली फिल्म पल पल दिल के पास से सिनेमा में प्रवेश करने जा रहा है। 

धर्मेन्द्र एक साफदिल इन्सान, भीतर-बाहर एक सा व्यक्तित्व हैं। उनका व्यक्तित्व एक खुली किताब की तरह है। वे हमारी-आपकी तरह सहज और सीधे-सादे इन्सान हैं। फिल्म जगत मेें उनका आना, यूँ किसी बड़े सुयोग या चमत्कार से कम न रहा है। फगवाड़ा, पंजाब के एक छोटे से गॉंव ललतों में उनका बचपन बीता। बचपन से उनको सिनेमा का शौक था। अपने तईं जब उनको मौका मिलता था, तब तो सिनेमा वे देखते ही थे, इसके बाद अपनी माँ और परिवार के सदस्यों के साथ भी वे फिल्म देखने का कोई अवसर जाने नहीं देते थे। उन्होंने स्वयं ही बताया कि बचपन में सुरैया के वे इतने मुरीद थे कि चौदह वर्ष की उम्र में उनकी एक फिल्म दिल्लगी उन्होंने चालीस बार देखी थी। धर्मेन्द्र अपने पिता को काफी डरते थे। उनसे सीधे बात करने की हिम्मत उनकी कभी न पड़ती। अपनी माँ के प्रति उनकी गहरी श्रद्घा रही है। 

उन्होंने फिल्म फेयर की नये सितारों की खोज प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपने सितारा बनने के स्वप्र को साकार करने की दिशा में पहला कदम रखा था। जब उनको मुम्बई बुलाया गया तो खुशी का पारावार न रहा। इस यात्रा के लिए उनको फस्र्ट क्लास का टिकिट और फाइव स्टार होटल में ठहरने के इन्त$जाम के साथ बुलाया गया था। वे इसके लिए फिल्म फेयर के तब के सम्पादक पी. एल. राव को याद करना नहीं भूलते। यह 1958 की बात है। चयन तो उनका हो गया और फिल्म फेयर ने अपने जो स्टार घोषित किए उनमें धर्मेन्द्र भी शामिल थे मगर उनको एकदम से काम नहीं मिला। धर्मेन्द्र लेकिन जिद के पक्के थे। उन्होंने संघर्ष किया। अभिनेता बनने के ही ख्वाहिशमन्द अर्जुन हिंगोरानी और धर्मेन्द्र अक्सर काम के सिलसिले में किसी न किसी ऑफिस में एक-दूसरे को मिल जाते थे। दोनों में ऐसी दोस्ती हुई कि अर्जुन ने हीरो बनने की कोशिश से अपने को दूर करके निर्देशक के रूप में कैरियर शुरू किया तो उनके पहले नायक धर्मेन्द्र थे, दिल भी तेरा हम भी तेरे के साथ। बाद में यह दोस्ती ऐसी परवान चढ़ी कि हिंगोरानी की हर फिल्म के नायक धर्मेन्द्र ही हुए, शोला और शबनम, कब क्यों और कहाँ, कहानी किस्मत की आदि। 

धर्मेन्द्र की फिल्मोग्राफी बड़ी समृद्ध है। शायद ही ऐसा कोई श्रेष्ठï निर्देशक हो, जिनके साथ उन्होंने काम न किया हो। सीक्वेंस में देखें तो निर्माताओं में, निर्देशकों मेें, साथी कलाकारों में, नायिकाओं मेें ऐसे अनेक नाम सामने आते हैं जिनके साथ अपने कैरियर में कई बार, अनेक फिल्मों में उन्होंने काम किया। मोहन कुमार, मोहन सैगल, राज खोसला, बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी, असित सेन, रमेश सिप्पी, दुलाल गुहा,  जे. पी. दत्ता, अनिल शर्मा, ओ. पी. रल्हन, मनमोहन देसाई, रामानंद सागर, चेतन आनंद, विजय आनंद जैसे कितने ही निर्देशक होंगे जिनके साथ धर्मेन्द्र ने अपने समय की यादगार फिल्में की हैं। धर्मेन्द्र के कैरियर का शुरूआती दौर बहुत ही विशेष किस्म की अनुकूलता का माना जाता है। यह वह दौर था जब उन्होंने अपने समय की श्रेष्ठï नायिकाओं के साथ अनेक खास फिल्मों में काम किया। 

लेकिन इस दौर में जिन नायिकाओं के साथ उनकी शुरूआत हुई, उनके साथ आगे काम करने के लगातार मौके आये। जैसे नूतन के साथ बन्दिनी मेें, माला सिन्हा के साथ आँखें, अनपढ़ में, मीना कुमारी के साथ चन्दन का पालना, बहारों की मंजिल, मझली दीदी, फूल और पत्थर, मैं भी लडक़ी हूँ, काजल में, प्रिया राजवंश के साथ हकीकत में, शर्मिला टैगोर के साथ सत्यकाम, अनुपमा, चुपके चुपके, देवर, मेरे हमदम मेरे दोस्त मेें, नंदा के साथ आकाशदीप में, आशा पारेख के साथ आये दिन बहार के, आया सावन झूम के, मेरा गाँव मेरा देश में, राखी के साथ जीवनमृत्यु और बलैक मेल में, हेमा मालिनी के साथ नया जमाना, राजा जानी, प्रतिज्ञा, ड्रीम गर्ल, चाचा भतीजा, शोले, चरस, जुगनू, सीता और गीता, दोस्त, तुम हसीं मैं जवाँ, द बर्निंग ट्रेन, दिल्लगी, बगावत, रजिया सुल्तान में, सायरा बानो के साथ रेशम की डोरी, आयी मिलन की बेला, ज्वार भाटा में, वहीदा रहमान के साथ खामोशी, फागुन में, सुचित्रा सेन के साथ ममता में, रेखा के साथ झूठा सच, गजब, कहानी किस्मत की, कर्तव्य में उनकी जोडिय़ाँ बड़ी अनुकूल और परफेक्ट भी प्रतीत होती हैं। 

लगभग दो सौ से अधिक फिल्मों के माध्यम से धर्मेन्द्र ने न जाने कितने ही किरदारों को परदे पर साकार किया है। दर्शकों के बीच उनके सभी किरदार अपने-अपने ढंग से प्रतिष्ठिïत हैं। रामानंद सागर की फिल्म आँखें ने उनको इण्डियन जेम्स बॉण्ड के रूप में पहचान दी। रूमानी किरदार, बुरा आदमी, कानून का रक्षक, सच्चा और स्वाभिमानी चरित्र, बॉक्सर, फाइटर टाइप के चरित्र हों या इसके अलावा कुछ और, धर्मेन्द्र सभी मेें प्रभावशाली ही नजर आये। कॉमेडी में धर्मेन्द्र कुछ अलग ही रेंज के आदमी दिखायी पड़ते हैं जिसका उदाहरण तुम हसीं मैं जवाँ, प्रतिज्ञा, चाचा- भतीजा, गजब, शोले, चुपके-चुपके, नौकर बीवी का जैसी फिल्में हैं। 

धर्मेन्द्र भारतीय सिनेमा में एक यशस्वी उपस्थिति हैं। उनके साथ सदाबहार कलाकार की पहचान जुड़ी हुई है। धर्मेन्द्र दर्शकों में अपनी छबि को लेकर कहते हैं, कि फिल्मों में काम करते हुए दर्शकों में हमेशा मेरे लिए जो प्यार रहा है, उसको परिभाषित करना कठिन है। हर माँ ने मुझमें अपना बेटा देखा है, हर बहन ने मुझमें अपना भाई देखा है। और हर प्रेमिका ने........ इस पर वे शरमा जाते हैं। धर्मेन्द्र कहते हैं कि इस इण्डस्ट्री ने, इस हिन्दुस्तान ने मुझे जो दिया है, उसको बयाँ करना आसान नहीं है। ये ही वो दुनिया है जिसने धर्मेन्द्र को बनाया है।