बुधवार, 18 मार्च 2020

ताल से ताल मिला........


पुनरावलोकन / ताल (1999)

 

सुभाष घई को राजकपूर के बाद फिल्‍म इण्‍डस्‍ट्री का दूसरा शोमैन माना जाता है। वे सिनेमा में हीरो बनने की चाहत लिए पुणे फिल्‍म इन्‍स्‍टीट्यूट गये थे। प्रशिक्षण प्राप्‍त करने के बाद दो-एक फिल्‍में मिलीं, एकाध में खलनायक भी बने लेकिन फिर लगा कि अपने को साबित करने के लिए कैमरे के पीछे जाना होगा। शत्रुघ्‍न सिन्‍हा दोस्‍त थे, साथी। उनको लेकर कालीचरण और विश्‍वनाथ फिल्‍में बनायीं और फिर एक निर्देशक के रूप में स्‍थापित हो गये। बाद में कर्ज, क्रोधी, विधाता, हीरो आदि अनेक फिल्‍में बनाते हुए उनकी पहचान इन मायनों में भी हुई कि दृश्‍यों को बांधने में इस फिल्‍मकार को जितनी महारथ हासिल है, ड्रामा रचने में भी उतनी ही दक्षता और संगीत की बहुत खास किस्‍म की समझ। वे किंगमेकर भी प्रसिद्ध हुए और जैकी श्रॉफ सहित माधुरी, मनीषा, महिमा आदि को अपनी फिल्‍मों में अच्‍छे अवसर देने के लिए भी।

ताल उनकी क्‍लैसिक फ़िल्म है। इसको एक बहुत साधारण सी कहानी के साथ उन्‍होंने गढ़ा है लेकिन संगीत को लेकर अपनी दृष्टि के साथ ए आर रहमान से मिलकर जो उन्‍होंने गीतों, संगीत, पार्श्‍व संगीत के साथ जो वातावरण खड़ा किया है वह अनूठा है। जिस समय यह फिल्‍म रिलीज हुई थी उस समय तत्‍काल ही हिट हो गयी हो ऐसा नहीं है। सुभाष घई ने चार-पॉंच हफ्ते दर्श्‍कों को विश्‍वास में लेकर इस फिल्‍म के अच्‍छे अच्‍छे विज्ञापन प्रसारित करके इसे लगभग दर्शकों के सामने इस तरह ला दिया कि आपके जमाने का म्‍युजिक सेंस दरअसल ये है, रहमान ने इस फिल्‍म के गानों के संगीत को बैकग्राउण्‍ड म्‍युजिक में इस तरह सदुपयोग किया कि पूरी फिल्‍म आपको जाग्रत करती हुई प्रतीत होती है और जैसा कि शुरू में लिखा, एक साधारण सी कहानी भी प्रेम, आत्‍म सम्‍मान, स्‍वाभिमान, समझौता, त्‍याग आदि के धरातलों पर मन को छूती हुई चली जाती है।

इस फिल्‍म को आये बीस वर्ष करीब हो गया है लेकिन जिस तरह एक अच्‍छी किताब आप अपने संग्रह से किसी वक्‍त विशेष पर निकाल कर फिर पढ़ने को होते हैं तो जिज्ञासा बनती और बढ़ती है। छोटी सी कथा है। हिमाचल के एक गॉंव में एक संगीत शिक्षक अपनी आर्थिक सीमाओं के साथ परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। संगीत की पवित्रता और उसके प्रति उनकी श्रद्धा है। शहर से रईस और व्‍यावसायी खानदान की टोली अपना कुछ बाजार खड़ा करने गॉंव आ गयी है। शहरी चतुर चालाक हैं और गॉंव वाले भोलेभाले। दरअसल फिल्‍मी कहानी में यह लाइन खूब चलती है। शिक्षक तारा बाबू की एक बेटी मानसी और रईस शहरी जगमोहन का बेटा मानव कुछ छोटे-मोटे घटनाक्रमों के साथ एक-दूसरे के प्रेम में हैं। शहरी रईस शिलान्‍यास करके चले जाते हैं बाद में तारा बाबू अपनी बेटी के साथ शहर में जाकर जब इनसे मिलते हैं तो उनका बरताव अपमानजनक होता है और सहन न कर पाने पर तारा बाबू भी अपना आपा खो बैठते हैं लिहाजा मानसी और मानस के बीच गरीब और अमीर, मान और अपमान की बड़ी खाई खड़ी हो जाती है। 

बाद की फिल्‍म ड्रामेटिक है। मानसी, विक्रान्‍त जो कि शहर में आंचलिक संगीत के रीमिक्‍स रचकर बड़ा आयकॉन बन गया है उसके साथ मानसी प्रसिद्धि के रास्‍ते चल पड़ती है। मानव उसको भुला नहीं पाता। रईसों के घर अग्निकाण्‍ड जिसमें कूदकर मानव वह मफलर निकालकर ले आता है जिसमें मानसी ने नाम लिख रखा है। रईस जगमोहन करुणा से भर गया है अपने बेटे के इस दुस्‍साहस से। अब प्रेम चढ़ाव से उतार की ओर बहता है। अन्‍त में विक्रान्‍त प्रेम का प्‍याला पीकर के भी प्‍यासा रह जाता है और मानव तथा मानसी प्रेम के उस मर्म को पा लेते हैं जिसकी ताल दोनों की पहली मुलाकात पर ही मोहब्‍बत रच देती है। अक्षय खन्‍ना, ऐश्‍वर्य, आलोकनाथ और अमरीश पुरी के साथ मीता वशिष्‍ठ और अनिल कपूर फिल्‍म के प्रमुख पात्र हैं। ऐश्वर्या राय खूबसूरत गुड़िया की तरह हैं। द्वन्द्व के दृश्यों में क्लोज शॉट में प्रभावित करतीं हैं। फिल्‍म में इसलिए नहीं कि त्‍यागी हैं, अनिल कपूर बहुत तरीके से मध्‍यान्‍तर से पूरी फिल्‍म अपने साथ लेकर चलते हैं। उनके सामने अक्षय खन्‍ना साधारण मजनू के ज्‍यादा कुछ नहीं लगते। आलोकनाथ का किरदार बहुत ही विचित्र किस्‍म की भावुकता का शिकार दिखाया गया है जिसे समझना कठिन है। अमरीश पुरी जरूर दृश्‍य में होते हैं तो उस दृश्‍य के बादशाह ही लगते हैं। जलकर अस्‍पताल में इलाज करा रहे बेटे से उनका डायलॉग भावुक है जब मानव मफलर छुपाता है और वे देख लेते हैं। उस समय वह बोलते हैं, बेटा मैं तुम्‍हारा बाप हूँ।  


एक चरित्र अभिनेता के रूप किसी भी फिल्‍म में अमरीश पुरी की उपस्थिति हमेशा एक वज्र के रूप में लगती रही है। उनके बाद इस प्रकार का सशक्‍त कलाकार अब तक नहीं आया। सुभाष घई अपनी फिल्‍म में भावनात्‍मक स्‍पर्श के कुछ एंगल बहुत सूझपरक ढंग से रखते हैं। एक ये ताल और दूसरी फिल्‍म युवराज के सन्‍दर्भ में देखो तो अमीर-रईस चरित्र आत्मिक दृष्टि से बहुत निर्मम होते हैं उनके। वे परिवार के कुटिल और दुष्‍ट रिश्‍तेदारों के किरदार भी खूब खड़े करते हैं जो किसी भी सुखद अवधारणा में चतुर-चालाक षडयंत्रकारी के रूप में परदे पर आते हैं। ताल में नायक के परिवार में इस तरह के लोग हैं जो मानव और मानसी के प्रेम और आकांक्षा के बीच खुरदुरे पत्‍थर की तरह चेहरे पर चाशनी चढ़ाये नजर आते हैं। 

ताल के गीत आनंद बख्‍शी ने अस्‍सी साल की उम्र में लिखे थे। इस उम्र में भी वे गुड़े से मीठा और इमली से खट्ठा इश्‍क लिखकर अपने लिखे गानों को आज भी याद में बनाये हुए हैं। ए आर रहमान का संगीत तो खैर इस फिल्‍म की नब्‍ज में बहता है। तबला, बॉंसुरी, वायोलिन, गिटार आदि वाद्यों की स्‍वतंत्र माधुरी अनुभवों में जान डाल देती है। सुखविंदर, उदित नारायण, आशा भोसले, अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति की आवाजों की सराहना किए बिना ताल पर लिखना पूरा नहीं हो सकता। खूबसूरत दृश्‍यों में फिल्‍म बहुत रोमांटिक लगती है लेकिन जब कहानी शहर आ जाती है तो उसका अंजाम लगभग पता ही होता है। फिर भी ताल से दर्शकों को कन्‍वीन्‍स कराने में प्रदर्शन के समय सुभाष घई ने जो प्रचार-प्रसार का तरीका अपनाया था वह कामयाब था। तीसरे-चौथे हफ्ते में फिल्‍म तक दर्शक पहुँचना शुरू हो गये थे और आखिरकार दर्शकों की राय में ताल एक अच्‍छी फिल्‍म कहलायी भी।
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गुरुवार, 12 मार्च 2020

फिर भी शैलेन्‍द्र जैसे लोग विस्‍मृत नहीं हो पाते.....


गीतकार शैलेन्‍द्र की याद किस रूप में करूँ यह सोच नहीं पाता हूँ ठीक से। मेरे जैसे भावुक व्‍यक्ति के लिए एक भावुक और संवेदनशील का स्‍मरण बहुत कुछ वेदना से भर देता है क्‍योंकि अक्‍सर मेरे मन में यह ख्‍याल आता है कि बहुत से गुणी लोगों, कोमल हृदय और संवेदनशीलों पर समय का ऐसा अचूक प्रहार होता है जहॉं पर थोड़ा सा भी कमजोर पड़ जाने या हार जाने-हताश हो जाने वालों के लिए इस दुनिया में ही रहना कठिन हो जाता है। मैं यहॉं ऐसे लोगों के नाम गिनाने नहीं जा रहा हूँ नहीं तो अवसाद अनुभूति की एक टाटपट्टी ही ऐसी बिछ जायेगी जिसमें अनेक विलक्षण लोग बैठे हमें दिख जायेंगे और हमारी ऑंखों के सामने चलचित्र की तरह उनकी छबियॉं आयेंगी और चली जायेंगी। समय, समाज और लोग हश्र सभी का एक सा ही करते हैं भूल जाने के मामले में फिर चाहे वह कोई भी हो। हम हृदयहीन इतना हो गये हैं कि बाद में याद करके भी याद नहीं आता कि कौन हमारी चेतना या प्रेरणा का हमारी दुनिया से इस तरह चला गया जिस तरह जाने के लिए वह कभी बना ही नहीं था।

शैलेन्‍द्र इसी तरह के इन्‍सान थे जो समय के आगे हार गये अन्‍यथा उनकी क्षमताओं का कुछ भी नहीं बिगड़ा था और न ही गीतात्‍मक संवेदन सृजन प्रक्रिया का। सिनेमा की विफलता क्‍या गुरुदत्‍त और शैलेन्‍द्र जैसों के लिए जानलेवा हो सकती हैं यह प्रश्‍न इसी बात से कौंध उठता है। कहॉं एक समय वह था जब वे सिनेमा के प्रति नितान्‍त उपेक्षा का भाव रखते थे। यह एक अजीब सी विरक्ति कही जायेगी जिसमें अचरज इस बात का भी भरा हुआ है कि आगे चलकर वे उसी सिनेमा का एक मनभावन लिरिकल हिस्‍सा भी बनते हैं। विभाजन बाद के पाकिस्‍तान (रावलपिण्‍डी) में जन्‍मे शैलेन्‍द्र का परिवार जब मथुरा आकर बस गया था उस समय कौटुम्बिक सरोकारों के कारण वे वहीं रह गये थे और अपनी पढ़ाई-लिखाई को भी वहीं अंजाम दिया था। साहित्‍य के बीच उनकी देह, मन और मस्तिष्‍क में अपनी फसल को एक तरह से सहेज रहे थे। यह शख्‍स वास्‍तव में कविताऍं, गीत और रचनाऍं लिखते हुए औरों की तरह काम नहीं कर रहा था बल्कि एक जमीन तैयार कर रहा था अपनी। बिमल रॉय की अविस्‍मरणीय फिल्‍म दो बीघा जमीन में एक गाना है, धरती कहे पुकार के, बीच उगा ले प्‍यार के, मौसम बीता जाये, अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा, कौन कहे इस ओर, तू फिर आये न आये, मौसम बीता जाये......। इस तरह का गीत लिखते हुए एक रचनाकार भी अपने अल्‍कालिक जीवन के आभासों या आगे चलकर आने वाली दुश्‍वारियों के बीच अपने भी आकस्मिक प्रस्‍थान की किसी भावभूमि से अवगत होगा, इसके बारे में हम क्‍या सोचते हैं.......मुझे लगता है कि जीवन की क्षणभंगुरता को लेकर शैलेन्‍द्र के दार्शनिक मन्‍तव्‍य बहुत स्‍पष्‍ट या साफ होंगे जिसे जीना और गाना दोनों ही आसान नहीं है।

एक गीतकार है जो मथुरा में गंगा सिंह के छोटे से मकान में सामूहिक परिवार का हिस्‍सा बना रहा जो धौली प्‍याऊ की गली में बना रहा होगा। वहॉं से एक दिन रेल्‍वे की नौकरी का स्‍थानान्‍तरण इस गीतकार को मुम्‍बई की तरफ ले जाता है, वह मुम्‍बई जो खूब सारे सपने सजाकर ले जाने वाले का नेपथ्‍य ही विस्‍मृत कर देती है। मुम्‍बई जहॉं सफलता और विफलता के लाख सच्‍चे किस्‍से हैं। लोगों ने इस जगह पर फॉंकामस्‍ती को भी अपनी क्षमताओं की हद तक जाकर महसूस किया है और पलायन भी किया है। लोगों ने इस जगह के वैभव और भाग्‍य तथा पुरुषार्थ के साथ अपने में घटित होते समय को भी जिया है और उसमें मरे भी हैं। लेकिन मुम्‍बई तो मुम्‍बई है, उसी यही खूबी भी है। भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर और शैलेन्‍द्र का रिश्‍ता जौहरी और हीरे का रिश्‍ता ही कहा जायेगा। यह‍ रिश्‍ता साफगोई और साफबयानी के बीच ही तो बनकर चला आया जब सीधे और सधे हुए इस गीतकार को फिल्‍मी दुनिया के प्रति ही जरा सा भी आकर्षण न था। राजकपूर ने शैलेन्‍द्र को रचनापाठ करते हुए सुना था। हमारे लिए तो यह भी आश्‍चर्य का विषय ही होगा कि उस समय के प्रतिभाशाली युवा फिल्‍मकार और नायक का साहित्‍य और लिरिकली ग्रेट के प्रति ऐसी कोई खोजबीन या हासिल की स्थितियॉं रहती होंगी। बहरहाल खरा सोना किसको, कब और कहॉं मिल जाये, कौन कब उसकी परख कर ले और कैसे उसके उत्‍कृष्‍ट को अपनी मान्‍यता के साथ जगत भी मान्‍यता बना दे, ऐसे उदाहरण राजकपूर ही थे जो अपने पिता को थिएटर के लिए देश-देश घूमते न केवल देखते थे बल्कि उनके साथ जाया करते थे। पृथ्‍वीराज कपूर के समकालीन इप्‍टा से जुड़े अनेक लेखक, कलाकार, रंगकर्मी पारस्‍परिक सान्निध्‍य में रहा करते थे और सब तरह के संघर्ष में रचनात्‍मक एकजुटता के साथ प्रसतुत होते थे। राजकपूर के मन में अपने पिता के साथ-साथ ऐसे लोगों के लिए भी बहुत इज्‍जत रहा करती थी। यह जो रचनात्‍मक उदारता उनमें आयी, उसी से उनको शैलेन्‍द्र, मुकेश, शंकर और जयकिशन जैसे लोग मिले जिन्‍होंने खुद राजकपूर की क्षमताओं को प्रकाशित करने में अपना बड़ा योगदान किया। शैलेन्‍द्र भी इप्‍टा के मंच की प्रतिभा थे।

राजकपूर जिस समय आग बना रहे थे उसी समय वे शैलेन्‍द्र से मिल चुके थे और वे चाहते भी थे कि शैलेन्‍द्र उनकी फिल्‍मों के लिए लिखें लेकिन वे किसी तरह अपने आपको फिल्‍मों से बचाये हुए थे। फिल्‍म आग के समय दोनों का परिचय हुआ था लेकिन एक दिन जरूरत ही शैलेन्‍द्र को राजकपूर के पास ले आयी। यह और बाद का समय था और तब राज बरसात फिल्‍म बना रहे थे। एक तरफ राज, अब फिल्‍मों में सफलता के दरवाजे की तरफ जा रहे थे। यह सन्‍दर्भ कुछेक जगह लिखा है कि राजकपूर के घर जाने के‍ लिए शैलेन्‍द्र निकले थे। उनके पास उनको देने के लिए कुछ गीत भी साथ थे, इस बीच रास्‍ते में पानी बरसने लगा। मुसलाधार बरसात में उनको मुखड़ा याद आया, बरसात में हम से मिले तुम सजन तुम से मिले हम, बरसात में। राजकपूर से मिलते हुए उन्‍होंने उनको यह मुखड़ा सुनाया और दोनों साथ हो गये। जो और गीत वे उनके लिए ले गये थे वे भी उन्‍होंने अपने पास रख लिए और उनको बरसात, श्रीचार सौ बीस और आवारा में इस्‍तेमाल किया। यह राजकपूर की खूबी थी कि वे अपने साथ बहुत सकारात्‍मक ढंग से अपनी चाह की रचनाओं के लिए गीतकार में भी एक ही समय में हसरत जयपुरी और शैलेन्‍द्र में चयन कर सकते थे जिसका दोनों ही गीतकारों को कोई गुरेज नहीं रहा करता था, इसी प्रकार पार्श्‍व गायन में भी वे जानते थे कि कौन से गाने मुकेश से न गवा कर मन्‍नाडे या मोहम्‍मद रफी से गवाने हैं। एक साथ इतने श्रेष्‍ठ लोगों का सान्निध्‍य भी राजकपूर ने प्राप्‍त किया लेकिन सभी के आपसी सम्‍बन्‍धों की बनक वैसी ही रही, कोई स्‍पर्धा नहीं, किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं।

गीतकार शैलेन्‍द्र का नाम निन्‍यानवे प्रतिशत राजकपूर, शंकर जयकिशन की टीम में बड़े फ्लो के साथ लिया जाता रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि इस टीम से बाहर शैलेन्‍द्र का सृजन ऑंका नहीं गया। उनके भीतर का सच्‍चा इन्‍सान और गीतकार इतना सरल, सहज और सम्‍प्रेषणीय था कि उनकी रचनाओं को फिल्‍म में देखते सुनते मन स्‍वत: ही उसको ग्राह्य किये जाता था। वे बिमल रॉय के भी पसन्‍दीदा गीतकार थे और सचिन देव बर्मन के भी, वे हृषिकेश मुखर्जी के भी पसन्‍दीदा गीतकार थे और विजय आनंद के भी। गुरुदत्‍त के लिए भी उन्‍होंने लिखा और किशोर कुमार के लिए भी। बिमल रॉय की फिल्‍म नौकरी का एक गीत है जो किशोर कुमार पर फिल्‍माया गया है, छोटा सा घर होगा बादलों के छॉंव में, आशा दीवानी मन में बंसरी बजाये। इसी गीत का पहला अन्‍तरा, चांदी की कुर्सी में बैठे मेरी प्‍यारी बहना, सोने के सिंहासन में बैठे मेरी प्‍यारी मॉं, मेरा क्‍या मैं पड़ा रहूँगा मम्‍मी जी के पॉंव में। अपनी मॉं और बहन के लिए देखे स्‍वप्‍न के साथ एक युवा अपने लिए क्‍या जगह सुरक्षित पाता है, मेरा क्‍या मैं पड़ा रहूँगा मम्‍मी जी के पॉंव में। यही किशोर कुमार जब दूर गगन की छॉंव में बनाते हैं तो उनको शैलेन्‍द्र की याद आती है। वे शैलेन्‍द्र को फोन करके बड़े आदर के साथ अपने घर में खाना खाने के लिए आमंत्रित करते हैं, शैलेन्‍द्र पूछते हैं कि और क्‍या बात है, तो किशाेर बतलाते हैं कि एक फिल्‍म बना रहा हूँ दूर गगन की छॉंव में। मन है कि उसके गीत आप लिखें। तब शैलेन्‍द्र, किशोर से कहते हैं कि यह बात समुद्र किनारे टहलते हुए करना ज्‍यादा सार्थक होगा। दोनों मिलते हैं। किशोर बताते हैं कि एक फौजी की कहानी है जो अपने गॉंव लौटता है तो अपना घर तहस नहस पाता है, पत्‍नी मर चुकी है, बेटा गूँगा हो गया है। शैलेन्‍द्र सुनते ही गुनगुना उठते हैं, कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्‍यारे पलछिन। और किशोर कुमार उनको गले लगा लेते हैं। इस तरह शैलेन्‍द्र, किशोर कुमार के भी प्रिय हुए।

शैलेन्‍द्र की पहचान, उनका स्‍मरण और उनके अवदान को सचमुच कबीर, रहीम और रैदास के स्‍मरण के साथ याद किया जाना चाहिए। बिमल रॉय के साथ उनकी फिल्‍मों की बड़ी श्रृंखला है। दो बीघा जमीन से हमने बात शुरू की थी। आगे मधुमति, परख, नौकरी से बन्दिनी तक तक गीतों का समुद्र अनुभूतियों का अथाह है सचमुच। प्रेम को लेकर, विरह को लेकर, स्थितियों को लेकर, विरह को लेकर, सम्‍बन्‍धों और रिश्‍ते-नातों को लेकर वे जिस तरह से विचार करते हैं, वह हमारे मन के कोने-कोने को जाकर छूता है और अपनी इच्छित जगह पर जाकर बैठ जाता है। बन्दिनी के गीत बरबस याद आ जाते हैं, मेरे साजन हैं उस पार………..बर्मन दा ने जिस तरह इसको कण्‍ठ और आत्‍मा से गाया है, गहरे विचलन से भर देने वाली रचना, मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना, गुन तो न था कोई भी अवगुन मेरे भुला देना। कितने सादे सच्‍चे स्‍वीकार हैं। इसी फिल्‍म में बन्दिनियों के बीच का गाना, अब के बरस भेज भैया को बाबुल। बैरन जवानी ने छीने खिलौने, और मेरी गुडि़या चुरायी, बीते रे जुग, कोई चिठिया न पाती, न कोई नैहर से आये रे……..किसी ऑंख भर न आयेगी, इसे सुनकर। शैलेन्‍द्र ऐसे गीतकार थे जिनको आम आदमी के जीवन और सपनों के साथ सीधा जोड़ा जा सकता है। उनके गीत कम से कम तीन पीढ़ियों की चेतना और धरोहर हैं। सचिन देव बर्मन और साहिर की युति जब टूटी थी तो सबसे बड़ा सहारा बने थे बर्मन का शैलेन्‍द्र और जब शैलेन्‍द्र नहीं रहे तो बर्मन एकदम टूट गये थे। जीवन दर्शन को लेकर जो गहरा बोध शैलेन्‍द्र के पास था, उसको और गहराई देकर अपनी आवाज से समृद्ध करना बर्मन दा को बहुत अच्‍छा लगता था। बन्दिनी में उनका गाया गीत मेरे साजन हैं उस पार के बाद विजय आनंद निर्देशित गाइड में वहॉं कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहॉं…………...में उसी जीवन-मरण, उसी क्षणभंगुरता की बात कही गयी है, कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी, पानी पे लिखी लिखायी, है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ‍ किसी के न आयी, कुछ तेरा न मेरा, मुसाफिर जायेगा कहॉं……….।

शैलेन्‍द्र प्रकृति के प्रति असीम अनुराग के गीतकार थे, सुहाना सफर और ये मौसम हँसी। इसी तरह अभावों में सपने तजे नहीं जाते, इस बात को बूट पॉलिश के इस गीत में, चली कौन से देस, गुजरिया तू सज धज के। इस गीत को गाया तलत महमूद ने है पर दिलचस्‍प कि परदे पर यह गीत फिल्‍माया शैलेन्‍द्र पर गया है। शैलेन्‍द्र जिन्‍होंने मित्रता में कुछ भूमिकाऍं भी निभायीं, बूट पॉलिश के अलावा नया घर, मुसाफिर आदि में।

क्‍या तीसरी कसम त्रासदी के जिक्र के बिना शैलेन्‍द्र पर बात पूरी न होगी, बड़ा कठिन लगता है, हालॉंकि बहुत से लोगों ने अपनी टिप्‍पणी में यह बात कही होगी। हमारे सिनेमा के इतिहास में क्‍या वह बात है जब यह निष्‍ठुर समाज किसी के प्राण पखेरू उड़ जाने के बाद संवेदनशील हो उठता है। पाकीजा को सफल होना था मीना कुमारी के न रहने के बाद। प्‍यासा और कागज के फूल की क्‍लैसिकी और उत्‍कृष्‍टता की चर्चा होनी थी, गुरुदत्‍त के चले जाने के बाद। इसी तरह शैलेन्‍द्र भी जब मन और आत्‍मा लगाकर तीसरी कसम बनाकर सबके सामने लाये तो उसको सफलता न मिली। उनके न रहने के बाद आज तक जानकार तीसरी कसम की चर्चा किए बिना अघाते नहीं हैं। एक फिल्‍मकार रवीन्‍द्र धर्मराज की चक्र भी उनके नहीं रहने के बाद प्रदर्शित और चर्चित हुई। तीसरी कसम में निर्देशक का परिश्रम है, अभिनय की श्रेष्‍ठता है, कहानी अनमोल है, फिल्‍मांकन कमाल का है, एक-एक गीत में जीवन दर्शन व्‍याप्‍त है, गायन और संगीत रचना अविस्‍मरणीय है। इसके बाद भी उस समय 1966 में यह ग्राहृय न हुई और शैलेन्‍द्र के अवसाद में जाने, बीमार हो जाने, कर्ज में डूब जाने और अन्‍तत: नहीं रहने के बाद से आज तक हर संजीदा और गम्‍भीर जानकार से लेकर दर्शक तक इसकी प्रशंसा किए नहीं थकता। हमें इस पूरी मन:स्थिति पर दरअसल विचार करने की जरूरत है, शैलेन्‍द्र और उन जैसे प्रतिभाशाली, प्रतिभासम्‍पन्‍न सर्जकों का स्‍मरण करते हुए जिनका अवसान बाद में एक सामाजिक प्रायश्चित की तरह भी याद आता है और हमारे पास इस बात को स्‍वीकार करने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं होता कि दरअसल हम सब लम्‍बे समय से निरन्‍तर चले आ रहे संवेदनहीन समय का ही हिस्‍सा हैं।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

पियानो का जादूगर : ब्रायन सिलायस





एक सौम्य ऋषि


वे एक गोताखोर हैं। बड़े गहरे। डूबकर मोती चुनते हैं और फिर लेकर आते हैं। उनको सुनने का मतलब यह है कि उनको ध्यान से सुनो। ध्यान से सुनो का मतलब है उनके साथ चलो। तैरो, डूबो और फिर मोती पाओ। यह सुख बहुत अनूठा, बहुत अलौकिक है। इस सुख की संगत बड़ी अनमोल, बड़ी दुर्लभ है।
 
ब्राय सिलायस विश्व विख्यात हिंदुस्तानी पियानो वादक हैं। पियानो पर हाथ रखे हुए वे एक सौम्य ऋषि की तरह दिखायी देते हैं। स्वभाव भी उनका ऋषितुल्य ही है। उनके भीतर का संत ही दरअसल उन राग-रागिनियों से अनुरागभरा रिश्ता बनाता है जिसके माध्यम से हम अनुभूतियों की अलौकिकी में आवाजाही करने लगते हैं। वे सादगी से भरे हुए हैं। ब्रायन मंच पर बिना हंगामे के दो शब्दों के प्यार भरे निमंत्रण पर आ जाते हैं। इस बात की कल्‍पना की जा सकती है कि कैसे एक धुनी और गुणी सर्जक की यात्रा संघर्ष से होते हुए यश को छूते हुए परवान चढ़ती है। हम सब देखने, सुनने वालों की निगाह में जब कोई यशस्‍वी कलाकार अचम्भित करता हुआ दीखता है तो हम उसके आज से बहुत मोहित हो जाते हैं। दरअसल महान कलाकारों का स्‍वर्णिम और चमचमाता आज, कल के अनेक ऊहापोह, ऊबड़-खाबड़ पथरीले रास्‍ते, आशा और निराशा के बीच तराजू की सुई की तरह डगमगाता मन और आत्‍मविश्‍वास बहुत बड़ा काम करते हैं। 

ब्रायन सिलायस कानपुर मूल के हैं। बचपन से संगीत के प्रति एक रूमानी आसक्ति रहा करती थी। परिवेश और वातावरण में बहुत कोई ऐसा प्रोत्‍साहक समय नहीं था जो सतत चले लेकिन वे सब तरह के साजों का स्‍पर्श करने और उनके तारों और बोर्ड पर अपनी ऊँगलियों से छूने का अनूठा जिज्ञासाभरा कौशल रखते थे। एक तरह से देखा जाये तो सितार, गिटार, पियानो सभी साजों से उन्‍होंने थोड़ी-थोड़ी बात की उनके मर्म को समझा। ब्रायन कहते हैं कि साज के साथ आत्‍मा का रिश्‍ता होता है जो बनाना पड़ता है। यह बहुत सम्‍वेदनशील और प्रेम करने की तरह अन्‍त:स्‍थल को महकदार बनाता है। यह जुड़ना ही सच्‍चा जुड़ना है। 

ब्रायन इन्‍हीं सर्जनात्‍मक अवधारणाओं से कानपुर से दिल्‍ली चले और उनको ला मे‍रेडियन होटल में पियानो बजाने का अवसर मिला। वे हिन्‍दी सिनेमा में संगीत के मधुरतम युग, उस युग के सर्जको, संगीतकारों और गायकों के साथ गीतकारों के प्रति भी बड़ी श्रद्धा रखते थे। पचास के दशक से उन्‍होंने गीत-संगीत में रूह तक उतर जाने वाले, शिराओं में रक्‍त के साथ अनुभूतियॉं लेकर बहने वाले गीतों को चुन-चुनकर बजाना शुरू किया। मेरेडियन में तो ब्रायन कुछ ही समय रहे लेकिन मौर्या में जब वे गये तो वहॉं उनका व्‍यक्तित्‍व, उनका चेहरा गहरी आश्‍वस्ति से दिपदिपा रहा था। उनकी मुस्‍कराहट में जादू था, यह जादू मुस्‍कराहट में जादुई अँगुलियों की वजह से आया था। धीरे-धीरे उनकी कीर्ति होटलों से बाहर शहरों में और शहरों से बाहर देशों में गयी। ब्रायन के रूप में दुनिया के सामने ऐसा भारतीय कलाकार परिचित हुआ जो भारतीय सिनेमा की मेलोडी के साथ-साथ बजाये जाने वाले गानों की धुन से रसिकों को जोड़ने में अभूतपूर्व रूप से सफल हुआ। 

ब्रायन का पियानो के साथ होना भारत के लिए तो निश्चित ही एक-दूसरे का पर्याय है। भारतीय सिनेमा में यदि इतिहास पर जायें तो सामाजिक फिल्‍मों के दौर में सम्‍भवत: हर पॉंचवीं फिल्‍म में पियानो कहीं न कहीं लगभग एक पात्र की तरह, एक कैरेक्‍टर की तरह मौजूद रहा है। नायक और नायिका ने पियानो के सान्निध्‍य में अपने प्रेम की, अपने विरह की, अपने साथ हुए छल की, दगाबाज़ी की, गिले-शिवके की, उलाहनों की बात की है। कितने ही गाने याद आते हैं, आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है (आपकी परछाइयॉं), दोस्‍त दोस्‍त न रहा प्‍यार प्‍यार न रहा (संगम), आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (राम और श्‍याम), दिल के झरोखे में तुझको बैठाकर (ब्रम्‍हचारी), कोई सोने के दिल वाला कोई चांदी के दिल वाला (असली नकली), तू कहे अगर जीवनभर मैं गीत सुनाता जाऊँ मन बीन बजाता जाऊँ (अन्‍दाज) और भी बहुत सारे। 

प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह, ब्रायन के पियानो के बड़े प्रेमी रहे हैं। उन्‍होंने ब्रायन को पियानो सिंह नाम दिया। एक बार उनका पियानो सुनते हुए महान संगीतका खैय्याम साहब ने कहा, यार तुमने तो हमारी रूह पकड़ ली। सही बात तो यह है कि ब्रायन ने हमारे सिनेमा के विलक्षण संगीतकारों की रूह को नजदीक से छूकर देखा तभी सलिल चौधरी, खैय्याम, ओ.पी. नैय्यर, सचिन देव बर्मन, रवि, मदन मोहन और लक्ष्‍मीकान्‍त-प्‍यारेलाल जैसे सर्जकों के मर्म को समझ पाये। पियानो पर एक पूरा गाना बजा लेना आत्मिक और शारीरिक रूप से बहुत कठिन और जटिल है। ब्रायन बतलाते हैं कि बजाते हुए जितना उनका दिमाग चलता है, उतना ही मन चलता है, उतनी ही अँगुलियॉं चलती हैं और उतने ही पैर चलते हैं। बहुत दार्शनिक भाव से ब्रायन कहते हैं कि किसी भी महफिल या ऑडिटोरियम में बैठकर पियानो बजाते हुए भीतर ही भीतर न जाने कहॉं-कहॉं तक जाना होता है, बता पाना मुश्किल है। 

जब वे पियानो बजा रहे होते हैं, उनके साथ संगी संगतकार बिल्‍कुल ऐसे अनुसरित होते हैं जैसे इस महानदी के बहाव का एक-एक पथ, एक-एक मोड़ उनको पता हो। गिटार पर उनके साथी जयदीप लखटकिया और तबले पर तुलसीराम उतने ही सादे और सहज हैं लेकिन साहब ब्रायन के साथ राग पथ के सहयात्री के रूप में उनका हाल और चाल दोनों कमाल के हैं। संगीत के माधुर्य का यह हंस अपने दोनों पंखों के साथ क्या खूब उड़ चलता है, वाकई विलक्षण। बात पूरी करते-करते यह न लिखा जाये तो बात अधूरी ही रह जायेगी कि ब्रायन की उपलब्धियों और यश की इस यात्रा में उनकी सहधर्मिणी रविन्‍दर कौर सिलास परछाँयीं की तरह उनके साथ होती हैं, स्‍टेज के सामने भी वे ब्रायन पर मुग्‍ध बनी रहती हैं, उनके चेहरे पर ब्रायन के लिए जो प्‍यार दिखायी देता है वो भी किसी प्रेमधुन से कम नहीं है।
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दबंग के सकारात्‍मक पहलू

सिरे से खारिज करने के पहले



हाल ही में प्रदर्शित सलमान खान की नयी फिल्म दबंग तीन को लेकर मेरी टिप्पणी पर मित्रों की निरी असहमतियाँ प्राप्त हुई हैं। कुछेक मित्रों ने मेरे सिनेमा लेखन की समझ और अनुभव को भी आड़े हाथों लिया। मेरा विनम्र उत्तर यही था कि सीख रहे हैं, पारंगत हो गये हैं, यह अभिव्यक्त तो कभी रहा ही नहीं, बहरहाल। 

दबंग को सिने से नकार दिए जाने की कोई बहुत ठोस वजह देखने में नहीं आती। सलमान खान सहित उसके तीन बड़े निर्माता हैं जिन्होंने दक्षिण के एक बड़े सितारे, कोरियोग्राफर और निर्देशक प्रभुदेवा को इस फिल्म के निर्देशन के लिए अनुबन्धित किया। भरपूर धन लगाकर फिल्म बनायी गयी जो अपनी लागत का ठीकठाक अर्जित कर रही है। सितारा उपस्थिति है। बिल्कुल उबा दे, बैठना दूभर कर दे इतनी अप्रिय फिल्म नहीं है दबंग।

माना जा सकता है कि कहानी नहीं है कुछ। पहली दबंग से दूसरी और दूसरी को बनाने पर मिली खूब सफलता ने इस साहस के लिए प्रेरित किया होगा लेकिन यह भी तय मानिए कि इस दबंग पर आम राय बनने के बाद चौथी दबंग तो कम से कम नहीं बनेगी। दस साल की आवृत्ति में यह तीसरी दबंग ही सबसे बड़े अन्तराल के साथ आयी है। 

दबंग तीन आम मसाला और फार्मूला फिल्म है लेकिन उसमें दूसरी मसाला और फार्मूला फिल्मों की तरह बेतरह अनर्गल चीजें नहीं डाल दी गयी हैं। हर तरह के दर्शकों का ध्यान रखते हुए एक ऐसी फिल्म निर्माताओं के बनानी चाही है जो अपने नाम और सफलता के इतिहास के बचे-खुचे प्रभाव में कुछ खींचकर ला सके। बहुत उत्साहजनक ढंग से ये न भी कर पायी तो भी घाटे में फिल्म न रहेगी यह भी तय है।

फिल्म की अच्छाइयों में कई बातें ध्यान आकृष्ट करती हैं। इनमें से एक परिवार के साथ जिन्दगी और दुनिया की कल्पना जिसमें आपसी अनुकूलताएँ, दृश्य और संवाद प्रभावित करते हैं। दिशाहीन नायक का कुछ करने को उदृत होना, जिसे चाहता है उसकी पढ़ाई पूरी हो, अपनी ओर से धन देने की वचन बद्धता सकारात्मक सोच पैदा करते हैं। एक दृश्य वह दिलचस्प है जब वह धोखे से अपनी माँ को ही खुली मालगाड़ी पर पहले छोड़ आता है फिर सच पता चलने पर बचाकर लाता है। मनुष्य की आम बुराइयों को दिखाने में परहेज नहीं किया गया है। अच्छी सिनेमेटोग्राफी, एक्शन, कोरियोग्राफी के साथ संवादों में मर्यादा का प्रदर्शन उल्लेखनीय पक्ष हैं। सलमान खान अपनी लगभग सभी फिल्मों में अच्छी हिन्दी का प्रयोग करते हैं। यहाँ भी की है, विशेषकर ऐसे समय में जब हिन्दी सिनेमा से हिन्दी समाप्त हो रही हो, इस नायक के इस प्रयत्न को नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। 

हिंसक दृश्यों, मारधाड़ के तीव्र प्रदर्शनकारी दृश्यों के बाद भी नायक के चेहरे पर उत्तेजना, आवेग और घृणा या नफरत दिखायी नहीं देती जो एक बैलेन्स और सन्तुलित कलाकार और किरदार को व्यक्त करती है। एक इन्सपेक्टर ऊपर की कमायी से वेल्फेयर सोसायटी भी चला रहा है, सामूहिक विवाह करा रहा है। उसने शादी ब्याह में लूटने वाले को मारपीट कर उसके पुराने व्यावसाय बैण्ड मास्टर के काम से लगा दिया है जो अब उसके साथ हो गया है और फिल्म के अन्त तक दीखता रहता है।

अच्छी सिनेमेटोग्राफी, एक्शन, कोरियोग्राफी के साथ संवादों में मर्यादा का प्रदर्शन, शिष्टता, सभ्यता, मानवीय संवेदना के पक्षों को एक बार फिर याद कर सकते हैं कि कैसे वह कम उम्र की लड़कियों को गलत जगह जाने से बचाता है, कैसे एक इन्स्पेक्टर होने के नाते पल भर में यह निर्णय लेकर लड़कियों से कहता है कि तुम लोग घर जाओ, तुमसे कोई पूछताछ नहीं की जायेगी।

मैं एक फिल्म समीक्षक होकर भी देखता हूँ और दर्शक होकर भी। किसी एक पक्ष का तराजू भारी नहीं हो यह ध्यान रहता है, अन्ततः सन्तुलन सबसे बड़ी चीज है जो सब्जी बनाते समय मसालों की मात्रा के चयन से लेकर जीवन मूल्यों और व्यवहार में भी मायने रखती है, हमारे पास हर बात का सन्तुलन होना चाहिए, व्यग्रता और आवेग ही सब कुछ नहीं, तुरन्त फैसला कर देना, मित्रगण ऐसे भी जिन्होंने बिना देखे ही यह राय कायम कर ली कि फिल्म अच्छी नहीं है, मेरी समझ में फिल्म बनाने वालों से लेकर उसमें छोटी-छोटी भूमिका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निबाहने वालों के परिश्रम के साथ भी न्याय न कहा जायेगा, बाकी कहने, लिखने की स्वतंत्रता सबकी अपनी है, कुछ भी कहा जा सकता है।    

एक सिनेमा से आप यदि एक भी सकारात्मक बात लेकर बाहर निकलते हैं सिनेमाघर से तो वह एक दर्शक, एक मनुष्य की उपलब्धि है, शेष जैसा आपको ठीक लगे, आपकी राय भी तो शिरोधार्य अर्थात सिरमाथे है.............   

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

देखते हुए / फिर फिर दबंग.....दबंग

अपेक्षाओं का कम होते जाना स्‍वाभाविक है.......

(हर बार वही करिश्‍मा कैसे सम्‍भव है)


दबंग, सलमान खान और प्रभुदेवा तीनों का ही ध्यान बना रहता है इस फिल्म को देखते हुए। प्रभुदेवा का सबसे पहले इसलिए कि वाण्टेड निर्देशित करके सलमान खान को बरसों पहले स्टारडम दोबारा लौटाने का श्रेय उन्हीं को है। दबंग सलमान ने पहले अभिनव कश्यप को लेकर बनायी जो सबसे अच्छी थी, दोबारा अरबाज खान ने इसे बनाया तो छायाप्रति में कुछ प्रभाव घटा। इससे सावधानी बरतते हुए तीसरी बार जब दबंग बनने चली तो वाण्टेड प्रभुदेवा को बुला लिया गया। डांसर औ कोरियोग्राफर प्रभु देवा ने इसको बस बना दिया है, अन्यथा यह निर्माता सलमान खान की फिल्म पूरी तरह लगती है और दो दबंग की सफलता के आत्मविश्वास से थोड़ी झूलती हुई भी।

सलमान खान की पिछली किसी फिल्म पर लिखते हुए मेरे लिखने में यह गलत नहीं आया था कि वे बॉलीवुड के रजनीकान्त हो जाना चाहते हैं। अपनी छबि पिछले दस सालों में उन्होंने ऐसी ही बनायी है। यह सही भी है कि फिलहाल तो वे नम्बर वन हैं ही। शेष सब उनके बाद। पहली दबंग से दूसरी दबंग की कहानी कानपुर तरफ चली गयी थी, इस दबंग में भी उत्तरप्रदेश है और वातावरण टुण्डला का है। चुलबुल पाण्डे वही है, उनके मसखरे और हँसोड़ संगी साथी भी उसी तरह जो कंधे पर गोली भी खा लेते हैं, डौल-बेडौल होने के बाद भी गानों में नायक के साथ नाचते भी हैं और सारे पुलिस व्यवहार के यथार्थ का निर्वाह सहजता से करते हैं।

इधर दो दबंग की नायिका से पहले की एक नायिका है नायक की। छेदी सिंह, बच्चा सिंह से होते हुए इस बार खलनायक बाला सिंह है, हिन्दी फिल्मों के लिए नया चेहरा मगर दक्षिण से मजबूत कन्नड़ सिनेमा के लेखक, निर्देशक एवं अभिनेता किच्चा सुदीप। यह रहस्य तीसरी दबंग में खुला कि हमेशा सहज रहते और हँसते-हँसाते रहने वाले नायक का पहला रूमानी दर्द खुशी नाम की लड़की भी है। यह नयी आमद है महेश मांजरेकर की बेटी सई। कुछ दृश्य के लिए है लेकिन कोमल और सॉफ्ट रोमांटिक उपस्थिति में अच्छी लगती है। सोनाक्षी सिन्हा इस तीसरी बार में और भी अधिक आश्वस्त लगती हैं लेकिन श्रेष्ठ नहीं, यह कहा जा सकता है क्योंकि सीमित संवाद और खूब सारी साड़ियाँ बदलते हुए वे अभी कम प्रतिभा के चलते भी चलती रहेंगी। एक गाने के साथ कुछ मादक रूमानी लीलाएँ नायक के साथ उल्लेखनीय हैं जिसमें बाथटब में शराब डालना और अंजुली में भरकर पी लेना शामिल हैं लेकिन यह खूबी है कि नायक ने इस दृश्य को स्तरहीन नहीं होने दिया है।

नायक और नायक का भाई निर्माता है, निर्देशक भी वेल-विशर। लगभग हर दृश्य में सलमान खान हैं लेकिन हमेशा की तरह कई दृश्यों में आदर्शवादिता, सभ्यता और सामाजिकता के पक्ष में बात करने के बावजूद वे निर्देशक के हाथ में नहीं हैं यह साबित हो जाता है। पहली दबंग इसीलिए बहुत बेहतर इस कारण लगती है कि अभिनय कश्यप ने लोकप्रियता के इस फलसफे को मौलिकता में गढ़ा था। चुलबुल पाण्डे के किरदार को पहली बार विकसित किया था। आज उसमें दोहराव और तिहराव है।

फिल्म में खलनायक आपको थोड़ी थोड़ी देर के लिए दूसरी आबोहवा में ले जाता है क्योंकि वह यहाँ अपनी पहली परीक्षा दे रहा है। कन्नड़ फिल्मों के सितारे किच्चा सुदीप एक निर्मम और बर्बर वृत्ति के बुरे आदमी के रूप में आकृष्ट करते हैं पर उनका बाला सिंह नाम एक तरह से मिस मैच है जो देहाती सा लगता है जबकि प्रकट तौर पर इस कलाकार ने अपने आपको हृदयहीन आवेगी की तरह प्रस्तुत किया है। वह दृश्य महत्वपूर्ण है जब क्लायमेक्स में खलनायक को मारते हुए नायक कहता है कि यदि तुम किसी से प्यार करते हो और वह तुमसे प्यार न करती हो तो क्या तुम उसको मार डालोगे, एक बड़ा सवाल है जो सलमान, किच्चा सुदीप को दण्ड देते हुए पूछते हैं। आज के समय में भी यह मौजूँ है।

मित्र सोचते होंगे कि सारी बातें कर दी हैं, कहानी नहीं बतायी। उत्तर है कि कहानी है ही नहीं। क्योंकि दबंग एक के बाद दूसरी बनी और दो के बाद जो तीसरी बनी वह दरअसल दबंग एक के भी पहले की दबंग प्रचारित है। इसी कारण यह अलमारी में कसकर रखी किताबों के बीच में एक किताब यह कहकर खोंस देना है कि इसकी जगह पहले हैं। अब दक्षिण भारत का निर्देशक है, वह रोहित शेट्टी तबीयत की फाइटिंग, स्टंट और गाड़ियों के करतब शामिल हैं। मध्यप्रदेश के महेश्वर और माण्डू में फिल्माये हुए दृश्यों को देखते हुए वातावरण में टुण्डला के यथार्थ पर यकीन करना मुश्किल होता है। इस फिल्म में स्कॉर्पियो वाहन का बढ़िया इस्तेमाल है, काफिले से लेकर लड़ाई-झगड़े और स्टंट के विषयों में सफेद स्कॉर्पियो से दृश्य और प्रसंग की आक्रामकता ज्यादा असर देती है।

इस फिल्म को समीक्षक बड़ी कंजूसी से सितारे प्रदान कर रहे हैं और कोई भी डेढ़ से दो को पार नहीं कर रहा। निजी रूप से मैं सोचता हूँ कि दबंग तीन की तुलना में हमारा दिमाग बार-बार दबंग एक और दो के साथ क्यां हो जाता है? इसे उससे अलग हटकर भी देखा जाये। मेरा ख्याल है कि तीन स्टार उचित है। 



गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

।। द स्काय इज पिंक ।।


फिल्म जो मन को छूकर मन में बैठ जाती है


द स्काय इज पिंक देखकर आया हूँ। कभी-कभी किसी फिल्म को देखने का निर्णय अपने लिए बहुत भारी पड़ जाता है। दरअसल इतने वर्षों में बहुत साधारण फिल्में देखते हुए ऐसी फिल्मों की स्मृति मन से लगभग जाती रही जो दिमाग में द्वंद्व पैदा करती थीं। बरसों हो जाते हैं ऐसी फिल्म देखे हुए। इस फिल्म के बारे में चूँकि जान लिया था तो मन में था कि इसे देखना ही है। खासकर तब और देखना है जब सिनेमाघरों में यह दो-एक शो में ही लगी हो शेष जगह दोयम दर्जे की फिल्मों का कब्जा हो।

अब हमारा दिमाग उन सबसे हट गया है जब हम सिनेमाघर में जाकर बैठ गये हैं। इस समय निरर्थक क्रांति करने वाले नारे कौंध नहीं रहे हैं कि शुरूआत में ही इस बात पर चौंकते हैं जब अदिति अपने पति निरेन को अपने फिर से गर्भवती होने की बात बतलाती है। तब करीब-करीब युद्ध में बदलती बहस है। बच्चा चाहिए या नहीं। यह भी डर है कि पहली बेटी की तरह ही जानलेवा बीमारी का शिकार होकर जन्मी तब। पिता गर्भपात कराना चाहता है और मॉं नहीं। अन्तत: सन्तान बेटी के रूप में जन्म लेती है। स्वाभाविक रूप से फिल्म में यह घटना और उसी लड़की का नैरेशन कुछ एक साथ चलते हैं। लड़की जो अठारह साल की उम्र तक आते-आते इस दुनिया से चली गयी लेकिन पल्मोनरी फिबरोसिस नाम की जन्मजात बीमारी के साथ इसका जन्मते ही संघर्ष और परिवार में उसको लेकर वातावरण इस फिल्म में इतने सूक्ष्मत विवेचन के साथ दिखाया गया है जिसको देखते हुए एक पल भी ऊब का एहसास नहीं होता।

चार लोगों के परिवार में माता-पिता, भाई-बहन हैं। सबसे पहली भी बेटी थी जो इसी बीमारी के कारण छोटी उम्र में ही चल बसी थी। आने वाली सन्तान को लेकर यही बहस है कि कितने दिन जियेगी, कैसे जियेगी और जब थोड़ा जियेगी तो इसे दुनिया में लाया ही क्यों जाये। चित्रकार और लेखिका बनकर अपने जीवन को साहसिक ढंग से जीने वाली यह लड़की आयशा अपने इन लड़ते-झगड़ते और कई बार मारपीट करते माता-पिता का आभार कहती है कि उन्होंने इसे दुनिया में आने दिया। न केवल आने दिया बल्कि उससे ज्यादा वे दोनों भी उसकी बीमारी के साथ लड़ते रहे, टूटते रहे, फिर जुड़ते रहे।

कहानी क्या है, एक मर्मस्पर्शी आत्मकथ्य है लेकिन वह एक बहुत बहादुर लड़की का है जो हर स्थितियों में हारा नहीं करती, लड़ा करती है। वह अपने माता-पिता को अपने ऊपर जान छिड़कते देखा करती है, वह यह जानती है कि जीना बहुत कठिन है लेकिन वह उनके हौसले से पहले टूटती नहीं। उसका विनोदप्रिय होना, जैसे बात-बात पर वह नैरेट करते हुए अपने मम्मी -पापा की सेक्स लाइफ की जीवन्तता की बात भी करती है, दर्शक इस गम्भीर फिल्मे को देखते हुए हँसने लगता है। एक जगह शुरू में वह कहती है कि मेरे मम्मी -पापा के पास हनीमून के लिए नेपाल जाने के पैसे नहीं थे लेकिन मैं पैदा क्या हुई, लन्दन की सैर करा दी।

बेटी की चिकित्सा के लिए हर जतन करने वाले, कोई कमी न छोड़ने वाले, पैसों के अभाव के बावजूद डगमगाते हौसलों के बीच खड़े रहने वाले पिता फरहान अख्तर जब डबडबायी ऑंखों से लन्दन के रेडियो में उसकी बीमारी की बात कहते हुए पैसों के सहयोग की अपील करता है या प्रियंका चोपड़ा मॉं का बेटी के लिए हर एक सेकण्ड लगभग जाग्रत रहना, उसके ऑक्सीजन के सिलेण्डर की अतिरिक्त व्यवस्था करके रखना, आखिरी समय में एक-एक पल कम पड़ते और हारते हुए विक्षिप्त होकर पति पर ही हमला कर देना और मानसिक अस्पताल जाना ये सब ऐसे दृश्य प्रसंग हैं जो आपको एक मर्मस्पर्शी सिनेमा की शक्ति और सम्प्रेषणीयता का एहसास कराते हैं। उस वक्त बेटी का अपने पिता का ख्याल रखना और अपनी मॉं से वादा करना कि आपके लौटकर आने तक मैं टपकूँगी नहीं सजल कर देता है।

जायरा वसीम ने फिल्म में बेटी का किरदार निभाया है। देखते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि हमारे सामने कलाकार है। जिस तरह से वह आयशा चौधरी की पूरी की पूरी आत्मा को आत्मसात करती है वो उनके लिए सलाम करने का मन देता है। आखिरी आखिरी की पेण्टिंग, कविताऍं, नैरेशन सब कुछ और मॉं की जी-तोड़ कोशिश की बेटी की ऑंख बन्द होने से पहले उसकी किताब की एक प्रति छपकर आ जाये। ओह........बड़ा मुश्किल होता है सब कुछ सहना। इस फिल्म में एक भाई भी है और एक कुत्ता भी। सब के सब पता नहीं कैसे घुट्टी पिये अपना शॉट दे रहे होते हैं। आरम्भ के दृश्य में ही जहॉं से पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) शुरू होती है, पहले आयशा के पलंग पर कुत्ते का मायूस सा सोया होना हृदयविदारक रिक्तता का एहसास कराता है।

यह फिल्म गुलजार साहब की दिल पर पेन से लिखी जाती कविता की भावुक सिहरन के लिए भी याद रह जाती है। शोनाली बोस और निलेश मणियार ने इस सच घटना को सिनेमा में जस का तस गढ़ दिया है बिना उसकी आत्मा को छेड़े या मारे जिसका खतरा हिन्दी सिनेमा में बहुत होता है और मानस मित्तल ने फिल्म बहुत सलीके से फिल्म एडिट की है। यह फिल्म कई दिनों तक दिमाग में बनी रहेगी। आमतौर पर सिनेमा के प्रति निरी सतही विचारधारा के अभ्यस्त दर्शकों में से गम्भीर दर्शक यदि इसे चुनते हैं देखने के लिए तो उपलब्धि ही महसूस करेंगे।
#theskyispink Shonali Bose

रविवार, 20 अक्टूबर 2019

वार : बचाने के लिए वार


हिृतिक रोशन को इससे भी बेहतर कहानी दी जानी चाहिए

 


अपने बड़े भाई बी आर चोपड़ा के साथ काम करते हुए यश चोपड़ा ने स्वयं अपनी निर्माण संस्था बनायी और निर्देशन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण फिल्मों के साथ नाम और दाम दोनों कमाया। बाद में यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे एक सुपरहिट बनाकर लगभग रिटायरमेंट जैसी जिन्दगी ही अपना ली। उन्होंने दूसरे निर्देशकों को अपने बैनर पर मौका दिया। अपवाद स्वरूप रब ने बना दी जोड़ी या एक दो और कुछ बनाया होगा तो याद नहीं है। बहरहाल अपने पास उपलब्ध बजट से वे यशराज को बनाये हुए हैं लेकिन उनके कार्यकाल में दीवार, त्रिशूल, कभी-कभी, चांदनी, लम्हें या सिलसिला जैसे नाम नहीं हैं। नेपथ्य से वे युक्तिपूर्वक अर्जन में जीवन बिता रहे हैं। बहरहाल, उनकी निर्माण संस्था की नयी फिल्म वार देखने का अवसर जुटा पाया था तो लगा कि कुछ बातें लिख दूँ। मित्रों में फिल्म समीक्षा को लेकर जो जिज्ञासा या कौतुहल रहता है, उसका किसी हद तक अपनी समझ और प्रयासों से समाधान करने का प्रयत्न भी इसी बहाने है।

वार फिल्म को सिद्धार्थ आनंद ने निर्देशित किया है। इस साधारण सी कहानी को लिखने में उनके अलावा फिल्म के निर्माता आदित्य भी लगे तब जाकर यह भटकी सी कहानी फिल्म के लिए बन पायी। इसके संवाद उन्होंने अब्बास टायरवाला से लिखवाये हैं। देश को बाहरी मुल्कों से खतरा, आपसी शत्रुता, छल-षडयंत्र ये हमारे सिनेमा के बहुत आम विषय रहे हैं। बहुत कम फिल्मकार ऐसे विषय लेकर जिम्मेदारी या समझबूझ से कोई फिल्म बना पाते हैं। सिद्धार्थ आनंद ने जान-जोखिम में डालने वाले देश के सुरक्षा एजेण्टों की ओर से यह कहानी प्रस्तुत की है। हितिक रोशन और टाइगर श्रॉफ के तेवर प्रदर्शन और प्रचार के साथ यह फिल्म शुरू होती है। दोनों नायक एक-एक करके जिस तरह से परदे पर आते हैं लगभग प्राकट्य भाव है। मुश्किल यह है कि हॉल में ताली नहीं बजती।

सारा झगड़ा आतंकी को पकड़ने का है। उसको मदद करने वाले, रुपयों और पैसों के लालच में आकर अपना ईमान बेचने वालों की एक पूरी श्रृंखला को बेनकाब करना है। कहानी आरम्भ में नायक को रहस्यमयी ढंग से नकारात्मक दर्शाती है। नायक का अधीनस्थ जो है उसी को इसका पता लगाने को कहा जाता है कि कैसे बहादुर हीरो की बन्दूक अपने ही लोगों पर तन गयी है। एक घण्टे सब कुछ बढ़िया चल रहा है, माल्टा, पुर्तगाल, ईराक और वहाँ के विभिन्न स्थानों, पहाड़, तराई, घाटी के हवाई फिल्मांकन, खासकर एक्शन दृश्य, मारधाड़, आधुनिक विमान, मोटर सायकिलों पर पीछा करने के जोखिम भरे दृश्य दर्शक को जगाये रखते हैं।

मध्यान्तर के बाद बिना सोचे समझे बाहृय संरचना करके फिर भीतर कुछ ईंट और कुछ रोड़े लगाने में निर्देशक की ऊर्जा नष्ट होती चली गयी है। नायकों को स्थापित करने, उनका अतिशय महिमा मण्डन करने में लगभग सिद्धहस्त हो चले युवा निर्देशक सबसे ज्यादा छल नायिकाओं के साथ करते हैं। बरसों से अच्छे अवसर की यशराज में प्रतीक्षा करती वाणी कपूर को इस फिल्म में भी कुछ मिनट का, अथाह देहप्रदर्शन का किरदार देकर छुट्टी पायी है। शेष सहायक भूमिका निभाने वाले आशुतोष राणा जैसे कलाकार बहुत बंधे हुए लगते हैं जैसे सचेत कर दिया हो कि बस इतना ही इससे ज्यादा नहीं जाना। दो-तीन गाना, नाचना भी है। लेकिन प्रचारित यह हो रहा है कि बॉक्स ऑफिस पर रुपयों की बरसात हो रही है और वार ने सभी आसपास की फिल्मों के साथ वार करके विजयश्री हासिल कर ली है।

कुल मिलाकर ऐसा है नहीं। प्रथम दृष्टया पूरी कहानी की आत्मा ही कल्पनाहीनता और तर्क के विपरीत है। ऐसा लगा है कि बहुत सी लीपापोती शूट करते चलने के बाद पूर्वदीप्ति (फ्लैश बैक) में करके अपनी बात के पक्ष में भर लिया गया है। विशेष रूप से वह दृश्य बहुत फालतू लगा है जिसमें टाइगर के छुटपन के किरदार को स्कूल में बच्चे बुरी तरह मारते हैं जिससे वह बाँयी ओर से आँखों से देखने की क्षमता खो बैठता है। एक दृश्य को व्यर्थ न बताने के लिए यह गुणाभाग। ऐसे ही हितिक का नायिका को दिया वचन और फिर उसके एक वाक्य से जुड़कर उसकी बच्ची का ध्यान रखने वाली चेष्टाएँ। यह इसलिए कि वह जिस आश्वस्ति के साथ नायिका को उसकी रक्षा का वचन देता है, उसी में विफल हो जाता है।

इन सबके बावजूद अपनी भूमिका के साथ हितिक बहुत अच्छे उपस्थित हैं। उनकी पूरी शख्सियत फिल्म को एक तरह का रक्षाकवच ही है। टाइगर श्रॉफ इसलिए इसमें ठीकठाक नजर आते हैं क्योंकि उनका कन्ट्रास्ट नायक के साथ है। इतने के बाद सिनेमेटोग्राफी (बेंजामिन जेस्पियर), एक्शन डायरेक्टरों का कमाल और लगभग दो तिहाई हिस्से का कसा हुआ सम्पादन (आरिफ शेख) इस फिल्म को देखने-सहने योग्य बनाता है।

हालाँकि यह फिल्म एक था टाइगर या टाइगर जिन्दा है परम्परा की ही आगे की कड़ी है। चेहरा बदलने वाली चिकित्सक और उसके अस्पताल की, मुँह का त्वचीय उपचार करती मशीने बहुत हास्यास्पद लगती हैं। असली टाइगर श्रॉफ आरम्भ में मर चुका है, एक खुफिया अधिकारी का चेहरा उस जैसा कर दिया गया है जो शत्रुओं के साथ है। नकारात्मकता और सहानुभूति के बीच यह किरदार और टाइगर दोनों ही अपना श्रेय इसीलिए नहीं पा सके हैं। विदेश आम भारतीय के सपनों का स्वर्ग होता है, मेरे लिए भी है और हम जैसे लोगों के लिए ढाई घण्टे में तीन-चार देश घूम आना बुरा नहीं है लेकिन फिल्म बहुत अच्छी बन जाती यदि कहानी ढंग की होती, उसका निर्वाह कायदे से किया जाता।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

हिन्दी सिनेमा में बरसात


बिजुरी की तलवार नहीं बून्दों के बान चलाओ

 


हिन्दी सिनेमा की एक लम्बी परिपाटी समसामयिक परिस्थितियों, आवश्यकताओं, अभावों और संघर्ष के विषयों का अहम बिन्दु रही है। समय-समय पर ऐसी अनेक फिल्में बनी हैं जिनमें मानवीय जीवन के सुखदुख, रिश्ते नाते, खुशियाँ, तकलीफें, रीति-रिवाजों की व्याख्याएँ दर्शकों के मन मस्तिष्क में अपनी ऐसी जगह बना गयी हैं कि आज भी उनकी छाप स्मृतियों में है। गर्मी का मौसम है, बरसात की आमद होने को है। हिन्दी फिल्मों में गर्मी का मौसम, पानी की कठिनाई और बरसात के आव्हान को लेकर कितनी ही बातें कही गयी हैं। न जाने कितने गीत हम गुनगुनाते हैं, कितनी ही फिल्मों के यादगार प्रसंगों को याद करते हैं। आज के सिनेमा में समय सापेक्षता के कितने तत्व मौजूद हैं, ये तो जमाना जानता है मगर हमें पहले का सिनेमा जरूर अपनी कई खूबियों और विशिष्टताओं के साथ-साथ दर्शकों से अपने अनूठे रिश्ते बना लेने के कारण अक्सर याद आता है। इस लेख के माध्यम से ऐसी ही कुछ फिल्मों की चर्चा की जा रही है जिसमें जल के साथ इन्सानी जद्दोजहद को बखूबी पेश किया गया है।

1953 में प्रख्यात फिल्मकार स्वर्गीय बिमल राय ने एक अविस्मरणीय फिल्म बनायी थी, ‘दो बीघा ज़मीन’। ‘धरती कहे पुकार के, गीत गा ले प्यार के, मौसम बीता जाए, मौसम बीता जाए’, मन्नाडे का गाया यह गीत आज भी सुनो तो फिल्म के सशक्त कथ्य और उसमें अन्तर्निहित यथार्थ की तस्वीर आँखों के सामने उभर आती है। ग्रामीण परिवेश में प्रकृति और पूंजीपति से संघर्ष करता किसान कितना विवश और असहाय है, यह फिल्म में देखा जा सकता है। सूखे और अवर्षा की स्थिति में जब पूरे गाँव के लोग पानी का आव्हान करते हुए ‘हरियाला सावन ढोल बजाता आया’ गाते हैं तो एक-एक आदमी और औरत के चेहरे पर आसमान से बरसने वाले पानी के लिए स्वागतातुर ललक उम्मीदों से भरी नज़र आती है। गाना खत्म होते होते जब पानी बरसता है तो लोग जमकर नहाते हैं। 

1956 में राजकपूर की फिल्म ‘जागते रहो’ में पानी के लिए प्यासा नायक जब एक घर में जा घुसता है तो उसे अपने जगत के बेनकाब होते चेहरे दिखायी पड़ते हैं। उसकी प्यास तब और चरम पर जा पहुँचती है जब वो उन चेहरों पर मानवीयता को नेस्तनाबूत कर दिए जाने के षडयत्रों को अट्टहास करते हुए देखता है। उसका गला खुष्क हो जाता है। उसके सामने आम आदमी के विरोध में जैसे एक पूरी दुनिया ही खड़ी दिखायी देती है। वह चोर साबित होता है। बेतहाशा भागकर जब पस्त हो जाता है तो फिल्म के अन्त में उसके चुल्लू में नरगिस पानी डालती है और वह व्याकुल आत्मा के साथ पानी पीकर तृप्त होने की कोशिश करता है। यह अन्त एक तरह का आशावाद ही माना जायेगा जिसका इन्तज़ार आज तक उस नायक जैसे इन्सान कर रहे हैं। 1965 में आयी विजय आनन्द की फिल्म ‘गाइड’ की एक अलग ही फिलॉसफी थी। उसके मूल में प्रेम था, जिसको सशक्त कथ्य और चरित्र के भीतर के अन्तर्द्वन्द्वों के बावजूद नैतिक ठहराने की एक बड़ी और आत्मविचलन से भरपूर जद्दोजहद दिखायी पड़ती थी। फिल्म का नायक अन्त में जब एक गाँव में जाकर लोगों की श्रद्धा का पात्र बन जाता है तब उसकी अपनी एक कठिन परीक्षा जो कि परिस्थितिजन्य होती है मगर उसकी ज़िन्दगी की कीमत पर उसे नायकत्व के शिखर पर स्थापित करती है। पानी को तरसते सूखे गाँव के लिए नायक का अन्न जल त्याग देना आखिर उस चरम को स्पर्श करता है जिसमें पानी का बरसना और नायक का मर जाना एक ही चरम बिन्दू पर घटित होता है। पानी के आव्हान से आत्मपरीक्षा का यह तारतम्य आज भी दर्शक भुला नहीं पाये हैं। 

पानी को लेकर संघर्ष की स्थितियों को अक्सर राजस्थान की पृष्ठभूमि और परिवेश में बनी फिल्मों में अक्सर व्यक्त किया गया है। रेत और रेगिस्तान में जहाँ दूर-दूर तक पानी का नामोनिशान न हो वहाँ लोग क्या करेंगे? सिनेमा को मानवीय संघर्ष और सरोकारों के सशक्त माध्यम के रूप में बरतने वाले प्रख्यात फिल्मकार ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने 1971 में फिल्म ‘दो बून्द पानी’ में पानी और सपनों के यथार्थ को इन्सानी ज़िन्दगी और संवेदना के परिप्रेक्ष्य बहुत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया था। ‘पीतल की मेरी गागरी, दिल्ली से मैंने मोल मंगायी रे। पाँवों में घुंघरू बांध के, अब पनिया भरन हम जाईं रे’ गीत की मधुर भावना और संगीत आज भी उतना ही प्रभावशाली है जितना उस वक्त था। कैफी आज़मी के लिखे इस गीत को जयदेव ने संगीत से सजाया था। राजस्थान गंगा सागर परियोजना इस फिल्म के मूल में थी जिसमें एक संवेदनशील कहानी को अब्बास ने सृजित किया था।

1981 में तमिल के प्रख्यात निर्देशक के. बालाचन्दर की फिल्म ‘थन्नीर थन्नीर’ में पानी की समस्या को राजनीति में इस्तेमाल करने और शोषण का प्रभावी चित्रण किया गया था। तमिलनाडु के एक गाँव अतिपत्तु में भयावह जलसंकट है। पानी को लेकर तरसते गाँव को जीवनयापन के लिए पानी चाहिए मगर दो प्रभावशाली राजनैतिक दलों में यह राजनीति प्रबल होती है कि पानी गाँव में आये या नहीं? बीस मील दूर से इस गाँव को पानी उपलब्ध कराने के नाम पर स्थानीय राजनीति अपने ढंग से जनता को भरमाती है। राजनेता, उनके अनुयायी और पुलिस सब मिलकर इस अत्यन्त सम्वेदनशील मुद्दे को राजनीति का हथियार बनाकर भोले-भाले ग्रामीणों की भावना, उम्मीदों और ज़िन्दगी से खिलवाड़ करते हैं। कालान्तर में यह एक ऐसे संघर्ष में तब्दील होता है जो अनियंत्रित और अराजक हो जाता है। परिणामस्वरूप झगड़ा होता है, जानें जाती हैं। 

1985 में जे. पी. दत्ता ने ‘गुलामी’ फिल्म का निर्माण किया था। ज़मींदारी-साहूकार शोषण, वर्ग भेद, ऊँच नीच का यथार्थ इस फिल्म के मूल में था। इस फिल्म में भी गाँव के स्कूल में ठाकुरों के बच्चों के पीने का पानी अलग रखा है और बाकी का पानी अलग रखा है। फिल्म का नायक मास्टर जी से सवाल भी करता है मगर मास्टर जी के पास जवाब नहीं है। गाँव के कुँए से मृत पशु के निकलने से पानी ज़हरीला हो जाता है तब नायक धर्मेन्द्र जमींदार के महल से पानी लेने के लिए गाँव वालों की अगुवाई करते हैं। इस पर भारी खून-खराबा होता है। इस फिल्म में भेदभाव और शोषण के बीच पानी की ज़रूरत, उसका मयस्सर होना कठिन होना और इन्सानी ज़िन्दगी के मोल को आँकने की प्रवृत्ति को सशक्त रूप में उभारा गया है। यह फिल्म बेहद प्रभावशाली है जिसके तीन प्रमुख नायक अन्त में एक-एक करके मरते हैं मगर वे यथासम्भव एक ऐसा मार्ग प्रशस्त कर जाते हैं जिसमें शायद ऐसी व्यवस्था कायम हो जिसमें गरीब और छोटी जाति के लोगों को किसी भी कुँए, पोखर, तालाब, नदी या बावड़ी से पानी पीने-लेने के एवज में जान न देना पड़े।

1990 में आयी सईं परांजपे की फिल्म ‘दिशा’ एक अलग तरह की महत्वपूर्ण फिल्म है जिसमें रोज़ी रोटी की आस में घर परिवार गाँव में छोड़कर महानगर की भूलभुलैया में खो गये दो किरदारों की कहानी है। एक आखिर में शहर से गाँव लौटता है और गाँव में ही रहने का निर्णय लेता है और दूसरा इसलिए गाँव नहीं लौट पाता क्योंकि उसके शहर रहते, गाँव में उसके अपने लोग पराए हो गये, जिसमें उसकी पत्नी भी शामिल है जिसका गाँव के एक बीड़ी ठेकेदार से सम्बन्ध हो गया है। इस नायक का पिता यह बात जानता है मगर बीड़ी ठेकेदार ने उसे ऐसे ठाठ उपलब्ध कराए हैं कि वो भी सब कुछ नज़रअन्दाज़ कर आँख मूंदकर दूसरी तरफ करवट लेकर सो रहा है। इस फिल्म में एक दिलचस्प कैरेक्टर ओमपुरी का है जो शहर कमाने गये रघुवीर यादव का बड़ा भाई है। उसकी एक ही धुन है, वह गाँव में कुँआ खोदने में अकेला जुटा हुआ है। सब लोग उसे पागल सा समझते हैं मगर चौबीसों घण्टे वो अकेला ही गड्ढे को इस आस में गहरा किए जा रहा है कि उसमें से एक दिन पानी निकलेगा और पूरे गाँव की समस्या हल हो जाएगी। सईं परांजपे क्लाइमेक्स में इस किरदार को सफल होते दिखाती हैं। कुँए से स्रोत फूट पड़ता है। ओमपुरी का छोटा भाई बना रघुवीर यादव इसी खबर के बाद लौटने का निर्णय लेता है। कुल मिलाकर यह फिल्म एक आदमी के साहस और हौसले के साथ साथ अपनी जड़ों से विस्थापित होते इन्सान की विडम्बनाओं को भी प्रकट करती है। 

आशुतोष गोवारीकर की फिल्म ‘लगान’ की पृष्ठभूमि में ग्रामीण परिवेश है। गाँव के लोगों को अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बरसात नहीं हो रही है। खेत का क्या होगा, फसल होगी कि नहीं, यही चिन्ताएँ भोले ग्रामीणों को एक जगह पर ले आती हैं। सब के सब आसमान की ओर निहारते हैं और अनन्त से अनन्त तक विस्तीर्ण नीली छतरी की मनुहार में ये मधुर गीत गा उठते हैं, घनन घनन घन घिर आए बदरा काले मेघा काले मेघा पानी तो बरसाओ बिजली की तलवार नहीं बून्दों के बान चलाओ। यह खूबसूरत गीत जावेद अख़्तर ने लिखा है जिसे ए. आर. रहमान ने संगीतबद्ध किया है। बड़ा खूबसूरत दृश्य उपस्थित होता है जब काले मेघा सचमुच बून्दों के बान चला देते हैं और ग्रामीणों के चेहरे पर पानी की बून्दें, आँखों के आँसुओं के साथ मिलकर खुशी की एक अलग ही परिभाषा रचती हैं। 

हिन्दी सिनेमा में न जाने कितनी ही फिल्मों में पनघट, नदी, तालाब, पोखर और जलस्रोत के आसपास खूबसूरत दृश्य से लेकर हृदयविदारक हादसे भी रचे गये हैं। नायक-नायिका, सखियाँ, गगरी, मटकी, गीत से लेकर छेड़छाड़ तक पनघटों में एक अलग ही प्रभाव रचती है। अल्ला मेघ दे पानी दे पानी दे गुड़धानी दे, रामा मेघ दे, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे, हरियाला सावन ढोल बजाता आया, उमड़ घुमड़कर छायी रे घटा का अपना अलग रंग और प्रभाव रहा है। हमारे जीवन में पानी का बहुत बड़ा मोल है। पानी हमारे लिए जीवन का विकल्प है। पानी से रिश्ते बनते भी हैं और बिगड़ते भी हैं। दिनों दिन नष्ट होते पर्यावरण और प्रकृति के सन्तुलन ने हमारी ज़रूरतों में से सबसे अहम पानी का जिस तरह संकट खड़ा किया है, वो अत्यन्त भयावह है। सईं परांजपे की फिल्म ‘दिशा’ का किरदार अकेला कुँआ खोदकर एक दिन पानी निकाल देने का अपना जुनून पूरा करता है मगर समाज में इसकी कोई सार्थक प्रेरणा कहाँ सम्प्रेषित हो पाती है? यथार्थ में तो हम कुँए पूरने का काम कर रहे हैं और धीरे-धीरे सारे जलस्रोतों को समाप्त करने में, अस्तित्वहीन करने में जाने-अनजाने अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। 



 
     

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

खैयाम

इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार



मीडिया में एक संजीदगी भरा ट्रिब्यूट देखने को नहीं मिला, ऐसी सूझ और कंजूसी एक महान संगीतज्ञ के अवसान पर नजर आयी। एक फनकार है, एक सदी बराबर जिसका सुयश है। जिसकी वजह से बहुत सारी कागज पर ठहरकर रह जाने वाली रचनाएँ बोल उठी हैं। कितने ही दूसरे गुणी फनकारों के ओठों पर उनके बनाये गीत खिले हैं। कितनों को अपने होने और जीने का मकसद मिला है। कितनों ने अपनी बात इनके संगीत से सजाये गीतों के माध्यम से अपनी सही जगह तक पहुँचायी है, ऐसे खैयाम लम्बे समय बिस्तर पर रहे। बरसों से अपने जवान बेटे की असमय मौत से टूटे और बिखरे मियाँ-बीवी, सुनते हैं कि जगजीत कौर की तबीयत भी बहुत खराब है। और हमारे सामने देखते ही देखते देर रात खैयाम साहब के नहीं रहने की खबर आ जाती है। यह खबर जैसे उनके बनाये हुए तमाम गीतों को भी शोक-धुन में बदल देती है। कल और आयेंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले...............लगता है सचमुच क्षणभंगुरता का जीवन है। सबकी अपने समय पर तैयारी पूरी है। धर्मेन्द्र की फिल्म आरम्भिक फिल्म शोला और शबनम में कैफी आजमी के लिखे दो गीत, जीत ही लेंगे बाजी हम तुम और जाने क्या ढूँढ़ती हैं ये आँखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है.......सुनना कथानक की स्थितियों और अनुरक्ति के द्वंद्व को महसूस करना है।

खैयाम साहब ने बहुत चुनकर फिल्में कीं। उनसे एक आकर्षण कभी-कभी से बनता है, कल और आयेंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, साहिर अपने बारे में जैसे बड़े एक्सीलेंस के बावजूद कह जाते हैं, मुझसे बेहतर कहने वाले..........उस समय खैयाम साहब के इशारे पर साज भी जैसे शायर की बात सुनता है। आगे बहुत से उदाहरण हैं, त्रिशूल, नूरी, नाखुदा, उमराव जान, दर्द, थोड़ी सी बेवफाई, बाजार, दिले नादान और अल्टीमेट रजिया सुल्तान आदि..........नजर से फूल चुनती है नजर, चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है, मोहब्बत बड़े काम की चीज है की शुरूआत में कुछ पंक्तियाँ हर तरफ हुस्न है जवानी है आज की रात क्या सयानी है, तुम्हारी पलकों की चिलमनों में ये क्या छुपा है सितारे जैसा, देख लो आज हमको जी भर के और ऐ दिले नादान, आयी जंजीर की झनकार, जुस्तजूँ जिसकी थी उसको तो न पाया हमने.............मन-मस्तिष्क दोहराते हैं, फिर खैयाम साहब का न होना याद आता है तो लगता है कि साँझ हो गयी है और हवा में पतंग टूट जाने के बाद उदास उड़ाने वाला मांझा उतार रहा है........

हम सब एक बुरे समय के शिकार नहीं बल्कि खुशी-खुशी उसके साथ हैं, यह समय है भूल जाने, बिसरा देने और याद न रखने का। अब खैयाम साहब को कब याद किया जायेगा, पता नहीं। उनकी पत्नी जगजीत कौर भी अत्यधिक बीमार और अब एकाकी रह गयीं। खैयाम साहब ने उनसे अनेक भावुक और संवेदनशील प्रसंगों पर बहुत वास्तविक आभास देने वाले गीत गवाये थे, देख लो आज हमको जी भरके, चले आओ सैंया, इधर आ सितमगर, हरियाला बन्ना आदि। रजिया सुल्तान फिल्म में एक गाना तो उस्तादों के साथ जगजीत जी ने गाया था जिसमें परवीन सुल्ताना, फैयाज अहमद खाँ, नियाज अहमद खाँ, मोहम्मद दिलशाद खान संगी थे।

खैयाम, एक फनकार थे, सुरों और साजों की संवेदनशीलता को समझने वाले माहिर थे, तबला, सारंगी, सितार और सन्तूर उनकी संगत में जैसे बोल उठते थे। ऐसे खैयाम को हृदय और श्रद्धा के साथ नमन.....