शनिवार, 11 अप्रैल 2020

लघु फिल्‍मों में जिन्‍दगी के दो मर्मस्‍पर्शी रूप


इस बार जो दो फिल्‍में देखीं वे करीब दस-ग्‍यारह मिनट की रही होंगी। सर्जनात्‍मक माध्‍यमों में उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति के साथ हस्‍ताक्षर होने वालों के प्रति मन गर्व से भर जाता है। चकित होता हूँ कैसे ये लोग मन के डाकघर में अपनी पहचान का लिफाफा डालकर चले जाते हैं। उनकी चिट्ठी पढ़ते रहने का मन होता है। जिन फिल्‍मों की चर्चा करने जा रहा हूँ वे हैं गुब्‍बारे और पुदीना।

गुब्‍बारे



संजय गुप्‍ता निर्देशित इस फिल्‍म में नाना पाटेकर, रोहित राय और अनिता हसनंदानी हैं। एक बस की यात्रा का दृश्‍य है, अपने शहर लौटते हुए पति और पत्‍नी अपने होने वाले घर को लेकर बात कर रहे हैं और एक-दूसरे के तर्कों पर लड़ रहे हैं। पति बार बार पैर के पास रखी डोलची पर ठोकर मार देता है जिसमें खाना रखा है, पत्‍नी उस बात पर उससे नाराज हो रही है। वह एक बार यह भी कहती है कि खाना मॉं ने बनाया है। पति का तर्क है कि खाना तो डिब्‍बे में रखा है। लापरवाह चेष्‍टा से बाज नहीं आने पर पति से खीजकर पत्‍नी नीचे से डोलची उठाकर अपनी जगह पति के बगल में रख देती है और पीछे एक खाली सीट पर जाकर बैठ जाती है। 

यहॉं से कहानी बदलती है। एक प्रौढ आदमी हाथ में दस-बारह गुब्‍बारे लिए जा रहा है लाल रंग के। कौतुहलवश वह पूछती है किसके लिए ले जा रहे हैं। वह बतलाता है अपनी पत्‍नी के लिए। फिर कहता है, जैसे तुम लोग लड़ रहे थे न, वैसा ही झगड़ा हममें भी होता है। जब मैं नाराज हो जाता हूँ तो वह मेरे लिए कुछ मीठा बनाकर ले आती है और एक कागज में लिखकर छोड़ जाती है, सॉरी और जब वो मेरी वजह से नाराज हो जाती है तो मैं उसके लिए दस गुब्‍बारे और एक कार्ड लेकर जाता हूँ सॉरी का। बस एक जगह रुकती है जहॉं वह आदमी उतर जाता है लेकिन उतरते समय कार्ड वहीं भूल जाता है बस में। वह युवती उस कार्ड को देखती है और बस से उतरकर उसको देने का उपक्रम करती है। नीचे वह उसे नहीं मिलता, थोड़ा आगे जाकर बाहर से नजर आ रहे कब्रिस्‍तान की ओर ध्‍यान उसका जाता है, देखती है, वह एक कब्र के सामने गुब्‍बारे लिए बैठा है। पीछे से उस ओर जाती है, चुपचाप खड़े होकर उसकी बातें सुनती है और पीछे कार्ड छोड़कर चली आती है। जीते-जी कभी खत्‍म न होने वाले पति-पत्‍नी के झगड़ों के बीच कौन सा मनोविज्ञान काम करता है, कोई समझ नहीं पाया। युवती बस में चढ़कर पति के पास जाकर बैठती है और उसके निकट हो जाती है। 

जब युवती उस व्‍यक्ति से उसकी और उसकी पत्‍नी के बीच की बात सुन रही होती है तक आपस के कुछ और रोमांटिक विवरण भी मिलते हैं जिसमें मेंहदी लगाने पर नाराज हो जाने वाला दिलचस्‍प है। हादसा एक बार नाराज होकर काम पर चले जाने के बाद होता है। कब्र के पास बैठा पति पत्‍नी से बात कर रहा है, अब वह वो सब करता है जो पत्‍नी कहा करती थी, तब नहीं करता था जिसके कारण झगड़ा होता था। दो-चार गुब्‍बारे ज्‍यादा ले जाने की सूझ भी खूब है, वह कहता है कम से कम दो चार फूट जाते हैं, ग्‍यारह गुब्‍बारे देना होते हैं। इस फिल्‍म पर ज्‍यादा लिखने का मन है पर बेहतर है, पढ़ने वाला फिल्‍म ही देख ले। नाना पाटेकर तो खैर अपने किरदार झकझोरकर चले जाते हैं। इस फिल्‍म में पैंतीस साल के विवाहित अनुभव की बात कहता यह चरित्र बहुत दार्शनिक लगता है। रोहित राय को कुछ ज्‍यादा करने को मिला नहीं, अनीता का किरदार जरूर नाना से संवादों में रहता है तो वे अच्‍छा असर छोड़ती हैं। इस दस मिनट की फिल्‍म पर एक हजार शब्‍द लिखे जा सकते हैं ऐसा मुझे लगता है। 

यह फिल्‍म एक बस में ही घटित होती है। लम्‍बे-लम्‍बे सर्पिल रास्‍तों, उतार-चढ़ावों से होती हुई बस का गंतव्‍य से मंतव्‍य तक जाना, भीतर चल रहे प्रसंगों और संवादों के यथार्थ को ही व्‍यक्‍त करता है। निर्देशक ने बड़ी सूझबूझ के साथ उस पूरे रास्‍ते का छायांकन बाहर से किया है जहॉं से होती हुई बस आ रही है। निश्चित रूप से सिनेमेटोग्राफी की भी सराहना की जानी चाहिए। फिल्‍म में सिनेमेटोग्राफर का नाम नजर नहीं आता है।

पुदीना


पुदीना में होती हुई बरसात को अनुभूति के अनूठे विवरणों के साथ सुनते हुए देखना बहुत अच्‍छा लगता है। फिल्‍म रेडियो में छायागीत कार्यक्रम के प्रसारण, कार्यक्रम प्रस्‍तुत करने वाली उद्घोषिका द्वारा सुनाये जाने वाले गाने के पूर्व उसकी रोमांटिक भूमिका से सीधे चौबे में काम कर रही स्‍त्री पर खुलती है। उम्रदराज पति-पत्‍नी और बेटे की छोटी सी दुनिया है। बरसात हो रही है। पत्‍नी को घर से चिन्‍ता हो रही है कि पति लौटे नहीं हैं। भीग जायेंगे तो तबियत खराब हो जायेगी। मोबाइल से पता करती हैं तो भीगते हुए पति सब्‍जी खरीदने की कोशिश में हैं। सब्जियों के भाव पूछ रहे हैं ठेले वालों से। पत्‍नी के फोन से रोमांटिक हो जाते हैं। गुदुगुदी और निजता की सभ्‍य चुहल के बाद आश्‍वस्‍त करते हैं कि जल्‍दी से आ रहा हूँ। रोचक है जब पत्‍नी कहती है कि बेटा भी अभी तक नहीं आया है तो पति का उत्‍तर है तब तो और जल्‍दी आता हूँ। घर आकर पति का बाहर ही चबूतरे पर उसी तरह भीगे भीगे बैठना और पत्‍नी को भी पास बुला लेना अच्‍छा लगता है। पति कहता है कि ये सब देखे हुए बरसों हो गये। जिन्‍दगी कब आगे बढ़ गयी पता ही नहीं चला। घर के अन्‍दर पति-पत्‍नी की बातें फिर रोचक हैं जब पति, पत्‍नी से बरसों पहले अपने मिलने और मिलने पर प्रेम और शादी होने का किस्‍सा बयॉं करने का आग्रह करता है। 

पूर्वदीप्ति में दोनों के जवान होने के साथ ही कैसे मिले, पहली बार ही में पकौड़े खिलाने का आग्रह पसन्‍द नहीं आया। पति बतलाता है कि उस समय उसके पास एक गुलाब का फूल भी था। पत्‍नी कहती है कि तुमने तो आज तक मुझे गुलाब का फूल दिया ही नहीं। तब अपनी जेब से वह गुलाब का फूल निकालता है और बड़े अदब से पत्‍नी को भेंट करता है। इस फिल्‍म का निर्देशन शिरीष खेमरिया ने किया है। फिल्‍म में जय तिवारी, शिवा तिवारी और गिरीश थापर ने काम किया है। जीवन खुशनुमा और भावनात्‍मक पहलुओं को पेश करने वाली यह फिल्‍म छोटे छोटे सारांशों में से एक अच्‍छी सी बानगी कही जा सकती है।
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

प्रेम औरअवसाद की दो फिल्‍में



लघु फिल्‍मों के अवलोकन के सिलसिले के बीच दो फिल्‍में देखने का अवसर मिला। इनमें एक है पुराना प्‍यार जिसका निर्देशन अम्‍बर चक्रवर्ती ने किया है और दूसरी है बातें जिसे अदीब रईस ने निर्देशित किया है। एक फिल्‍म के मूल में दो बढ़ती उम्र के संगियों के बीच प्रेम की सम्‍भावना है और दूसरे में पुत्र बिछोह की व्‍यथा है और इस बात पर विचार की कोशिश है कि माता-पिता अपने बच्‍चों को कितना जान पाते हैं?

पुराना प्‍यार



पति अथवा पत्‍नी के बिना रह रहे बढ़ती उम्र के लोगों को अपने बुढ़ापे में एकाकीपन से जूझने के लिए किसी साथी की कामना होती है। यह फिल्‍म पुराना प्‍यार अम्‍बर चक्रवर्ती ने लिखी है और उन्‍होंने ही इसे निर्देशित भी किया है। बेटे को यकायक खबर हुई है कि पिताजी कहीं चले गये हैं मिसेज शर्मा के साथ। बच्‍चे आपस में इस बात की चर्चा दबी जुबान में अपने शहर में करते हैं। हम देखते हैं कि उत्‍तराखण्‍ड की खूबसूरत वादियों में एक लक्‍झरी बस चली जा रही है उसमें इस फिल्‍म के नायक नायिका साथ में बैठे हैं और आपस में तोता-मैना की तरह बात कर रहे हैं। डॉ मोहन आगाशे और लिलेट दुबे इन भूमिकाओं में हैं। दोनों का होटल में ठहरना, सुरम्‍य स्‍थलों में घूमना, बातें करना, एक-दूसरे से उनके मन की सुनना, ऐसे दृश्‍यों से फिल्‍म आगे बढ़ती है। दिलचस्‍प यह है कि यह बड़ा मैत्रीपूर्ण और एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता का सफर है जिसको मूर्ख होटल मैनेजर क्षुद्र काल्‍पनिकताओं में और बेटा बेमतलब की ग्‍लानि में अनुभव करते दिखायी देते हैं। 

आखिर में मिसेज शर्मा को उनके आग्रह पर देव का उनको सुनयना नाम से बुलाना और वृद्ध हीरो का अपने बचपन के स्‍कूल में अपने 1969 बैच के साथियों के गेट टूगेदर में ले जाकर मिलवाना एक दिलचस्‍प अन्‍त का अनुभव कराता है। दून स्‍कूल की लोकेशन बहुत प्रभावी लगती है इस उत्‍तरार्ध में। पता चलता है कि सुनयना, देव के बचपन के ही एक साथी की विवाहिता है जो बरसों से अलग हैं। समीर खख्‍कर वह साथी हैं जो एक ही उम्र के एक ही बैच के हमउम्रों के बीच नजर आते हैं। डॉ मोहन आगाशे और लिलेट वहॉं बहुत खूबसूरत लगते हैं सबके बीच डॉंस करते हुए। इस फिल्‍म में दो गीत भी हैं छोटे छोटे जिनको सुरेश वाडकर ने गाया है, अभिषेक सिंह के लिखे हुए। मृदुला रामकृष्‍णन निर्मात्री हैं। अमिताभ सिंह की सिनेमेटोग्राफी बहुत खूबसूरत है। सेमल भट्ट और निखिल कोटिभास्‍कर का संगीत भी काव्‍यात्‍मक। इस फिल्‍म के बारे में यही कहा जा सकता है कि एक खूबसूरत विषय, गुणी कलाकारों के साथ निभाया गया है।

बातें 



बातें एक भावनात्‍मक फिल्‍म है जिसमें निर्देशक अदीब रईस ने ही एक भूमिका भी निभायी है। सुप्रिया पिलगॉंवकर और शिवानी रघुवंशी प्रमुख कलाकार हैं। पालघर मुम्‍बई से बाहर बसे एक नये शहर में एक युवा एक घर में पहुँचता है। दरवाजा खटखटाने पर एक सुन्‍दर लड़की बाहर निकलती है जिससे वह पूछता है कि मिसेज देशपाण्‍डे से मिलना है। वह लड़की बतलाती है कि मासी घर पर नहीं हैं, एक घण्‍टे में आ जायेंगी। वह कहता है कि मैं उनका इन्‍तजार कर लूँगा। कुछ देर वह घर के बाहर सीढि़यों पर बैठ जाता है फिर लड़की उसको घर के भीतर बैठने के लिए बुला लेती है। थोड़ी देर में मिसेज देशपाण्‍डे भी आती हैं। वह आरम्‍भ में अपने को उनके दिवंगत बेटे का दोस्‍त बतलाता है। साथ खाना भी खाता है लेकिन उसके पूरे व्‍यवहार से उसका दूर किसी शहर का होना और बातचीत में एक सहमा हुआ सा भाव एक रहस्‍य बनाये रखता है। वह बाद में मिसेज देशपाण्‍डे को बतलाता है कि वह उनके बेटे का दोस्‍त नहीं है बल्कि एक शॉर्ट फिल्‍म मेकर है जो शहर में एक फिल्‍म बनाते हुए उस युवक से मिलता है जो उनके बेटे की मृत्‍यु के अपराध में जेल में सजा काट रहा है। प्रसंग बिल्‍कुल बदल जाता है और मिसेज देशपाण्‍डे के साथ लम्‍बे सीन में बात होती है। स्‍कूल में अपने स्‍वभाव के वशीभूत एकाकी और अपने में रहते हुए उनका बेटा कुछ शरारती और मसखरे मनचले साथियों की लापरवाही का शिकार हो जाता है। मॉं का पूरा जीवन ही अशान्‍त होकर रह गया है। 

फिल्‍म बना रहा युवा इस सूचना के साथ मिसेज देशपाण्‍डे से मिल रहा है कि शहर में जेल में सजा काट रहा अपराधी भयानक ग्‍लानि में है और दो दिन पहले अपनी जान देने का प्रयास कर चुका है। सजा तो वह काटेगा ही लेकिन यह युवा यह अपील लेकर मिल रहा है कि वे अपने बेटे के गुनहगार को माफ कर दें। आसान तो यह भी नहीं है। मिसेज देशपाण्‍डे का बेटा जैसा और उसके उन दिशाहीन साथियों जैसे बच्‍चों के साथ समकालीन चिन्‍ता यह है कि माता-पिता के पास उनकी शिक्षा की जवाबदारी का ऐसा हौव्‍वा है जिसके बीच में उनको आगे चलकर एक बेहतर इन्‍सान बनाने की सीख या संस्‍कार देने की जिम्‍मेदारी किसी ने नहीं उठाना चाही है, ज्‍यादातर। भावनात्‍मक रूप से छूने वाली यह फिल्‍म एक बड़ा प्रश्‍न छोड़कर खत्‍म होती है। कलाकारों में अनुभवी सुप्रिया बहुत मार्मिक होकर सामने आती हैं, शिवानी आश्‍वस्‍त और अदीब जितने अच्‍छे अभिनेता उतने ही अच्‍छे निर्देशक। 
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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

पीयूष मिश्रा की तीन लघु फिल्‍में


इन दिनों लघु सिनेमा का एक आकर्षण बना है। अंग्रेजी मदिरा का एक ब्राण्‍ड और दूसरी संस्‍थाऍं अनेक प्रतिभाशाली निर्देशकों, लेखकों और कलाकारों को ऐसी फिल्‍मों के लिए सहायता दे रहा है। इनमें से ऐसी कई फिल्‍में ध्‍यान आकृष्‍ट करती हैं और हमारे सामने संक्षिप्‍त या संक्षेप में सशक्‍त कथ्‍य की जगह को स्‍थापित करती हैं........


कतरन




प्रेम सिंह निर्देशित इस फिल्‍म में पीयूष मिश्रा और अलका अमीन प्रमुख कलाकार हैं पति-पत्‍नी की भूमिका में। रिटायरमेंट के बाद पति के गुस्‍से, झगड़े और हस्‍तक्षेप से त्रस्‍त पत्‍नी, दोनों तलाक के लिए वकील से मिलने जा रहे हैं। रास्‍तें में दोनों ही के पास बच्‍चों के फोन आ रहे हैं, पापा/मम्‍मी, मान जाओ, ये मत करो, मैं आ रहा हूँ/ आ रही हूँ। सब ठीक हो जायेगा। वकील के सामने काऊंसिलिंग। शिकवे शिकायतें। अन्‍तत: वकील कहता है, ठीक है, तलाक हो जायेगा, कुछ दिन लेकिन अभी साथ रहना होगा। दोनों साथ लौटते हैं, अलग-अलग कमरे में बैठे हैं कि अचानक किचन में कुछ गिरने की तेज आवाज आती है, एक-दूसरे के अन्‍देशे में दोनों दौड़ते हैं। आटे का डिब्‍बा और अन्‍य सामान जमीन पर गिरकर फैल गया है। दोनों नीचे देर तक देखते हैं, फिर आपस में एक-दूसरे की ओर देखते हुए सिर उठाते हैं, दोनों की डबडबायी ऑंखें, जीवन इस तरह बिखर रहा है....। पीयूष मिश्रा के चेहरे पर रोते और सुबकते हुए भाव गहरे बिंध जाते हैं। अलका अमीन जीवनभर परिवार और चौके में खटने वाली उम्रदराज स्‍त्री की अब आराम की चाह की सात्विक कामना को व्‍यक्‍त करती है। दोनों में किसका दोष है? मन को छू जाने वाली फिल्‍म। 



कथाकार




सिंगल स्‍क्रीन सिनेमाघरों की जगह पर मल्‍टीस्‍क्रीन सिनेमाघर बनाये गये थे तब ऐसे बहुत से लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट आ गया था जो मशीन पर रीलें चढ़ाकर प्रोजेक्‍टर चलाया करते थे। ऐसे ही एक प्रोजेक्‍टर ऑपरेटर की कहानी जो प्रोजेक्‍टर से परदे पर रोशनी फेंकने वाली खिड़की से हॉल का क्राउड और दर्शकों का शोर सुन-सुनकर अपना खून बढ़ाया करता है। वह दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्‍चन और सलमान खान तक की एंट्री पर बजने वाली तालियों का गवाह है। अब इसे नौकरी से निकाला जा रहा है क्‍योंकि लम्‍बे समय बाद जब नया मल्‍टीस्‍क्रीन सिनेमाघर तैयार होगा तब नयी टेक्‍नीक वाले, युवा कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। उम्र के उत्‍तरार्ध में यह हारा हुआ उदास आदमी अपने गॉंव लौटता है। वह क्‍या करे? आखिर एक दिन उसे जीने का जरिया, अपने ही अब तक के अनुभवों से सूझता है। वह कहानी नैरेट करना शुरू करता है। पहले बच्‍चों को कहता है, कहानी सुनोगे? तब बच्‍चे भाग जाते हैं। फिर एक-एक करके बच्‍चे, फिर समूह, फिर परिवार, फिर गॉंव......उसकी सुनायी कहानी के लिए भीड़ जुटती है। हारा हुआ गॉंव लौटा आदमी अपने ही गॉंव में जीने का लक्ष्‍य फिर प्राप्‍त करता है। गॉंव की खूबसूरत संरचना के बीच पीयूष मिश्रा की यह अकेली बहुआयामी प्रतिभा को व्‍यक्‍त करने वाली सराहनीय फिल्‍म है। इसका निर्देशन अभिमन्‍यु कनोडिया ने किया है। 



ग्‍लू


ग्‍लू के निर्देशक शरद दासगुप्‍ता हैं। इस फिल्‍म में पीयूष मिश्रा दृश्‍य में नहीं हैं बल्कि स्‍वर में हैं या यों कहिए कि फिलॉसफी में हैं। फिल्‍म बच्‍चे और पति के लिए टिफिन तैयार करती स्‍त्री के किचन में किए जा रहे उपक्रम से शुरू होती है। छोटा बच्‍चा जमीन पर बिछी दरी में पेट के बल लेटा हुआ सुपरमैन के उड़ने के एक्‍शन कर रहा है। जल्‍दी जल्‍दी से स्‍त्री पति और बेटे को टिफिन पकड़ाती है, बेटा पिता के साथ ही निकल जाता है और वह थकी मुद्रा में बैठ जाती है। स्‍कूल का दृश्‍य जिसमें बच्‍चा सुपरमैन का चित्र बनाने में तल्‍लीन है और पीछे उसका एक सहपाठी साथी उसको तंग कर रहा है। नहीं रहा जाता तो बच्‍चा उससे हाथापाई करने लगता है। मास्‍टर जी तंग कर रहे सहपाठी के बजाय बच्‍चे को सजा देते हैं। मेज पर उसका बनाया सुपरमैन का चित्र देखकर कहते हैं इसी तरह बाहर एक्‍शन में खड़े रहो। बच्‍चा समय पास कर रहा है। इस बीच खिड़की से जाते हुए चींटे को हाथ में लेकर खेलता भी है। एक और दिन के घर से बाहर निकलते हुए प्रसंग के पहले बच्‍चे के पिता से मछली का जार गिरकर टूट जाता है, वह पत्‍नी से झगड़ा करता है। पत्‍नी भी। शाम को बच्‍चा अकेला लौटता है। देखता है उसके माता-पिता फिर झगड़ रहे हैं। वह स्‍नेहिल हस्‍तक्षेप करना चाहता है अपने आपको सुपरमैन कहते हुए पिता से कहता है कि आप मम्‍मी को मत डॉंटा करो। वह सुपरमैन की मम्‍मी है, नहीं तो सुपरमैन गुस्‍सा हो जायेगा। इस पिता बोलते हैं सुपरमैन हो तो ऊपर जाकर उड़ो.......। बच्‍चा टूटकर सीढि़यॉं चढ़ता हुआ ऊपर चला जाता है जिसके बाद एक बड़ी दुर्घटना हो जाती है। लड़ते हुए पति-पत्‍नी को इसका आभास न रहा होगा शायद। इसी आखिरी छोर पर पीयूष मिश्रा की आवाज में गरिमा ओबराह का गीत सुनता हूँ.....अब तू किसे पुकारे....। यह एक भारी फिल्‍म है मगर कलह से अशान्‍त घर-गृहस्‍थी के दोनों चरित्रों पति और पत्‍नी को सचेत करने वाली। यह फिल्‍म राजनांदगॉंव में फिल्‍मायी गयी है।