शनिवार, 7 जुलाई 2018

तर्कसंगति में अप्रासंगिक किन्तु निर्देशकीय कौशल की सफल फिल्म

संजू



रविवार का दिन था। शहर के मॉल्स में इस फिल्म के टिकिट आसानी से नहीं मिल पा रहे थे। अच्छी खासी बुकिंग थी। फिल्म देखने दो लोग गये थे मगर दोनों सीट अलग-अलग थीं। मॉल्स में पार्किंग की भी जगह उपलब्ध नहीं थी, कार्य पर तैनात गार्ड दो-‘दो, तीन-तीन गाड़ियाँ छोड़ रहे थे। सिनेमाहॉल का आलम यह था कि लगभग दो घण्टे चालीस मिनट लम्बी फिल्म को दर्शक खासी चुप्पी के साथ देख रहे थे, न ताली, न सीटी न ही किसी किस्म का ओछा हल्ला-गुल्ला। यह क्या था, एकाग्रता या बंध कर रह जाने की विवशता जिसने और कुछ सूझने ही न दिया।

संजू फिल्म का अनुभव इसी तरह का है। साल भर पहले जब राजकुमार हीरानी भोपाल आये थे, पुरानी जेल को भीतर से देखने तब उनके साथ एक घण्टे रहने और अनौपचारिक बातचीत का अवसर मिला था। एक-एक करके तीन-चार सफल और कमाऊ के साथ-साथ प्रशंसनीय फिल्में बना चुका यह आदमी छरहरे बदन का, मुस्कुराहट स्थायी भाव और नपी-तुली बात करने वाला। बहरहाल जेल पसन्द आ गयी और फिल्म के उत्तरार्ध का एक बड़ा हिस्सा हीरानी ने यहाँ फिल्माया।

संजू यों हर आम दर्शक की जानी-समझी जाने वाली कहानी है या कह लीजिए, यथार्थ है। लगभग तीस साल तक सुर्खियों में रहने वाला घटनाक्रम और उसका यह एक प्रमुख पात्र। सिनेमा जैसी लाइम लाइट वाली विधा में अपने को आजमाने वाला और अपने समय के श्रेष्ठ नायक और नायिका का पुत्र। आरोपी से अपराधी और अपराधी से सजा काटकर अपने संसार में लौटने वाला शख्स जिसका मूड, अन्दाज और बरताव वही है जो पहले था, बाद में भी वैसा ही। भावनात्मकता, संवेदनशीलता, आवेग, उद्वेग यह सब मनुष्य स्वभाव की तरह ही आते-जाते। 

वह दृश्य दर्शकों के सामने एक नासमझ और अविवेकी युवा की छबि को सामने रखते हैं जो बिना कुछ हासिल किए अपने पिता की सराहना और तारीफ की कामना करता है, वह भी उस पिता से जिसका जीवन ही संघर्ष, त्याग और आदर्श स्थापित करने में बीता हो। चरित्र चित्रण में विभेद हैं। निर्देशक ने पटकथा लेखक से जस का तस लिखवाकर उसको दृश्यों में बाँट भी दिया है। खामियों को कीर्तिमान या शेखी की तरह प्रस्तुत करना निरी बेवकूफी है, पर यह समझ आये तो पटकथा का हिस्सा नहीं बनती। निर्देशक फिल्म बनाते हुए सावधान बहुत है, इसीलिए नायक के जीवन के उन औरों को नहीं छूता जो जोखिमपूर्ण हो सकते हैं। वह सुविधानुसार आधी हकीकत, आधा फसाना बना रहा है और उसकी छूट आरम्भ में ही लिए ले रहा है।


फिल्मकार का जोर इस बात में है कि वो विवादास्पद नायक की शख्सियत पर इतने वर्षों मेंं हुए तमाम आक्रमणों और अतिक्रमणों को छुटाता चले, आखिर वह कृतज्ञ है क्योंकि कैरियर की शुरूआत में इसी नायक के साथ दो फिल्में एक के बाद एक करते हुए वह प्रतिष्ठापित हुआ था। वह यहाँ पर उस महानायक के चरित्र को गढ़ते हुए भी लापरवाह है जो मुझे जीने दो, यादें, ये रास्ते हैं प्यार के, रेशमा और शेरा और दर्द का रिश्ता जैसी फिल्म बनाता है, वह जो देश की पदयात्रा करता है, वो जो निर्विवाद सांसद है, वो जो मुम्बई शहर का जिम्मेदार शेरिफ रहा है, वो जो देश पर आयी हर आपदा पर शहर में अपने साथी कलाकारों को लेकर धन संग्रह के लिए निकलता है, वो जो सीमा पर जाकर जवानों का मनोरंजन करता है, वो जिसका आदर हर विचारधारा का आदमी करता है। बावजूद इसके कि उसे इस बात का श्रेय भी है कि एक अरसे बाद वो ही उनको अपनी पहली फिल्म में जादू की झप्पी वाले प्यारे और दिलचस्प अन्दाज में लेकर आया था। निर्देशक इस चरित्र को ठीक से स्थापित नहीं करता। माना कि परेश रावल एक कलाकार के रूप में बहुत गुणी और प्रतिभासम्पन्न हैं लेकिन छः फीट एक इंच लगभग लम्बे और मध्यम स्वर की अत्यन्त स्वच्छ आवाज वाले सुनील दत्त को उच्च स्वर और अपेक्षाकृत छोटे कद के कारण बड़ी मेहनत के बावजूद साकार नहीं कर पाते। 

संजय दत्त के आरोपी बनने से लेकर सुनील दत्त की जिन्दगी तक लगभग पन्द्रह साल उनके जीवन की बड़ी वेदना और अशान्ति के रहे हैं, उसके बावजूद वे सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सहज और व्यवहारकुशल बने रहे बिना धैय-धीरज खोये। यह पक्ष हीरानी ने इसलिए विस्मृत कर रखा होगा क्योंकि इससे उनके बाजार के समृद्ध होने की गुंजाइश नहीं थी। ऐसा ही कुछ नरगिस की भूमिका निबाहने वाली मनीषा कोइराला के साथ हुआ है। वे दृश्य में आती ही तब हैं जब बीमार हो चुकी होती हैं। उनका चरित्र भी एक नायाब अभिनेत्री और मदर इण्डिया जैसी सशक्त फिल्म से भारतीय सिनेमा में अपनी क्षमताओं का इतिहास लिखने वाली कलाकार के रूप में, विवाह के बाद सामाजिक जीवन और परिवार की जिम्मेदारी सम्हालने वाली पत्नी और माँ के रूप में उनकी पूर्वपीठिका रची ही नहीं गयी। परिवार के सामूहिक छायाचित्रों और स्वयं के एकल छायाचित्रों में मनीषा की छबि नरगिस की छबि के निकट पहुँचती है। 

यह एक संवेदनशील संयोग भी कैसा है कि अपने जीवन में मनीषा को भी ऐसी ही भयावह बीमारी का सामना करना पड़ा और वे उस बीमारी से जूझकर, जीतकर एक विजेता के रूप में दुनिया में स्वस्थ और सकुशल बनी हुई हैं, इसके बावजूद उनका चेहरा, उस पीड़ा और व्यथा का साक्ष्य नजदीक के दृश्यों में व्यक्त भी करता है। उनकी आँखों के पास सलवटें मार्मिक आभास कराती हैं। गाने वाले दृश्य में पहाड़ के ऊपर उनकी नृत्य मुद्रा बहुत ही भावपूर्ण और मनमोहक है और उन्होंने जितना किरदार उनका लिखा गया, उसको दोहरे वजन के साथ निभाया भी है।  

रणवीर कपूर को संजय दत्त होने में जितनी मेहनत करनी पड़ी, उससे अधिक उन्होंने युक्तियों का प्रयोग किया है। उन्होंने संजय दत्त की चाल की नकल की है, भँवें चढ़ाकर, आवाज़ में वो असर पैदा करते हैं और इतना ही वे कर भी सकते थे। पटकथा में महिमा मण्डन के लिए तमाम अतिरेक हैं, चालू दर्शकों को हँसाने के लिए सम्बन्धों की संख्या कोई शेखी बघारने जैसा काम नहीं करती बल्कि हतप्रभ करती है, खासकर हीरानी जैसे निर्देशक की फिल्म में। इसी तरह सहवास के चालू और घटिया अर्थ घपाघप का भी बार-बार और लगभग बेजा इस्तेमाल इस फिल्म को हल्का बनाता है। यह फिल्म अपने नायक को विवेकहीन अधिक साबित करती है जो आसानी से मादक पदार्थ तुरन्त बने मित्र से स्वीकार करता चला जाता है। दर्शकों के सामने यह फिल्म खुद अपने आपमें एक सवाल है कि इतनी भूलों और गिरते चले जाने की पराकाष्ठा को देखने और जानने के बाद आप किसी व्यक्ति के विषय में किस तरह सकारात्मक रह सकते हो? वह व्यक्ति जो मृत्युशैया पर पड़ी माँ के प्रति भी संवेदनशील नहीं है और एक आदर्श पिता के प्रति तमाम विद्रोही भाव रखता है। 

इस फिल्म में अनेक नायिकाएँ हैं, मनीषा कोइराला, दिया मिर्जा, सोनम कपूर, करिश्मा तन्ना आदि सभी की अपनी-अपनी तरह उपस्थिति है। मनीषा और दिया प्रमुखता से हैं जबकि सोनम और करिश्मा उपकृत नायिकाओं सी। सहायक कलाकारों में विकी कौशल, कमलेश की भूमिका में और जिम सरभ जुबिन मिस्त्री की भूमिका में सकारात्मक-नकारात्मक छबियों के उचित प्रभाव छोड़ते हैं। विकी कौशल के बारे में यह कहा जा सकता है कि इस फिल्‍म मेंं उनकी मेहनत उनको और अनेक अच्‍छी फिल्‍मों तक ले जायेगी। मेहमान उपस्थिति में महत्वहीन रहे पीयूष मिश्रा और तब्बू, अरशद, बोमन ईरानी और महेश मांजरेकर बस दृश्य भर के लेकिन अंजन श्रीवास्तव पाँच मिनट की अपनी भूमिका में दृश्य लूट ले जाते हैं। इसी प्रकार सयाजी शिन्दे ठेठ देसी अन्दाज में एक विवादास्पद अपराधी को बखूबी जीते हैं। इसी से यहाँ यह बात ध्यान में आती है कि कुछेक कलाकार प्रसिद्ध व्यक्तियों की बातचीत, चालढाल और अन्दाज की खूब नकल उतारते हैं, यह बात वे दर्शक समझेंगे जो उन मूल व्यक्तियों को अपनी देखी-सुनी स्मृतियों में रखते होंगे। 

कुल मिलाकर संजू इस वक्त की एक चर्चित फिल्म है जिसने इस समय खूब बाजार लूटा है, न केवल बाजार लूटा है बल्कि पिछली बड़ी चर्चित फिल्मों के धन संग्रह को भी चिढ़ाने और जीभ दिखाने का काम किया है। रणवीर कपूर पिछली कुछेक फ्लॉप फिल्मों से जिस तरह छिल गये थे, यह ठण्डा मलहम कही जा सकती है। राजकुमार हीरानी के खाते में एक और बाजार पर काबिज होने वाली फिल्म चढ़ गयी है जिससे वे अपने गुरु विधु विनोद चोपड़ा और मित्र संजय दत्त के प्रति अपने उपकृत होने का फर्ज अदा करेंगे लेकिन संजू फिल्म की अपनी प्रासंगिकता, किसी भी सिनेमा के बनने के अर्थ और महत्व की दृष्टि से अनेक खामियों और आलोचनाओं के कारण भी चर्चित बनी रहेगी जिसमें से एक सबसे मौजूँ तो यही लगता है कि राजकुमार हीरानी संजू की जगह सुनील बनाते, एक बड़े अभिनेता, निर्देशक, सार्वजनिक जीवन में आदर्श उपस्थित करने वाले एक कलाकार के जीवन और व्यक्तित्व को रेखांकित करते जो मदर इण्डिया का वो बिरजू है जिसके लिए उसकी माँ भगवान है, वही माँ जिसकी बन्दूक से वह मरता है और मरते समय उसके हाथ में माँ का कंगन है। ऐसे कलाकार, व्यक्तित्व के जीवन का एक संत्रासद पक्ष उसके बेटे का एक गुनाह में गहरे फँस जाना होता और उससे मुक्त होने की यात्रा जो अब सम्पन्न हो चुकी है।
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शुक्रवार, 15 जून 2018

रजनीकान्‍त के राजनैतिक मन्‍तव्‍य अहम नेपथ्‍य

काला करिकलन

Kaala Karikaalan


ऐसा लगता है कि सलमान खान की महात्वाकांक्षी फिल्म रेस-3 के आ जाने से भी रजनीकान्त की पिछले सप्ताह प्रदर्शित फिल्म काला करिकलन की आय, सुर्खियों और चर्चाओं में कोई कमी नहीं आ पायेगी। तमिल, तेलुगु और हिन्दी तीन भाषाओं में यह फिल्म देश में आय के कीर्तिमान बना रही है। फिल्म के केन्द्र में महानायक रजनीकान्त हैं जिनकी सितारा छबि आरम्भ से अब तक निरन्तर निर्विवाद रही है दूसरे कुछ समय पहले बाकायदा राजनीति में आने की घोषणा करके उन्होंने अपना दल बना लिया है और उस नये आयाम में अपनी जड़ें सुनियोजित ढंग से जमा रहे हैं जहाँ उनके पूर्ववर्ती और दक्षिण भारत के कलाकार अन्ततः गये हैं और बारी-बारी से राज्य भी किया है। दक्षिण के कलाकारों में अब तक रजनीकान्त और कमल हसन ही राजनीति में आने से अपने आपको बचाये हुए थे तथापि उनकी राजनैतिक महात्वाकांक्षा अधिक समय तक ठहरी न रह सकी इसीलिए एक के पीछे एक आकर रजनीकान्त और कमल हसन दोनों ही राजनीति की आरामदेह लेकिन दूर से उतनी आसान न होकर भी अनन्य कारणों से खूब आकृष्ट करने वाली भव्य काल्पनिक कुर्सी पर आसीन होने के स्वप्न को सारी सक्रियता के साथ जी रहे हैं। 

रजनीकान्त पारिवारिक रूप से दक्ष और कुशल सन्तानों के पिता हैं और धनुष जैसे सुपर स्टार के ससुर भी लिहाजा जीवन के उत्तरार्ध में उनकी महात्वाकांक्षा वाला कैरियर सँवारने और बनाने में बेटी सौन्दर्या और दामाद धनुष की उत्साह से जुटे हैं और चूँकि सभी का क्षेत्र सिनेमा है और सिनेमा से ही रजनीकान्त को दक्षिण में असाधारण लोकप्रियता हासिल है, इस हद तक कि असंख्य दर्शक उनके लिए भावुक है, आगे के सारे स्वप्न भी सिनेमा के रस्ते ही साकार होंगे। काला करिकलन रजनीकान्त की इसी महात्वाकांक्षा का अपनी जनता के सामने लाया गया मन्तव्य है जिसको ध्यान से देखो, गहरे में जाओ तो आपको अपनी बहुत सी जिज्ञासाओं के हल मिलते चलेंगे और कुछ चीजें आप साफ-साफ पहचानेंगे भी। 


काला फिल्म को देखते हुए आपका ध्यान ऐसी किसी भी बॉलीवुड या मुम्बइया फिल्म से तुरन्त ही हट जाता है जो आपने पहले कभी देखी होंगी। इस बात को हमारे दर्शक भलीभाँति जानते हैं कि मुम्बइया सिनेमा की एक बड़ी निर्भरता लम्बे समय से दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग रही है। पचास के दशक से दक्षिण भारत से पारिवारिक सिनेमा अपनी सम्वेदनशील और भावनात्मक व्याख्या के साथ आया और उसने दर्शकों को प्रभावित किया। यह सिलसिला लगभग अस्सी के दशक तक चला है लेकिन बीच में अनेक व्यवधान भी आये जिनके कारण सामाजिक सरोकारों वाली फिल्म से हमारा दर्शक वर्ग वंचित भी रहा। अस्सी के दशक में दक्षिण से ही फूहड़ हास्य फिल्मों का जलवा स्थापित हुआ जो कुछ समय बरकरार रहा। उसी के समानान्तर तब अच्छी एक्शन फिल्मों के साथ रजनीकान्त, कमल हसन, मम्मूटी, मोहनलाल, विष्णुवर्धन, चिरंजीवी, नागार्जुन, व्यंकटेश जैसे नायकों को हमने देखा लेकिन दक्षिण और मुम्बइया सिनेमा के विरोधाभासों में इन नायकों को ज्यादा सम्भावना नहीं दिखी और वे अपनी भाषा की फिल्मों में ही कीर्तिमान रचते रहे। अभी पिछले एक दशक में फिर एक बार तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ सिनेमा की सुपरहिट फिल्मों के अधिकार खरीदकर उनको हिन्दी में बनाने का काम चल निकला है जिसमें सबसे ज्यादा सलमान खान और उनके बाद अक्षय कुमार लाभान्वित हैं। ऐसे अवसरों के बीच भी रजनीकान्त काबाली, शिवाजी, एंदिरन, रॉवन, कोच्चादियाँ, लिंगा आदि से ठसक के साथ दक्षिणोत्तर भारत के सिनेमाघरों में आते हैं और कौतुहल जगाकर चले जाते हैं। 

यह अपने आपमें वाकई दिलचस्प है। यह रजनीकान्त के व्यक्तित्व और उनके साथ फिल्में बनाने वाले लोगों की दक्षता ही कही जायेगी कि वे सूत्र साधते हुए इस अनोखे महानायक के व्यक्तित्व का लगभग चमत्कारिक फैलाव बखूबी किया करते हैं। यह सब कम अचरज से भरी बातें नहीं हैं कि चेन्नई में रजनीकान्त की फिल्म देखने मुम्बई या अन्य शहरों से लोग जहाज का टिकिट खरीदकर जाया करते हैं। रजनीकान्त की फिल्म का प्रदर्शन अनेक दफ्तरों में अवकाश सा माहौल बना दे, यह सब वे बातें हैं जिनको समझे जाने की जरूरत है। दक्षिण के सितारों की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि असाधारण लोकप्रियता के बावजूद वे अपने चाहने वालों, दर्शकों और आमजन की कामनाओं से लेकर पहुँच तक बड़े सहज रहे हैं। नफरत और मोहब्बत के सिद्धान्त बहुधा एकतरफा काम नहीं करते। उसमें प्राण फूँकने का काम सितारा छबियाँ भी करती हैं। अमिताभ बच्चन का उदाहरण हमारे सामने है, एक समय था जब 11 अक्टूबर को प्रतीक्षा के सामने हजारों प्रतीक्षार्थियों को प्रायः हताशा हाथ लगा करती थी, मौके-बे-मौके लाठीचार्ज अलग लेकिन आज वही अमिताभ बच्चन ट्विटर से लेकर अपनी सक्रियता के हर माध्यम पर प्रायः रविवार शाम की वे फोटो प्रचारित-प्रसारित करते हैं जो उनके अब के रहने वाले जलसा घर के सामने उपस्थित भीड़ की होती है और वे सहर्ष उन सबका अभिवादन करना अपना सौभाग्य समझते हैं। समय ने अब उनको वह उदारता दी है जिसमें पहले हाथ तंग रहा है।


रजनीकान्त की नयी फिल्म काला करिकलन को देखना इन्हीं सारे सन्दर्भों, समय और समयातीत अनुभवों के साथ महसूस करना विलक्षण अनुभव है। हमारे सामने काला करिकलन के रूप में एक ऐसा व्यक्तित्व है जो एशिया की सबसे बड़ी बस्ती का अविभावक है, उसका सबके साथ अभय का रिश्ता है। वह पुत्र से लेकर पौत्र तक के कुटुम्ब का मुखिया है और सबके बीच रहता है। दिलचस्प यह है कि मोहल्ले के बच्चों के साथ बल्ला साधे बालसुलभ बेईमानी भी करता है, परिवार के छुटपुट झगड़े, नोंकझोंक भी निपटाता है, खुद भी अपने छोटी-मोटी खामियों वाले स्वभाव पर पत्नी से लेकर, बेटे, बहुओं और पोते-पोतियों की चुहल में सहज रहता है लेकिन किसी तरह उसकी सम्वेदना के बारीक तन्तु बस्ती के एक-एक घर तक गये हैं। वो हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई, दलित और विभिन्न किस्म की कठिनाइयों और मुसीबतों से जूझ रहते लोगों का मसीहा है। दुख, तकलीफ और व्यथा से उसके सामने बिलख उठते बुजुर्गों, स्त्रियों और बच्चों के आँसू उसके तवे से गरम तपते कलेजे पर छन्न से जाकर गिरते हैं। कैसे वो सबका रक्षक है? वह तमाम आकांक्षाओं से परे है और आज के समय में निरर्थक रूप से अर्जित करते की विषय-वासना से दूर है इसीलिए सन्तुष्ट है। वह अपने होने से घर को भी जोड़कर रखता है और अपनी बस्ती को भी। उसकी शत्रुता उस खलनायक से है जो उसके संसार को असहाय भविष्य में बदल देना चाहता है।    

एक महानायक को इस तरह प्रस्तुत करने की खूबी कमाल की है। पटकथा लेखक और निर्देशक ने यह काम बखूबी किया है। गरीबों और अभावग्रस्त लोगों के जीवन और उनकी दुख-तकलीफों को वर्षों से अपने में छुपाये धारावी बस्ती को जब-जब उसके विहंगम में देखा, सिने-छायांकन की दाद देने का जी हुआ। वास्तव में जी. मुरली वर्धन को इसका श्रेय जाता है। हवाई फिल्मांकन के दृश्य वास्तव में अद्भुत और साहस से भरे हैं। मध्यान्तर के पूर्व मुम्बई के पुल पर खासी बरसात के प्रयोग के साथ हिंसक मारधाड़ का दृश्य अद्भुत है जिसे दम साधे बैठे देखना पड़ता है। रजनीकान्त विजयी योद्धा की तरह अपराधियों को मारते-काटते चले जाते हैं। धारावी का सेट जो कला निर्देशक रामलिंगम का कमाल है, चुस्त सम्पादन जो ए. श्रीकर प्रसाद का कौशल है, फिल्म को बड़ी तवज्जो पर ले जाते हैं। फिल्म का पार्श्व संगीत सन्तोष नारायणन ने तैयार किया है। ये सारी खूबियाँ काला को उसके महानायक के राजनीतिक भविष्य के लिए बखूबी पेश करने में सफल हैं। नाना पाटेकर आसान कलाकार नहीं हैं, रजनीकान्त के सामने, अकेले और दूसरे दृश्यों में अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। उनकी यह भूमिका, विधु विनोद चोपड़ा की पुरानी फिल्म परिन्दा का विस्तार है और आज के समय में बुरे आदमी की बौद्धिकता और उसके इस्तेमाल को भी रेखांकित करती है। यह बहुत सारे अच्छे सहयोगी कलाकारों की भी फिल्म है जिसे दो घण्टे चालीस मिनट देखना असहनीय या बोझिल जरा भी नहीं लगता। आप इसे एक हिंसक फिल्म कह सकते हैं पर इसका प्रस्तुतिकरण कमाल का है जो खासा रोमांचकारी भी है। 

शुक्रवार, 1 जून 2018

शो मैन अवधारणा की अनुपस्थिति के तीन दशक

राजकपूर / पुण्‍यतिथि पर स्‍मरण



2 जून हिन्दी सिनेमा के शीर्षस्थ अभिनेता और निर्देशक राजकपूर की पुण्यतिथि का दिन है। आज से तीस साल पहले 1988 में उनका निधन हो गया था। वे नईदिल्ली में दादा साहब फाल्के सम्मान ग्रहण करने आये थे, अचानक उनकी तबीयत खराब हो गयी थी और उनको आॅक्सीजन की जरूरत पड़ी थी। पुरस्कार लेने के बाद उनको तत्काल अस्पताल दाखिल करना पड़ा था जहाँ लम्बी चिकित्सा के बाद उनका निधन हो गया था। निधन से पहले उनकी अन्तिम निर्देशित फिल्म राम तेरी गंगा मैली थी जो 1985 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के बाद वे भारत-पाकिस्तान की पृष्ठभूमि पर एक फिल्म हिना बनाना चाहते थे और इसके लिए नायिका की तलाश कर रहे थे। उनके नहीं रहने के तीन साल बाद बेटे रणधीर कपूर ने 1991 में हिना बनाकर प्रदर्शित की। यह पुत्र की पिता को श्रद्धांजलि थी। हिना का दर्शकों और प्रेक्षकों ने अपनी-अपनी तरह से आकलन किया था लेकिन तटस्थ होकर विचार किया जाये तो पिता के अधूरे सपने को पूरा करने में रणधीर कपूर ने अपनी क्षमताओं का पूरा प्रयोग किया था। 

एक निर्देशक के रूप में भले रणधीर बड़ी पहचान और प्रतिष्ठा के साथ स्थापित न हों लेकिन उन्होंने निर्देशन का अनुभव बड़ा पहले से प्राप्त कर रखा था। जब उन्होंने 1971 में कल आज और कल फिल्म का निर्देशन किया था तब इस बात के लिए उनकी सराहना हुई थी कि उन्होंने अपने परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ फिल्म बनायी है। समय के साथ आने वाले बदलाव और सोच को लेकर उनका यह प्रयोग बुरा नहीं था बल्कि इस बार को भी रेखांकित किया गया था कि रणधीर ने अपने से कहीं अधिक काबिल अपने पिता और दादा को निर्देशित करने में आत्मविश्वास नहीं खोया। बाद में उन्होंने 1975 में धरम करम भी बनायी जो एक प्रकार से अभिनेता के रूप में राजकपूर के सम्मानजनक प्रस्थान बिन्दु की फिल्म थी। इस तरह हिना को पिता के लिए देखा रणधीर कपूर का कोई बुरा स्वप्न नहीं था।

राजकपूर के नहीं रहने से एक बड़ा शून्य तो लम्बे समय तक व्याप्त हुआ इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता। भारतीय सिनेमा के शो-मैन कहे जाने वाले राजकपूर में अपने लम्बे अनुभवों, एक क्लैप बाॅय से कैरियर की शुरूआत और अभिनेता तथा निर्देशक तक बन जाना, इतना ही नहीं बन जाने के बाद अपने आपको लगातार प्रमाणित करने रहना रचनात्मक स्तर पर, वह बड़ा योगदान रहा है। वे रूमान और यथार्थ दोनों धरातल पर अपने सिनेमा को गढ़ने में सिद्धहस्थ थे। उनकी विशेषता यह थी कि वे अपनी सीमाओं और क्षमताओं को भलीभाँति जानते थे। वे यदि बरसात, आवारा और श्री चार सौ बीस जैसी फिल्में स्वयं निर्देशित करते थे तो उनको पता होता था कि बूट पाॅलिश या जागते रहो बनाते हुए प्रकाश अरोरा और शम्भु मित्र को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। हालांकि सभी फिल्मों पर उनकी निगाह रहती थी तभी वे अपनी छाप छोड़ने के कामयाब होते थे। 

राजकपूर ने जीवन की क्षण भंगुरता वाले दर्शन को मेरा नाम जोकर जैसी एक बहुत महत्वपूर्ण फिल्म से प्रदर्शित किया था। जिस तरह से उन्होंने उस फिल्म को बनाया था, ऐसा लगता था अवचेतन में यह फिल्म नहीं बल्कि वह देह है जिसमें उनके प्राण बसते हैं। जीना यहाँ मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ और ऐ भाई जरा देख के चलो जैसे गाने में दुनिया में अपने होने के अर्थ को स्पष्ट तथा सार्थक करना और ऐ भाई जरा देख के चलो गाने में यह दर्शन कि यह दुनिय हमेशा बने रहने की जगह नहीं है, देखा जा सकता था। उनके द्वारा बनायी गयी ग्लैमर और उत्तेजना से भरपूर फिल्म बाॅबी वास्तव में मेरा नाम जोकर जैसी दार्शनिक फिल्म खारिज देने वालों को वह जवाब थी जिसमें उन्होंने लगभग सामाजिक भटकाव और मनोरंजन के बदलते आस्वाद की छिपी प्रवृत्ति वाली जिव्हा में पसन्द का स्वाद ही रख दिया था। बाद में सत्यम शिवम सुन्दरम, राम तेरी गंगा मैली में वे शो मैन बनते चलते गये। ऐसे शो मैन बन गये जो अपनी पहचान, समृद्ध प्रतिष्ठता और अपने होने के अर्थ का भी बादशाह है। 

यह सही है कि राजकपूर अस्थमा के अपने आकस्मिक आघात से उपजी परिस्थितियों के जानलेवा हो उस आयाम तक न  पहुँच सके लेकिन वे वो लकीर खींचने में कामयाब जरूर हुए जो बहुत श्रेष्ठता के साथ उनकी स्मृतियों को अमर रख सके। एक फिल्मकार के रूप मे उनकी पहचान, आज भी उनकी यादगार फिल्मों के माध्यम से है। अंधेरे में आँख खोलकर टकटकी बांधे सारी वर्जनाओं को त्याग देने को आतुर दर्शक के साथ प्रेम रोग और सत्यम शिवम सुन्दरम फिर राम तेरी गंगा मैली बनाकर उन्होंने उन आलोचकों को भी चुप कर दिया था जो राजकपूर को सीमाओं में रखकर देखते थे। वास्तविकता यही है कि वे एक महान फिल्मकार थे, एक महान कलाकार थे और उतने ही महान आम आदमी भी थे। समग्रता में उनकी आवाजाही अपने खास आदमी से अपने आम आदमी तक सहजतापूर्वक हो जाया करती थी और यह विशिष्टता से आज हमारे बहुतेरे फिल्मकार परे होकर रह गये हैं। 


मध्यप्रदेश में सिनेमा : यहाँ बनी फिल्‍मों से जुड़ा इतिहास और स्‍मृतियाँ



मध्यप्रदेश राज्य नैसर्गिक सम्पदा, ऐतिहासिक विरासत, अमर कथाओं और घटनाक्रमों की अविस्मरणीय और कालजयी थाती को समेटे ऐसे प्रदेश के रूप में अपनी पहचान रखता है जिसकी खूब देश-दुनिया को आकृष्ट करती है। कितने ही कलाकारों ने अपनी सर्जना में मध्यप्रदेश को समाहित किया है। चित्रकारों ने चित्र, शिल्पकारों ने शिल्प, संगीतकारों ने साधना और फिल्मकारों ने यहाँ की धरोहरों और स्थानों को अपने भव्य और महँगे कैमरों से देखा है और फिर यह सब नजारा देश और दुनिया के सामने आया है। यह सचमुच विशिष्ट है कि पिछले पचास से भी ज्यादा वर्षों में मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत अपनी मौलिक छायाछबियों में इस तरह प्रकाशमान हुई है कि दुनिया के अनेक देशों के पर्यटक, सैलानी, संस्कृतिप्रेमी यहाँ वर्ष भर आते-जाते रहते हैं। यह अनूठे सांस्कृतिक संयोग हैं कि मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, पर्यटन स्थलों पर संस्कृति के श्रेष्ठ उपक्रमों की पहचान न केवल जुड़ी हुई है बल्कि बरसों-बरस इतनी समृद्ध हो गयी है लोग ग्वालियर में तानसेन समाधि परिसर से तानसेन समारोह को, खजुराहो के कालजयी स्थापत्य और मन्दिरों को नृत्य समारोह से, मैहर को उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत समारोह से, पचमढ़ी को पचमढ़ी उत्सव से, माण्डू को माण्डू महोत्सव से, भोजपुर को भोजपुर महोत्सव से, साँची को महाबोधि उत्सव से, इन्दौर को अमीर खाँ समारोह से, उज्जैन को अखिल भारतीय कालिदास समारोह से, जबलपुर भेड़ाघाट को नर्मदा महोत्सव से, चित्रकूट को शरदोत्सव से पहचानते हैं, याद करते हैं और ऐसे अवसरों का साक्षी और प्रेक्षक बनने के लिए देश-दुनिया से मध्यप्रदेश आते हैं। 

अभी हाल ही में एक दिलचस्प संयोग देख रहा हूँ। नेशनल फिल्म अवार्डों की घोषणा हुई है। चन्देरी पर बनी श्रेष्ठ प्रमोशनल फिल्म को पुरस्कृत किया गया है जिसे गुणी फिल्मकार राजेन्द्र जांगले ने बनाया है। जांगले पाँचवीं बार अपनी किसी फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित हुए हैं। दिलचस्प यह है कि इसी बीच चन्देरी मुम्बई के बड़े निर्माण घरानों की निगाह में आया है। बैजू बावरा का इतिहास तो चन्देरी के नाम से अमर है ही, यहाँ की साड़ियाँ भारतीय परम्परा में उत्कृष्ट निर्माण और बुनावट के कारण देश-दुनिया में महिलाओं के लिए अनूठा पहनावा और चयन है। अभी पिछले चार माह में चन्देरी में दो फीचर फिल्मों का बड़ा हिस्सा शूट किया गया है। ये फिल्में हैं सुई धागा जो यशराज घराने की एक बड़ी फिल्म है। इसमें वरुण धवन और अनुष्का शर्मा काम कर रहे हैं। शरत कटारिया इसके निर्देशक हैं। दूसरी फिल्म है स्त्री जिसमें राजकुमार राव की अहम भूमिका है जिनको न्यूटन फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया है। स्त्री एक हाॅरर काॅमेडी जिसमें उनके साथ श्रद्धा कपूर काम कर रही हैं। अमर कौशिक इस फिल्म के निर्देशक हैं। इस तरह अचानक फिल्मकारों का चन्देरी को एकाग्र करना जितना दिलचस्प है उतना ही अहम भी। 

भोपाल, मध्यप्रदेश की राजधानी है। राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों में भी लम्बे समय में अनेक महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ। विशेष रूप से दो बड़ी फिल्मों का जिक्र जरूर किया जाना चाहिए जिनमें एक मर्चेण्ट आयवरी प्रोडक्शन्स की इन कस्टडी है जिसको उर्दू में मुहाफिज़ नाम दिया गया था। इस फिल्म में शशि कपूर, शाबाना आजमी, ओम पुरी, नीना गुप्ता आदि ने अहम भूमिकाएँ निभायीं थी। यह गुमनामी के शिकार एक शायर पर केन्द्रित थी। इस फिल्म का प्रदर्शन काल 1993 का है। भोपाल में एक महीने से भी ज्यादा समय तक इस फिल्म का बनना अपने आपमें शहर के लिए उपलब्धि था। पुराने भोपाल के अनेक स्थल गौहर महल, सैफिया काॅलेज, मोती मस्जिद, हाथी खाना आदि स्थानों पर इसका फिल्मांकन हुआ। हास्य अभिनेता जगदीप को एक बड़ी पहचान शोले फिल्म के सूरमा भोपाली किरदार से मिली थी। बाद में उन्होंने 1998 में इसी नाम से एक फिल्म बनायी तो उसके कई हिस्से और एक गाना फिल्माने वे भोपाल आये। इस फिल्म में जगदीप ने अनेक बड़े सितारों को मेहमान कलाकार के रूप में शामिल किया था। इसी प्रकार 2003 में अपनी फिल्म मकबूल बनाने विशाल भारद्वाज भोपाल आये जब रंगकर्मी और प्रसिद्ध आर्ट डायरेक्टर जयन्त देशमुख ने उनको इस फिल्म के मिजाज और व्यवहार के दृष्टिगत लोकेशन भोपाल सुझायी। इम्पीरियल सेब्रे होटल में लम्बे समय इस फिल्म की शूटिंग चली, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, इरफान, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा, तब्बू जैसे कलाकार यहाँ आये और रहे। 

भोपाल में ही गुलजार ने सुनील शेट्टी और तब्बू के साथ हू तू तू फिल्म बनायी। सुधीर मिश्रा ने हजारों ख्वाहिशें ऐसी फिल्म बनायी। विजयपत सिंघानिया ने वो तेरा नाम का एक बड़ा हिस्सा शूट किया। मणि रत्नम ने भी शूल और युवा फिल्मों को शहर में फिल्माया है। समानान्तर सिनेमा आन्दोलन के एक प्रमुख फिल्मकार प्रकाश झा जो दामुल, हिप हिप हुर्रे और मृत्युदण्ड से प्रतिष्ठित हुए, एक समय निर्णय करके भोपाल में 2009 में राजनीति के नाम से अपनी अगली फिल्म बनाने आये। नाना पाटेकर, नसीर, मनोज वाजपेयी, अजय देवगन, रणवीर कपूर, अर्जुन रामपाल, कैटरीना कैफ आदि अनेक बड़े सितारों के साथ उन्होंने यह खर्चीली फिल्म बनायी। इस फिल्म ने उनको जो लाभ दिया उसके बाद वे एक के बाद एक अनेक फिल्में यहाँ रहकर बनाते गये जिनमें आरक्षण, सत्याग्रह, चक्रव्यूह, जय गंगाजल आदि प्रमुख हंै। चक्रव्यूह के बड़े हिस्से के लिए झा ने पचमढ़ी लोकेशन भी चुनी थी। हालाँकि जिस क्रम और हड़बड़ी में वे बाद में काम करते गये, उनकी लगातार विफल होती फिल्मों ने फिलहाल कुछ समय के लिए उनको अवकाश लेने पर भी विवश कर दिया। 2012 के आसपास भोपाल के ही चर्चित फिल्म पटकथाकार और निर्देशक रूमी जाफरी ने अपने शहर में गली गली चोर है नाम की फिल्म का निर्माण किया। इसके बाद अनिल शर्मा एक फिल्म सिंह साहेब द ग्रेट बनाने 2013 में भोपाल आये। सनी देओल, प्रकाश राज इस फिल्म के अहम कलाकार थे। 

इधर एक ओर नासिर हुसैन जैसे एक बड़े निर्माता के नाम से भोपाल शहर की पहचान जुड़ती है, वहीं उनके वंश के होनहार फिल्मकार, अभिनेता आमिर खान ने भोपाल से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव में पीपली लाइव फिल्म का निर्माण किया। इस फिल्म को बड़ी चर्चा मिली थी। राजधानी का सिनेमा के हब के रूप में विकसित होना एक बड़ी बात रही है। राजधानी से आगे चलें तो पूरे मध्यप्रदेश में फिल्म निर्देशकों ने अनेक मनोरम स्थलों का चयन किया जो पर्यटन के लिहाज से भी उल्लेखनीय हैं। मणि रत्नम का दो फिल्में बनाने मध्यप्रदेश आने के बाद रावण बनाने ओरछा आना अहम है। समीर कर्णिक ने महेश्वर आकर यमला पगला दीवाना बनायी जिसमें धर्मेन्द्र, सनी देओल और बाॅबी देओल ने साथ काम किया। पचमढ़ी में प्रकाश झा ने चक्रव्यूह बाद में बनायी पहले प्रदीप कृष्ण नेशनल अवार्ड विनिंग फिल्म मैसी साहब बना चुके थे रघुवीर यादव और अरुंधति राय को लेकर। उन्होंने पचमढ़ी में ही एन इलेक्ट्रिक मून फिल्म भी बनायी। यहीं पर विख्यात अभिनेता, निर्देशक अमोल पालेकर ने थोड़ा सा रूमानी हो जायें फिल्म पूरी ही बनायी जो लगभग एक मर्मस्पर्शी कविता की तरह है। इसमें नाना पाटेकर, विक्रम गोखले, अनिता कँवर ने काम किया था। एन. चन्द्रा की फिल्म नरसिम्हा और सोहेल खान की फिल्म प्यार किया तो डरना क्या के सुपरहिट गाने हम से तुम दोस्ती कर लो और तुझे प्यार है मुझसे बोल दे भी इन्दौर में शूट किए गये। 

पुरानी स्मृतियों में समय-समय पर अनेक यादगार फिल्मों की शूटिंग होने और एक से बढ़कर एक सितारों के मध्यप्रदेश आगमन की बातें स्थायी उल्लेख में मिलती हैं। मध्यप्रदेश के साथ यह भी रहा है कि यहाँ से एक से बढ़कर एक कलाकार सिनेमा और मनोरंजन की दुनिया में समय-समय पर शीर्ष हस्ताक्षर हुए हैं। हम बड़े गौरव के साथ जाॅनी वाकर, सलीम खान, जावेद अख्तर, जया बच्चन, गोविन्द नामदेव, पण्डित रघुनाथ सेठ, किशोर कुमार, लता मंगेशकर आदि का नाम लेते हैं। एक समय में जाॅनी वाकर जो कि इन्दौर से मुम्बई गये थे, गुरुदत्त के निमंत्रण पर, वे अक्सर दिलीप कुमार, नौशाद आदि अपने मित्रों के साथ भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में पिकनिक मनाने आते थे। ऐसी ही एक भोपाल यात्रा में दिलीप कुमार ने शकीला बानो भोपाली कव्वाल का गाना सुना था और उनको मुम्बई फिल्मी दुनिया आने का निमंत्रण दिया था। दिलीप कुमार के साथ भी मध्यप्रदेश की स्मृतियाँ बहुत पुरानी जुड़ी हैं। 1952 में फिल्मकार मेहबूब खान की फिल्म आन के एक गाने का फिल्मांकन इन्दौर में हुआ था, जहाँ एक शानदार बग्गी में दिलीप कुमार और नादिरा के साथ एक गाना, दिल में बसा के प्यार का तूफान ले चले फिल्माया गया था। इसी प्रकार होशंगाबाद के निकट बुदनी में 1957 में नया दौर फिल्म का क्लायमेक्स फिल्माया गया था। साथी हाथ बढ़ाना गाने के साथ हुई तांगा दौड़ में दिलीप कुमार के साथ जीवन, वैजयन्ती माला और जाॅनी वाकर ने भी हिस्सा लिया था। यादगार फिल्म दिल दिया दर्द लिया 1966 में बनी थी। इसकी शूटिंग माण्डू और उसके निकट के अनेक हिस्सों में हुई थी। भारत भूषण और निरुपा राय की फिल्म रानी रूपमति माण्डू में फिल्मायी गयी। माण्डू में ही गुलजार ने किनारा फिल्म के खूबसूरत और मर्मस्पर्शी प्रसंगों का फिल्मांकन किया था वहीं रतलाम के सैलाना में निर्देशक राजकुमार कोहली ने धर्मेन्द्र और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच तलवारबाजी के दृश्य जीने नहीं दूँगा फिल्म के लिए शूट किए थे। 

हम हैं राही प्यार के, हम से कुछ न बोलिए......देव आनंद के इस गाने के फिल्मांकन के साथ ही इन्दौर-महू की याद हो आती है। इस गाने के पहले सवारी के लिए आवाज लगाते इन्दौर रेल्वे स्टेशन के पास देव आनंद, इन्दौर-महू साढ़े छः आना बोल रहे होते हैं। फिल्म नौ दो ग्यारह का यह दृश्य और देव आनंद का अन्दाज, जो भी प्यार से मिला, हम उसी के हो लिए कहाँ भुलाया जा सकता है! 

राजकपूर का मध्यप्रदेश से बड़ा लगाव रहा है। राजकपूर की ससुराल रीवा में थी। उनके ससुर करतारनाथ मल्होत्रा रीवा रियासत के डीआईजी थे। राजकपूर की बारात का रीवा आना और उस बारात में अशोक कुमार का आना, इसके साथ एक दिलचस्प घटना यह कि दुल्हन बनी कृष्णा को जब यह मालूम हुआ कि बारात में अशोक कुमार भी हैं तो उनको देखने के लिए ललक के साथ वे अपनी सहेलियों को लेकर घर की छत पर चली गयीं आती हुई बारात में अशोक कुमार को देखने। राजकपूर की अनेक फिल्मों के फिल्मांकन का साक्ष्य मध्यप्रदेश से जुड़ता है। राजकपूर की फिल्म आह जो 1953 का निर्माण है, आखिरी गाना जिसमें तांगा चलाते हुए पाश्र्व गायक मुकेश, तांगे में रोगी बनकर बैठे राजकपूर और छोटी सी ये जिन्दगानी रे चार दिन की जवानी तेरी, हाय रे.......इस गाने के पहले सतना का रेल्वे स्टेशन है और नायक तांगे में बैठकर रीवा जा रहा है। इसी प्रकार 1955 में श्री चार सौ बीस का, मेरा जूता है जापानी गाना जिसमें सड़क मध्यप्रदेश की है और रास्ता मुम्बई को जा रहा है। बासु भट्टाचार्य की फिल्म तीसरी कसम का नायक भी अपनी बैलगाड़ी के साथ मध्यप्रदेश की सड़कों पर दौड़ता है, राजकपूर को दर्शक देखते हैं बीना स्टेशन के पास छोटा स्टेशन कुरवाई जहाँ वो गाड़ीवान के रूप में सवारी के लिए प्रतीक्षारत हैं। यही नहीं 1960 की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है में भेड़ाघाट की चट्टानंे और नर्मदा नदी गंगा नदी का प्रतीक बनकर दिखायी देती हैं। ओ बसन्ती पवन पागल गाती हुई नायिका जिसकी भूमिका पद्मिनी ने निभायी है। जब दूर-दराज से सैलानी जबलपुर, भेड़ाघाट और नर्मदा नदी को धुँआधार वेग में देखने आते हैं तो जिस देश में गंगा बहती है को याद न करें, ऐसा हो ही नहीं सकता। 

1963 की फिल्म मुझे जीने दो के निर्देशक के रूप में नाम भले मोनी भट्टाचार्य का गया था लेकिन वह थी पूरी तरह सुनील दत्त के नियंत्रण की फिल्म जो कि इसके निर्माता भी थे। इसकी शूटिंग मुरैना और चम्बल के बीहड़ों में हुई थी जो दस्यु जीवन और उसकी विडम्बनाओं के साथ ही परिस्थितियों के शिकार, बेहतर जीवन की चाहत रखने वाले इन्सान की बेबसी को चित्रित करती है। यह एक सशक्त फिल्म थी जिसमें सुनील दत्त ने अपने जीवन की उत्कृष्ट भूमिका निभायी थी। वहीदा रहमान इस फिल्म की गरिमामयी नायिका जिन पर फिल्माये गीत, नदी नारे न जाओ श्याम पैंया पडूँ, रात भी है कुछ भीगी-भीगी में उनकी असाधारण नृत्य प्रतिभा, कथक का प्रभाव और लच्छू महाराज की कोरियोग्राफी भुलाया नहीं जा सकता। 

समृद्ध इतिहास से लेकर उपलब्धियों भरे वर्तमान के बीच भोपाल में 1985 में फिर आयी बरसात फिल्म की शूटिंग के समाचार अखबारों में खूब आया करते थे। यह भी कि नायक सुनील लहरी भोपाल के ही हैं। जयप्रकाश के विनायक इस फिल्म के निर्देशक थे जिसमें नायिका बनी थीं अनुराधा पटेल। बाद में सुनील लहरी रामानंद सागर के बहुचर्चित धारावाहिक रामायण के लक्ष्मण के रूप में खूब चर्चित हुए। शाहरुख खान की अशोका इस सदी की पहली बड़ी और चर्चित फिल्म थी जिसके निर्देशक संतोष सिवन ने जबलपुर, खजुराहो, पचमढ़ी आदि से कुछ स्थानों का चयन फिल्मांकन के लिए किया था। करीना कपूर इस फिल्म की ग्लैमरस नायिका थीं। ऐसे ही दो साल पहले आशुतोष गोवारीकर ने अपनी फिल्म मोहेन्जो दाड़ो की शूटिंग जबलपुर और आसपास की। मध्यप्रदेश के पर्यटन स्थलों में प्रसिद्ध ग्वालियर, ओरछा, खजुराहो, माण्डू, पचमढ़ी, महेश्वर आदि से फिल्मों के अनेकानेक सन्दर्भ जुड़े हैं। कहने का तात्पर्य यह कि भारत का यह हृदयप्रदेश और भारतीय सिनेमा का इतिहास और उसका वर्तमान मिलकर एक ऐसे उल्लेखनीय संयोग को समृद्ध करते हैं जिसका सरोकार हम सबके जीवन और जमीन की उपलब्धियों से जुड़ा हुआ है। अभी हाल ही में लगातार अक्षय कुमार की दो सुपरहिट फिल्में टाॅयलेट एक प्रेमकथा और पैडमेन मध्यप्रदेश में फिल्मांकित हुईं। टाॅयलेट एक प्रेमकथा, सिनेमा के गुणी सम्पादक निर्देशक श्रीनारायण सिंह की पहली निर्देशकीय सफलता थी वहीं पैडमेन, दक्षिण के पारखी फिल्मकार आर. बाल्कि ने बनायी थी। इसके लिए श्रीनारायण सिंह होशंगाबाद, नर्मदा तट, सेठानी घाट आदि जगहों पर होली का एक गाना शूट कर ले गये थे। आर. बाल्कि ने पैडमेन के निर्माण में महेश्वर के नर्मदा तट का खूबसूरत उपयोग किया, वहाँ अक्षय कुमार खूब सायकिल चलाते हुए दिखायी देते हैं। 

देखा जाये तो इस पूरी नयी सदी के ये लगभग दो दशक मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक निर्माण की दृष्टि से बहुमूल्य रहे हैं। जिस तरह से मध्यप्रदेश का विकास किया हुआ है। पथ मार्ग से यह राज्य पास-पड़ोस के सभी राज्यों से सुगमतापूर्वक जुड़ता चला गया है। यहाँ की यात्रा सुगम है, दिन-रात सड़क मार्ग पर लम्बी यात्रा निर्भय होकर की जा सकती है। मध्यप्रदेश के शहर जागते हुए हैं जहाँ लोगों की उपस्थिति से उनको पहचान मिली है। मध्यप्रदेश का आतिथ्य, मनोरम स्थल, आवभगत, सहयोग-सहायता और सांस्कृतिक सहभागिता और सरोकारों में प्रत्येक आने वाले के अनुभव उनकी यादगार रहे हैं। 

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सोमवार, 28 मई 2018

फिल्‍म चर्चा / बायस्‍कोपवाला

काबुलीवाला से अलग बायस्‍कोपवाला पर ही एकाग्र होने पर




बायस्कोपवाला ने ध्यान इसीलिए आकृष्ट किया कि उसमें डैनी को एक पूर्णाकारी भूमिका मिली है। डैनी किरदारों के चयन में सावधानी बरतते हैं और हर अनुबन्ध उनको स्वीकार हों, ऐसा नहीं होता। यह एक छोटी सी, सीमित बजट की फिल्म उन्होंने करनी चाही, इसके पीछे जरूर कुछ बात होगी, भावनात्मक भी शायद। तो पता लगा, वे बिमल राॅय की स्मरणीय फिल्म काबुलीवाला से प्रभावित रहे हैं और निर्देशक ने उनको यह भरोसा दिलाया कि यह कहानी उसने उसी से प्रभावित होकर अब के कोई बीस-तीस साल के कालखण्ड को सोचकर फिल्म बनाने के लिए चुनी है। 

सम्बन्धों में संवेदना का अपना स्थान होता है। बिना संवेदना के सम्बन्ध यांत्रिक हो जाते हैं। यहाँ एक बेटी अपने पिता का फोन व्यस्तता के किसी क्षण में नहीं सुन पाती और पिता का जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। पिता एक यात्रा पर था जो अधूरी रह जाती है और उस यात्रा में एक भावनात्मक संकल्प छिपा होता है। बेटी इस काम को हाथ में लेती है। अपने पिता के द्वारा पनाह पाये एक अफगान से वर्षों पूर्व भारत आ गये और यहाँ बायस्कोप दिखाकर बच्चों का मनोरंजन करने वाले वृद्ध से जुड़कर वो पहले उसके अतीत का पता लगाने निकलती है फिर उसकी बेटी का।

कहानी फिल्म की बहुत सीधी और तरल हो सकती थी लेकिन स्मरणों और अधूरी सूचनाओं की पुष्टि में अनेक बार पूर्वदीप्ति में जाना, कहानी से वर्तमान को जोड़ना और तारतम्यता देने में कहीं-कहीं चूक दिखती है। डैनी के किरदार के नजरिए से देखूँ तो इसमें डैनी के मौन, चुप्पी को बखूबी परदे पर प्रभाव पैदा करने में सफल हुआ है निर्देशक लेकिन एक अशान्त देश से निर्वासित जहाँ से वे छोटे-छोटे हिस्से सहेजे आ गये जो बायस्कोप के भीतर बच्चों की आँखों के सामने कौतुहल रचते हैं लेकिन छोटी उम्मीद से परदेस आ गया एक व्यक्ति फिर अपनी बेटी से मिल नहीं पाता। 

राॅबी बासु अपने आपमें पूरी तरह संवेदनशील व्यक्ति नहीं है तभी वह एक बार पुलिस को रहमत अली के अपने घर में होने की सूचना देकर पकड़वा भी देता है। प्रायश्चितों में पता चलता है कि वह किसी भी प्रकार का अपराधी नहीं है। अविश्वास और उससे उपजा गुनाह और गुनाह का प्रायश्चित अजीब सी तिर्यक रेखाएँ हैं जो किसी भी मनुष्य को अविश्वसनीय बनाती हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने परिवार को खो देता है, मुल्क को खो देता है वह जिस देश में पनाह लेता है वहाँ भी उसकी मुलाकात अपने ही उस गुम आदमी से नहीं हो पाती जो छाया की तरह उसके साथ भी है और उससे परे भी। डैनी अपने को ठीक-ठीक रेखांकित करते हैं इस जगह पर जो उनकी इतने बरसों के अनुभव की सिद्धी है। 

आदिल खान अपनी भूमिका से बहुत सारी जगहों को भरते हैं लेकिन मिनी के रूप में गीतांजलि थापा ने दूसरे क्रम पर प्रभावित करने की कोशिश की है। एकावली खन्ना को हाल में एक फिल्म में बड़ी अच्छी भूमिका में देखा है, यह श्यामला सुन्दर छबि अपने एक संवाद से प्रभावित करती है, मुझे जिन्दगी ने ऐसा दिया ही क्या है जिसके खो जाने का दुख करूँ। वैसे उनकी भूमिका छोटी सी है इसके बावजूद उनका संज्ञान लिया जाता है। भोला, बृजेन्द्र काला इधर निरन्तर अच्छी फिल्मों के अच्छे किरदार हैं, इस फिल्म में भी। फिल्म में आक्रान्त भीड़ के अंधेपन और उससे होने वाले हादसों को भी बखूबी चित्रित किया गया है, इसमें राफे मेहमूद की सिनेमेटोग्राफी का बहुत पास तक जाकर दिखाती है। दीपिका कालरा फिल्म को बहुत अच्छा सम्पादित करती हैं तभी नब्बे मिनट की यह फिल्म एक संवेदनशील अनुभव साबित होती है। 

निर्देशक देव मेढ़ेकर ने रवीन्द्रनाथ टैगोर, काबुलीवाला और उसकी मीठी यादों को बायस्कोप वाला से दर्शकों में ताजा करने, पुनरावलोकन कराने का प्रयत्न किया है पर पटकथा में बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं मिल पायी है उनको बेहतर कर पाने की। गुलजार के गीत को संदेश शाण्डिल्‍य ने कोमलता से निभाया है। बैकग्राउण्‍ड म्‍युजिक में भी वे विष्‍ाय की गम्‍भीरता के खूब समझे हैं। निर्माता सुनील दोशी के साथ मिलकर राधिका आनंद में इसमें मेहनत की है पर बड़ी दर्शक संख्या तक जाने के लिए और सर्जनात्मक परिश्रम आवश्यक था। 




शुक्रवार, 18 मई 2018

फिल्‍म चर्चा / अंग्रेजी में कहते हैं..

एक मध्‍यमवर्गीय जीवन, घर और उसमें रहने वालों से मिलते हुए

 


ऐसे समय में जब हमारे सिनेमा में निरी भव्यता, झूठे और भ्रमित कर देने वाले सपने, अविश्वसनीयता, संवेदनहीनता और भटकाव भलीभांति घर कर गया हो। ऐसे समय में जब सिनेमा महंगे माॅल और उसके लगभग बहलाने वाले आकर्षण में हमको लगभग दो-ढाई घण्टे चपेट लिया करता हो, हमारी जेब को ठिकाने लगाने में निर्मम हो, कोई फिल्मकार मध्यमवर्गीय परिवार और घर की कहानी लेकर उसको उसी वास्तविकता और ईमानदारी से बनाकर प्रस्तुत करने का जतन करेगा तो क्या होगा, बताइये! शायद आप कहने लगें यदि सिनेमा और उसके बाजार के इन्द्रजाल को थोड़ा-बहुत भी जानते हों, कहने लगें कि या तो उसे थिएटर नहीं मिलेगा और यदि मिल भी गया तो दर्शक नहीं मिलेगा................।

अंग्रेजी में कहते हैं, फिल्म बनाने वाले लेखक निर्देशक हरीश व्यास को क्यों यह ख्याल आया यह तो वे ही जाने लेकिन अपने ही शहर में दूरियों और समय की जटिल शर्तों के बीच गिने-चुने शो में प्रदर्शित इस फिल्म को देखने के लिए मैं आठ-दस दिन से प्रतीक्षित था सो चला गया। 

परदे पर इस फिल्म का आरम्भ अपने आपमें ऐसा सम्मोहन है कि पहले दृश्य से ही आप इसके साथ हो लेते हैं। परदे पर गंगा, चलती हुई नाव, नामावली और महुआ चक्रवर्ती के कण्‍ठ से झरता स्‍वर, अब मान जाओ सांवरिया से ही आप फिल्‍म के पक्ष में हो लेते हैं। फिल्म की कहानी एक क्लर्क यशवंत बत्रा की है जो एक आॅफिस में क्लर्क है और छोटे से घर में अपनी पत्नी किरण और बेटी प्रीति के साथ रहता है। प्रीति बहुत मुखर और समझदार है। बत्रा अधेड़ उम्र के मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया की तरह जीवन जी रहा है जिसके जीवन में जीवन का ही आकलन धरातल से नीचे है। पत्नी और बेटी के साथ उसका व्यवहार भी वैसा। बनारस शहर का परिवेश है। बेटी मुहल्ले के युवक से प्रेम करने लगी है, पिता को पता नहीं है और एक दिन वह तब जान पाता है जब वह घर में बिना बताये मन्दिर में शादी कर लेती है।

इधर पिता जिस घर में रह रहा है उसी को बेचकर बेटी की शादी करने के स्वप्न देखता है। वह पत्नी से बात-बेबात झगड़ता भी है और दिन भर की कुण्ठा को दूर करने के लिए रात को शराब भी पीता है। उसका जीवन इतना ही है। पत्नी किरण ने तय कर लिया था कि बेटी की शादी होने के बाद वो भी घर से अपनी मां के घर चली जायेगी। बेटी की शादी हो जाती है और पत्नी भी चली जाती है। बत्रा, उसे रोक नहीं पाता, साथ रहती है तो उसका होकर रह नहीं पाता, उसके प्रति अपना प्रेम नहीं जता पाता। जिस तरह के स्वभाव को वह जीता है, अघा गये आसपास के लोग उसका साथ छोड़ देना चाहते हैं।

अकेले घर में रह रहे बत्रा के जीवन में बेटी और दामाद एक सुखद बदलाव बनकर आते हैं जिसमें दोनों उसकी बेबसी, अपने आपमें गुम रहने की उसकी कुण्ठा से बाहर लाने का प्रयत्न करते हैं। वे उसके कपड़ों को ही नहीं बदलवाते, झेंप, झिझक और बरसों का अकथ जो उसके भीतर राख हो गया है, उसको जिलाने का काम करते हैं। यही बत्रा अब किरण को पटा-फुसलाकर, प्यार का वास्ता देकर ले आना चाहता है...........

फिल्म में एक आप्त वाक्य दिलचस्प है, हर हिट फिल्म के लिए शाहरुख खान का हीरो होना जरूरी नहीं है, यह हीरोशिप हर आदमी के भीतर होती है। रोचक ढंग से इस फिल्म को अन्त तक लाया गया है। उत्तरार्ध में फिरोज के रूप में एक चरित्र भी बत्रा के जीवन में बदलाव लाता है जिसकी पत्नी मृत्यु शैया पर है लेकिन उसको भरोसा है कि एक दिन वह उसे अपने साथ घर ले जायेगा, दोनों में प्रेम विवाह हुआ है।

बत्रा के रूप में संजय मिश्रा उसी तरह किरदार बन जाते हैं जैसे वे अपनी हर फिल्म में होते हैं। फिर उनको परिवेश भी वैसा ही मिला है, बनारस, गंगा, घाट के आसपास पूरी फिल्म किस तरह से अपने आपको तमाम बहकाव से बचाती हुई उपसंहार तक पहुंचती है, देखने योग्य है। संजय की हंसी, उनका रोना, उनकी लम्बी चुप्पी और बोल सब कुछ ऐसे लगते हैं जैसे हम से ही यह सब बुलावाया जा रहा हो। किरण के रूप में इकावली खन्ना ने लगभग उसी प्रत्युत्तर में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। अपने सांवले रंग में वे बड़ी उम्र एक स्त्री के संघर्ष और टूटते मन की वाणी बनकर सामने आती हैं। बेटी की भूमिका में शिवानी रघुवंशी की उपस्थिति को बहुत सकारात्मक और आश्वस्त कहा जाना चाहिए। फिल्‍म में अंशुमान झा की भूमिका बत्रा की बेटी प्रीति के प्रेमी और पति की है, यह युवा भी बड़े आश्‍वस्‍त होकर दृश्‍य में आता है, खासकर संजय मिश्रा के साथ उनके संवाद दिलचस्‍प हैं।

पंकज त्रिपाठी इस फिल्म में अपनी एक मर्मस्पर्शी लघु कथा की तरह अपनी कहानी के साथ दृश्य में आते हैं और उसी संजीदगी के साथ अपने चरित्र को साकार करते हैं जिसकी जरूरत कहानी को होती है। पंकज त्रिपाठी की नायिका की भूमिका में इप्शिता त्रिपाठी ने एक लम्‍बे दृश्‍य में जो ध्‍यान आकृट किया है उसका जिक्र भी जरूरी है। अलग जाति में प्रेमविवाह, पिता की नाराजगी और बाद में अचानक एक जानलेवा बीमारी का शिकार हो जाना, एक ही दृ‍श्‍य जो इस चरित्र की मृत्‍यु से पूर्ण होता है, मन को छू जाता है। पंकज अन्तिम दृश्‍य में असहनीय बिछोह के हीरो बनकर दिखायी देते हैं। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कहीं भी कृत्रिमता, नकलीपन या भ्रमित करने वाला तरीका प्रयोग में नहीं लाया गया है। गरीब बत्रा का पुराना और बरसों से रंग-रोगन को तरसता मकान, शादी के दृश्यों में सात-आठ लोगों भर की उपस्थिति, कोई आडम्बर या विलासिता थोपी नहीं गयी है। निर्देशक ने सचमुच मध्यवर्गीय जीवन को जिस तरह छूते हुए इस बड़े वर्ग की चिन्ताओं और परिस्थितियों को सामने रखा है वह सराहनीय है। 

निर्देशक और पटकथाकार हरीश व्यास की इस बात के लिए भी प्रशंसा की जाना चाहिए कि उन्होंने सिनेमेटोग्राफी से लेकर कला निर्देशन, गीत और संगीत में खूब समरसता निभायी है, कहीं भी समझौता नहीं किया। फिल्म देखते हुए जब हम कहानी का हिस्सा होकर कोई न कोई किरदार में अपने आपको ढूंढ़ने लगते हैं तो ऐसा लगता है जैसे यह हमारे साथ ही घटित हो रहा है। फिल्म का प्रमुख चरित्र बत्रा का गंगा से रिश्ता भी खूब व्यक्त किया गया है, वह अपनी तकलीफ, अपने अव्यक्त, अपने द्वंद्व और अपने अवसाद में किस तरह गंगा के किनारे जा खड़ा होता है, कभी मंदिर के बाहर बैठा है कभी चबूतरे पर, कभी नाव में। 

गंगा नदी के सान्निध्य में जैसे हमारे सारे के सारे आवरण छूट जाते हैं, सारे के सारे पाखण्ड पकड़े जाते हैं, सारी की सारी भूलें हमारे अन्तद्र्वन्द्व में तिर कर उपर आ जाती हैं, ऐसा लगता है कि अपनी विराटता में बहती गंगा एक ऐसा वृहद आत्मावलोकी दर्पण है जिसके सामने कुछ भी छिपा नहीं है। फारुख मिस्त्री की सिनेमेटोग्राफी इन मायनों में कमाल की है। यह ऐसी फिल्म है जिसके गानों को भी कई दिन सुनने की इच्छा बनेगी, गीतों में बनारस घराने की पारम्परिक गायिकी के साथ दूसरे गीतों को शान, मोहित चौहान, वैशाली महादे, अभिजीत घोषाल, महुआ चक्रवर्ती, सत्येन्द्र त्रिपाठी शिराओं में उतर जाने वाली अनुभूति कराने के साथ गाया है। 

अंग्रेजी में कहते हैं के बारे में कहना यही होगा कि अपने जमीर, अपने भीतर के धूमिल होते सच और सीमाओं में छटपटाते सपनों के साथ कुछ देर अपने में होने की इच्छा यदि आपकी बनती है तो यह फिल्म निश्चित ही आपके लिए है। ऐसी फिल्मों को दर्शक समर्थन बड़ी प्रासंगिकता है।  


गुरुवार, 17 मई 2018

फिल्‍म चर्चा : राजी

प्रतिबद्धता और सम्‍बन्‍धों की संवेदना पर महिला फिल्‍मकार की दृष्टि  


राजी देखने के पीछे एक कारण तो यही था कि फिल्म की चर्चा है और दर्शक भी। एक कारण यह था कि गुलजार साहब के गीत बड़े दिन बाद सुनने को मिलेंगे। तीसरा कारण यह भी था कि फिलहाल और तलवार के बाद मेघना गुलजार की इस माध्यम में एक निर्देशक की तरह पकड़ कैसी है, किस तरह भिन्न है या पिता का कितना-कैसा प्रभाव है!

सभी कारणों का कुछ-कुछ समाधान मिलता है। फिल्म देखते हुए न जाने क्यों गुलजार साहब की माचिस का स्मरण हो आता है। बहरहाल राजी की खूबियों पर केन्द्रित करें तो बात आलिया भट्ट से ही शुरू करनी होगी। इस दौर की यह बहुत प्रतिभाशाली लड़की है। अपनी कद-काठी से बहुत छोटी लगती है उम्र में लेकिन उतनी ही परिपक्वता के साथ दृश्य में होती है, उतने ही आत्मविश्वास के साथ अपना चरित्र कहती है जो वह परदे पर निबाह रही होती है।

यह एक कालखण्ड विशेष की फिल्म है जो हरिन्दर सिक्का के उपन्यास काॅलिंग सहमत का फिल्म रूपान्तर है। इसमें मेघना के साथ भवानी अय्यर ने संवादों और पटकथा पर काफी ध्यान दिया है और परिश्रम किया है। मूल में देशभक्ति है, अपने-अपने देश के प्रति लेकिन दोनों ही देशों के प्रतिनिधि दो मित्र किस तरह एक-दूसरे के देश के पक्ष में नहीं है, इस यथार्थ के परिवेश में फिल्म शुरू होती है। दुश्मन देश की तैयारियों, उसकी नीयत और उसके दिखावे के बीच सच की पड़ताल का काम सोचे-समझे ढंग से, बहुत कुछ जोखिम उठाकर, बहुत कुछ दांव पर लगाकर देशप्रेम के सबसे बड़े जज्बे की रक्षा में विफलता सबसे बड़ा जोखिम है जिसमें अकेले पड़ जाने से लेकर जान गंवाने तक की स्थितियां हैं वहीं सफलता हासिल होने पर किए गये बलिदान और बाहरी-भीतरी पराजय के साथ, अपने जमीर के साथ किसी भी तर्क में बिना पड़े हार जाना भी एक पक्ष है सबसे बड़ा। राजी और उसकी नायिका इसी जद्दोजहद का शिकार होती है।

राजी फिल्म का दर्शकों तक ठीक तरह से पहुंचना या दर्शकों का सिनेमाघर चलकर आना, उसकी खूबियों के कारण है जिनमें से कुछेक बड़ी महत्वपूर्ण हैं। खास बात तो यही है कि बनाने से पहले पटकथा और संवाद के स्तर पर उसकी बेहतरीन तैयारी नजर आती है। दूसरी बात दृश्यों की है जो आपको बांधते हैं, हालांकि खुफिया ढंग से अपने उद्देश्य को अंजाम देने का कार्य उसी तरह का है जैसे 1970-71 में तथाकथित जासूसी फिल्में बना करती थीं लेकिन कैसे एक किरदार अपनी उपस्थिति से उस कार्य को चतुराईपूर्वक अंजाम देता है, यह दिलचस्प ढंग से व्यक्त किया गया है। आलिया अपनी पिछली फिल्मों के तजुर्बों और परिश्रम से अच्छी पारंगत होकर इस फिल्म का चरित्र बनती हैं। सम्बन्धों में बंध जाने के बाद निष्ठा और लक्ष्य दोनों में कितने समझौते हैं, यह देखकर अचम्भा होता है। आलिया सब जगह परिपक्वता का परिचय देती हैं।

फिल्म के सहयोगी कलाकारों में बड़े दिनों बाद परदे पर नजर आये जयदीप अहलावत की भूमिका पूरे आकार की है और वे खुफिया अधिकारी के रूप में प्रभावित भी करते हैं। दो अच्छे कलाकारों आरिफ जकारिया और रजित कपूर की भूमिका बहुत छोटी है। इसके विपरीत पाकिस्तानी सेना के अधिकारी के रूप में शिशिर शर्मा ने अपने आपको प्रभावी ढंग से स्थापित किया। राजी की मां की भूमिका सोनी राजदान को मिली है, वे थकी थकी सी लगती हैं और प्रभावहीन भी। कुछेक दृश्य बड़े महत्वपूर्ण हैं जैसे भारत और पाकिस्तान की सीमा में एक गाड़ी से उतरकर दूसरी गाड़ी में बैठना और चेहरे पर अलग-अलग देशों में उपस्थिति के मनोविज्ञान को चेहरे पर लाना, आलिया भट्ट के आरम्भ में मुस्कराने का दृश्य जिसमें उनके गाल खींचे जाते हैं और वे अपनी मुस्कान को वहीं स्थिर कर लेती हैं। इसके अलावा गुप्त रूप से सारी कार्रवाई को अंजाम देने वाले दृश्य जो परिस्थिति के अनुरूप भय पैदा करते हैं। शादी की रात राजी के पति का अलग सोने का फैसला और उसके पीछे के तर्क, नायिका की भारतीय शास्त्रीय संगीत की पसन्दगी पर पति का उस तरह के रेकाॅर्ड्स लाकर भेंट करना, राजी की असलियत सामने आने पर पति का अन्तरंगता और निजता को लेकर संवेदनशील प्रश्न बहुत अहम हैं।

मेघना गुलजार ने पिता गुलजार की रचनाओं, गीतों का बहुत अच्छा प्रयोग किया है। शंकर एहसान लाॅय का संगीत वास्तव में इन रचनाओं के साथ गरिमापूर्ण सावधानी बरतता है और गरिमा के साथ बांधता है। जय आय पटेल की सिनेमेटोग्राफी फिल्म में नयनाभिराम दृश्यों और संवेदनशील दृश्यों को बखूबी बांधने का काम करती है। दूर के भूदृश्य, जाती हुई बस आदि देखना बहुत प्रभावी है। लम्बे समय बाद कंवलजीत सिंह को एक छोटी सी भूमिका करते देखना सुखद यो कि दीदार हुआ और तकलीफदेह इसलिए कि वे इन दिनों फिल्मों से दूर हैं। संजय सूरी भी एक निर्विकार उपस्थिति में जाया हुए हैं। 

संजीदा देखने वालों को इस बात का अचरज जरूर हुआ कि समुद्र में खड़े पानी के जहाज पर आर्मी के जवान और उनको सम्बोधित करता अधिकारी आर्मी से हैं जबकि सिचुएशन में वहां नेवी की उपस्थिति होनी चाहिए। हमारे निर्देशक और उनके सलाहकार ऐसी बारीकी से प्रायः वंचित रह जाते हैं जबकि अधिकतम काम सराहनीय है। 

मेघना, हमारे सिनेमा में अपने पिता की दक्षता और रचनात्मकता की एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित फिल्मकार हैं और उनका काम भी रेखांकित किए जाने योग्य है, अतएव राजी देखना चाहिए, मुझे लगता है।

हां, भोपाल के वरिष्ठ रंगकर्मी कलाकार मित्र बालेन्द्र सिंह ने आलिया के ड्रायवर की भूमिका की है और एक दृश्य में मनोज रावत पान वाले के किरदार में दीखते हैं। दोनों को शुभकामनाओं के साथ देखकर अच्छा तो लगा ही.........

शनिवार, 12 मई 2018

फिल्म चर्चा/ एक सौ दो नाॅट आउट

मृत्यु भी परियों सी होनी चाहिए


एक सौ दो नाॅट आउट, उमेश शुक्ला निर्देशित फिल्म है जिन्होंने अक्षय कुमार के साथ एक व्यंग्यप्रधान सफल फिल्म ओह माय गाॅड बनायी थी। एक सौ दो नाॅट आउट, सौम्या जोशी के लिखे सफल गुजराती नाटक का फिल्मांकन है। उमेश ने दो बड़े सितारों अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के साथ यह प्रयोग किया है जो काफी हद तक मौलिक और देर से पकड़ में आने के बावजूद उत्तरार्ध में प्रशंसनीय हो जाता है। हालाँकि समग्रता में फिल्म को देखा जाये तो इसके अच्छे लगने में प्रमुख रूप से फिल्म के संवाद, अनेक मर्मस्पर्शी दृश्यबन्ध, लक्ष्मण उतेकर का विवरणों तक पहुँच करने वाला छायांकन, बुधादित्य बैनर्जी का सम्पादन अपना योगदान रखते हैं।

अब तक कहानी खूब आम हो चुकी है, पिता एक सौ दो साल के हैं, ठीक-ठाक, पूरी चेतना और उस पूरी स्थूलता से परे जो हम साठ बरस की उम्र में अपने आसपास देखते हैं। बेटा साठोत्तरी है, जैसे अमिताभ बच्चन का व्यक्तित्व है, वे और जैसा ऋषि कपूर का व्यक्तित्व है, वे फिल्म में भी वैसी ही स्फूर्तता और स्थूलता को जीते हुए दिखायी देते हैं। कहानी इतनी सी है कि वयोवृद्ध पिता को बूढ़े होते अपने बैठे का हताश और रुग्ण होना नहीं सुहाता है, वह खासकर अपने पोते से अपने बेटे के रिश्ते और उसमें जमे स्वार्थ का जवाब देना चाहता है। पोता विदेश में रहता है, स्वार्थी, लोभी और मोहरहित है लेकिन वयोवृद्ध पिता अपने बूढ़े बेटे को बहुत चाहता है। पिता-पुत्र के दो स्तरों पर द्वन्द्व हैं लेकिन अमिताभ बच्चन अपने पूरे किरदार को अपनी दक्षताओं से ऋषि कपूर पर इस तरह अधिरोपित कर दिया है कि एक तरह से यह उनकी फिल्म बन गयी है। ऋषि कपूर का व्यक्तित्व और लिखा गया चरित्र दोनों बच्चन साहब से कमतर पड़ते हैं लेकिन फिल्म के अन्त में जिस तरह से हम एयरपोर्ट पर उनका बेटे के साथ संवाद देखते हैं, एक तरह से वे एक बड़ी रेंज लेकर इसमें प्रस्तुत होते हैं।

औलादों का अपने अविभावकों के साथ सलूक, इस पर समय-समय पर अनेक फिल्में बनी हैं। अवतार से लेकर बागबान तक। एक सौ दो नाॅट आउट तक आते-आते बेटे विदेशी नागरिकता लेकर वहाँ नौकरी या व्यावसाय करने लगे हैं। वे जड़ों में सिमट और संकीर्ण हो गये हैं लेकिन भ्रम की अमर बेल उनको एक अलग फंतासी में लिए जा रही है। सम्पत्ति छुड़ाकर सम्बन्धों को समाप्त कर लेने का यह निर्मम दस्तूर भयानक है, जिसकी ओर निर्देशक का इशारा है।

एक सौ दो नाॅट आउट लगभग पौने दो घण्टे की फिल्म है लेकिन मध्यान्तर तक यह फिल्म बिना सशक्त पटकथा के ही चलती है जो बिखरी-बिखरी लगती है। ऐसा लगता है कि स्वयं फिल्म के दो चरित्र, कलाकार इस बात से वाकिफ हैं लेकिन अपनी क्षमताओं के साथ वे मोर्चा मध्यान्तर के बाद ही सम्हालते हैं। आखिरी आखिरी में फिल्म जज्बाती होती है, तब हमारे सामने अचूक कैमरावर्क कुछ खूबियों के साथ हमें फिल्म से जोड़ता है, जैसे बेटे के कमरे में पिता का जाना, बरनी से कंचों का जमीन पर गिरना, गुल्लक हो हिलाकर उसमें भरे सिक्कों की ध्वनि से जुड़ना, बाहर बरसते पानी के दृश्य, कांच से बाहर बहता पानी और भीतर वयोवृद्ध पिता का अपने बेटे को, अल्जाइमर की शिकार होकर तिल तिल करती अपनी बहू की वेदना का याद दिलाना, कमाल का है, सब का सब मन पी जाता है वैसे ही जैसे दरवाजे में लगे कांच पर पानी।

यह सधे हुए, अनुभवी और अनेक बार अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने वाले कलाकारों की फिल्म है। अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर अमर अकबर अंथनी, नसीब, अजूबा आदि फिल्मों में साथ आ चुके हैं। लगभग सत्ताइस साल बाद दोबारा दोनों ने साथ कैमरे का सामना किया। शीर्षक से लेकर चरित्र तक अमिताभ बच्चन ने अपना जोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मृत्यु के बारे में उनका कथ्य कि मौत भी परियों की तरह आनी चाहिए, संध्याकाल के मानस की एक बहुत संवेदनशील आकांक्षा होती है। ऋषि अपने चरित्र के हिसाब से बेहतर काम करते हैं, पिता के द्वारा ट्यूमर बताये जाने पर चेहरे पर आयी प्रतिक्रिया बहुत गहरी है। फिल्म का अन्तिम दृश्य यादगार है जहाँ वे धीरू का चरित्र निबाह रहे जिमित त्रिवेदी के साथ समुद्र के पास बैठे टेप रेकाॅर्डर में पिता की आवाज सुनते हुए आकाश में देखते हैं और बादल के एक बड़े से टुकड़े पर सजल नयनों से एकाग्र होते हैं। हाँ, अपनी भूमिका जिमित ने भी बखूबी निभायी है। मध्यान्तरपूर्व दस-पन्द्रह मिनट का सम्पादन मांगती यह फिल्म लोगों को फिर भी स्टार कास्ट, निर्देशक की साख और प्रचार-प्रसार से आकृष्ट कर रही है, यह भी कम बड़ी बात नहीं है।

शुक्रवार, 4 मई 2018

सिनेमा पर सर्वोत्‍तम लेखन के लिए विशेष उल्‍लेख के साथ नेशनल अवार्ड


3 मई को नई दिल्‍ली के विज्ञान भवन में 65वें नेशनल फिल्‍म अवार्ड का समारोह आयोजित हुआ. इस समारोह में सिनेमा पर सर्वोत्‍तम लेखन के लिए विशेष उल्‍लेख के साथ मुझे सम्‍मानित किया गया. यह सम्‍मान केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती स्‍मृति जेड ईरानी द्वारा प्रदान किया गया, साथ में विभाग के राज्‍यमंत्री श्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौड़ भी उपस्थित थे...



रविवार, 29 अप्रैल 2018

तीन दशक बाद नेशनल अवार्ड जीतने वाली दूसरी असमिया फिल्म

विलेज रॉकस्‍टार्स 


इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाली असमिया फिल्म विलेज राॅकस्टार्स एक बहुत प्रेरणीय और मर्मस्पर्शी फिल्म है। आमतौर पर सिनेमा का मतलब मुम्बइया सिनेमा या बाॅलीवुड निकालने वाले दर्शकों तक ऐसी अच्छी फिल्में पहुँचाने के जरूर सार्थक उपक्रम होने चाहिए। हालाँकि दूरदर्शन, नेशनल अवार्ड प्राप्त फिल्मों का प्रसारण बाद में करता है लेकिन उसका भी बेहतर प्रचार-प्रसार हो तो निश्चित रूप से दर्शकों तक अच्छे सिनेमा की पहुँच और भी सुदृढ़ हो सकती है। 

रीमा दास हमारे समय की इस मायने में एक उल्लेखनीय फिल्मकार हैं जिन्होंने इस फिल्म को बनाते हुए निर्माण, निर्देशन, कहानी, सम्पादन और सिने-छायांकन का भी दायित्व निर्वहन करते हुए बड़ी ही सादगी के साथ एक विलक्षण फिल्म अच्छे सिनेमा के चाहने वालों को सौंप दी है। विलेज राॅकस्टार को टोरण्टो इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म के रूप में चुना जा चुका है वहीं कान फिल्म समारोह में इस फिल्म को खासी चर्चा मिली है, इसके अलावा पिछले साल के अन्त में गोवा में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में इस फिल्म को दर्शकों ने बहुत पसन्द किया और इस टिप्पणीकार को भी उसी समय यह अनूठी तथा मन को छू जाने वाली फिल्म देखने का अवसर प्राप्त हुआ। 

युवा उम्र से सिनेमा का लोकप्रिय चेहरा बनने की ख्वाहिश लिए मुम्बई आयीं रीमा दास ने तब यह नहीं सोचा था कि समय आगे चलकर उनको कैमरे के पीछे ले जायेगा और फिर दृश्य वही बनेंगे जो वे गढ़ेंगी। उनको शुरू से ही मुम्बइया सिनेमा देखने का शौक रहा है। लगभग ग्यारह साल पहले वे मुम्बई आ गयीं। लघु फिल्म के निर्माण से उन्होंने अपनी शुरूआत की लेकिन व्यापकता में सिनेमा को देखने के चाव ने उनको दुनिया की अच्छी फिल्मों के नजदीक लाने का काम किया। 2009 में बनायी उनकी फिल्म प्रथा को बड़ी सराहना मिली। जब 2016 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म अन्तर्दृष्टि बनायी तब उनको अच्छे काम और उसके प्रतिसाद दोनों का अवसर प्राप्त हुआ। यह एक ऐसे पिता की कहानी है जिनको रिटायर होने पर उनका बेटा एक दूरबीन भेंट करता है। दूसरी फिल्म विलेज राॅकस्टार्स पहली से एक कदम आगे इस दृष्टि से निकल गयी कि इसमें सुदूर गाँव, पिछड़े और अशान्त राज्य में कहीं बचपन और किशोर उम्र के बच्चों के स्वप्न को पास जाकर, टटोलकर, उसे संवेदनशीलता के साथ छूकर देखने की कोशिश की गयी है। 


रीमा दास जब विलेज राॅकस्टार पर काम कर रही थीं तब बस्ती और छोटे गाँवों को उसकी समूची शाब्दिकता में समझने का प्रयत्न भी कर रही थीं। उन्होंने अपने काम से पहले अनेक फिल्में देखीं और यह महसूस किया कि वे उस छोटे से संसार की बिल्कुल अलग सी कल्पना कर रही हैं जहाँ संघर्ष का पथ बहुत कोमल, बहुत मुश्किलों भरा, बहुत सात्विक और बहुत ही अधिक सीधी राह पर चलने वाला है। विलेज राॅकस्टार्स के कलाकार स्कूली बच्चे थे जिनके लिए पढ़ाई अपनी प्राथमिकता थी। रीमा ने उसके साथ-साथ बच्चों की घरेलू जवाबदारियों के समय को भी छोड़ दिया। इतनी उदारता के बाद नैसर्गिक प्रकाश अभिव्यंजना में उन्होंने विलेज राॅकस्टार्स की शूटिंग की और अपने सन्तोष की फिल्म बनायी। सर्जनात्मक सन्तुष्टि उनको अपने काम के साथ निरन्तर ही मिलती गयी। 

गुवाहाटी के पास रीमा दास का अपना जिया, देखाभाला स्थान छायागाँव जहाँ यह पूरी फिल्म बनायी गयी है, बड़ी ही विनम्र सी प्रतीत होने वाली सादगी के साथ अपनी बात कहती है। यह एक जुझारू लड़की धुनू की कहानी है जिसे अपने साथियों के बीच एक बैण्ड स्थापित करने की ललक है। वो और उसके साथ राॅकस्टार्स बनना चाहते हैं। टीवी और दूसरे साधनों से दूर देश की खबरें गाँव तक आती हैं और धुनू अपने लक्ष्य को पक्का करती चली जाती है। अपनी ही तरह के गरीब बच्चों की संगत में उसका यह स्वप्न शनैः शनैः आकार ले रहा है लेकिन इसमें भी बड़ी बाधाएँ हैं। धुनू की माँ अनेक कठिनाइयों में अपना, उसका और अपने बेटे का पेट भर पा रही है। जिन्दगी के साथ लड़ रही धुनू की माँ को समय ने बहुत मजबूत बना दिया है। धुनू गिटार बजाना सीख रही है, वह अपनी टीम को भी सिखा रही है। कैसे उसके स्वप्न को परिवेश और लोग बाधित करते हैं, कैसे शिक्षा से वंचित सुदूर अंचल में वातावरण और लोगों के मानसिक अभिप्राय इस स्वप्न को पूरा करने में बाधक होते हैं, यह इस फिल्म में बहुत ही सच्चाई के साथ दिखाया गया है। वा़द्यों का टूटना और मन का टूटना या खण्डित होकर रह जाना दौड़ते उत्साह का भरभराकर गिर जाना है। परदे पर ऐसी विडम्बना देखते हुए मन व्यथित होता है। धुनू की भूमिका निबाह रही भनिता दास के चेहरे पर भावों का संचय, आवेग की अभिव्यक्ति और हतोत्साहित किए जाने के बाद भी भाव भंगिमाओं और चेष्टाओं में संयत बने रहना बल्कि अपने लक्ष्यों के लिए और दृढ़ होने का विद्रोह बखूबी आया है। 

रीमा ने विपरीत और विरोधाभासी परिस्थितियों को दृश्यों में जिस तरह बांधा है, देखकर आँखें नम हो जाती हैं। ऐसे हर दृश्य प्रशंसा के लायक हैं जिनमें चरित्रों को टूटने से बचाते हुए भीतर छिपा मनोबल, जिद और आप हठ दिखायी देता है। धुनू की माँ की भूमिका बसंती दास ने निभायी है जो भाई की भूमिका में मानबेन्द्र दास अपनी उम्र और रौ में दीखता है। मल्लिका दास ने बेस्ट लोकेशन साउण्ड रिकाॅर्डिस्ट के रूप में एक-एक सूक्ष्म ध्वन्यात्मक बारीकियों को जिस तरह फिल्म का हिस्सा बनाया है, अनुभव करने लायक है। बसंती दास, मल्लिका दास के साथ ही निर्देशन के अतिरिक्त सम्पादन में भी फिल्म को अवार्ड हासिल हुआ है जो गौर करने लायक है। उल्लेखनीय तो यह भी है कि लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर असमिया फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला है। इसके पहले 1989 मेंजाहनू बरुआ की फिल्म हालोधिया चैराये बाओधान खाई को नेशनल अवार्ड हासिल हुआ था। 
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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

संवेदनशील होना या संवेदनशील होने की बात भर करना.....

।। बियाॅण्ड द क्लाउड्स।।

 


अनोखे और चर्चित माजिद मजीदी विश्व सिनेमा के धरातल पर एक श्रेष्ठ फिल्मकार हैं, यह बात पढ़े-लिखे जाने-जानने से करीब पन्द्रह-बीस साल पहले उनकी दो फिल्में द कलर आॅफ पैराडाइस और चिल्ड्रन आॅफ हैवन देखकर मन में बैठी है। अपने लिए यह विशेष उल्लेख है कि संवेदना की बड़ी सच्ची परख रखने वाला दुनिया का एक फिल्मकार पे भारत में आकर एक फिल्म बनायी है। जब आप दो उत्कृष्ट फिल्मों के सकारात्मक प्रभावों से भरे हो तो एक प्रकार आश्वस्ति तो आपको हो ही जाती है कि कोई निरर्थक काम देखने नहीं जा रहे हो, दूसरे एक जिज्ञासा बनती है कि एक देश का फिल्मकार, दूसरे देश की नब्ज को किस तरह पकड़ पाता है या उसकी कोशिश भी करता है। इस जिज्ञासा के साथ निर्णय यही कर पाता हूँ फिल्म देखकर कि दृष्टि और परख की भी अपनी एक भूमध्य रेखा होती है, उसका तटस्थ या निष्पक्ष होना, एक जैसी संवेदना की तलाश करना एक आदर्श और सार्थक सोच है।

कहानी थोड़े में बता देता हूँ। मादक पदार्थों को छोटे-छोटे छिपे और गुप्त स्थानों पर पुलिस से लेकर आवारा, गुण्डों आदि के जोखिम से बचते हुए पहुँचाने का काम नायक करता है। उसकी एक बहन है जिससे वो दूर रहता है, कारण कि उसका पति उसे बहुत पीटता था और बेहिसाब शराब पीता था। बाद में बहन ने भी इसी कारण से उसे छोड़ दिया और छोटा-मोटा काम करके जीवन व्यतीत कर रही है। भाई, बहन के जीवन में एक दिन फिर दाखिल होता है जब पुलिस उसे और उसके साथी को दौड़ा रही है। भागते-भागते मादक पदार्थ का पैकेट वो बहन को देकर छुप जाता है। इधर उसी धोबी बस्ती, जहाँ उसकी बहन काम करती है, एक अधेड़ अक्शी उसकी इज्जत लूटना चाहता है तो बहन उसके सिर पर भारी पत्थर मारकर बच पाती है। अधेड़ कोमा में चला गया है और बहन को पुलिस जेल ले गयी। कहानी आगे यही है कि भाई, बहन को जेल से निकालना चाहता है और उसको अस्पताल में भरती उसी आदमी को बचाने के लिए दवा आदि का प्रबन्ध करना पड़ रहा है। 

घटनाक्रम आगे इस तरह बढ़ता है कि बहन, जेल में एक और कैदी स्त्री के बच्चे से हिलमिल जाती है जिसकी आगे चलकर मृत्यु हो जाती है और इधर अक्शी की माँ और दो बेटियाँ दक्षिण के गाँव से उसे मिलने चली आती हैं। दो धरातल पर कहानी आगे बढ़ती है, नायक आमिर उस आदमी के बोलने लगने और बयान देने के लिए सारे जतन कर रहा है और साथ में एक बूढ़ी और दो बच्चियों को भी घर ले आता है। 

आगे चलकर अक्शी का मर जाना, बूढ़ी माँ और दोनों बच्चियों का आमिर पर आश्रित हो जाना, आमिर की बहन तारा का जेल का ही होकर रह जाना और मर चुकी कैदी के बच्चे को साथ रखना, एक जगह पर आकर दर्शकों को सोचने के लिए कुछ प्रश्नों के साथ फिल्म खत्म होती है। बीच-बीच में आमिर का पहले निष्ठुर होना, फिर तीनों को पनाह देना, उनके खाने से लेकर जीने का भी प्रबन्ध करना, हताशा में एक क्षण उनको भला-बुरा कहना, बूढ़ी माँ का अपनी ही समभाषी की मदद से अपने अपराधी बेटे की ओर से सारे दोष कुबूल करने वाली चिट्ठी बनवाना आदि प्रसंग हैं। निर्देशक मादक पदार्थों की सप्लाई से घटनाओं के साथ देह व्यापार के अड्डे पर भी दर्शकों को ले जा रहा है जहाँ आमिर के लिए औरतों का एजेण्ट मुसीबतें खड़ी करता है। आमिर के साथी का उसको धोखा देना फिर जमीर जागना मर्मस्पर्शी है। 


निर्देशक पूरी निष्ठा और साफगोई से एक ऐसी दुनिया के यथार्थ से दर्शकों को परिचित कराता है जिसकी होशो-हवास में हमें कल्पना भी न होती होगी। यही कारण है कि निर्देशक, पात्र, कैमरा सब उन स्थानों से होकर निकल आते हैं लेकिन संवेदनशील दर्शक जैसे वहीं भटक कर कहें या खो कर कहें, रह जाता है। किसी भी मनुष्य के भीतर वे क्या प्रवृत्तियाँ होती हैं जो उसकी नीयत बिगाड़ती हैं, क्या वो सकारात्मकता होती है जिसमें वह सम्हल सकता है, अपराधी की बेटी को दलाल के हाथ बेच देने की गरज से निकला आमिर आखिर उसे लौटाकर घर ले आता है। 

माजिद मजीदी एक-एक विवरण पर जाते हैं, आरम्भ में कुछ सेकेण्ड एक मोबाइल सिम कम्पनी के बड़े होर्डिंग पर स्थिर रहकर जब कैमरा नीचे आता है तब हम उस असलयित से रूबरू होना शुरू होते हैं जो पुल, पुलिया के नीचे जिन्दगियों में व्यतीत हो रही होती है। इस फिल्म में कोई भी चीज गढ़ी गयी नहीं है, कुछ भी नकली या फिनिश्ड सा नहीं लगता बल्कि सब कुछ जस का तस। गरीबी, गरीबी के घर, धोबी घाट, अन्दर की संकीर्ण गलियाँ और धोये जाते कपड़ों के एक-दूसरे के ऊपर बर्दाश्त करने वाले छींटे, देह व्यापार की जगह पर बिकने आयी छोटी उम्र की लड़कियों के साथ बोलचाल एक निर्मम सच को आपके सामने रखते हैं। हर पल डरी, सहमी और लगभग मर-मर जाती जिन्दगियों के बीच हँसी-ठिठोली, रुसवायी, मान-मनौव्वल, अच्छा-बुरा सब का सब जस का तस। वैसे ही जेल जिसमें महिला कैदियों की व्यथा, दुर्दशा लगभग अन्ततः उनका क्या हो जाना है, यह जताने के लिए काफी हैं। वहाँ महिला कैदियों के निरीह मासूम बच्चे जो गन्दगी और बदबूदार गड्ढों से निकलकर आते-जाते चूहों को ही दोस्त बनाये हुए हैं। उस छोटे से बच्चे का तारा से पूछना दर्शक के लिए शायद सहन करना आसान न हो कि माँ कहाँ चली गयी तब तारा उससे कहती है कि तेरी माँ आकाश में चांद के घर में रहने लगी है और अब वो बहुत मस्त हो गयी है, खांसती भी नहीं। इस पर बच्चा कहता है कि मुझे चांद को देखना है, माँ का घर। तारा और उस बच्चे का घनघोर बारिश में आकाश की ओर ताकते रहना और इधर आमिर के साथ अक्शी की दोनों मासूम बच्चियों और पत्थर हो गयी माँ की जवाबदारी......फिल्म यहीं खत्म होती है।

एक बात प्रमुखता से उल्लेख कर देना जरूरी लगता है और वह यह कि माजिद मजीदी के इस सर्जनात्मक उपक्रम को भारत के दो प्रमुख निर्देशकों विशाल भाऱ़द्वाज और गौतम घोष ने एक बड़ा समर्थन दिया है। विशाल ने जहाँ इस फिल्म के पूरे हिन्दी संवाद लिखे वहीं गौतम घोष अक्शी की भूमिका में चरित्र और वृत्ति को एकाकार करते हैं। विशाल भाऱद्वाज को सब जानते हैं और गौतम घोष बंगला सिनेमा के शीर्षस्थ निर्देशक हैं। तीसरा बड़ा सहयोग उनको सिनेमेटोग्राफर अनिल मेहता का मिलता है जिन्होंने एक-एक जगह को उसके पूरे अस्तित्व के साथ अपने कैमरे से हमारे लिए देख लिया है। यहाँ कमजोर पड़ते हैं तो केवल ए.आर. रहमान जो संगीत के साथ उस वातावरण का हिस्सा नहीं बन पाते। कलाकारों में आमिर की भूमिका में ईशान खट्टर ने जिस आश्वस्ति के साथ एक-एक शाॅट में अपने होने को साबित किया है, कमाल ही है। 

लोकल ट्रेन के दृश्य, मोटर सायकिल पर आते-जाते अपने हाथ खोल कर खिल जाने और अपना ही अतिरेक करने वाले दृश्य अनूठे हैं। कीचड़ में लड़ाई वाला, देह व्यापार के दलाल से निर्भीक होकर बात करने वाला, धोखा देने वाले एक दुकानदार के हाथ में चाकू गाड़ देने वाला दृश्य, बहन से लड़ने, जिरह करने और अन्त में उसको छुड़ाने की फिक्र करने वाले प्रसंगों में कमाल कर गये हैं वे। इसी तरह तारा की भूमिका में मालविका मोहनन की भूमिका भी मन को छू जाती है। भाई के साथ झगड़ते हुए जब वो अपनी जिन्दगी के बारे में बतलाती है, जेल जाते हुए आमिर का सायकल से पीछा करना और बस के भीतर और बाहर से दोनों का एक-दूसरे को पुकारना विचलित कर देता है। जेल के अन्दर की जिन्दगी तारा की बड़ी परीक्षा है जिसमें माँ को खो देने वाले छोटे बच्चे से उसका जुड़ना अहम है। इधर अक्शी के परिवार में बूढ़ी माँ और दो बच्चियाँ आमिर के पीछे-पीछे घर क्या चली आती हैं, दर्शक को लगता है, वे उसके भीतर चली आयी हैं।

भारत में ऐसे सिनेमा का बनना बड़ा साहसिक है। साहसिक इसलिए है क्योंकि ऐसे सिनेमा को संवेदनशील दर्शक की तलाश या चाहत या अपेक्षा रहती है लेकिन हमारा दर्शक सिनेमा के नाम पर एक अलग तरह की मानसिक विलासिता में खोया रहता है। उस सुरंग में ही वह आनंदित है, बाहर आना या लाना दोनों ही दुरूह है। 

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

एक संवेदनशील फिल्‍म जो अन्‍त में भटक गयी.....

फिल्‍म समीक्षा / अक्टूबर


इस फिल्म के नाम को लेकर प्रदर्शन पूर्व तक अचरज बना रहना स्वाभाविक ही था। दर्शक इसके आगमन की झलकियों से खीज भी सकता था यदि इसमें शूजित सरकार, जूही चतुर्वेदी जैसे सर्जनात्मक नाम न जुड़े होते। यही कारण रहा शायद कि अप्रैल में भी अक्टूबर का दर्शकों ने स्वागत किया। अपनी तरह से यह फिल्म निरर्थक नहीं है, अच्छी बनी है लेकिन देखते हुए दर्शक और समीक्षक भी यदि बहुत ज्यादा भावुक हो रहे हैं तो थोड़ा सजग होकर देखना जरूरी लगता है।

अक्टूबर उन युवाओं में शुरू होती है जो जिन्दगी बनाने, शुरू करने के स्वप्न देख रहे हैं। गनीमत है कि शुरू-शुरू में किसी को भी प्रेम नहीं हुआ है। एक बड़े सितारा होटल का प्रत्यक्ष और नेपथ्य, उसकी हलचल, पूर्वरंग और परोक्ष परिस्थितियाँ हमारे सामने सुरुचिपूर्ण ढंग से घटित होती हैं, खासकर तब जब हमारे अपने अनुभव ऐसे वातावरण में परोक्ष के तो कम से कम न के बराबर हैं।

ऐसे ही माहौल में तीन-चार तरह के स्वभाव, बहुलता वैसी ही जैसी आमतौर पर दिखती है, जिम्मेदारी और खासी चिन्ता के साथ अपने प्रोबेशन को पूरा करने, अच्छी और स्थायी नौकरी तथा अवसर पाने और विरोधाभासों को सहन करने वाले मित्रों के बीच नायक है जिसकी भूमिका शुरू से तय है। नायिका के चौथी मंजिल से गिर जाने के बाद उसकी अस्थिरता संवेदनशीलता में तब्दील हो जाती है। पटकथा में इस बात की उदारता बरती गयी है कि नायक अनेक भूलों, व्यवहार और स्वभाव के बावजूद क्षम्य है, मित्रों में भी प्रिय।

कोमा में चली गयी नायिका की चिकित्सा, चिकित्सालय, चिकित्सक, गहन चिकित्सा इकाइयों का वातावरण, परिस्थितियों से जूझती नर्सें, नायिका की हालत से विचलित परिवार, चिकित्सा खर्च इन सबके साथ-साथ एक रूमानिकता भी घटित होती हुई चलती है जिसमें अक्टूबर माह का मौसम, खास दिल्ली की ठण्ड, सुबह, शाम और रात के दृश्य, कोहरा, मैट्रो, सोता-जागता शहर आदि शामिल हैं। दार्शनिकता में हरसिंगार के फूल, उनकी महक, एक रात का जीवन जैसी क्षणभंगुरता की फिलाॅसफी आपको पूरी तरह बांध लेती है।

दर्शक जितना नायिका की हालत से द्रवित है उतना ही नायक के समर्पण पर वारा गया है। कोमा से लौटती, सकारात्मक संकेत देती और जीवन के प्रति एक आशान्वित भरोसा दिलाती नायिका के प्रति नायक का लगाव, उसके ठीक होने में स्वयं के भी योगदान का निजी आत्मविश्वास यह सब अक्टूबर को एक बेहतर उपसंहार तक ले जाने के बेहतर संकेते हैं लेकिन लेखिका जूही चतुर्वेदी, नायिका की मृत्यु को दिखाकर अन्त को जटिल बनाती हैं और अपने समर्थक दर्शकों को भी असहमत करती हैं। भीगी आँखों के साथ दर्शक सिनेमाघर से इस अन्त को अमान्य करता हुआ निकलता है। यह एक पथ से भटके हुए अन्त का चयन करने वाली लेखिका की फिल्म है।

हालाँकि इसमें वरुण धवन ने अपने अब तक के समय की श्रेष्ठ भूमिका का निर्वहन किया है। ऐसे चरित्र बहुत मेहनत की अपेक्षा करते हैं, वरुण दृश्यों, अपनी उदासी, मन के नायिका की संवेदना और स्थितियों के साथ लगभग एकाकार हो चुके अभिव्यक्त भाव में बहुत आगे जाते हैं। नायिका बनिता संधू ने नियंत्रण रहित लगभग एक देह की तरह उस पार्थिवता को दृश्यों में जिया है जो ऐसी भयानक दुर्घटना की परिणति को साक्ष्य के रूप में हमारे सामने लाती है। माँ का किरदार निबाह रहीं गीतांजलि राव अपनी विवशता को बखूबी जीती हैं। निर्देशक ने फिल्म बनाते हुए पात्रों से अच्छा काम लिया है।

लगभग सत्तर प्रतिशत फिल्म अवसादपूर्ण परिस्थितियों के दृश्यबन्ध हैं, शेष में होटल संस्कृति का ग्लैमर हमारे सामने है जो निर्माता की राहत के लिए होगा, बहरहाल व्यवहारसंगत अन्त न होते हुए भी भावुक दर्शकों के लिए यह फिल्म आकृष्ट करने वाली है। कई बार ऐसे अन्त इसलिए भी गढ़े जाते हैं जिस पर आप असहमत होते हुए भी बात करो लेकिन इसी कारण फिल्म का वो आखिरी दृश्य अपनी संवेदना खो बैठता है जिसमें नायक हरसिंगार का पेड़ लेकर जा रहा है......
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गुणी कलाकार और भ्रमित निर्देशक

।। ब्लैकमेल ।।



अभिनेता इरफान खान की फिल्मों को लेकर दर्शकीय उत्सुकता दूसरे सितारों से बेहद अलग है। सलाम बाॅम्बे से लेकर पान सिंह तोमर के नेशनल अवार्ड प्राप्त करने तक और उसके बाद की भी अनेक फिल्मों से उन्होंने अपने को एक आश्वस्त और आत्मविश्वास से भरे अभिनेता के रूप में साबित किया है। यह नयी फिल्म ब्लैकमेल ऐसे समय में आयी है जब वे अपने स्वास्थ्य के एक बड़े संकट से जूझ रहे हैं। सिनेमाघर में दर्शक इस अतिरिक्त सहानुभूति के साथ भी आ रहा है।

अभिनय देव निर्देशित यह फिल्म दो तरह के विभाजनों में अपनी आवाजाही करते हुए न तो एक गम्भीर फिल्म की तरह आकृष्ट कर पाती है और दृश्यों और संवादों में हास्य के तत्व-पुट शामिल कर देने से कहानी अपनी गम्भीरता खो बैठती है। ब्लैकमेल सम्बन्धों के संसार से एक अलग तरह की कहानी उठाती है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका अलग-अलग शादी हो जाने के बाद तत्काल ही एक-दूसरे के सम्पर्क में आकर विवाहित जैसा जीवन जीने लगते हैं। अमीर स्त्री के साथ विवाह के बाद की जिन्दगी, इधर एक लगभग असहाय किस्म का नौकरीपेशा व्यक्ति, अपनी-अपनी तरह से समय से जूझ रहे हैं। किसी के भी प्रयत्न परिस्थितियों से निजात पाने के नहीं हैं बल्कि उसे एक अलग ढंग से एन्जाॅय कर रहे हैं। 

इस फिल्‍म की खूबियों के रूप में अच्‍छा कैमरा वर्क खासकर वे शॉट जो इरफान के द्वन्‍द्व को दर्शाते हैं, छत पर ऊँचाई में बैठकर उनका सोचना, उत्‍तरार्ध में ऑफिस में साथ काम कर रही लड़की की उसके घर में दुर्घटना मृत्‍यु होना, उस आफत से बचने के लिए मुहल्‍ले और सड़कों पर भागना दिलचस्‍प हैं। इरफान का बॉस बने ओमी वैद्य का अपने प्रोडक्‍ट टॉयलेट पेपर की मार्केटिंग करने के लिए किए जाने वाले उपक्रम मनाेरंजक हैं बल्कि इतने ज्‍यादा मनोरंजक कि सिनेमाघर का दर्शक बाद के दृश्‍यों में भी अकारण हँसता है।

इरफान, कीर्ति, दिव्या, अरुणोदय, अनुजा अपने चरित्रों के साथ हैं लेकिन इस पूरी फिल्म को अपने होने से अर्थ देने का काम ओमी वैद्य ज्यादा अच्छे ढंग से कर जाते हैं। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य और संगीतकार अमित त्रिवेदी इस फिल्म के लिए लगभग मिस मैच गीत-संगीत रचना करते हैं। अरुणोदय सिंह माॅडल पर्सनैलिटी हैं, अच्छे लगते हैं। उनको एक शातिर किस्म का चरित्र दिया है, हालाँकि कई बार वह अस्वाभाविक ढंग से काॅमिक भी लगता है। यह जरूर है कि यह कलाकार अच्छी नकारात्मक भूमिकाओं के लिए बड़ी सम्भावनाशील आमद है।
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