रविवार, 29 अप्रैल 2018

तीन दशक बाद नेशनल अवार्ड जीतने वाली दूसरी असमिया फिल्म

विलेज रॉकस्‍टार्स 


इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाली असमिया फिल्म विलेज राॅकस्टार्स एक बहुत प्रेरणीय और मर्मस्पर्शी फिल्म है। आमतौर पर सिनेमा का मतलब मुम्बइया सिनेमा या बाॅलीवुड निकालने वाले दर्शकों तक ऐसी अच्छी फिल्में पहुँचाने के जरूर सार्थक उपक्रम होने चाहिए। हालाँकि दूरदर्शन, नेशनल अवार्ड प्राप्त फिल्मों का प्रसारण बाद में करता है लेकिन उसका भी बेहतर प्रचार-प्रसार हो तो निश्चित रूप से दर्शकों तक अच्छे सिनेमा की पहुँच और भी सुदृढ़ हो सकती है। 

रीमा दास हमारे समय की इस मायने में एक उल्लेखनीय फिल्मकार हैं जिन्होंने इस फिल्म को बनाते हुए निर्माण, निर्देशन, कहानी, सम्पादन और सिने-छायांकन का भी दायित्व निर्वहन करते हुए बड़ी ही सादगी के साथ एक विलक्षण फिल्म अच्छे सिनेमा के चाहने वालों को सौंप दी है। विलेज राॅकस्टार को टोरण्टो इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म के रूप में चुना जा चुका है वहीं कान फिल्म समारोह में इस फिल्म को खासी चर्चा मिली है, इसके अलावा पिछले साल के अन्त में गोवा में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में इस फिल्म को दर्शकों ने बहुत पसन्द किया और इस टिप्पणीकार को भी उसी समय यह अनूठी तथा मन को छू जाने वाली फिल्म देखने का अवसर प्राप्त हुआ। 

युवा उम्र से सिनेमा का लोकप्रिय चेहरा बनने की ख्वाहिश लिए मुम्बई आयीं रीमा दास ने तब यह नहीं सोचा था कि समय आगे चलकर उनको कैमरे के पीछे ले जायेगा और फिर दृश्य वही बनेंगे जो वे गढ़ेंगी। उनको शुरू से ही मुम्बइया सिनेमा देखने का शौक रहा है। लगभग ग्यारह साल पहले वे मुम्बई आ गयीं। लघु फिल्म के निर्माण से उन्होंने अपनी शुरूआत की लेकिन व्यापकता में सिनेमा को देखने के चाव ने उनको दुनिया की अच्छी फिल्मों के नजदीक लाने का काम किया। 2009 में बनायी उनकी फिल्म प्रथा को बड़ी सराहना मिली। जब 2016 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म अन्तर्दृष्टि बनायी तब उनको अच्छे काम और उसके प्रतिसाद दोनों का अवसर प्राप्त हुआ। यह एक ऐसे पिता की कहानी है जिनको रिटायर होने पर उनका बेटा एक दूरबीन भेंट करता है। दूसरी फिल्म विलेज राॅकस्टार्स पहली से एक कदम आगे इस दृष्टि से निकल गयी कि इसमें सुदूर गाँव, पिछड़े और अशान्त राज्य में कहीं बचपन और किशोर उम्र के बच्चों के स्वप्न को पास जाकर, टटोलकर, उसे संवेदनशीलता के साथ छूकर देखने की कोशिश की गयी है। 


रीमा दास जब विलेज राॅकस्टार पर काम कर रही थीं तब बस्ती और छोटे गाँवों को उसकी समूची शाब्दिकता में समझने का प्रयत्न भी कर रही थीं। उन्होंने अपने काम से पहले अनेक फिल्में देखीं और यह महसूस किया कि वे उस छोटे से संसार की बिल्कुल अलग सी कल्पना कर रही हैं जहाँ संघर्ष का पथ बहुत कोमल, बहुत मुश्किलों भरा, बहुत सात्विक और बहुत ही अधिक सीधी राह पर चलने वाला है। विलेज राॅकस्टार्स के कलाकार स्कूली बच्चे थे जिनके लिए पढ़ाई अपनी प्राथमिकता थी। रीमा ने उसके साथ-साथ बच्चों की घरेलू जवाबदारियों के समय को भी छोड़ दिया। इतनी उदारता के बाद नैसर्गिक प्रकाश अभिव्यंजना में उन्होंने विलेज राॅकस्टार्स की शूटिंग की और अपने सन्तोष की फिल्म बनायी। सर्जनात्मक सन्तुष्टि उनको अपने काम के साथ निरन्तर ही मिलती गयी। 

गुवाहाटी के पास रीमा दास का अपना जिया, देखाभाला स्थान छायागाँव जहाँ यह पूरी फिल्म बनायी गयी है, बड़ी ही विनम्र सी प्रतीत होने वाली सादगी के साथ अपनी बात कहती है। यह एक जुझारू लड़की धुनू की कहानी है जिसे अपने साथियों के बीच एक बैण्ड स्थापित करने की ललक है। वो और उसके साथ राॅकस्टार्स बनना चाहते हैं। टीवी और दूसरे साधनों से दूर देश की खबरें गाँव तक आती हैं और धुनू अपने लक्ष्य को पक्का करती चली जाती है। अपनी ही तरह के गरीब बच्चों की संगत में उसका यह स्वप्न शनैः शनैः आकार ले रहा है लेकिन इसमें भी बड़ी बाधाएँ हैं। धुनू की माँ अनेक कठिनाइयों में अपना, उसका और अपने बेटे का पेट भर पा रही है। जिन्दगी के साथ लड़ रही धुनू की माँ को समय ने बहुत मजबूत बना दिया है। धुनू गिटार बजाना सीख रही है, वह अपनी टीम को भी सिखा रही है। कैसे उसके स्वप्न को परिवेश और लोग बाधित करते हैं, कैसे शिक्षा से वंचित सुदूर अंचल में वातावरण और लोगों के मानसिक अभिप्राय इस स्वप्न को पूरा करने में बाधक होते हैं, यह इस फिल्म में बहुत ही सच्चाई के साथ दिखाया गया है। वा़द्यों का टूटना और मन का टूटना या खण्डित होकर रह जाना दौड़ते उत्साह का भरभराकर गिर जाना है। परदे पर ऐसी विडम्बना देखते हुए मन व्यथित होता है। धुनू की भूमिका निबाह रही भनिता दास के चेहरे पर भावों का संचय, आवेग की अभिव्यक्ति और हतोत्साहित किए जाने के बाद भी भाव भंगिमाओं और चेष्टाओं में संयत बने रहना बल्कि अपने लक्ष्यों के लिए और दृढ़ होने का विद्रोह बखूबी आया है। 

रीमा ने विपरीत और विरोधाभासी परिस्थितियों को दृश्यों में जिस तरह बांधा है, देखकर आँखें नम हो जाती हैं। ऐसे हर दृश्य प्रशंसा के लायक हैं जिनमें चरित्रों को टूटने से बचाते हुए भीतर छिपा मनोबल, जिद और आप हठ दिखायी देता है। धुनू की माँ की भूमिका बसंती दास ने निभायी है जो भाई की भूमिका में मानबेन्द्र दास अपनी उम्र और रौ में दीखता है। मल्लिका दास ने बेस्ट लोकेशन साउण्ड रिकाॅर्डिस्ट के रूप में एक-एक सूक्ष्म ध्वन्यात्मक बारीकियों को जिस तरह फिल्म का हिस्सा बनाया है, अनुभव करने लायक है। बसंती दास, मल्लिका दास के साथ ही निर्देशन के अतिरिक्त सम्पादन में भी फिल्म को अवार्ड हासिल हुआ है जो गौर करने लायक है। उल्लेखनीय तो यह भी है कि लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर असमिया फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला है। इसके पहले 1989 मेंजाहनू बरुआ की फिल्म हालोधिया चैराये बाओधान खाई को नेशनल अवार्ड हासिल हुआ था। 
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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

संवेदनशील होना या संवेदनशील होने की बात भर करना.....

।। बियाॅण्ड द क्लाउड्स।।

 


अनोखे और चर्चित माजिद मजीदी विश्व सिनेमा के धरातल पर एक श्रेष्ठ फिल्मकार हैं, यह बात पढ़े-लिखे जाने-जानने से करीब पन्द्रह-बीस साल पहले उनकी दो फिल्में द कलर आॅफ पैराडाइस और चिल्ड्रन आॅफ हैवन देखकर मन में बैठी है। अपने लिए यह विशेष उल्लेख है कि संवेदना की बड़ी सच्ची परख रखने वाला दुनिया का एक फिल्मकार पे भारत में आकर एक फिल्म बनायी है। जब आप दो उत्कृष्ट फिल्मों के सकारात्मक प्रभावों से भरे हो तो एक प्रकार आश्वस्ति तो आपको हो ही जाती है कि कोई निरर्थक काम देखने नहीं जा रहे हो, दूसरे एक जिज्ञासा बनती है कि एक देश का फिल्मकार, दूसरे देश की नब्ज को किस तरह पकड़ पाता है या उसकी कोशिश भी करता है। इस जिज्ञासा के साथ निर्णय यही कर पाता हूँ फिल्म देखकर कि दृष्टि और परख की भी अपनी एक भूमध्य रेखा होती है, उसका तटस्थ या निष्पक्ष होना, एक जैसी संवेदना की तलाश करना एक आदर्श और सार्थक सोच है।

कहानी थोड़े में बता देता हूँ। मादक पदार्थों को छोटे-छोटे छिपे और गुप्त स्थानों पर पुलिस से लेकर आवारा, गुण्डों आदि के जोखिम से बचते हुए पहुँचाने का काम नायक करता है। उसकी एक बहन है जिससे वो दूर रहता है, कारण कि उसका पति उसे बहुत पीटता था और बेहिसाब शराब पीता था। बाद में बहन ने भी इसी कारण से उसे छोड़ दिया और छोटा-मोटा काम करके जीवन व्यतीत कर रही है। भाई, बहन के जीवन में एक दिन फिर दाखिल होता है जब पुलिस उसे और उसके साथी को दौड़ा रही है। भागते-भागते मादक पदार्थ का पैकेट वो बहन को देकर छुप जाता है। इधर उसी धोबी बस्ती, जहाँ उसकी बहन काम करती है, एक अधेड़ अक्शी उसकी इज्जत लूटना चाहता है तो बहन उसके सिर पर भारी पत्थर मारकर बच पाती है। अधेड़ कोमा में चला गया है और बहन को पुलिस जेल ले गयी। कहानी आगे यही है कि भाई, बहन को जेल से निकालना चाहता है और उसको अस्पताल में भरती उसी आदमी को बचाने के लिए दवा आदि का प्रबन्ध करना पड़ रहा है। 

घटनाक्रम आगे इस तरह बढ़ता है कि बहन, जेल में एक और कैदी स्त्री के बच्चे से हिलमिल जाती है जिसकी आगे चलकर मृत्यु हो जाती है और इधर अक्शी की माँ और दो बेटियाँ दक्षिण के गाँव से उसे मिलने चली आती हैं। दो धरातल पर कहानी आगे बढ़ती है, नायक आमिर उस आदमी के बोलने लगने और बयान देने के लिए सारे जतन कर रहा है और साथ में एक बूढ़ी और दो बच्चियों को भी घर ले आता है। 

आगे चलकर अक्शी का मर जाना, बूढ़ी माँ और दोनों बच्चियों का आमिर पर आश्रित हो जाना, आमिर की बहन तारा का जेल का ही होकर रह जाना और मर चुकी कैदी के बच्चे को साथ रखना, एक जगह पर आकर दर्शकों को सोचने के लिए कुछ प्रश्नों के साथ फिल्म खत्म होती है। बीच-बीच में आमिर का पहले निष्ठुर होना, फिर तीनों को पनाह देना, उनके खाने से लेकर जीने का भी प्रबन्ध करना, हताशा में एक क्षण उनको भला-बुरा कहना, बूढ़ी माँ का अपनी ही समभाषी की मदद से अपने अपराधी बेटे की ओर से सारे दोष कुबूल करने वाली चिट्ठी बनवाना आदि प्रसंग हैं। निर्देशक मादक पदार्थों की सप्लाई से घटनाओं के साथ देह व्यापार के अड्डे पर भी दर्शकों को ले जा रहा है जहाँ आमिर के लिए औरतों का एजेण्ट मुसीबतें खड़ी करता है। आमिर के साथी का उसको धोखा देना फिर जमीर जागना मर्मस्पर्शी है। 


निर्देशक पूरी निष्ठा और साफगोई से एक ऐसी दुनिया के यथार्थ से दर्शकों को परिचित कराता है जिसकी होशो-हवास में हमें कल्पना भी न होती होगी। यही कारण है कि निर्देशक, पात्र, कैमरा सब उन स्थानों से होकर निकल आते हैं लेकिन संवेदनशील दर्शक जैसे वहीं भटक कर कहें या खो कर कहें, रह जाता है। किसी भी मनुष्य के भीतर वे क्या प्रवृत्तियाँ होती हैं जो उसकी नीयत बिगाड़ती हैं, क्या वो सकारात्मकता होती है जिसमें वह सम्हल सकता है, अपराधी की बेटी को दलाल के हाथ बेच देने की गरज से निकला आमिर आखिर उसे लौटाकर घर ले आता है। 

माजिद मजीदी एक-एक विवरण पर जाते हैं, आरम्भ में कुछ सेकेण्ड एक मोबाइल सिम कम्पनी के बड़े होर्डिंग पर स्थिर रहकर जब कैमरा नीचे आता है तब हम उस असलयित से रूबरू होना शुरू होते हैं जो पुल, पुलिया के नीचे जिन्दगियों में व्यतीत हो रही होती है। इस फिल्म में कोई भी चीज गढ़ी गयी नहीं है, कुछ भी नकली या फिनिश्ड सा नहीं लगता बल्कि सब कुछ जस का तस। गरीबी, गरीबी के घर, धोबी घाट, अन्दर की संकीर्ण गलियाँ और धोये जाते कपड़ों के एक-दूसरे के ऊपर बर्दाश्त करने वाले छींटे, देह व्यापार की जगह पर बिकने आयी छोटी उम्र की लड़कियों के साथ बोलचाल एक निर्मम सच को आपके सामने रखते हैं। हर पल डरी, सहमी और लगभग मर-मर जाती जिन्दगियों के बीच हँसी-ठिठोली, रुसवायी, मान-मनौव्वल, अच्छा-बुरा सब का सब जस का तस। वैसे ही जेल जिसमें महिला कैदियों की व्यथा, दुर्दशा लगभग अन्ततः उनका क्या हो जाना है, यह जताने के लिए काफी हैं। वहाँ महिला कैदियों के निरीह मासूम बच्चे जो गन्दगी और बदबूदार गड्ढों से निकलकर आते-जाते चूहों को ही दोस्त बनाये हुए हैं। उस छोटे से बच्चे का तारा से पूछना दर्शक के लिए शायद सहन करना आसान न हो कि माँ कहाँ चली गयी तब तारा उससे कहती है कि तेरी माँ आकाश में चांद के घर में रहने लगी है और अब वो बहुत मस्त हो गयी है, खांसती भी नहीं। इस पर बच्चा कहता है कि मुझे चांद को देखना है, माँ का घर। तारा और उस बच्चे का घनघोर बारिश में आकाश की ओर ताकते रहना और इधर आमिर के साथ अक्शी की दोनों मासूम बच्चियों और पत्थर हो गयी माँ की जवाबदारी......फिल्म यहीं खत्म होती है।

एक बात प्रमुखता से उल्लेख कर देना जरूरी लगता है और वह यह कि माजिद मजीदी के इस सर्जनात्मक उपक्रम को भारत के दो प्रमुख निर्देशकों विशाल भाऱ़द्वाज और गौतम घोष ने एक बड़ा समर्थन दिया है। विशाल ने जहाँ इस फिल्म के पूरे हिन्दी संवाद लिखे वहीं गौतम घोष अक्शी की भूमिका में चरित्र और वृत्ति को एकाकार करते हैं। विशाल भाऱद्वाज को सब जानते हैं और गौतम घोष बंगला सिनेमा के शीर्षस्थ निर्देशक हैं। तीसरा बड़ा सहयोग उनको सिनेमेटोग्राफर अनिल मेहता का मिलता है जिन्होंने एक-एक जगह को उसके पूरे अस्तित्व के साथ अपने कैमरे से हमारे लिए देख लिया है। यहाँ कमजोर पड़ते हैं तो केवल ए.आर. रहमान जो संगीत के साथ उस वातावरण का हिस्सा नहीं बन पाते। कलाकारों में आमिर की भूमिका में ईशान खट्टर ने जिस आश्वस्ति के साथ एक-एक शाॅट में अपने होने को साबित किया है, कमाल ही है। 

लोकल ट्रेन के दृश्य, मोटर सायकिल पर आते-जाते अपने हाथ खोल कर खिल जाने और अपना ही अतिरेक करने वाले दृश्य अनूठे हैं। कीचड़ में लड़ाई वाला, देह व्यापार के दलाल से निर्भीक होकर बात करने वाला, धोखा देने वाले एक दुकानदार के हाथ में चाकू गाड़ देने वाला दृश्य, बहन से लड़ने, जिरह करने और अन्त में उसको छुड़ाने की फिक्र करने वाले प्रसंगों में कमाल कर गये हैं वे। इसी तरह तारा की भूमिका में मालविका मोहनन की भूमिका भी मन को छू जाती है। भाई के साथ झगड़ते हुए जब वो अपनी जिन्दगी के बारे में बतलाती है, जेल जाते हुए आमिर का सायकल से पीछा करना और बस के भीतर और बाहर से दोनों का एक-दूसरे को पुकारना विचलित कर देता है। जेल के अन्दर की जिन्दगी तारा की बड़ी परीक्षा है जिसमें माँ को खो देने वाले छोटे बच्चे से उसका जुड़ना अहम है। इधर अक्शी के परिवार में बूढ़ी माँ और दो बच्चियाँ आमिर के पीछे-पीछे घर क्या चली आती हैं, दर्शक को लगता है, वे उसके भीतर चली आयी हैं।

भारत में ऐसे सिनेमा का बनना बड़ा साहसिक है। साहसिक इसलिए है क्योंकि ऐसे सिनेमा को संवेदनशील दर्शक की तलाश या चाहत या अपेक्षा रहती है लेकिन हमारा दर्शक सिनेमा के नाम पर एक अलग तरह की मानसिक विलासिता में खोया रहता है। उस सुरंग में ही वह आनंदित है, बाहर आना या लाना दोनों ही दुरूह है। 

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

एक संवेदनशील फिल्‍म जो अन्‍त में भटक गयी.....

फिल्‍म समीक्षा / अक्टूबर


इस फिल्म के नाम को लेकर प्रदर्शन पूर्व तक अचरज बना रहना स्वाभाविक ही था। दर्शक इसके आगमन की झलकियों से खीज भी सकता था यदि इसमें शूजित सरकार, जूही चतुर्वेदी जैसे सर्जनात्मक नाम न जुड़े होते। यही कारण रहा शायद कि अप्रैल में भी अक्टूबर का दर्शकों ने स्वागत किया। अपनी तरह से यह फिल्म निरर्थक नहीं है, अच्छी बनी है लेकिन देखते हुए दर्शक और समीक्षक भी यदि बहुत ज्यादा भावुक हो रहे हैं तो थोड़ा सजग होकर देखना जरूरी लगता है।

अक्टूबर उन युवाओं में शुरू होती है जो जिन्दगी बनाने, शुरू करने के स्वप्न देख रहे हैं। गनीमत है कि शुरू-शुरू में किसी को भी प्रेम नहीं हुआ है। एक बड़े सितारा होटल का प्रत्यक्ष और नेपथ्य, उसकी हलचल, पूर्वरंग और परोक्ष परिस्थितियाँ हमारे सामने सुरुचिपूर्ण ढंग से घटित होती हैं, खासकर तब जब हमारे अपने अनुभव ऐसे वातावरण में परोक्ष के तो कम से कम न के बराबर हैं।

ऐसे ही माहौल में तीन-चार तरह के स्वभाव, बहुलता वैसी ही जैसी आमतौर पर दिखती है, जिम्मेदारी और खासी चिन्ता के साथ अपने प्रोबेशन को पूरा करने, अच्छी और स्थायी नौकरी तथा अवसर पाने और विरोधाभासों को सहन करने वाले मित्रों के बीच नायक है जिसकी भूमिका शुरू से तय है। नायिका के चौथी मंजिल से गिर जाने के बाद उसकी अस्थिरता संवेदनशीलता में तब्दील हो जाती है। पटकथा में इस बात की उदारता बरती गयी है कि नायक अनेक भूलों, व्यवहार और स्वभाव के बावजूद क्षम्य है, मित्रों में भी प्रिय।

कोमा में चली गयी नायिका की चिकित्सा, चिकित्सालय, चिकित्सक, गहन चिकित्सा इकाइयों का वातावरण, परिस्थितियों से जूझती नर्सें, नायिका की हालत से विचलित परिवार, चिकित्सा खर्च इन सबके साथ-साथ एक रूमानिकता भी घटित होती हुई चलती है जिसमें अक्टूबर माह का मौसम, खास दिल्ली की ठण्ड, सुबह, शाम और रात के दृश्य, कोहरा, मैट्रो, सोता-जागता शहर आदि शामिल हैं। दार्शनिकता में हरसिंगार के फूल, उनकी महक, एक रात का जीवन जैसी क्षणभंगुरता की फिलाॅसफी आपको पूरी तरह बांध लेती है।

दर्शक जितना नायिका की हालत से द्रवित है उतना ही नायक के समर्पण पर वारा गया है। कोमा से लौटती, सकारात्मक संकेत देती और जीवन के प्रति एक आशान्वित भरोसा दिलाती नायिका के प्रति नायक का लगाव, उसके ठीक होने में स्वयं के भी योगदान का निजी आत्मविश्वास यह सब अक्टूबर को एक बेहतर उपसंहार तक ले जाने के बेहतर संकेते हैं लेकिन लेखिका जूही चतुर्वेदी, नायिका की मृत्यु को दिखाकर अन्त को जटिल बनाती हैं और अपने समर्थक दर्शकों को भी असहमत करती हैं। भीगी आँखों के साथ दर्शक सिनेमाघर से इस अन्त को अमान्य करता हुआ निकलता है। यह एक पथ से भटके हुए अन्त का चयन करने वाली लेखिका की फिल्म है।

हालाँकि इसमें वरुण धवन ने अपने अब तक के समय की श्रेष्ठ भूमिका का निर्वहन किया है। ऐसे चरित्र बहुत मेहनत की अपेक्षा करते हैं, वरुण दृश्यों, अपनी उदासी, मन के नायिका की संवेदना और स्थितियों के साथ लगभग एकाकार हो चुके अभिव्यक्त भाव में बहुत आगे जाते हैं। नायिका बनिता संधू ने नियंत्रण रहित लगभग एक देह की तरह उस पार्थिवता को दृश्यों में जिया है जो ऐसी भयानक दुर्घटना की परिणति को साक्ष्य के रूप में हमारे सामने लाती है। माँ का किरदार निबाह रहीं गीतांजलि राव अपनी विवशता को बखूबी जीती हैं। निर्देशक ने फिल्म बनाते हुए पात्रों से अच्छा काम लिया है।

लगभग सत्तर प्रतिशत फिल्म अवसादपूर्ण परिस्थितियों के दृश्यबन्ध हैं, शेष में होटल संस्कृति का ग्लैमर हमारे सामने है जो निर्माता की राहत के लिए होगा, बहरहाल व्यवहारसंगत अन्त न होते हुए भी भावुक दर्शकों के लिए यह फिल्म आकृष्ट करने वाली है। कई बार ऐसे अन्त इसलिए भी गढ़े जाते हैं जिस पर आप असहमत होते हुए भी बात करो लेकिन इसी कारण फिल्म का वो आखिरी दृश्य अपनी संवेदना खो बैठता है जिसमें नायक हरसिंगार का पेड़ लेकर जा रहा है......
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गुणी कलाकार और भ्रमित निर्देशक

।। ब्लैकमेल ।।



अभिनेता इरफान खान की फिल्मों को लेकर दर्शकीय उत्सुकता दूसरे सितारों से बेहद अलग है। सलाम बाॅम्बे से लेकर पान सिंह तोमर के नेशनल अवार्ड प्राप्त करने तक और उसके बाद की भी अनेक फिल्मों से उन्होंने अपने को एक आश्वस्त और आत्मविश्वास से भरे अभिनेता के रूप में साबित किया है। यह नयी फिल्म ब्लैकमेल ऐसे समय में आयी है जब वे अपने स्वास्थ्य के एक बड़े संकट से जूझ रहे हैं। सिनेमाघर में दर्शक इस अतिरिक्त सहानुभूति के साथ भी आ रहा है।

अभिनय देव निर्देशित यह फिल्म दो तरह के विभाजनों में अपनी आवाजाही करते हुए न तो एक गम्भीर फिल्म की तरह आकृष्ट कर पाती है और दृश्यों और संवादों में हास्य के तत्व-पुट शामिल कर देने से कहानी अपनी गम्भीरता खो बैठती है। ब्लैकमेल सम्बन्धों के संसार से एक अलग तरह की कहानी उठाती है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका अलग-अलग शादी हो जाने के बाद तत्काल ही एक-दूसरे के सम्पर्क में आकर विवाहित जैसा जीवन जीने लगते हैं। अमीर स्त्री के साथ विवाह के बाद की जिन्दगी, इधर एक लगभग असहाय किस्म का नौकरीपेशा व्यक्ति, अपनी-अपनी तरह से समय से जूझ रहे हैं। किसी के भी प्रयत्न परिस्थितियों से निजात पाने के नहीं हैं बल्कि उसे एक अलग ढंग से एन्जाॅय कर रहे हैं। 

इस फिल्‍म की खूबियों के रूप में अच्‍छा कैमरा वर्क खासकर वे शॉट जो इरफान के द्वन्‍द्व को दर्शाते हैं, छत पर ऊँचाई में बैठकर उनका सोचना, उत्‍तरार्ध में ऑफिस में साथ काम कर रही लड़की की उसके घर में दुर्घटना मृत्‍यु होना, उस आफत से बचने के लिए मुहल्‍ले और सड़कों पर भागना दिलचस्‍प हैं। इरफान का बॉस बने ओमी वैद्य का अपने प्रोडक्‍ट टॉयलेट पेपर की मार्केटिंग करने के लिए किए जाने वाले उपक्रम मनाेरंजक हैं बल्कि इतने ज्‍यादा मनोरंजक कि सिनेमाघर का दर्शक बाद के दृश्‍यों में भी अकारण हँसता है।

इरफान, कीर्ति, दिव्या, अरुणोदय, अनुजा अपने चरित्रों के साथ हैं लेकिन इस पूरी फिल्म को अपने होने से अर्थ देने का काम ओमी वैद्य ज्यादा अच्छे ढंग से कर जाते हैं। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य और संगीतकार अमित त्रिवेदी इस फिल्म के लिए लगभग मिस मैच गीत-संगीत रचना करते हैं। अरुणोदय सिंह माॅडल पर्सनैलिटी हैं, अच्छे लगते हैं। उनको एक शातिर किस्म का चरित्र दिया है, हालाँकि कई बार वह अस्वाभाविक ढंग से काॅमिक भी लगता है। यह जरूर है कि यह कलाकार अच्छी नकारात्मक भूमिकाओं के लिए बड़ी सम्भावनाशील आमद है।
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सोमवार, 26 मार्च 2018

भारतीय रंगमंच की परम्परा, थाती और वर्तमान

27 मार्च: विश्व रंगमंच दिवस



विश्व रंगमंच दिवस की शुरूआत का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। 1961 में फ्रांस में इसकी पहल की गयी। दुनिया के अनेक देश रंगमंच के माध्यम से अपनी सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली के माध्यम से अपने समकाल की विशिष्ट घटनाओं को प्रस्तुत करते हैं। भारत इस मायने में अग्रणी है कि उसने इस दिवस को मनाये जाने के सदियों पहले से रंगमंच की परम्परा को स्थापित किया। पुराणों में सभ्यता के सबसे पहले नाटक के मंचित होने की कथाएँ मिलती हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम हमारे देश में रंगमंच के देवता के रूप में स्मरण किया जाता है। उनका लिखा नाटक अंधेर नगरी आज भी न केवल किसी वरिष्ठ रंगकर्मी के लिए मंचन और प्रयोग का दिलचस्प विषय होता है बल्कि किसी नवागत का पट्टी पूजन की रंगमंच के क्षेत्र में इस नाटक से कराया जाता है। 

हमारे देश में नाटक की बात करते हुए एक व्यापक दृष्टि और रखने के लिए बड़े हिसाब-किताब की आवश्यकता पड़ेगी। सच बात यही है कि लम्बे समय में हमको यदि चार बातें करने के लिए वाक्य, मुहावरे और सलीके-शऊर आ गये हैं तो उसके पीछे बहुत कर्मठ और प्रतिबद्ध रंगकर्मियों के योगदानों का स्मरण किया जाना आवश्यक है। हमारे यहाँ मुश्किल यही है कि अपने-अपने समय और सक्रियता के साथ रंगमंच के कितने ही विद्वतजन सक्रिय रहे और लम्बी अवधि, कई बार अकस्मात समय से पहले स्मृति शेष हो गये लेकिन हमारे पास उनके किए गये कार्य का, उनकी उपलब्धियों का, उनकी परम्परा का, उनकी धरोहर का न तो कोई साक्ष्य उपलब्ध है और न ही कोई रख-रखाव। 

भारतीय रंगमंच के पितृपुरुष कावलम नारायण पणिक्कर जब नहीं रहे थे तब वरिष्ठ रंगकर्मी एम. के. रैना ने यह बात उठायी थी कि सरकारें बाजारू और फिल्मी कलाकारों के नाच-गाने पर लाखों करोड़ों खर्च कर देती हैं जबकि उससे बहुत कम खर्च करके पणिक्कर जैसे मूर्धन्यों की थाती को संरक्षित किया जा सकता है। यह बात मुझसे कभी बिसरायी नहीं जाती, सच भी है। बड़े-बड़े गुप्तदान होंगे, करोड़ों-अरबों के लेकिन इस परम्परा को बचाने में कोई धनपति आगे नहीं आता। अपनी-अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के महत्व और उसके प्रति पूज्यभाव को रखते हुए कलाकारों ने संघर्ष से उपलब्धियों तक की लम्बी यात्रा की है। देश के अनेक राज्यों में अनेक विसंगतियों, मुश्किलों, अशान्तियों के बावजूद रंगकर्म हो रहा है, यह कम महत्वपूर्ण नहीं है। पृथ्वीराज कपूर, इब्राहिम अल्काजी, विजय तेन्दुलकर, भास्कर चन्दावरकर, सत्यदेव दुबे, शम्भु मित्र, पी.एल. देशपाण्डे, हबीब तनवीर, विजया मेहता, बादल सरकार, ब.व. कारन्त, श्यामानंद जालान, जोहरा सहगल, के.वी. सुब्बन्ना, गुरुशरण सिंह, चन्द्रशेखर कम्बार, डाॅ. श्रीराम लागू, नीलू फुले, अरविन्द देशपाण्डे, सुलभा देशपाण्डे, भालचन्द्र पेंढारकर, नेमिचन्द जैन, गिरीश कर्नाड,  ऊषा गांगुली, नीलम मानसिंह चैधरी, रतन थियम, कन्हाई लाल, तापस सेन, रेखा जैन, कीर्ति जैन जैसे कितने ही नाम होंगे जिनका स्मरण कर हम रंगमंच के देशकाल और उसके यथार्थ से रूबरू होते हैं।  

सक्रिय नाटककारों की एक बड़ी ऊर्जावान पीढ़ी वर्तमान में हमारे बीच काम कर रही है। इस समय युवा और प्रौढ़ उम्र के रंगकर्मियों में समय सापेक्ष नवप्रयोगों और अधुनातन स्थितियों को देखने की अलग दृष्टि विकसित हो रही है। उनके रंगकर्म में वही ताप, वही ऊष्मा दिखायी देती है। हमारे बीच अभी वह पीढ़ी भी सौभाग्य से है जिनके नये काम के प्रति जिज्ञासापरक निगाह हमारी हुआ करती है, नयी पीढ़ी को ऐसे नाट्यकारों की दृष्टि और व्याकरण को देखना और सीखना चाहिए। मोहन महर्षि, महेश एलकुंचवार, नादिरा जहीर बब्बर, गोविन्द नामदेव, राजिन्दर नाथ, रुद्रप्रसाद सेनगुप्त, बंसी कौल, संजय उपाध्याय, मानव कौल, कुमुद मिश्रा आदि ऐसे कितने ही नाम होंगे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व से रंगमंच के व्याकरण को भलीभाँति समझा जा सकता है। 

आधुनिक शास्त्रीय रंगमंच के साथ ही आंचलिक रंगमंच का समृद्ध होना, उसका निरन्तर संघर्ष में बने रहना हमारे देश में कलाओं की बड़ी जिजीविषा का प्रमाण है। कथकली, यक्षगान, चण्डूभागवतम, नौटंकी, नाचा, माच, खयाल, स्वांग, तमाशा आदि लोकनाट्य विधाओं ने ग्रामीण अंचलों में नाट्यकर्म को प्राणवान बनाये रखा है। भारत का लोकव्यापी रंगमंच, आधुनिक शहरी रंगमंच से पृथक ग्रामीण परिवेश में, उसकी सम्पूर्ण आंचलिकता में जो पहचान बनाता है, वह समानान्तर रूप से स्तुत्य है। हालांकि ऐसा संयोग बड़ी मुश्किल से उपस्थित होता है कि जिसमें सभी लोकनाट्य शैलियों या आंचलिक नाट्य परम्परा की भागीदारी हो पाना सम्भव हो सके, उनको देखा जा सके, सीखा और समझा जा सके। जितनी ग्रामीण, विभिन्न राज्यों से जुड़ी रंगप्रस्तुतियों की आमद होती है, हम अपने ही देश के लोकरंग वैभव से परिचित होते हैं। 

अनेकानेक राज्यों में लोकनाट्य परम्परा की एक जैसी स्थिति है। सभी के पास संसाधन सीमित हैं। सभी के पास आर्थिक कठिनाइयाँ हैं जो उनके जीवन के संघर्षों के साथ जुड़ी हैं लेकिन इसके बावजूद यदि ये समूह, ये कलाकार, ये लोकरंगकर्मी अपनी चेतना को, अपने लोक की रंगचेतना को जाग्रत किए रहते हैं तो इनका यह प्रयत्न, इनका यह कर्म, इनका यह पुरुषार्थ स्तुत्य है। 



रविवार, 17 दिसंबर 2017

48वाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह, गोआ

सिनेमा सदैव ही जीवन की संवेदना का हिस्सा रहा है

(iffigoa2017)

गोआ (goa) में विश्व सिनेमा की भागीदारी वाला भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का अड़तालीवाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह सम्पन्न (iffigoa2017) हो चुका है। इस समारोह का शुभारम्भ भारतीय सिनेमा के आज के चर्चित सितारे शाहरुख खान ने किया था। वहीं इसके समापन पर भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार की उपस्थिति और उद्बोधनों ने समारोह को भावनात्मक रूप से समेटने का उपक्रम किया। देश-दुनिया के शीर्षस्थ फिल्मकार और उनका सिनेमा देखने के अवसर यह समारोह पिछले अड़तालीस बार से जुटाया करता है। पहले यह समारोह एक साल दिल्ली और एक साल देश के किसी एक राज्य में हुआ करता था। देश के अनेक राज्यों को इस समारोह का आतिथेय होने का अवसर मिला। सदैव ही इस समारोह को एक ग्लैमर, एक आभा और एक रौनक प्राप्त होती रही है क्योंकि यह देश का अकेला ऐसा समारोह रहा जिसने दुनिया के उत्कृष्ट सिनेमा को एक प्लेटफाॅर्म पर लाने का प्रयास किया, उन फिल्मकारों को हिन्दुस्तान में इस समारोह का हिस्सा बनने को निमंत्रित किया जिनके नाम और व्यक्तित्व का अर्थात ही समृद्ध सिनेमा हुआ करता था। 

आरम्भ के कुछ वर्षों तक यह समारोह बाॅलीवुड के फिल्मकारों और सितारों की बड़ी आमद का केन्द्र बना रहा लेकिन बाद में धीरे-धीरे देश के दूसरे राज्यों के फिल्मकार, कलाकार, दुनिया के अनेक देशों के फिल्मकार और कलाकार आकृष्ट होना शुरू हुए। पिछले एक दशक में इस समारोह को बावजूद एक ही राज्य में सिमटकर रह जाने, शेष देश और उसके राज्यों से बड़ी दूर हो जाने और देखने वालों के लिए अपेक्षाकृत व्ययसाध्य होने के बाद भी स्थापित हुआ कहा जा सकता है। इस बार का अड़तालीसवाँ अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह अपने आपमें अनेक आकर्षण एवं आयाम समेटकर प्रस्तुत हुआ है। इण्टरनेशनल फेडरेशन आॅफ प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के साथ मिलकर 195 फिल्मों के साथ इस समारोह की शुरूआत एक अच्छा संकेत था। इस बार के समारोह में 82 देशों के सिनेमा की भागीदारी हुई। इनमें दस वल्र्ड प्रीमियर्स, दस एशियन एवं इण्टरनेशनल प्रीमियर्स एवं 65 भारतीय प्रीमियर्स शामिल थे। ईरान के शीर्षस्थ फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म बियाॅण्ड द क्लाउड्स से समारोह की शुरूआत तथा समापन अवसर पर पाबलो कैसर की फिल्म इण्डो-अर्जेण्टीनियन फिल्म थिंकिंग आॅफ फिल्म का प्रदर्शन प्रीमियर देखने वालों के लिए रोचक अनुभव रहा। इस बार कनाडा को विशेष रूप से सिनेमा-केन्द्रित किया गया जिसमें श्रेष्ठ फिल्मों के साथ प्रतिष्ठित कलाकारों और फिल्मकारों का भी आना-जाना लगा रहा। 

अड़तालीसवें अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में देश-दुनिया की तकरीबन 30 महिला फिल्मकारों का सिनेमा देखने का अवसर फिल्म समारोह में शामिल होने वाले सिनेप्रेमियों को मिला जो सुखद संकेत है। समारोह का एक बड़ा आकर्षण पिछली सदी के विश्व के दो महान फिल्मकारों फ्रिट्ज लैंग की फिल्म मेट्रोपाॅलिस एवं आन्दे्रई तारकोव्स्की की फिल्म सेक्रीफाइस थीं जो प्रदर्शन के लिए हासिल की गयी। 

विदेशी सिनेमा में जेम्स बाॅण्ड की फिल्मों की समानान्तर सफलता एवं लोकप्रियता का आकर्षण इस बार इस समारोह को भी बचा नहीं पाया है, यही कारण है कि बाॅण्ड की 9 फिल्में इस समारोह का हिस्सा बनी। इनमें शामिल थीं, गोल्डन आई, गोल्ड फिंगर, आॅक्टोपसी, स्कायफाल, आॅन हर मिजेस्ट्रीज़ सीक्रेट सर्विस, इ स्पाय हू लव्ड मी इत्यादि। 

लगभग नौ दिनों के इस समारोह में इतनी सारी फिल्मों का शामिल होना दिलचस्प था, उसकी विविधता उतनी ही आकृष्ट करने वाली भी। एक तरफ अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगी खण्ड में बीट्स पर मिनट, डार्क स्कल, द ग्रेट बुद्धा, कच्चा लिम्बू, शटल लाइफ, विलेज राॅकस्टार जैसी फिल्में थीं तो दूसरी ओर विश्व सिनेमा श्रेणी में ब्लैक लेवल, ब्लडी मिल्क, ब्रीथ, चिल्ड्रन आॅफ द नाइट, डेब्रेक, हाई नून स्टोरी, बैरेज, एलोन डज नाॅट बिलीव इन डेथ, फादर एण्ड सन, लवलेस, मोंपारनास बिएवेन्यू, द स्ट्रेन्ज वन्स आदि। इस बार जैसा कि ऊपर जिक्र आया, कनाडा के सिनेमा को विशेष केन्द्रित किया गया था। द स्टेअर्स, आई आॅन जूलिएट, डोंट टाॅक टू आइरीन, मेडीटेशन पार्क, ओल्ड स्टोन वगैरह। ब्रिक्स फिल्म फेस्टिवल अवार्ड श्रेणी में नीस: द हार्ट आॅफ मेडनेस, अयाण्डा, टर्टल, वेयर हेज़ टाइम गाॅन, द सेकेण्ड मदर आदि को देखना समय के साथ दुर्लभ और दुरूह विषयों पर परिश्रमपूर्वक बने सिनेमा का आस्वादन करना था। 

विश्व सिनेमा के इस बड़े समागम में ब्रिक्स फिल्म फेस्टिवल श्रेणी में नीस: द हार्ट आॅफ मेडनेस देखना संवेदनशील अनुभव था जिसमें चालीस के दशक की एक सच घटना को आधार बनाकर प्रस्तुत किया गया था। यह एक महिला मनोचिकित्सक के साहस और प्रयोगों की कहानी है जो मानसिक रोगियों को करण्ट जैसी चिकित्सा पद्धति के विरुद्ध है और उसे मनुष्य के लिए अत्यन्त पीड़ाजनक और त्रासद मानती है। समकालीन परिवेश और साथी उससे असहमत उसे अलग-थलग कर देते हैं और भयावह रोगियों के बीच काम करने भेज देते हैं जहाँ वह अपनी तरह से अनेक मरीजों को सुधार पाती है, उनको ठीक कर पाती है। राॅबर्टो बर्लिनर की यह ब्राजीलियन फिल्म हमें आज भी सोचने पर विवश करती है। बैरेज(फ्रांस-लोरा स्कोरेडर), फादर एण्ड सन(विएतनाम-लुओंग डिन्ह डुंग), लवलेस(रशिया-एण्ड्री ज्वाइगिनत्सेव) जैसी फिल्मों के मूल में विषय छोटी उम्र के बच्चे हैं जो अलग-अलग कारणों से एकाकीपन, वेदना, उपेक्षा और कठिनाइयाँ झेल रहे हैं। 

आश्चर्य यह होता है कि कैसे अलग-अलग देशों में फिल्मकारों ने यह लगभग एक जैसी मासूम संवेदना और वेदना को अपने सिनेमा का आधार बनाया। बैरेज में एक माँ अपनी बेटी को तब अपने ढंग से परवरिश और सान्निध्य के दबाव डाल रही है जब उसका संसार खुलने को है और वह छोटी ही उम्र से अपनी नानी के पास रह रही है। इस बच्ची की चुप्पी बड़े सवाल खड़े करती है। दूसरी ओर लवलेस जैसी फिल्म जिसमें तलाक लेकर अलग होने को आतुर पति-पत्नी को अपने बच्चे के भविष्य का ख्याल ही नहीं है। वह उसकी उपस्थिति में घर का सौदा कर रहे हैं ताकि घर बेचकर अलग हो जायें। ऐसे में उस बच्चे का एक दिन गायब हो जाने की घटना भी उपेक्षा शिकार हो जाती है। माता-पिता को इतना निर्मम देखना त्रासद लगता है पर यह है दुनिया के ही समाज का सच। तीसरी ओर एक फिल्म फादर एण्ड सन में एक पहाड़ी इलाके में रहने वाले गरीब मछुआरे का अपने बच्चे के साथ कठिन संघर्ष है जो मासूम एक गम्भीर बीमारी का शिकार हो गया है।

भारतीय सिनेमा खण्ड में फीचर फिल्म श्रेणी में कच्चा लिम्बू, कड़वी हवा, क्षितिज-ए होराइजन, पिहू, रुख, टेक आॅफ, वेण्टिलेटर, बिसोर्जन, माछेर झोल, मुरम्बा, न्यूटन और नाॅन फीचर फिल्मों में बलूत, अम्मा मेरी, एपिल, ए वेरी ओल्ड मैन विद एनाॅरमस विंग्स, खिड़की, पलाश, पुष्कर पुराण आदि विषयों की मौलिकता और कथ्य के साथ परदे पर उसके निर्वाह के कौशल और दृष्टिकोण के कारण पसन्द की गयीं। अलावा दादा साहब फाल्के अवार्ड से विभूषित फिल्मकार के. विश्वनाथ की फिल्मों सागर संगमम, शंकराभरणम, स्वाति किरानम को देखा गया। उल्लेखनीय यह भी कि इस साल दिवंगत हुए फिल्मकारों और कलाकारों को श्रद्धांजलि देते हुए सरकार ने ओमपुरी की अर्धसत्य, विनोद खन्ना की अचानक, अब्दुल मजीद की असमिया फिल्म चमेली मेमसाब, टाॅम आल्टर की ओसियन आॅफ एन ओल्ड मैन, रीमा लागू की मराठी फिल्म सवाली, जयललिता की तमिल फिल्म अइयारथिल ओरुवन, कुन्दन शाह की जाने भी दो यारों, दासरि नारायण राव की तेलुगु फिल्म ओसे रामुलम्मा और रामानंद सेनगुप्ता की बंगला फिल्म नागरिक को भी स्थान दिया गया था। हिन्दी मीडियम और सीक्रेट सुपर स्टार जैसी फिल्में भी सुगम और बोधगम्य फिल्मों की श्रेणी में शामिल थीं जो पूर्व प्रदर्शित भी हैं।

समारोह के समापन अवसर पर भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन को साल की इण्डियन फिल्म पर्सनैलिटी के रूप में सम्मानित करने किया गया वहीं लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रसिद्ध कैनेडियन निर्देशक एटाॅम इगोयान दिया गया। समापन अवसर सलमान खान, कैटरीना कैफ और अक्षय कुमार जैसे सितारों की उपस्थिति से और भी यादगार बन गया। कनाडा के सर्वाधिक प्रतिष्ठित फिल्मकार एटाॅम को एक्जोटिका से अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली। उनकी एक फिल्म द स्वीट हेअरआॅफ्टर भी प्रेक्षकों में पसन्द की गयी थी। अरारत, श्लोए, व्हेयर द ट्रुथ लाइज़, अडोरेशन, डेवल्स नाॅट, द केप्टिव, रिमेम्बर इगोयन उनकी अन्य श्रेष्ठ फिल्में हैं। फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान कम्पेनियन आॅफ द आर्डर आॅफ कनाडा से सम्मानित एटाॅम इगोएन विश्व सिनेमा में सर्जनात्मक उपलब्धियों का एक अहम चेहरा हैं। 

गोआ की अनुपम प्रकृति और छटाओं के बीच आयनाॅक्स, कला अकादमी भवन, मेक्विनेज़ भवनों में फिल्मों के प्रदर्शनों ने प्रतिदिन सुबह लगभग नौ बजे से देर रात बारह बजे के बाद तक सिनेमा का ऐसा माहौल बनाया जिसको देखकर लगता था कि दुनिया के सिनेमा को एक जगह पर देख पाने का इससे बेहतर सुअवसर और नहीं है। बड़ी बात यही है कि लगभग पचास साल से यह परम्परा एक बड़े रूप में स्थापित हो चुकी है और दुनिया के फिल्मकारों और सिनेप्रेमियों को इस अवसर का इन्तजार। सिनेमा का वजूद अपने आपमें बहुत मयाने रखता है। उसकी वजहें साफ हैं। सिनेमा का हमारे सपनों से जुड़ा होना, हमारे अचम्भे का हिस्सा होना, हमारी महात्वाकांक्षाओं में शामिल होना और ऐसे अनेक कारण है जो सिनेमा को विशिष्ट बनाते हैं। 

बीसवीं शताब्दी की यह सबसे चमत्कारिक विधा इक्कीसवीं सदी के दो दशकों में आधुनिक तकनीक, संसाधन और क्षण भर में हमसे सम्पर्क कर संवाद स्थापित करने वाली है, निश्चित ही इसकी उतनी ही लाभ-हानियाँ भी हैं लेकिन इसके बावजूद सिनेमा हमारे रोमांच का पर्याय है, हमारी स्फूर्ति का पोषक है, इसे नकारा नहीं जा सकता। 
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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

खूबियाँ जो धर्मेन्द्र को सदाबहार बनाती हैं....

जन्मदिन : 8 दिसम्बर


भारतीय सिनेमा के सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र एक सदैव प्रासंगिक सितारे हैं। 8 दिसम्बर को उनका जन्मदिन है। देश के कोने-कोने से उनके चाहने वाले मुम्बई पहुँचते हैं, यथाक्षमता उपहार, फूल, गुलदस्ता और खूब सारा प्यार लिए। धर्मेन्द्र सबसे मिलते हैं, यह दिन यदि वे मुम्बई में हुए तो उनसे मिलकर जाने वाले के लिए यादगार बन जाता है। बयासी वर्ष की उम्र में वे अनुशासित और अपनी फिटनेस को लेकर सजग रहते हैं। जहाँ तक सक्रियता की बात है तो वे न केवल यमला पगला दीवाना के तीसरे भाग की शूटिंग में व्यस्त हैं बल्कि अपनी भावनात्मक फिल्म अपने का सीक्वेल भी बनाने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी ही देखरेख में उनका पोता और सनी का बेटा राजवीर अपनी पहली फिल्म पल पल दिल के पास से सिनेमा में प्रवेश करने जा रहा है। 

धर्मेन्द्र एक साफदिल इन्सान, भीतर-बाहर एक सा व्यक्तित्व हैं। उनका व्यक्तित्व एक खुली किताब की तरह है। वे हमारी-आपकी तरह सहज और सीधे-सादे इन्सान हैं। फिल्म जगत मेें उनका आना, यूँ किसी बड़े सुयोग या चमत्कार से कम न रहा है। फगवाड़ा, पंजाब के एक छोटे से गॉंव ललतों में उनका बचपन बीता। बचपन से उनको सिनेमा का शौक था। अपने तईं जब उनको मौका मिलता था, तब तो सिनेमा वे देखते ही थे, इसके बाद अपनी माँ और परिवार के सदस्यों के साथ भी वे फिल्म देखने का कोई अवसर जाने नहीं देते थे। उन्होंने स्वयं ही बताया कि बचपन में सुरैया के वे इतने मुरीद थे कि चौदह वर्ष की उम्र में उनकी एक फिल्म दिल्लगी उन्होंने चालीस बार देखी थी। धर्मेन्द्र अपने पिता को काफी डरते थे। उनसे सीधे बात करने की हिम्मत उनकी कभी न पड़ती। अपनी माँ के प्रति उनकी गहरी श्रद्घा रही है। 

उन्होंने फिल्म फेयर की नये सितारों की खोज प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपने सितारा बनने के स्वप्र को साकार करने की दिशा में पहला कदम रखा था। जब उनको मुम्बई बुलाया गया तो खुशी का पारावार न रहा। इस यात्रा के लिए उनको फस्र्ट क्लास का टिकिट और फाइव स्टार होटल में ठहरने के इन्त$जाम के साथ बुलाया गया था। वे इसके लिए फिल्म फेयर के तब के सम्पादक पी. एल. राव को याद करना नहीं भूलते। यह 1958 की बात है। चयन तो उनका हो गया और फिल्म फेयर ने अपने जो स्टार घोषित किए उनमें धर्मेन्द्र भी शामिल थे मगर उनको एकदम से काम नहीं मिला। धर्मेन्द्र लेकिन जिद के पक्के थे। उन्होंने संघर्ष किया। अभिनेता बनने के ही ख्वाहिशमन्द अर्जुन हिंगोरानी और धर्मेन्द्र अक्सर काम के सिलसिले में किसी न किसी ऑफिस में एक-दूसरे को मिल जाते थे। दोनों में ऐसी दोस्ती हुई कि अर्जुन ने हीरो बनने की कोशिश से अपने को दूर करके निर्देशक के रूप में कैरियर शुरू किया तो उनके पहले नायक धर्मेन्द्र थे, दिल भी तेरा हम भी तेरे के साथ। बाद में यह दोस्ती ऐसी परवान चढ़ी कि हिंगोरानी की हर फिल्म के नायक धर्मेन्द्र ही हुए, शोला और शबनम, कब क्यों और कहाँ, कहानी किस्मत की आदि। 

धर्मेन्द्र की फिल्मोग्राफी बड़ी समृद्ध है। शायद ही ऐसा कोई श्रेष्ठï निर्देशक हो, जिनके साथ उन्होंने काम न किया हो। सीक्वेंस में देखें तो निर्माताओं में, निर्देशकों मेें, साथी कलाकारों में, नायिकाओं मेें ऐसे अनेक नाम सामने आते हैं जिनके साथ अपने कैरियर में कई बार, अनेक फिल्मों में उन्होंने काम किया। मोहन कुमार, मोहन सैगल, राज खोसला, बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी, असित सेन, रमेश सिप्पी, दुलाल गुहा,  जे. पी. दत्ता, अनिल शर्मा, ओ. पी. रल्हन, मनमोहन देसाई, रामानंद सागर, चेतन आनंद, विजय आनंद जैसे कितने ही निर्देशक होंगे जिनके साथ धर्मेन्द्र ने अपने समय की यादगार फिल्में की हैं। धर्मेन्द्र के कैरियर का शुरूआती दौर बहुत ही विशेष किस्म की अनुकूलता का माना जाता है। यह वह दौर था जब उन्होंने अपने समय की श्रेष्ठï नायिकाओं के साथ अनेक खास फिल्मों में काम किया। 

लेकिन इस दौर में जिन नायिकाओं के साथ उनकी शुरूआत हुई, उनके साथ आगे काम करने के लगातार मौके आये। जैसे नूतन के साथ बन्दिनी मेें, माला सिन्हा के साथ आँखें, अनपढ़ में, मीना कुमारी के साथ चन्दन का पालना, बहारों की मंजिल, मझली दीदी, फूल और पत्थर, मैं भी लडक़ी हूँ, काजल में, प्रिया राजवंश के साथ हकीकत में, शर्मिला टैगोर के साथ सत्यकाम, अनुपमा, चुपके चुपके, देवर, मेरे हमदम मेरे दोस्त मेें, नंदा के साथ आकाशदीप में, आशा पारेख के साथ आये दिन बहार के, आया सावन झूम के, मेरा गाँव मेरा देश में, राखी के साथ जीवनमृत्यु और बलैक मेल में, हेमा मालिनी के साथ नया जमाना, राजा जानी, प्रतिज्ञा, ड्रीम गर्ल, चाचा भतीजा, शोले, चरस, जुगनू, सीता और गीता, दोस्त, तुम हसीं मैं जवाँ, द बर्निंग ट्रेन, दिल्लगी, बगावत, रजिया सुल्तान में, सायरा बानो के साथ रेशम की डोरी, आयी मिलन की बेला, ज्वार भाटा में, वहीदा रहमान के साथ खामोशी, फागुन में, सुचित्रा सेन के साथ ममता में, रेखा के साथ झूठा सच, गजब, कहानी किस्मत की, कर्तव्य में उनकी जोडिय़ाँ बड़ी अनुकूल और परफेक्ट भी प्रतीत होती हैं। 

लगभग दो सौ से अधिक फिल्मों के माध्यम से धर्मेन्द्र ने न जाने कितने ही किरदारों को परदे पर साकार किया है। दर्शकों के बीच उनके सभी किरदार अपने-अपने ढंग से प्रतिष्ठिïत हैं। रामानंद सागर की फिल्म आँखें ने उनको इण्डियन जेम्स बॉण्ड के रूप में पहचान दी। रूमानी किरदार, बुरा आदमी, कानून का रक्षक, सच्चा और स्वाभिमानी चरित्र, बॉक्सर, फाइटर टाइप के चरित्र हों या इसके अलावा कुछ और, धर्मेन्द्र सभी मेें प्रभावशाली ही नजर आये। कॉमेडी में धर्मेन्द्र कुछ अलग ही रेंज के आदमी दिखायी पड़ते हैं जिसका उदाहरण तुम हसीं मैं जवाँ, प्रतिज्ञा, चाचा- भतीजा, गजब, शोले, चुपके-चुपके, नौकर बीवी का जैसी फिल्में हैं। 

धर्मेन्द्र भारतीय सिनेमा में एक यशस्वी उपस्थिति हैं। उनके साथ सदाबहार कलाकार की पहचान जुड़ी हुई है। धर्मेन्द्र दर्शकों में अपनी छबि को लेकर कहते हैं, कि फिल्मों में काम करते हुए दर्शकों में हमेशा मेरे लिए जो प्यार रहा है, उसको परिभाषित करना कठिन है। हर माँ ने मुझमें अपना बेटा देखा है, हर बहन ने मुझमें अपना भाई देखा है। और हर प्रेमिका ने........ इस पर वे शरमा जाते हैं। धर्मेन्द्र कहते हैं कि इस इण्डस्ट्री ने, इस हिन्दुस्तान ने मुझे जो दिया है, उसको बयाँ करना आसान नहीं है। ये ही वो दुनिया है जिसने धर्मेन्द्र को बनाया है। 


रविवार, 19 नवंबर 2017

IFFI 2017 STELLAR LINE UP IS ANNOUNCED


Lifetime Achievement award to celebrated Canadian director Atom Egoyan.


IFFI 2017 has already garnered a great amount of buzz owing to its stellar announcements that include many firsts. The Festival that is credited with a Grade “A” status by the International Federation of Producers’ Associations (FIAPF) today announced that the festival will be presenting 195 films from over 82 countries of which there will be 10 World Premieres, 10 Asian and International premieres and over 64 Indian premieres as part of the Official programme.

The Festival will open with the much talked about new feature, “Beyond The Clouds” from acclaimed filmmaker MajidMajidi and presented by Namah Pictures and Zee Studios and Close with the World premiere of the Indo Argentinian Co-production “Thinking of Film” directed by Pablo Cesar. It was also announced that while noted actor Shahrukh Khan will grace the opening ceremony of the festival as a special guest, the closing ceremony will be graced by noted actor Salman Khan, this in addition to a galaxy of noted industry professionals, international guests, dignitaries and film celebrities.

The press and delegate screenings that will kick off on the 21st of November will also see the opening of the Indian Panaroma section, with the section being inaugurated by renowned actress Sridevi. The same day will also see the IFFI 2017 Country Focus on Canadabeing celebrated with a grand red carpet opening and amidst the presence of noted Canadian actors and celebrities. The Country focus Canada that has been organized in association with the government of Canada with the collaboration of Telefilm Canada, curated by the Toronto International Film Festival,

The International Competition section of IFFI 2017, which carries a cumulative cash prize of over Rs. 1 Crore(Rupees Ten Million) will showcase 15 of the finest films of this year, competing for the Golden and Silver Peacock awards.  The International Competition jury will be headed by renowned filmmaker Muzaffar Ali, who is joined by his fellow jury members Festival director Maxine Williamson from Australia, Actor-Director Tzahi Grad from Isreal, Russian Cinematographer VladislavOpelyants, Director and Production Designer Roger Christian from the United Kingdom.

This edition of the Festival will also be presenting films from a record number of women filmmakers (Over 30) in addition to a carefully curated section of Restored classics from across the globe, which includes the recently completed restorations of Fritz Lang’s Metropolis and Tarkovsky’s Sacrifice among some other notable films.

Among many other firsts at the Festival, IFFI 2017 will present a specially curated section celebrating the most loved spy in films, James Bond. The section will showcase films featuring the various leading actors who have essayed the iconic character, through a package of 9 films. Additionally the Festival will present 4 films from young filmmakers of the Biennale College as a first of it’s kind collaboration with the the Venice International Film Festival. Speaking about the same, Venice International Film Festival Director, Alberto Barbera said “I am particularly grateful to IFFI for the collaboration that gives the Venice Film Festival the opportunity to present four films produced in the frame of the Biennale College Cinema, a projects we are greatly proud of for the results obtained in supporting young filmmakers from all over the world.  I am sure that the audience of the prestigious IFFI will appreciate the quality of these micro-budget films, and combined efforts of our two institutions to offer them a larger visibility. I wish that we will be able to continue our collaboration, which is based on shared feelings of love for good cinema and passion for young talented film directors”.

The 2017 edition of the Festival will also host a Mixed Reality Sidebar featuring Virtual Reality and Augmented Reality activities in addition to a series of Master Classes and Panel Discussions featuring the who’s who of the entertainment industry, including noted filmmakers Atom Egoyam, ShekharKapur, NiteshTiwari and Farah Khan, as well as Oscar winning sound designer Craig Mann.


IFFI 2017 will present the coveted Indian film personality of the year award on acclaimed actor Amitabh Bachcchan and the Lifetime Achievement award to celebrated Canadian director Atom Egoyan.

शनिवार, 18 नवंबर 2017

गहरी अन्तर्दृष्टि वाले सिने-आलोचक भी थे कुँवर नारायण


मूर्धन्य विद्वान कुँवर नारायण का निधन सृजन के बहुआयामीय व्यक्तित्व का हमारे बीच से चले जाना है। लगभग नब्बे वर्ष की उम्र में वे कुछ दिनों से निरन्तर गहरे अस्वस्थ थे और अपनी रुग्णता से बेहद व्यथित भी क्योंकि सर्जनात्मक सक्रियता के साथ-साथ लिखना-पढ़ना उनको बहुत ऊर्जा देता था और आँखों से देख न पाना उनको बहुत परेशान करने लगा था। साहित्य के अनेक आयामों में अपनी दक्षता के साथ मौलिक दृष्टि, स्वअनुशासन और गहरे भावबोध के साथ अपनी पहचान को प्रतिष्ठापित करते हुए जिस एक और माध्यम में वे प्रभावित करते थे वह था सिनेमा। कुँवर नारायण गहरी अन्तर्दृष्टि वाले सिनेमा आलोचक थे जिनका लिखा गया पढ़ना और बोला गया सुनना बहुत महत्वपूर्ण होता था। 

वे क्लैसिकी रुझान के कवि थे। उनकी कविता तर्क और भावना के विभेद को समाप्त करने वाले बिन्दु पर प्रस्फुरित होती थी। उन्होंने किसी दार्शनिक, सामाजिक, राजनैतिक विचारधारा से प्रतिबद्ध हुए बिना और अतिकारों से बचते हुए तार्किक, संयमित, सुचिन्तित, संयोजित, नैतिक मानवीय सम्वेदन से परिपूर्ण अपनी आत्म-निर्धारित बंदिशों के कठिन चक्रव्यूह में भी अपने समय की ईमानदार कविता लिखी। मूलतः मनुष्य की चिन्ताओं से जुड़ी उनकी कविता समकालीन जीवन के जटिल अन्तर्विरोध, विडम्बनाओं और संत्रास को उसकी समग्रता और पूरी जटिलता में अभिव्यक्त करने वाली थी। प्रत्येक कविता संग्रह में उनका शिल्पगत बरताव, भाषाई लहजा और कलात्मक तेवर बदलते गये हैं। उनकी कविता सभ्यताओं की अमानवीय फिसलनों के विरुद्ध हमेशा एक सार्थक हस्तक्षेप ही मानी गयी। समय की यांत्रिक और उपभोक्ताप्रधान दुनिया में सामान्य व्यक्ति, टकराहट का शहीदी अवसान और विवश समर्पण के क्रमिक आत्मघात से बचकर एक ईमानदार मनुष्य की तरह जी सके, यही चिन्ता उनकी कविता का केन्द्रीय विचार रहा है। 

कुँवर नारायण का सिने-लेखन गहरे शोध, भाषा परिमार्जन और बीसवीं सदी के इस सबसे चमत्कारी चाक्षुष माध्यम को देखने की एक दृष्टि प्रदान करने वाला था। वे महान फिल्मकार सत्यजित रे के बारे में कहते थे कि उनकी फिल्में जीवन की गति को कला की लय में बांधने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। मुख्यतः पेचीदगी और जटिलता के वे कलाकार नहीं हैं। सरलता और क्लैसिकल अनुशासन उनकी कला की बुनियादी भाषा है जिसके द्वारा वे मानव मन की जटिल से जटिल गुत्थियों को चित्रित और उद्घाटित करते हैं। वे कहते थे कि राय की फिल्में इसलिए महान नहीं हैं कि वे साहित्य की स्पर्धा में अपनी एक अलग दुनिया रचती हों, वे विशिष्ट हैं क्योंकि वे उच्च कोटि के साहित्य के स्तर पर हमारे मन और चिन्तन को आन्दोलित करती हैं।

सिनेमा को देखने और सिनेमा पर बात करने के लिए कुँवर नारायण ने बौद्धिक धरातल पर बड़ी सम्भावनाओं को प्रकाशित करने का काम किया था। वे भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों के श्रेष्ठ सिनेमा को देखने, उस पर बात करने और विशेष रूप से हिन्दी में विश्व सिनेमा के गुणग्राहकों और जिज्ञासुओं के लिए एक जीनियस सेतु की तरह थे। मृणाल सेन, मीरा नायर, सत्यजित रे, आन्द्रेई तारकोवस्की, पोवाक्कात्सी आदि शीर्षस्थ फिल्मकारों के सिनेमा को उन्होंने अपनी भाषा और दृष्टि के साथ रेखांकित करने का जो काम किया, वह उनकी मूलभूत सर्जनात्मक साधना से इतर एक श्रेष्ठ आयामीय विलक्षणता की तरह है। उन्हें यदि मृणाल सेन की बहुचर्चित फिल्म खण्डहर ने आकृष्ट नहीं किया तो उसके लिए भी उन्होंने लिखा कि यह फिल्म जिन ऊँचाइयों की ओर संकेत करती है, उन ऊँचाइयों तक पहुँच नहीं पाती। बीच से ही लौट आती है क्योंकि मृणाल सेन की बुनियादी संवेदनाएँ जितनी भाव प्रबल हैं उतनी तर्क प्रबल नहीं, इस फर्क को उनकी ऐसी फिल्मों में भी देखा जा सकता है जिनका मूल विषय भावनात्मक न होकर वैचारिक है। कुँवर जी ने एक जगह पर लिखा था कि खण्डहर विफल फिल्म नहीं है लेकिन मेरी दृष्टि में इतनी सफल भी नहीं है कि मैं उसे निधड़क मृणाल सेन की उत्कृष्ट फिल्मों में रख सकूँ। 

वे एक ऐसे सिने आलोचक थे जो श्रेष्ठ फिल्मकारों से उनके स्तर की अपेक्षाओं को रेखांकित करते थे। महान फिल्मकारों की किसी-किसी फिल्म का कमतर प्रदर्शन उनको निराश करता था तो वे उस बात को बड़े साहस के साथ, अपनी क्षमताभर तार्किकता के साथ व्यक्त किया करते थे। उनका इतन स्पष्ट और भाषा तथा लेखनी में साफ-गो होना बहुत महत्व का माना जाता था। यदि उनको मीरा नायर की फिल्म सलाम बाॅम्बे बहुत ज्यादा प्रभावित करती थी तो वे उस पर लिखते हुए उस पर अपना शीर्षक लिखते थे - एक सार्थक कोशिश से कुछ ज्यादा। वे इस फिल्म को सराहते हुए कहते थे कि सलाम बाॅम्बे देखना एक फर्क तरह के अनुभव से गुजरने की तरह है। पाश्चात्य प्रभाव यदि इस फिल्म में दिखता भी है तो वह उत्कृष्ट तकनीक के रूप में रचनात्क ढंग से आया है। भारतीय समस्याओं को भारतीय दृष्टि से देखने की यह ईमानदार कोशिश है। उन्होंने लिखा था कि घोर यथार्थवादी फिल्म होते हुए भी सलाम बाॅम्बे हमारे मन को एक कविता की तरह छूती है क्योंकि एक कटु यथार्थ की तीव्रता को बरकरार रखते हुए भी वह व्यक्ति की कोमल और उदात्त दोनों भावनाओं को सुरक्षित रखती है। सिनेमा पर विश्लेषणात्मक और निबन्धात्मक लेखन से बहुत गहरे अपनी जगह बनाने वाले कुँवर जी बाद में अनेक सिने विश्लेषकों, आलोचकों के मार्गदर्शक हुए। 

एक पूरी पीढ़ी विष्णु खरे, विनोद भारद्वाज, प्रयाग शुक्ल ने जनमानस में सिनेमा जैसे साधारण मनोरंजन को गम्भीर परिभाषाओं और व्याकरणों से बांधा, सिनेमा बनाने वालों की जिम्मेदारी, इस माध्यम के प्रति प्रतिबद्धता और एक सुथरी परिमार्जनपूर्ण भाषा को व्यवहार में लाने का काम किया। ऐसे में कुँवर नारायण के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। उनका निधन सिनेमा-संज्ञान के बौद्धिक और भाषायी कैनवास में एक तकलीफदेह रिक्तता है।



रविवार, 12 नवंबर 2017

भविष्य का रंगमंच, अभिनेताकेन्द्रित और वैश्विक सरोकारों वाला

रामगोपाल बजाज की दृष्टि में

भारतीय रंगमंच के गहरे अनुभवी, गुणी और सुप्रतिष्ठित कलाकार, निर्देशक रामगोपाल बजाज को हाल ही में उज्जैन में मध्यप्रदेश शासन का रंगमंच के क्षेत्र के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से विभूषित किया गया है। उनकी रंगनिष्ठा और सर्जना की सुदूर और नैरन्तर्यभरी यात्रा आधी सदी के विस्तीर्ण फलक पर अनेक श्रेष्ठ प्रतिमानों के कारण उल्लेखनीय रही है।

रामगोपाल बजाज, देश के एकमात्र सबसे बड़े रंग-प्रशिक्षण एवं परिष्कार संस्थान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1965 बैच के स्नातक रहे हैं। आगे चलकर वे इसी संस्थान के छः साल निदेशक भी रहे। निदेशक के पद पर रहते हुए उन्होंने बच्चों के लिए नाट्य उत्सव जश्न ए बचपन और परिपक्व रंगकर्म के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नाट्य समारोह भारत रंग महोत्सव की परिकल्पना की और स्थापित किया। दोनों ही समारोह इस संस्थान की पहचान को बड़ी व्यापकता प्रदान करने में सफल रहे हैं। 

भारतीय रंगजगत मे अपनी पाँच दशक की निरन्तर सक्रियता और उत्कृष्ट प्रतिमानों से महत्वपूर्ण स्थान और आदर प्राप्त करने वाले रंगकर्मी रामगोपाल बजाज का जन्म 5 मार्च 1940 को दरभंगा, बिहार में हुआ था। उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त की। रंगमंच के प्रति उनका रुझान छोटी उम्र से ही रहा। युवावस्था में उन्होंने अपने रंगकर्मी मित्रों स्वर्गीय ओम शिवपुरी, स्वर्गीय सुधा शिवपुरी, स्वर्गीय ब.व. कारन्त, स्वर्गीय बृजमोहन शाह एवं मोहन महर्षि के साथ मिलकर दिशान्तर नामक नाट्य संस्था की स्थापना की और अनेक उत्कृष्ट नाट्य कृतियों के मंचन की शुरूआत की। उस समय उन्होंने जो नाटक मंचित किए उनमें सुनो जनमेजय, हयवदन, बेगम का तकिया, घासीराम कोतवाल, अंधा युग, तुगलक एवं किंग लियर आदि शामिल हैं। एक सफल एवं गुणी निर्देशक के रूप में इसी निरन्तरता और सक्रियता के बीच अजातघर, अषाढ़ का एक दिन, सूर्य की अन्तिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, कैद ए हयात, स्कन्दगुप्त, मुक्तधारा (पंजाबी भाषा में) सी गल, भूख आग है, तलघर, जल डमरू बाजे आदि नाटकों ने उनकी प्रतिष्ठा को और समृद्ध करने का काम किया। 

आरम्भ में नई दिल्ली आकर रामगोपाल बजाज ने अनेक संस्थानों में नाटक प्रभाग के प्रमुख रहते हुए महती कार्य किया इनमें 1969 से 73 तक माॅडर्न स्कूल दिल्ली में नाट्यकला का अध्यापन, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में के भारतीय थिएटर विभाग के रीडर पद पर कार्य एवं 1979 से 80 तक पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के नाट्य कला विभाग के प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष के रूप में सक्रियता शामिल हैं। इसके अलावा वर्ष 2002 में एक वर्ष डाॅ. राधाकृष्णन पीठ, हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रमुख रूप में भी उन्होंने काम किया। वर्ष 2008 में उन्होंने शब्दाकार थिएटर समूह की स्थापना की और लैला मजनूं नाटक को भव्यतापूर्वक मंचित किया। इस प्रस्तुति को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ पटकथा व ध्वनि आकल्पन के लिए तीन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। समकालीन भारतीय रंगचेतना के विशाल परिदृश्य में सघन, कल्पनाशील और पारखी रंग-दृष्टि के पर्याय श्री रामगोपाल बजाज एक निर्देशक के रूप में जितने बारीक, सूक्ष्म से सूक्ष्म संवेदनाओं और आवेगों के पारखी रहे हैं, एक कलाकार के रूप में उतने ही गहन, भीतरी त्वरा के विलक्षण एवं असाधारण प्रदर्शन में उनको महारथ हासिल है। 

एक गहरे, दृष्टि सम्मत तथा तार्किक गुणों से समृद्ध बज्जू भाई (आत्मीयता और अपनेपन में उनको इसी नाम से सम्बोधित किया जाता है) हमारे समय के एक अत्यन्त विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण कलाकार एवं रंगकर्मी हैं जिनकी प्रतिभा की जरूरत उतनी ही भारतीय सिनेमा को भी है, तभी उनको अनेक फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निरन्तर हासिल हुआ करती हैं। वे इन दिनों सिनेमा और धारावाहिकों में लगातार काम कर रहे हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों में टेली फिल्म जेवर का डिब्बा, तमस, बसन्ती, फीचर फिल्मों में मैं आजाद हूँ, उत्सव, गोधूलि, मासूम, मिर्च मसाला, हिप हिप हुर्रे, चांदनी, परजानिया, द मैथ, मैंगो ड्रीम्स, जाॅली एल.एल.बी. टू शामिल हैं।

बजाज सजग रंगचेता हैं, उनका कहना है कि सिनेमा के व्यापक प्रसार के कारण अब रंगमंच में यथार्थवाद पर फिर से विचार करने की जरूरत है। हमें सोचना होगा कि रंगमंच में विचार के अलावा मौलिक क्या है? अब मंच पर दृश्यबंध की चकाचैंध से हमारा काम नहीं चल सकता क्योंकि यह सब सिनेमा हमसे अधिक कर रहा है। रामगोपाल बजाज भविष्य के रंगकर्म की कल्पना करते हुए कहते हैं कि भावी रंगमंच स्थानीय भाषा में होगा, अभिनेताकेन्द्रित होगा और उसके सरोकार वैश्विक होंगे। यह रंगमंच अनुभूति-विचारप्रधान होगा। रंगमंच की चकाचैंधभरी दृश्यात्मकता को भाषा के स्तर पर तोड़ना होगा। फार्म के स्तर पर उसे काव्यात्मक बनाना होगा। इसके बाद ही रंगमंच अधिक व्यापक और वैश्विक होगा। जिस प्रकार कविता में बहुस्तरीय अभिव्यक्तियाँ सम्भव हैं, एक कला के रूप में हमारा भविष्य का रंगमंच, कविता का रंगमंच होगा। 

बजाज का कहना है कि दुनिया में संचार का स्वरूप बदल जाने से कोई भी कला अब केवल स्थानीय नहीं रही। अब तक हम जिसे और जिन अर्थों में हिन्दी रंगमंच कहते हैं वह दरअसल भारतीय रंगमंच है जिसकी भाषा हिन्दी है। यह भाषा कन्नड़, मलयालम या पंजाबी भी हो सकती है। मेरा मानना है कि आज जो नाटक लिखे जा रहे हैं, वे वैश्विक हैं। 

रामगोपाल बजाज ने नाटकों की समीक्षाएँ और आलोचना भी अपनी दृष्टि और तटस्थ भूमिका के साथ वर्ष 1969 से 72 तक दिनमान पत्रिका में लिखी हैं। उन्होंने बादल सरकार, बर्तोल्त ब्रेख्त और गिरीश कर्नाड आदि के लगभग पन्द्रह नाटकों को हिन्दी में अनूदित भी किया है। समग्रता में चालीस से अधिक नाटकों में अभिनय, इतने ही नाटकों का निर्देशन उनके प्रतिमान हैं। सुदीर्घ एवं निरन्तर सृजनयात्रा में आपको अब तक अनेक मान-सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इनमें वर्ष 2003 में पद्मश्री, साहित्य कला परिषद का परिषद सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नांदीकर सम्मान एवं राधारमण सम्मान शामिल हैं। वर्ष 2015 में आपको बिहार राज्य सरकार का बिहार कला पुरस्कार लाइफ टाइम अचीवेंट के लिए प्रदान किया गया है। 


गुरुवार, 9 नवंबर 2017

समय और स्‍वप्‍न से जूझते चरित्र

सीक्रेट सुपर स्‍टार की इन्सिया या तारे जमी पर का ईशान



कुछ समय की फिल्मों में से मन को गहरे छू गयी फिल्म सीक्रेट सुपर स्टार पर यह मेरा तीसरा नोट है। मित्रों का आभारी हूँ कि उनको, इस फिल्म को रेखांकित या विश्लेषित करना मेरा, अच्छा लगा। इतने समर्थन किसी अखबार में न छपने के बाद मिले हैं जो बहुत प्रोत्साहित करते हैं। आपका लिखा यदि दो हजार मित्रों तक पढ़ लिया जाये, तो इससे अधिक सार्थकता और क्या हो सकती है.........

सीक्रेट सुपर स्टार से रह-रहकर जुड़ना होता है। शायद एकाध बार और देखने जाऊँ। दो कूड़ा फिल्में देखने से ज्यादा बेहतर एक संवेदनशील फिल्म दो बार देख लो, बहरहाल। इस फिल्म में इन्सिया का चरित्र अत्यन्त गहरा है। वह अपनी छोटी उम्र में भी उस उम्र के किसी और बच्चे से ज्यादा गम्भीर, समझदार, सपनों के अर्थ को समझने वाली और सपनों के आगे आने वाली विडम्बना से जूझने वाली बहादुर बच्ची है। मुझे तारे जमी पर का ईशान अवस्थी भी तमाम कमजोरियों के बावजूद बहुत बहादुर लगता है जब वह एक दिन स्कूल से निकलकर दिन भर शहर में घूमता है। मासूम और कोमल मन कई बार अपनी ही क्षमताओं का अतिरेक करता है तो उसे जोखिम का अन्दाजा नहीं होता।

इन्सिया की शिक्षिका को उसके सपनों से कोई सरोकार नहीं है। वो उसी ढर्रे या भेड़चाल का एक औजार है जो हमारी शुरू से लदी-फँदी शिक्षा प्रणाली का पोषक है भले ही वो इस समय पूरी तरह कुपोषण का शिकार हो गयी हो। स्कूल में पढ़ाने से अधिक घर में ट्यूशन एक अलग तरह का रोमांस है अपने प्रोफेशन के साथ। ऐसी ही शिक्षिका इन्सिया से रिपोर्ट कार्ड में उसके पिता के हस्ताक्षर लेकर आने का हठ करती है। खराब रिजल्ट पर पिता का हस्ताक्षर इन्सिया को परेशान करता है, उसका परिणाम और ज्यादा जब उसके पिता निर्मम होकर बरताव करते हैं।

यहाँ पर अपने बचपन का अनुभव लिखने से ठहर नहीं पा रहा हूँ। स्कूल में छठवीं, सातवीं के छमाही इम्तिहानों में हिन्दी छोड़ सभी विषयों में फेल हो जाने का मेरा इतिहास रहा है। उस रिजल्ट पर पिता के साइन हमारे लिए भी अनिवार्य था लेकिन अपने पिता पर गर्व करता हूँ कि मामूली विचलन के बाद वे बिना किसी कठोरता के अपने हस्ताक्षर कार्ड पर कर दिया करते थे। यह मेरे लिए ही ग्लानि का विषय था कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता था। आज भी उनके हृदय को नापना मुझ जैसों के बस का नहीं, मुझे नहीं लगता कि इतना बड़ा इंची टेप कोई बना होगा।

सीक्रेट सुपर स्टार की इन्सिया का स्कूल से कूद-फाँदकर मुम्बई तक चले जाना, एक सपनीले पंछी की ऊँची उड़ान है। उड़ता हुआ हवाई जहाज देखकर हमें अपनी बगल से पंख खुलने का एहसास कराता है। यहाँ भी ऐसा ही है। आन्तरिक दृढ़ता और भीतर की सजगता, छोटे बच्चों को भी मजबूत बनाती है। यह अलग बात है कि घर से बाहर निकलकर इन्सिया का मार्ग उतना कंटकभरा, भयावह या निर्मम नहीं है लेकिन यदि ऐसा होता तो भी वह इन परिस्थितियों से भी पार पा सकती थी।

इन्सिया जैसी बेटियों के लिए यह फिल्म है, सीक्रेट सुपर स्टार। यह हमारे समय की फिल्म है। असुरों और पिशाचों की उम्र बहुत थोड़ी होती है। शक्ति ही उनके मर्दन का कारण बनती हैं। कठिन समय को सूझ और हौसले से ही जीता जा सकता है। यह फिल्म ऐसे बहुत से समानान्तर, सकारात्मक सन्देश देती है..........


सोमवार, 6 नवंबर 2017

सीक्रेट सुपर स्‍टार का शक्ति कुमार

आमिर खान होने का अर्थ



सीक्रेट सुपर स्टार पर लिखते हुए आमिर खान पर दो-तीन वाक्य ही लिख पाया था। दरअसल उन पर अलग से लिखने का मन था क्योंकि उनका चरित्र परदे पर और फिल्म के अविभावक के रूप में जिस तरह का सिद्ध है, वह और अधिक की अपेक्षा करता है। किसी भी नायक के लिए उस फिल्म में अपने होने या न होने अथवा कितना होने की स्वतंत्रता बहुत आसान होती है यदि वह उस फिल्म का निर्माता या नियन्ता भी हो। वह यदि उस फिल्म का दृश्य और चरित्र में हिस्सा बन रहा है तो अपनी जगह को पहले रेखांकित कर लेना चाहता है। आमिर इससे उलट हैं। वे अपनी फिल्मों के ऐसे अविभावक रहे हैं जो या तो फिल्म में है ही नहीं और यदि आवश्यकतानुसार है भी तो अपने होने की मात्रा स्वयं तय करके, अपना नियंत्रण भी स्वयं करते हुए। यह बात भी उनको औरों से विशिष्ट बनाती है। 

मैं यह बात इसलिए भी करना चाहता हूँ कि भोपाल के निकट ही एक गाँव में उनकी फिल्म पीपली लाइव बनी थी। उन्होंने उस फिल्म की निर्देशक को पूरी स्वतंत्रता प्रदान की थी। नाॅन स्टाॅप शूटिंग शेड्यूल में बिना कहे, बिना प्रचारे एक रात वे भोपाल एयरपोर्ट पर मुम्बई से आकर उतरे। उनके हाथ में एक किताब भर थी। एयरपोर्ट पर गाड़ी खड़ी थी जो उनको सीधे लोकेशन पर ले गयी। थोड़ी देर वे यूनिट के साथ रहे, प्रगति की जानकारी ली, कलाकारों से बात की, फिर अपने एक-दो साथियों के साथ उस गाँव में घूमने निकल गये। वे रात को कई घरों में गये, बैठे, बात की, बुजुर्गों से, बच्चों से, उनके माता-पिता से, उनका काम धंधा जाना, मुश्किलें कठिनाई जानीं। इस बीच वे अपने साथियों से धीमे धीमे कुछ कहते भी रहे। 

आधी रात वे लोकेशन पर फिर लौट आये और वेनिटी वेन में बैठकर किताब पढ़ने लगे। भोर हुई तो गाड़ी उनको लोकेशन से भोपाल एयरपोर्ट ले आयी और वे मुम्बई चले गये। दिलचस्प यह कि रात जिन घरों में गये, जो कुछ जरूरत की चीज उनको नहीं दिखी, वे चीजें अनेक घरों में उनके साथी अगले दिन रख आये। यह उसी रात का निर्देश था, उनका अपने साथियों को। इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है, न दिखावा न ही पाखण्ड।

आमिर खान ऐसे हैं। वे तारे जमीं पर में भी इण्टरवल में आने वाले निकुम्भ सर हैं। यह दर्शील की फिल्म थी, आमिर ने अपने को लो-प्रोफाइल रखते हुए दर्शील को भरपूर फैलाव दिया। सीक्रेट सुपर स्टार, तारे जमीं पर के ठीक बाद की फिल्म है भले वो अब बनी है मगर दोनों किसी अनमोल किताब के पहले और आखिरी पृष्ठ के आवरण हैं, मजबूत दफ्ती वाले। दर्शकों को, जो सिनेमा को थोड़ा सा भी व्यसन से मुक्त मानते हों, दोनों फिल्में एक के बाद एक देखनी चाहिए, पुनरावलोकन की तरह। सीक्रेट सुपर स्टार भी अविभावकत्व में समाहित मसीहाई कुटैव पर छींटे मारने वाली फिल्म है। बात शुरू इस फिल्म में आमिर खान के किरदार को लेकर हुई थी, शक्ति कुमार..........

ये शक्ति कुमार भी अपने हुनर और स्वभाव का वशीभूत है। उसका अपना एक्सीलेंस अहँकार के सिर चढ़कर बैठता है। उसका पारिवारिक जीवन ठीक नहीं है, दूसरा तलाक भी हो गया, प्रेस से बात करते हुए लगभग फुँफकारता सा शक्ति कुमार बात-बात पर सर्प की तरह साँस छोड़ता है, आप देखिए किस तरह किरदार गढ़ा गया है! आमिर को दृश्य में इस तरह उपस्थित होते हुए देखना अचरज से भरा है। इन्सिया की मदद करने के लिए अपनी तलाकशुदा बीवी की वकील से बात करने का ढंग, इन्सिया की वजह से नरम पड़ना, समझौता करना, वकील के आॅफिस जाना, आदत से मजबूर रसिक मिजाज शक्ति का टेलीफोन आॅपरेटर से ही फ्लर्ट करना, पानी को पूछे न जाने लायक अपमानजनक स्थिति में भी वह इन्सिया के साथ है। 

वह दृश्य बड़े अच्छे हैं जिसमें इन्सिया के साथ नींबू पानी पीते हुए वो बात कर रहा है या कि एयरपोर्ट से भीतर जाती इन्सिया का फिर दौड़कर वापस आना और शक्ति से लिपट जाना। एक बच्ची, सामाजिक रूप से सिद्ध असभ्य, दुष्ट और घमण्डी आदमी में अपने पिता से बेहतर मनुष्य देख पा रही है, यह सब चमत्कार आमिर खान आसानी से करते हैं। शक्ति कुमार जब अपने स्‍वभाव, अपनी पसन्‍द, नफरत के बारे में इन्सिया से कार में बात करता है तब यह नहीं लगता कि एक उम्रदराज और अनुभवी आदमी उस मासूम बच्‍ची से अपने गुरूर का बखान कर रहा है बल्कि यह लगता है कि संवेदना के धरातल पर दो समान समझ वाले आपस में बात कर रहे हैं, पिता और बेटी की उम्र के। परदे पर उनका ऐंठा हुआ चेहरा, अजीब से बाल, पहनावा, मेकअप, आभूषण और सनक देखकर बहुत हँसी आती है। पिछली फिल्म तलाश और दंगल का यह महानायक क्या बनकर आ गया है...........आश्चर्य है!

सीक्रेट सुपरस्टार तो वे भी कहलाये, आमिर खान क्योंकि फिल्म के मूल में होकर भी वे दृश्य में, केन्द्र में नहीं होते। दृश्य और केन्द्र में होती हैं परिस्थितियाँ अपने यथार्थ के साथ जिससे जूझकर, लड़कर, तमाम जोखिम उठाकर ही इन्सिया सीक्रेट सुपर स्टार बन पाती है............


शनिवार, 4 नवंबर 2017

अपनी आँच, अपने ताप में दिखायी देती ऊष्‍मा

Film Review/ Secret Superstar


सीक्रेट सुपर स्टार...............



कई बार लगता है कि हमारे जीवन में ऊष्मा कितनी जरूरी है, ऊष्मा न होगी तो संवेदनहीन जड़ता की बर्फ कैसे पिघलेगी? गनीमत है कि ऊष्मा कभी-कभी अपनी आँच, अपने ताप में दिखायी देती है, महसूस होती है। जब जब ऐसा होता है, बर्फ पिघलती प्रतीत होती है.............

अच्छा ही है, बहुत जल्दी में नहीं था, रहता भी नहीं, सीक्रेट सुपर स्टार देखने का समय और अवसर जुटा पाया तो अपनी धारणा का विश्वास जगा और उसे फिर से दोहराकर लिखने की कोशिश की। मेरे सामने एक फिल्म जैसे किसी उपेक्षित संसार का हिस्सा घटित हो रहा है। वह हिस्सा जो आमतौर पर हमारी भटकी हुई आँखों को दीखता ही नहीं है। हमारा दिन, हमारा जीवन और बहुत सारा समय जिस तरह से अपनी चिन्ताओं में, अपने द्वन्द्व में, अपने स्वार्थ में घटित होता है, कैसे और कब इन्सिया जैसे बच्चों, नजमा जैसी स्त्रियों को अपनी संवेदनाओं के फ्रेम में हम देख पायेंगे, पता नहीं.......

सीक्रेट सुपर स्टार, एक ऐसी बच्ची की फिल्म है जो सहमी हुई नहीं है लेकिन मर्यादा में है, उसके स्वप्न बहुत मौलिक और ताजा हैं मगर भय और संकीर्णताओं के कांटेदार तार, नोक उठाये तलुओं को छेद देना चाहते हैं। छोटी सी बच्ची को माँ के साथ हुए सलूक का पता है, उसकी रक्ताभ और सूजी आँख के पीछे की हिंसा का पता है। पिता अपने हठ और अपने दुराग्रहों को दोहराना नहीं चाहता, उसके बदले में हिंसा उसके लिए ज्यादा आसान है। इन्सिया के सपनों का जहाज सचमुच का जहाज नहीं बल्कि कागज का बना वो हल्का सा, बड़ी हद तक चतुर सा वो जहाज है जो बड़ौदा के एक साधारण मध्यमवर्गीय घर से हर विरोधी हवा को धता बताता हुआ, काँख के नीचे से कब उड़कर मुम्बई पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता।

इन्सिया की कहानी एक रेल में छात्राओं के उस समूह से फोकस होकर शुरू होती है जो पिकनिक से लौट रहे हैं। उसी की उम्र का लड़का चिन्तन, इन्सिया के सपनों को कोमल पंखे से झलता है। इस लड़के तीर्थ शर्मा ने पूरी फिल्म में बड़े अनुशासन के साथ काम किया है। जायरा वसीम की यह फिल्म है, वह यदि इन्सिया को उसी आत्मा में इस तरह उतर कर न जीती तो बात न बनती। दंगल से उसे आमिर खान के साथ काम करने का मतलब पता है लिहाजा यह दूसरा तजुर्बा उनके लिए लैण्डमार्क है। मेहर विज, माँ की भूमिका में अपने किरदार से समरस हैं। मैं गुड्डू कबीर साजिद शेख की प्रतिभा का कायल हुआ हूँ। क्या खूब बच्चा है, बहन के साथ, माँ के साथ, भयभीत, माँ को मार खाता देखकर, बहन का लेपटाॅप सुधारता हुआ ओह। पीपली लाइव की बड़ी आपा यहाँ भी हैं। मोना अम्बेगाँवकर एक दृश्य में शक्ति कुमार बने आमिर खान से खूब मोर्चा लेती हैं। मेरे मित्र राज अर्जुन, इन्सिया के पिता फारुख मलिक, सीमित दायरे में सोचने वाले, अपनी ही कुण्ठाओं और संकीर्णताओं में फँसे आततायी और हिंसक पिता के रूप में दर्शकों से जितनी नफरत पाते हैं, उनके लिए वह उतनी ही तारीफ है। अपने किरदार को प्रत्येक दृश्य में वे बिना जरा सा भी विचलित हुए जीते हैं।

आमिर खान के लिए क्या लिखूँ। मुझे लगता है कि उनकी प्रतिबद्धता, काम के प्रति उनकी असाधारण गम्भीरता और एक उत्कृष्ट से अगले उत्कृष्ट तक लांघ-फलांग उनके किसी समकालीन के बस की नहीं है और शक्ति कुमार के रूप में एक अलग सा मूडी, गुणी, अख्खड़ और वक्त पड़ने पर उस संवेदना से चिन्हित होना जिसकी इन्सिया जैसे बच्चों को जरूरत है, यह गहराई उनके जैसे कलाकार ही अपने भीतर से निकालकर प्रकट कर सकते हैं। शक्ति कुमार के किरदार में वे एक फड़कते हुए, चुहलबाज, दिलफेंक और फ्लर्टी आदमी के रूप में जो प्रभाव देते हैं, इन्सिया के साथ दृश्यों में उनकी अलग ही पहचान होती है। वह दृश्य दिलचस्प है जब वे अपनी पत्नी की वकील से इन्सिया के लिए मदद मांगते हैं जिससे वे बेहद चिढ़ते हैं क्योंकि उसी वकील शीना सबावाला ने उनका तलाक करवाया है..........


अद्वैत चन्दन, निर्देशक वाकई यह आपकी फिल्म है। आप फिल्म के एक-एक फ्रेम में अपनी दृष्टि और क्षमताओं के साथ उपस्थित हैं। इतनी बड़ी समीक्षा पढ़ने की फुरसत किसी को नहीं वरना मेरा मन एक-एक डीटेल्स में जाने को करता है, कैसे आप एक निम्न मध्यमवर्गीय घर के कमरे को बनाते हैं, कैसे उसका एक-एक सामान, छू जाने वाली सेट डिजाइनिंग, सिलाई मशीन, घर के लोगों का पहनावा, भोजन, थाली, सिंकती हुई रोटियाँ, संवेदनाओं के दृश्य, नन्हें भाई का बहन के लिए प्रेम, परिवार में बेटे को अधिक महत्व दिये जाने वाले दृश्य और संवाद ओह विचलित करके रख देते हैं आप।

सीक्रेट सुपर स्टार को देखते हुए मेरी तरह और भी कई दर्शक अपने आँसू और नाक पोंछते प्रतीत होते हैं। कोई सिनेमा यदि इस तीव्रता में, इस कोमलता में, इस संवेदना में हृदय को भेद दे तो वह सच्चा सिनेमा कहलाता है, अन्यथा फूहड़ता, घटियापन और भदेस पर दाँत निकालकर ताली बजाने वाले सड़कछाप से लेकर एलीट दर्शकों तक इतने लोग हमारे आसपास हैं कि ऐसी फिल्में बाॅक्स आॅफिस पर अपनी झोली, बिना डकार लिए भरती ही जा रही हैं............