गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

।। द स्काय इज पिंक ।।


फिल्म जो मन को छूकर मन में बैठ जाती है


द स्काय इज पिंक देखकर आया हूँ। कभी-कभी किसी फिल्म को देखने का निर्णय अपने लिए बहुत भारी पड़ जाता है। दरअसल इतने वर्षों में बहुत साधारण फिल्में देखते हुए ऐसी फिल्मों की स्मृति मन से लगभग जाती रही जो दिमाग में द्वंद्व पैदा करती थीं। बरसों हो जाते हैं ऐसी फिल्म देखे हुए। इस फिल्म के बारे में चूँकि जान लिया था तो मन में था कि इसे देखना ही है। खासकर तब और देखना है जब सिनेमाघरों में यह दो-एक शो में ही लगी हो शेष जगह दोयम दर्जे की फिल्मों का कब्जा हो।

अब हमारा दिमाग उन सबसे हट गया है जब हम सिनेमाघर में जाकर बैठ गये हैं। इस समय निरर्थक क्रांति करने वाले नारे कौंध नहीं रहे हैं कि शुरूआत में ही इस बात पर चौंकते हैं जब अदिति अपने पति निरेन को अपने फिर से गर्भवती होने की बात बतलाती है। तब करीब-करीब युद्ध में बदलती बहस है। बच्चा चाहिए या नहीं। यह भी डर है कि पहली बेटी की तरह ही जानलेवा बीमारी का शिकार होकर जन्मी तब। पिता गर्भपात कराना चाहता है और मॉं नहीं। अन्तत: सन्तान बेटी के रूप में जन्म लेती है। स्वाभाविक रूप से फिल्म में यह घटना और उसी लड़की का नैरेशन कुछ एक साथ चलते हैं। लड़की जो अठारह साल की उम्र तक आते-आते इस दुनिया से चली गयी लेकिन पल्मोनरी फिबरोसिस नाम की जन्मजात बीमारी के साथ इसका जन्मते ही संघर्ष और परिवार में उसको लेकर वातावरण इस फिल्म में इतने सूक्ष्मत विवेचन के साथ दिखाया गया है जिसको देखते हुए एक पल भी ऊब का एहसास नहीं होता।

चार लोगों के परिवार में माता-पिता, भाई-बहन हैं। सबसे पहली भी बेटी थी जो इसी बीमारी के कारण छोटी उम्र में ही चल बसी थी। आने वाली सन्तान को लेकर यही बहस है कि कितने दिन जियेगी, कैसे जियेगी और जब थोड़ा जियेगी तो इसे दुनिया में लाया ही क्यों जाये। चित्रकार और लेखिका बनकर अपने जीवन को साहसिक ढंग से जीने वाली यह लड़की आयशा अपने इन लड़ते-झगड़ते और कई बार मारपीट करते माता-पिता का आभार कहती है कि उन्होंने इसे दुनिया में आने दिया। न केवल आने दिया बल्कि उससे ज्यादा वे दोनों भी उसकी बीमारी के साथ लड़ते रहे, टूटते रहे, फिर जुड़ते रहे।

कहानी क्या है, एक मर्मस्पर्शी आत्मकथ्य है लेकिन वह एक बहुत बहादुर लड़की का है जो हर स्थितियों में हारा नहीं करती, लड़ा करती है। वह अपने माता-पिता को अपने ऊपर जान छिड़कते देखा करती है, वह यह जानती है कि जीना बहुत कठिन है लेकिन वह उनके हौसले से पहले टूटती नहीं। उसका विनोदप्रिय होना, जैसे बात-बात पर वह नैरेट करते हुए अपने मम्मी -पापा की सेक्स लाइफ की जीवन्तता की बात भी करती है, दर्शक इस गम्भीर फिल्मे को देखते हुए हँसने लगता है। एक जगह शुरू में वह कहती है कि मेरे मम्मी -पापा के पास हनीमून के लिए नेपाल जाने के पैसे नहीं थे लेकिन मैं पैदा क्या हुई, लन्दन की सैर करा दी।

बेटी की चिकित्सा के लिए हर जतन करने वाले, कोई कमी न छोड़ने वाले, पैसों के अभाव के बावजूद डगमगाते हौसलों के बीच खड़े रहने वाले पिता फरहान अख्तर जब डबडबायी ऑंखों से लन्दन के रेडियो में उसकी बीमारी की बात कहते हुए पैसों के सहयोग की अपील करता है या प्रियंका चोपड़ा मॉं का बेटी के लिए हर एक सेकण्ड लगभग जाग्रत रहना, उसके ऑक्सीजन के सिलेण्डर की अतिरिक्त व्यवस्था करके रखना, आखिरी समय में एक-एक पल कम पड़ते और हारते हुए विक्षिप्त होकर पति पर ही हमला कर देना और मानसिक अस्पताल जाना ये सब ऐसे दृश्य प्रसंग हैं जो आपको एक मर्मस्पर्शी सिनेमा की शक्ति और सम्प्रेषणीयता का एहसास कराते हैं। उस वक्त बेटी का अपने पिता का ख्याल रखना और अपनी मॉं से वादा करना कि आपके लौटकर आने तक मैं टपकूँगी नहीं सजल कर देता है।

जायरा वसीम ने फिल्म में बेटी का किरदार निभाया है। देखते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि हमारे सामने कलाकार है। जिस तरह से वह आयशा चौधरी की पूरी की पूरी आत्मा को आत्मसात करती है वो उनके लिए सलाम करने का मन देता है। आखिरी आखिरी की पेण्टिंग, कविताऍं, नैरेशन सब कुछ और मॉं की जी-तोड़ कोशिश की बेटी की ऑंख बन्द होने से पहले उसकी किताब की एक प्रति छपकर आ जाये। ओह........बड़ा मुश्किल होता है सब कुछ सहना। इस फिल्म में एक भाई भी है और एक कुत्ता भी। सब के सब पता नहीं कैसे घुट्टी पिये अपना शॉट दे रहे होते हैं। आरम्भ के दृश्य में ही जहॉं से पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) शुरू होती है, पहले आयशा के पलंग पर कुत्ते का मायूस सा सोया होना हृदयविदारक रिक्तता का एहसास कराता है।

यह फिल्म गुलजार साहब की दिल पर पेन से लिखी जाती कविता की भावुक सिहरन के लिए भी याद रह जाती है। शोनाली बोस और निलेश मणियार ने इस सच घटना को सिनेमा में जस का तस गढ़ दिया है बिना उसकी आत्मा को छेड़े या मारे जिसका खतरा हिन्दी सिनेमा में बहुत होता है और मानस मित्तल ने फिल्म बहुत सलीके से फिल्म एडिट की है। यह फिल्म कई दिनों तक दिमाग में बनी रहेगी। आमतौर पर सिनेमा के प्रति निरी सतही विचारधारा के अभ्यस्त दर्शकों में से गम्भीर दर्शक यदि इसे चुनते हैं देखने के लिए तो उपलब्धि ही महसूस करेंगे।
#theskyispink Shonali Bose

रविवार, 20 अक्टूबर 2019

वार : बचाने के लिए वार


हिृतिक रोशन को इससे भी बेहतर कहानी दी जानी चाहिए

 


अपने बड़े भाई बी आर चोपड़ा के साथ काम करते हुए यश चोपड़ा ने स्वयं अपनी निर्माण संस्था बनायी और निर्देशन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण फिल्मों के साथ नाम और दाम दोनों कमाया। बाद में यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे एक सुपरहिट बनाकर लगभग रिटायरमेंट जैसी जिन्दगी ही अपना ली। उन्होंने दूसरे निर्देशकों को अपने बैनर पर मौका दिया। अपवाद स्वरूप रब ने बना दी जोड़ी या एक दो और कुछ बनाया होगा तो याद नहीं है। बहरहाल अपने पास उपलब्ध बजट से वे यशराज को बनाये हुए हैं लेकिन उनके कार्यकाल में दीवार, त्रिशूल, कभी-कभी, चांदनी, लम्हें या सिलसिला जैसे नाम नहीं हैं। नेपथ्य से वे युक्तिपूर्वक अर्जन में जीवन बिता रहे हैं। बहरहाल, उनकी निर्माण संस्था की नयी फिल्म वार देखने का अवसर जुटा पाया था तो लगा कि कुछ बातें लिख दूँ। मित्रों में फिल्म समीक्षा को लेकर जो जिज्ञासा या कौतुहल रहता है, उसका किसी हद तक अपनी समझ और प्रयासों से समाधान करने का प्रयत्न भी इसी बहाने है।

वार फिल्म को सिद्धार्थ आनंद ने निर्देशित किया है। इस साधारण सी कहानी को लिखने में उनके अलावा फिल्म के निर्माता आदित्य भी लगे तब जाकर यह भटकी सी कहानी फिल्म के लिए बन पायी। इसके संवाद उन्होंने अब्बास टायरवाला से लिखवाये हैं। देश को बाहरी मुल्कों से खतरा, आपसी शत्रुता, छल-षडयंत्र ये हमारे सिनेमा के बहुत आम विषय रहे हैं। बहुत कम फिल्मकार ऐसे विषय लेकर जिम्मेदारी या समझबूझ से कोई फिल्म बना पाते हैं। सिद्धार्थ आनंद ने जान-जोखिम में डालने वाले देश के सुरक्षा एजेण्टों की ओर से यह कहानी प्रस्तुत की है। हितिक रोशन और टाइगर श्रॉफ के तेवर प्रदर्शन और प्रचार के साथ यह फिल्म शुरू होती है। दोनों नायक एक-एक करके जिस तरह से परदे पर आते हैं लगभग प्राकट्य भाव है। मुश्किल यह है कि हॉल में ताली नहीं बजती।

सारा झगड़ा आतंकी को पकड़ने का है। उसको मदद करने वाले, रुपयों और पैसों के लालच में आकर अपना ईमान बेचने वालों की एक पूरी श्रृंखला को बेनकाब करना है। कहानी आरम्भ में नायक को रहस्यमयी ढंग से नकारात्मक दर्शाती है। नायक का अधीनस्थ जो है उसी को इसका पता लगाने को कहा जाता है कि कैसे बहादुर हीरो की बन्दूक अपने ही लोगों पर तन गयी है। एक घण्टे सब कुछ बढ़िया चल रहा है, माल्टा, पुर्तगाल, ईराक और वहाँ के विभिन्न स्थानों, पहाड़, तराई, घाटी के हवाई फिल्मांकन, खासकर एक्शन दृश्य, मारधाड़, आधुनिक विमान, मोटर सायकिलों पर पीछा करने के जोखिम भरे दृश्य दर्शक को जगाये रखते हैं।

मध्यान्तर के बाद बिना सोचे समझे बाहृय संरचना करके फिर भीतर कुछ ईंट और कुछ रोड़े लगाने में निर्देशक की ऊर्जा नष्ट होती चली गयी है। नायकों को स्थापित करने, उनका अतिशय महिमा मण्डन करने में लगभग सिद्धहस्त हो चले युवा निर्देशक सबसे ज्यादा छल नायिकाओं के साथ करते हैं। बरसों से अच्छे अवसर की यशराज में प्रतीक्षा करती वाणी कपूर को इस फिल्म में भी कुछ मिनट का, अथाह देहप्रदर्शन का किरदार देकर छुट्टी पायी है। शेष सहायक भूमिका निभाने वाले आशुतोष राणा जैसे कलाकार बहुत बंधे हुए लगते हैं जैसे सचेत कर दिया हो कि बस इतना ही इससे ज्यादा नहीं जाना। दो-तीन गाना, नाचना भी है। लेकिन प्रचारित यह हो रहा है कि बॉक्स ऑफिस पर रुपयों की बरसात हो रही है और वार ने सभी आसपास की फिल्मों के साथ वार करके विजयश्री हासिल कर ली है।

कुल मिलाकर ऐसा है नहीं। प्रथम दृष्टया पूरी कहानी की आत्मा ही कल्पनाहीनता और तर्क के विपरीत है। ऐसा लगा है कि बहुत सी लीपापोती शूट करते चलने के बाद पूर्वदीप्ति (फ्लैश बैक) में करके अपनी बात के पक्ष में भर लिया गया है। विशेष रूप से वह दृश्य बहुत फालतू लगा है जिसमें टाइगर के छुटपन के किरदार को स्कूल में बच्चे बुरी तरह मारते हैं जिससे वह बाँयी ओर से आँखों से देखने की क्षमता खो बैठता है। एक दृश्य को व्यर्थ न बताने के लिए यह गुणाभाग। ऐसे ही हितिक का नायिका को दिया वचन और फिर उसके एक वाक्य से जुड़कर उसकी बच्ची का ध्यान रखने वाली चेष्टाएँ। यह इसलिए कि वह जिस आश्वस्ति के साथ नायिका को उसकी रक्षा का वचन देता है, उसी में विफल हो जाता है।

इन सबके बावजूद अपनी भूमिका के साथ हितिक बहुत अच्छे उपस्थित हैं। उनकी पूरी शख्सियत फिल्म को एक तरह का रक्षाकवच ही है। टाइगर श्रॉफ इसलिए इसमें ठीकठाक नजर आते हैं क्योंकि उनका कन्ट्रास्ट नायक के साथ है। इतने के बाद सिनेमेटोग्राफी (बेंजामिन जेस्पियर), एक्शन डायरेक्टरों का कमाल और लगभग दो तिहाई हिस्से का कसा हुआ सम्पादन (आरिफ शेख) इस फिल्म को देखने-सहने योग्य बनाता है।

हालाँकि यह फिल्म एक था टाइगर या टाइगर जिन्दा है परम्परा की ही आगे की कड़ी है। चेहरा बदलने वाली चिकित्सक और उसके अस्पताल की, मुँह का त्वचीय उपचार करती मशीने बहुत हास्यास्पद लगती हैं। असली टाइगर श्रॉफ आरम्भ में मर चुका है, एक खुफिया अधिकारी का चेहरा उस जैसा कर दिया गया है जो शत्रुओं के साथ है। नकारात्मकता और सहानुभूति के बीच यह किरदार और टाइगर दोनों ही अपना श्रेय इसीलिए नहीं पा सके हैं। विदेश आम भारतीय के सपनों का स्वर्ग होता है, मेरे लिए भी है और हम जैसे लोगों के लिए ढाई घण्टे में तीन-चार देश घूम आना बुरा नहीं है लेकिन फिल्म बहुत अच्छी बन जाती यदि कहानी ढंग की होती, उसका निर्वाह कायदे से किया जाता।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

हिन्दी सिनेमा में बरसात


बिजुरी की तलवार नहीं बून्दों के बान चलाओ

 


हिन्दी सिनेमा की एक लम्बी परिपाटी समसामयिक परिस्थितियों, आवश्यकताओं, अभावों और संघर्ष के विषयों का अहम बिन्दु रही है। समय-समय पर ऐसी अनेक फिल्में बनी हैं जिनमें मानवीय जीवन के सुखदुख, रिश्ते नाते, खुशियाँ, तकलीफें, रीति-रिवाजों की व्याख्याएँ दर्शकों के मन मस्तिष्क में अपनी ऐसी जगह बना गयी हैं कि आज भी उनकी छाप स्मृतियों में है। गर्मी का मौसम है, बरसात की आमद होने को है। हिन्दी फिल्मों में गर्मी का मौसम, पानी की कठिनाई और बरसात के आव्हान को लेकर कितनी ही बातें कही गयी हैं। न जाने कितने गीत हम गुनगुनाते हैं, कितनी ही फिल्मों के यादगार प्रसंगों को याद करते हैं। आज के सिनेमा में समय सापेक्षता के कितने तत्व मौजूद हैं, ये तो जमाना जानता है मगर हमें पहले का सिनेमा जरूर अपनी कई खूबियों और विशिष्टताओं के साथ-साथ दर्शकों से अपने अनूठे रिश्ते बना लेने के कारण अक्सर याद आता है। इस लेख के माध्यम से ऐसी ही कुछ फिल्मों की चर्चा की जा रही है जिसमें जल के साथ इन्सानी जद्दोजहद को बखूबी पेश किया गया है।

1953 में प्रख्यात फिल्मकार स्वर्गीय बिमल राय ने एक अविस्मरणीय फिल्म बनायी थी, ‘दो बीघा ज़मीन’। ‘धरती कहे पुकार के, गीत गा ले प्यार के, मौसम बीता जाए, मौसम बीता जाए’, मन्नाडे का गाया यह गीत आज भी सुनो तो फिल्म के सशक्त कथ्य और उसमें अन्तर्निहित यथार्थ की तस्वीर आँखों के सामने उभर आती है। ग्रामीण परिवेश में प्रकृति और पूंजीपति से संघर्ष करता किसान कितना विवश और असहाय है, यह फिल्म में देखा जा सकता है। सूखे और अवर्षा की स्थिति में जब पूरे गाँव के लोग पानी का आव्हान करते हुए ‘हरियाला सावन ढोल बजाता आया’ गाते हैं तो एक-एक आदमी और औरत के चेहरे पर आसमान से बरसने वाले पानी के लिए स्वागतातुर ललक उम्मीदों से भरी नज़र आती है। गाना खत्म होते होते जब पानी बरसता है तो लोग जमकर नहाते हैं। 

1956 में राजकपूर की फिल्म ‘जागते रहो’ में पानी के लिए प्यासा नायक जब एक घर में जा घुसता है तो उसे अपने जगत के बेनकाब होते चेहरे दिखायी पड़ते हैं। उसकी प्यास तब और चरम पर जा पहुँचती है जब वो उन चेहरों पर मानवीयता को नेस्तनाबूत कर दिए जाने के षडयत्रों को अट्टहास करते हुए देखता है। उसका गला खुष्क हो जाता है। उसके सामने आम आदमी के विरोध में जैसे एक पूरी दुनिया ही खड़ी दिखायी देती है। वह चोर साबित होता है। बेतहाशा भागकर जब पस्त हो जाता है तो फिल्म के अन्त में उसके चुल्लू में नरगिस पानी डालती है और वह व्याकुल आत्मा के साथ पानी पीकर तृप्त होने की कोशिश करता है। यह अन्त एक तरह का आशावाद ही माना जायेगा जिसका इन्तज़ार आज तक उस नायक जैसे इन्सान कर रहे हैं। 1965 में आयी विजय आनन्द की फिल्म ‘गाइड’ की एक अलग ही फिलॉसफी थी। उसके मूल में प्रेम था, जिसको सशक्त कथ्य और चरित्र के भीतर के अन्तर्द्वन्द्वों के बावजूद नैतिक ठहराने की एक बड़ी और आत्मविचलन से भरपूर जद्दोजहद दिखायी पड़ती थी। फिल्म का नायक अन्त में जब एक गाँव में जाकर लोगों की श्रद्धा का पात्र बन जाता है तब उसकी अपनी एक कठिन परीक्षा जो कि परिस्थितिजन्य होती है मगर उसकी ज़िन्दगी की कीमत पर उसे नायकत्व के शिखर पर स्थापित करती है। पानी को तरसते सूखे गाँव के लिए नायक का अन्न जल त्याग देना आखिर उस चरम को स्पर्श करता है जिसमें पानी का बरसना और नायक का मर जाना एक ही चरम बिन्दू पर घटित होता है। पानी के आव्हान से आत्मपरीक्षा का यह तारतम्य आज भी दर्शक भुला नहीं पाये हैं। 

पानी को लेकर संघर्ष की स्थितियों को अक्सर राजस्थान की पृष्ठभूमि और परिवेश में बनी फिल्मों में अक्सर व्यक्त किया गया है। रेत और रेगिस्तान में जहाँ दूर-दूर तक पानी का नामोनिशान न हो वहाँ लोग क्या करेंगे? सिनेमा को मानवीय संघर्ष और सरोकारों के सशक्त माध्यम के रूप में बरतने वाले प्रख्यात फिल्मकार ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने 1971 में फिल्म ‘दो बून्द पानी’ में पानी और सपनों के यथार्थ को इन्सानी ज़िन्दगी और संवेदना के परिप्रेक्ष्य बहुत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया था। ‘पीतल की मेरी गागरी, दिल्ली से मैंने मोल मंगायी रे। पाँवों में घुंघरू बांध के, अब पनिया भरन हम जाईं रे’ गीत की मधुर भावना और संगीत आज भी उतना ही प्रभावशाली है जितना उस वक्त था। कैफी आज़मी के लिखे इस गीत को जयदेव ने संगीत से सजाया था। राजस्थान गंगा सागर परियोजना इस फिल्म के मूल में थी जिसमें एक संवेदनशील कहानी को अब्बास ने सृजित किया था।

1981 में तमिल के प्रख्यात निर्देशक के. बालाचन्दर की फिल्म ‘थन्नीर थन्नीर’ में पानी की समस्या को राजनीति में इस्तेमाल करने और शोषण का प्रभावी चित्रण किया गया था। तमिलनाडु के एक गाँव अतिपत्तु में भयावह जलसंकट है। पानी को लेकर तरसते गाँव को जीवनयापन के लिए पानी चाहिए मगर दो प्रभावशाली राजनैतिक दलों में यह राजनीति प्रबल होती है कि पानी गाँव में आये या नहीं? बीस मील दूर से इस गाँव को पानी उपलब्ध कराने के नाम पर स्थानीय राजनीति अपने ढंग से जनता को भरमाती है। राजनेता, उनके अनुयायी और पुलिस सब मिलकर इस अत्यन्त सम्वेदनशील मुद्दे को राजनीति का हथियार बनाकर भोले-भाले ग्रामीणों की भावना, उम्मीदों और ज़िन्दगी से खिलवाड़ करते हैं। कालान्तर में यह एक ऐसे संघर्ष में तब्दील होता है जो अनियंत्रित और अराजक हो जाता है। परिणामस्वरूप झगड़ा होता है, जानें जाती हैं। 

1985 में जे. पी. दत्ता ने ‘गुलामी’ फिल्म का निर्माण किया था। ज़मींदारी-साहूकार शोषण, वर्ग भेद, ऊँच नीच का यथार्थ इस फिल्म के मूल में था। इस फिल्म में भी गाँव के स्कूल में ठाकुरों के बच्चों के पीने का पानी अलग रखा है और बाकी का पानी अलग रखा है। फिल्म का नायक मास्टर जी से सवाल भी करता है मगर मास्टर जी के पास जवाब नहीं है। गाँव के कुँए से मृत पशु के निकलने से पानी ज़हरीला हो जाता है तब नायक धर्मेन्द्र जमींदार के महल से पानी लेने के लिए गाँव वालों की अगुवाई करते हैं। इस पर भारी खून-खराबा होता है। इस फिल्म में भेदभाव और शोषण के बीच पानी की ज़रूरत, उसका मयस्सर होना कठिन होना और इन्सानी ज़िन्दगी के मोल को आँकने की प्रवृत्ति को सशक्त रूप में उभारा गया है। यह फिल्म बेहद प्रभावशाली है जिसके तीन प्रमुख नायक अन्त में एक-एक करके मरते हैं मगर वे यथासम्भव एक ऐसा मार्ग प्रशस्त कर जाते हैं जिसमें शायद ऐसी व्यवस्था कायम हो जिसमें गरीब और छोटी जाति के लोगों को किसी भी कुँए, पोखर, तालाब, नदी या बावड़ी से पानी पीने-लेने के एवज में जान न देना पड़े।

1990 में आयी सईं परांजपे की फिल्म ‘दिशा’ एक अलग तरह की महत्वपूर्ण फिल्म है जिसमें रोज़ी रोटी की आस में घर परिवार गाँव में छोड़कर महानगर की भूलभुलैया में खो गये दो किरदारों की कहानी है। एक आखिर में शहर से गाँव लौटता है और गाँव में ही रहने का निर्णय लेता है और दूसरा इसलिए गाँव नहीं लौट पाता क्योंकि उसके शहर रहते, गाँव में उसके अपने लोग पराए हो गये, जिसमें उसकी पत्नी भी शामिल है जिसका गाँव के एक बीड़ी ठेकेदार से सम्बन्ध हो गया है। इस नायक का पिता यह बात जानता है मगर बीड़ी ठेकेदार ने उसे ऐसे ठाठ उपलब्ध कराए हैं कि वो भी सब कुछ नज़रअन्दाज़ कर आँख मूंदकर दूसरी तरफ करवट लेकर सो रहा है। इस फिल्म में एक दिलचस्प कैरेक्टर ओमपुरी का है जो शहर कमाने गये रघुवीर यादव का बड़ा भाई है। उसकी एक ही धुन है, वह गाँव में कुँआ खोदने में अकेला जुटा हुआ है। सब लोग उसे पागल सा समझते हैं मगर चौबीसों घण्टे वो अकेला ही गड्ढे को इस आस में गहरा किए जा रहा है कि उसमें से एक दिन पानी निकलेगा और पूरे गाँव की समस्या हल हो जाएगी। सईं परांजपे क्लाइमेक्स में इस किरदार को सफल होते दिखाती हैं। कुँए से स्रोत फूट पड़ता है। ओमपुरी का छोटा भाई बना रघुवीर यादव इसी खबर के बाद लौटने का निर्णय लेता है। कुल मिलाकर यह फिल्म एक आदमी के साहस और हौसले के साथ साथ अपनी जड़ों से विस्थापित होते इन्सान की विडम्बनाओं को भी प्रकट करती है। 

आशुतोष गोवारीकर की फिल्म ‘लगान’ की पृष्ठभूमि में ग्रामीण परिवेश है। गाँव के लोगों को अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बरसात नहीं हो रही है। खेत का क्या होगा, फसल होगी कि नहीं, यही चिन्ताएँ भोले ग्रामीणों को एक जगह पर ले आती हैं। सब के सब आसमान की ओर निहारते हैं और अनन्त से अनन्त तक विस्तीर्ण नीली छतरी की मनुहार में ये मधुर गीत गा उठते हैं, घनन घनन घन घिर आए बदरा काले मेघा काले मेघा पानी तो बरसाओ बिजली की तलवार नहीं बून्दों के बान चलाओ। यह खूबसूरत गीत जावेद अख़्तर ने लिखा है जिसे ए. आर. रहमान ने संगीतबद्ध किया है। बड़ा खूबसूरत दृश्य उपस्थित होता है जब काले मेघा सचमुच बून्दों के बान चला देते हैं और ग्रामीणों के चेहरे पर पानी की बून्दें, आँखों के आँसुओं के साथ मिलकर खुशी की एक अलग ही परिभाषा रचती हैं। 

हिन्दी सिनेमा में न जाने कितनी ही फिल्मों में पनघट, नदी, तालाब, पोखर और जलस्रोत के आसपास खूबसूरत दृश्य से लेकर हृदयविदारक हादसे भी रचे गये हैं। नायक-नायिका, सखियाँ, गगरी, मटकी, गीत से लेकर छेड़छाड़ तक पनघटों में एक अलग ही प्रभाव रचती है। अल्ला मेघ दे पानी दे पानी दे गुड़धानी दे, रामा मेघ दे, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे, हरियाला सावन ढोल बजाता आया, उमड़ घुमड़कर छायी रे घटा का अपना अलग रंग और प्रभाव रहा है। हमारे जीवन में पानी का बहुत बड़ा मोल है। पानी हमारे लिए जीवन का विकल्प है। पानी से रिश्ते बनते भी हैं और बिगड़ते भी हैं। दिनों दिन नष्ट होते पर्यावरण और प्रकृति के सन्तुलन ने हमारी ज़रूरतों में से सबसे अहम पानी का जिस तरह संकट खड़ा किया है, वो अत्यन्त भयावह है। सईं परांजपे की फिल्म ‘दिशा’ का किरदार अकेला कुँआ खोदकर एक दिन पानी निकाल देने का अपना जुनून पूरा करता है मगर समाज में इसकी कोई सार्थक प्रेरणा कहाँ सम्प्रेषित हो पाती है? यथार्थ में तो हम कुँए पूरने का काम कर रहे हैं और धीरे-धीरे सारे जलस्रोतों को समाप्त करने में, अस्तित्वहीन करने में जाने-अनजाने अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। 



 
     

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

खैयाम

इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार



मीडिया में एक संजीदगी भरा ट्रिब्यूट देखने को नहीं मिला, ऐसी सूझ और कंजूसी एक महान संगीतज्ञ के अवसान पर नजर आयी। एक फनकार है, एक सदी बराबर जिसका सुयश है। जिसकी वजह से बहुत सारी कागज पर ठहरकर रह जाने वाली रचनाएँ बोल उठी हैं। कितने ही दूसरे गुणी फनकारों के ओठों पर उनके बनाये गीत खिले हैं। कितनों को अपने होने और जीने का मकसद मिला है। कितनों ने अपनी बात इनके संगीत से सजाये गीतों के माध्यम से अपनी सही जगह तक पहुँचायी है, ऐसे खैयाम लम्बे समय बिस्तर पर रहे। बरसों से अपने जवान बेटे की असमय मौत से टूटे और बिखरे मियाँ-बीवी, सुनते हैं कि जगजीत कौर की तबीयत भी बहुत खराब है। और हमारे सामने देखते ही देखते देर रात खैयाम साहब के नहीं रहने की खबर आ जाती है। यह खबर जैसे उनके बनाये हुए तमाम गीतों को भी शोक-धुन में बदल देती है। कल और आयेंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले...............लगता है सचमुच क्षणभंगुरता का जीवन है। सबकी अपने समय पर तैयारी पूरी है। धर्मेन्द्र की फिल्म आरम्भिक फिल्म शोला और शबनम में कैफी आजमी के लिखे दो गीत, जीत ही लेंगे बाजी हम तुम और जाने क्या ढूँढ़ती हैं ये आँखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है.......सुनना कथानक की स्थितियों और अनुरक्ति के द्वंद्व को महसूस करना है।

खैयाम साहब ने बहुत चुनकर फिल्में कीं। उनसे एक आकर्षण कभी-कभी से बनता है, कल और आयेंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, साहिर अपने बारे में जैसे बड़े एक्सीलेंस के बावजूद कह जाते हैं, मुझसे बेहतर कहने वाले..........उस समय खैयाम साहब के इशारे पर साज भी जैसे शायर की बात सुनता है। आगे बहुत से उदाहरण हैं, त्रिशूल, नूरी, नाखुदा, उमराव जान, दर्द, थोड़ी सी बेवफाई, बाजार, दिले नादान और अल्टीमेट रजिया सुल्तान आदि..........नजर से फूल चुनती है नजर, चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है, मोहब्बत बड़े काम की चीज है की शुरूआत में कुछ पंक्तियाँ हर तरफ हुस्न है जवानी है आज की रात क्या सयानी है, तुम्हारी पलकों की चिलमनों में ये क्या छुपा है सितारे जैसा, देख लो आज हमको जी भर के और ऐ दिले नादान, आयी जंजीर की झनकार, जुस्तजूँ जिसकी थी उसको तो न पाया हमने.............मन-मस्तिष्क दोहराते हैं, फिर खैयाम साहब का न होना याद आता है तो लगता है कि साँझ हो गयी है और हवा में पतंग टूट जाने के बाद उदास उड़ाने वाला मांझा उतार रहा है........

हम सब एक बुरे समय के शिकार नहीं बल्कि खुशी-खुशी उसके साथ हैं, यह समय है भूल जाने, बिसरा देने और याद न रखने का। अब खैयाम साहब को कब याद किया जायेगा, पता नहीं। उनकी पत्नी जगजीत कौर भी अत्यधिक बीमार और अब एकाकी रह गयीं। खैयाम साहब ने उनसे अनेक भावुक और संवेदनशील प्रसंगों पर बहुत वास्तविक आभास देने वाले गीत गवाये थे, देख लो आज हमको जी भरके, चले आओ सैंया, इधर आ सितमगर, हरियाला बन्ना आदि। रजिया सुल्तान फिल्म में एक गाना तो उस्तादों के साथ जगजीत जी ने गाया था जिसमें परवीन सुल्ताना, फैयाज अहमद खाँ, नियाज अहमद खाँ, मोहम्मद दिलशाद खान संगी थे।

खैयाम, एक फनकार थे, सुरों और साजों की संवेदनशीलता को समझने वाले माहिर थे, तबला, सारंगी, सितार और सन्तूर उनकी संगत में जैसे बोल उठते थे। ऐसे खैयाम को हृदय और श्रद्धा के साथ नमन.....

बुधवार, 31 जुलाई 2019

प्रेमचन्द की कृतियाँ और हिन्दी सिनेमा

प्रेमचन्द का साहित्य प्रमुख रूप से बीसवीं सदी के आरम्भ और लगभग तीन दशक की स्थितियों के आसपास घटनाक्रम, देखी-भाली कथाएँ, सुने हुए दृष्टान्त और मंथन किए मूल्यों का दस्तावेज है। भारत में सिनेमा का आगमन 1913 का है। प्रेमचन्द ने अपनी परिपक्व उम्र और अवस्था में सिनेमा के जन्म और उसकी सम्भावनाओं को देखा था। कहीं न कहीं अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करते सिनेमा की शक्ति को भी वे महसूस करते थे। दादा साहब फाल्के जब राजा हरिश्चन्द्र बना रहे होंगे तब प्रेमचन्द की उम्र तीस साल से जरा ज्यादा रही होगी। प्रेमचन्द को अपने लमही और बनारस से सिनेमा का सुदूर मुम्बई किस तरह आकृष्ट कर रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है!

सिनेमा का आकर्षण और बाद में या जल्द ही उससे मोहभंग होने के किस्से साहित्यकारों-कवियों के साथ ज्यादा जुड़े हैं। प्रेमचन्द से लेकर भवानी प्रसाद मिश्र, अमृतलाल नागर और नीरज तक इसके उदाहरण हैं। साहित्यकार अपनी रचना को लेकर अतिसंवेदनशील होता है। वह फिल्मकार की स्वतंत्रता या कृति को फिल्मांकन के अनुकूल बनाने के उसके प्रयोगों को आसानी से मान्य नहीं करना चाहता। विरोधाभास शुरू होते हैं और अन्त में मोहभंग लेकिन उसके बावजूद परस्पर आकर्षण आसानी से खत्म नहीं होता। हमारे साहित्यकार, सिनेमा के प्रति आकर्षण के दिनों में कई बार मुम्बई गये और वापस आये हैं। आत्मकथाओं में साहित्यकारों ने मायानगरी मुम्बई की उनके साथ हुए सलूक पर खबर भी ली है लेकिन सिनेमा माध्यम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। साहित्यकार-कवि कड़वे अनुभवों के साथ अपने प्रारब्ध को लौट आये और सिनेमा अधिक स्वतंत्रता के साथ उनके साथ हो लिया जो उससे समरस हो गये।

प्रेमचन्द के साहित्य पर हीरा मोती, गबन, कफन, सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी जैसी कुछ फिल्में बनी हैं मगर हमें बाद की सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी याद रह जाती हैं क्योंकि ये ज्यादा संजीदगी के साथ बनायी गयी थीं और इसके बनाने वाले फिल्मकार सत्यजित रे एक जीनियस व्यक्ति थे जिनके नाम के साथ एक ही विशेषण नहीं जुड़ा था क्योंकि अपनी फिल्मों के वे लगभग सब कुछ हुआ करते थे। रे ने अपनी सारी फिल्में बंगला में ही बनायी थीं। उनके बारे में एक बातचीत में डॉ. मोहन आगाशे जो कि हिन्दी और मराठी सिनेमा तथा रंगमंच के शीर्ष कलाकार हैं, ने कहा था कि माणिक दा के लिए श्रेष्ठ काम का पैमाना उनके अपने सहयोगी लेखक, सम्पादक, छायांकनकर्ता, सहायक निर्देशक हुआ करते थे जिन पर उनका विश्वास यह होता था कि जिस तरह की परिकल्पना किसी फिल्म को लेकर उनकी है, उसे साकार करने में ये सभी पक्ष उसी अपेक्षा के साथ सहयोगी होंगे। 

सत्यजित रे ने शतरंज के खिलाड़ी का निर्माण 1977 में किया था। उनके लिए बारह पृष्ठों की एक कहानी को दो घण्टे से भी कुछ अधिक समय की फिल्म के रूप में बनाना कम बड़ी चुनौती नहीं था। वे यह फिल्म हिन्दी में बनाने जा रहे थे। वे उन्नीसवीं सदी के देशकाल की कल्पना कर रहे थे। अपनी इस फिल्म को उसी ऊष्मा के साथ बनाने के लिए लोकेशन का ख्याल करते हुए उनके दिमाग में कोलकाता, लखनऊ और कुछ परिस्थितियों के चलते मुम्बई कौंध रहे थे। वाजिद अली शाह के किरदार के लिए अमजद खान उनकी पसन्द थे। मीर और मिर्जा की भूमिका के लिए सईद जाफरी और संजीव कुमार को उन्होंने अनुबन्धित कर लिया था। विक्टर बैनर्जी, फरीदा जलाल, फारुख शेख, शाबाना आजमी सहयोगी कलाकार थे। वाजिद अली शाह के साथ एक बराबर की जिरह वाली महत्वपूर्ण भूमिका के लिए रे ने रिचर्ड एटिनबरो को राजी कर लिया था जिन्होंने उट्रम के किरदार को जिया था। बंसी चन्द्र गुप्ता उनके कला निर्देशक थे जिनको स्कैच बनाकर रे ने काम करने के लिए दे दिए थे और कहा था कि सीन दर सीन मुझे यही परिवेश चाहिए। आलोचकों ने शतरंज के खिलाड़ी को बहुत सराहा था यद्यपि कुछ लोगों को कथ्य के अनुरूप फिल्म का निर्माण न होने से असन्तोष भी रहा लेकिन आलोच्य दृष्टि रे के पक्ष में रही और उन्हें इस फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला। 

प्रेमचन्द ने शतरंज के खिलाड़ी में मीर और मिर्जा को केन्द्रित किया है, इधर सत्यजित रे ने फिल्म में वाजिद अली शाह और जनरल उट्रम के चरित्रों को महत्वपूर्ण बनाया है। फिल्म में वाजिद अली शाह की सज्जनता के साथ-साथ राजनीतिक समझ की कमी को भी निर्देशक ने रेखांकित किया है। अंग्रेज जैसे चतुर और खतरनाक दुश्मन की शातिर कूटनीतिक चालों को समझ सकने में अक्षम भारतीय राजनैतिक मनोवृत्ति भी फिल्म में सशक्त ढंग से उभरती है। हमारे दर्शक सिनेमा में सूक्ष्म ब्यौरों तक नहीं जाते, कई बार सिनेमा की विफलता का यह भी एक कारण होता है। शतरंज के खिलाड़ी के माध्यम से निर्देशक ने प्रेमचन्द की कहानी को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयत्न किया है। यह भले पैंतीस साल पहले की फिल्म हो लेकिन शतरंज के खिलाड़ी पुनरावलोकन की भी फिल्म है, आज भी हम उसे देखेंगे तो प्रभावी नजर आयेगी।

सद्गति एक घण्टे की फिल्म थी। इसे सत्यजित रे ने दूरदर्शन के लिए बनाया था। यह लगभग बावन मिनट की फिल्म थी जिसको देखना अनुभवसाध्य है। निर्देशक ने इस फिल्म को कहानी की तरह ही बनाया है, एक-दो दृश्यों के अलावा पूरी फिल्म प्रेमचन्द की कहानी के अनुरूप ही है। स्वयं निर्देशक का मानना था कि यह कहानी ही ऐसी है जो इसके सीधे प्रस्तुतिकरण की मांग करती है। सत्यजित रे ने इसे उसी ताप के साथ प्रस्तुत करके उसकी तेज धार को बचाये रखा। मैंने इसके तीखेपन को जस का तस प्रस्तुत करने का काम किया। सद्गति की विशेषता यह भी है कि फिल्म में कहानी में प्रयुक्त संवाद भी ज्यां के त्यों रखे गये हैं। फिल्म के लिए रे ने पात्रों का चयन भी अनुकूल ही किया था। ओम पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन आगाशे प्रमुख भूमिकाओं थे। यह फिल्म दो सप्ताह के शेड्यूल में पूरी बन गयी थी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के निकट इसका फिल्मांकन हुआ था। बंगला के एक और महत्वपूर्ण फिल्मकार मृणाल सेन ने कोई पैंतीस साल पहले तेलुगु में कफन कहानी पर केन्द्रित ओका ओरि कथा फिल्म का निर्माण किया था। टेलीविजन पर निर्मला और कर्मभूमि पर धारावाहिक बने। विख्यात फिल्मकार गुलजार ने भी प्रेमचन्द की कहानियों पर तहरीर मुंशी प्रेमचन्द की धारावाहिक का निर्माण किया था जिसकी कई कहानियों में पंकज कपूर ने केन्द्रीय भूमिकाएँ निभायी थीं।

शनिवार, 20 जुलाई 2019

।। आर्टिकल 15 ।।


गहरे अनुभव (सिन्‍हा) की फिल्‍म

 


यह एक ऐसी फिल्म देखने का अनुभव है जिसे नहीं देखकर उस यथार्थ से वंचित रहना होता जिसकी हम खूब बातें किया करते हैं प्रसंगवश लेकिन वे वही बातें होती हैं जिनके बारे में कहा जाता है, बातें हैं बातों का क्या? अनुभव सिन्हा ने गौरव सोलंकी के साथ मिलकर एक घटना की परिधि में जिस तरह की सशक्त फिल्म निर्मित और निर्देशित की है वह आँखें खोल देने वाली है। हमारे यहाँ समग्रता में सशक्त या उत्कृष्ट फिल्में बहुत कम बनती हैं जिनमें निर्देशक सभी आयामों के सन्तुलन में कोई बड़ी दृष्टि या चमत्कार पेश कर सके। चूँकि अनुभव सिन्हा, पन्ने पर भी उस फिल्म के दृश्यों और संवादों को लिख रहे हैं लिहाजा परदे पर भी वह उसी प्रभाव के साथ घटित होती है।

जघन्य बलात्कार का शिकार दो नाबालिग लड़कियाँ हैं जिनकी पार्थिव देह गाँव के बाहर एक पेड़ से लटकी हैं, स्याह रात और भोर के बीच बड़ा फासला है जिसमें गहरी धुंध छायी हुई है और यह आकृतियाँ परदे पर प्रकट होती हैं। इसके पूर्व एक दृश्य यह भी है कि भारतीय पुलिस सेवा में सीधी भरती से नियुक्त एक अधिकारी यहाँ अपनी पोस्टिंग पर आया है जो अपने वरिष्ठ को शाम की पार्टी में दबी जुबाँ हँसकर बतलाता भी है कि सजा के रूप में भेज दिया गया हूँ। फिल्म आगे इस झूठ के साथ बढ़ती है कि दोनों लड़कियों के पिताओं ने ऑनर किंलिंग के रूप में यह सजा उनको दी क्योंकि वे समलिंगी थीं। एक तीसरी लड़की और इनके साथ थी जो गायब है। उसकी तलाश नहीं की जा रही, यह माना जा रहा है कि वह भी जीवित न होगी। पुलिस की विवेचना हो रही है और अपनी तरह से प्रकरण को बन्द किए जाने लायक फाइल तैयार होती जा रही है।

इसी घटनाक्रम के बीच नायक पुलिस अधिकारी की छानबीन जारी है। समानता की भारतीय संविधान में आर्टिकल 15 के अन्तर्गत दी गयी व्यवस्था, एक विवरण भर है और लालगाँव में दमन, शोषण, भेदभाव, पक्षपात अपने चरम पर है। राजनीति और उसके कुटैव तथा अराजकताएँ आमजन को अपने बर्बर और हिंसक आव्हान और आन्दोलन के नीचे किस तरह खड़े रखते हैं और अपने को सिद्ध करके उन आमजनों को उनके हाल पर छोड़ दिया करते हैं इस पर तीखे संवाद भी फिल्म में है। नायक के अधीन पुलिस अधिकारी प्रकरण को बन्द कर देने पर अमादा हैं वह तीसरी लड़की को ढूँढ़ने की जिद पाले हुए नायक को सचेत भी करते हैं कि साहब आपका तो केवल ट्रांसफर होगा, हम मार डाले जायेंगे। इसी क्रम में सीबीआई की जाँच, नायक को विद्वेषवश कटघरे में खड़ा करने के एजेंसियों, रसूखदारों और राजनैतिक दलों के षडयंत्र परदे पर देखते हैं। अन्त यह है कि नायक को दिल्ली में बैठे अपने वरिष्ठ अधिकारी से हौसला मिलता है और वह गायब हुई तीसरी लड़की भी।


यह जिजीविषा, नैतिकता और दृढ़ आत्मविश्वास की विजय के साथ इस फिल्म का खत्म होना एक बड़ा सन्देश भेजता है। अनुभव सिन्हा की पकड़ इसके एक-एक फ्रेम पर है। वह प्रत्येक दृश्य के साथ पार्श्व संगीत के तरह और प्रकार के साथ-साथ उसकी जरूरत का भी ध्यान रखते और नियंत्रित करते हैं। उनका सिनेमेटोग्राफर (इवान मुल्लिगन) दृश्यों को कैप्चर करने का कुशल सम्पादक भी है जो हवाई शॉट के साथ-साथ दिल को हिला देने वाले, सिहरा देने वाले, प्रेम और करुणा उपजा देने वाले दृश्यों तक बखूबी पहुँचता है। इस टिप्पणीकार के उस समय आँसू छलक आते हैं जब वह बुलबुलाते हुए गटर के भीतर से गटर साफ करने वाले को निकलते देखता है जो भीतर वह तमाम पदार्थ बाहर फेंक रहा है जिसने उसे अवरुद्ध कर रखा है। यह अनुभूति किसी सिहरन से कम नहीं है जो भीतर ही भीतर झिंझोड़कर रख देती है। हमारे सामने डरे हुए कर्मचारी, अन्देशों में रहने वाली स्त्रियाँ, मगरमच्छ से भी अधिक मोटी चमड़ी वाले बुरे, निर्मम और बेईमान पदधारित लोग जिस तरह से आते-जाते हैं, एक तो सब चरित्रों को निबाहने वाले कलाकार बहुत सशक्त हैं, मनोज पाहवा (ब्रम्हदत्त), कुमुद मिश्रा (जाटव), जीशान अयूब (निशाद), सयानी गुप्ता (गोरा), नासेर (सीबीआई अधिकारी) को परदे पर देखकर लगता है कि इन सबके लिए चरित्र हो जाना जैसे जीवन-मरण का प्रश्न हो गया होगा। मनोज पाहवा का खासतौर पर आपा खो बैठने पर दाँत मिलाकर ओंठ खोलकर बोलने का ढंग, नासेर (साउथ के एक बड़े स्टार) का आयुष्मान खुराना (अयान रंजन) के सामने जाँच करना और बयान लेने का लम्बा दृश्य सब कुछ हमारी व्यवस्था में व्याप्त उन विसंगतियों को उजागर करते हैं जो सदैव से किसी भी बदलाव के रास्ते पर रोढ़ा बनकर रहा करती हैं। 

इस फिल्म में दो जोड़ रोमांस के एक-एक दृश्य भी क्या हैं जो मन को छू जाते हैं, एक गोरा और निषाद का आखिरी दृश्य जिसमें निषाद अपनी अधूरी कामनाओं के रूप में छोटी-छोटी ख्वाहिश व्यक्त करता है और दूसरा नायक के साथ नायिका अदिति (ईशा तलवार) अन्त में जब उसके हाथ में उसके निलम्बन का कागज है और वह उसके साथ घर लौटता है तब देखता है कि वह वहाँ मौजूद है। अलग-अलग शहरों में दोनों रहते हुए फोन पर विचारों और असहमतियों पर प्रायः झुंझलाने और लड़ने लगने वाले नायक-नायिका एक कठिन वक्त पर एक-दूसरे के पास। 

आयुष्मान खुराना इस फिल्म के नायक हैं जिनकी सारी खूबी संयम के साथ हर दृश्य में, हर संवाद में और हर फ्रेम में उपस्थिति है। निर्देशक ने उनके माध्यम से किंचित उस युवा को भी साहस के साथ प्रस्तुत कर दिया है जो अपनी स्वाभाविकता में यदि लोगों से उसकी जात-बिरादरी पूछता है तो वह उसके गुनाह के रूप में दर्ज किया जाने लगता है (सीबीआई इन्वाक्यरी के दृश्य) लेकिन इस जिज्ञासा की सहजता और दुराग्रहरहितता फिल्म के आखिरी दृश्य में तब पता चलती है जब मिशन की सफलता के बाद सड़क के किनारे एक वृद्ध महिला की छोटी सी दुकान के पास जमीन पर सब बैठकर उसकी बनायी रोटी-सब्जी खाते हैं और यही सवाल नायक उस वृद्ध महिला के साथ करता है।

हमारा बॉलीवुड बहुधा मनोरंजन का सामान हो गया है। वह फिल्म ही प्रायः व्यर्थ हो जाती है जो मनोरंजन नहीं करती। दर्शक भी उस सिनेमा का पक्षधर है जिसमें सिनेमाघर में प्रवेश से पहले दिमाग बाहर रख जाओ और आनंद लो। इसी बहुधा अवधारणा के बीच यह सिनेमा फलीभूत होता है जो आपको सवा दो घण्टे सजग रखता है, एक-एक दृश्य का मूल्य समझने की सीख देता है, उस सच के सामने ला खड़ा करता है जो अखबार या चैनलों में सनसनी या टीआरपी से अधिक कुछ नहीं हो पाता। यह आर्टिकल 15 जैसी फिल्म आपको डिस्टर्ब करे, बेचैन करे, चैन से बैठने न दे और सिनेमाघर से निकलने के बाद आपके दिमाग में इस तरह चले कि आपको अपने किस कदर और बेवजह आश्वस्त होने या बने रहने के भ्रम से आजाद होने का मौका मिले तो उसकी यह बड़ी सफलता है। इन मायनों में निर्देशक, लेखक, निर्माता अनुभव सिन्हा की यह एक सशक्त और महत्वपूर्ण फिल्म है। ध्यान दीजिएगा, यह उतनी सफल भी है कि लागत का तीन गुना से ज्यादा अर्जित भी कर चुकी है।

मंगलवार, 21 मई 2019

जातक कथा आधारित नाटक - वृत्ति नाशक

प्राणी आचरण वृत्तियों के विपरीत 

पर मनुष्य वृत्तियों की शिकस्त में

 


तथागत बुद्ध के अनन्य जन्मों के साथ जुड़ी जातक कथाओं का संसार विहँगम है। वे इनके माध्यम से आदिकाल से मनुष्य के लिए कोई न कोई सीखकोई न कोई प्रेरणा देते है। मनुष्य जीवन की निष्फलता के पीछे कितने कारणकैसी स्थितियाँकैसा स्वभाव उत्तरदायी हैइसका नैतिक बोध मनुष्य को कभी नहीं होता। यदि होता तो अपना जीवन संवारने के लिए महापुरूषों का जीवनउनकी वाणीउनके आचरण को नजरअंदाज न किया जाता। तथागत बुद्ध ने सृष्टि में विचरण करने वाले अनेक हिसंक जीवों की योनि में भी जन्म लिया लेनिक वह प्राणी जीवन जीते हुए उन्होंने वृत्ति प्रवृत्ति के विपरीत संत और ऋषि मुनियों सा आचरण प्रस्तुत किया जो आज भी प्रेरणीय है।

जनजातीय संग्रहालय, भोपाल में तथागत बुद्ध की जातक कथाओं पर आधारित नाट्य प्रयोगों का समारोह यशोधरा का आज समापन चुलनन्दीय जातक पर आधारित नाट्य वृत्ति नाशक के मंचन से 20 मई को हुआ। इस प्रस्तुति में लगभग तीस से अधिक कलाकारों ने हिस्सा लिया। आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आयोजित यशोधरा समारोह में यह प्रस्तुति बैले नाट्य की प्रतिष्ठित संस्था अर्घ्य कला समिति ने एक माह से अधिक समय के पूर्वाभ्यास में तैयार की थी। 

वृत्ति नाशक नृत्य नाट्य प्रस्तुति की कोरियोग्राफिक परिकल्पना व निर्देशक वैशाली गुप्ता ने किया था जबकि मूल जातक कथा का बैले नाट्य रूपान्तर सुनील मिश्र ने किया था। यह प्रस्तुति वाराणसी में ब्रम्हदत्त के राज्य के समय हिमालय में नन्दीय एवं चुलनन्दीय नाम के दो बन्दर भाइयों की कहानी है जो अस्सी हजार बन्दरों के राजा थे और अपनी वृद्ध माँ के साथ जंगल में रहकर प्रजा का पालन करते थे। जब रहने वाले स्थान में भोजन और पानी का संकट आया तो वे अपनी माँ को हिफाजत से एक जगह छुपाकर दूर दूसरे स्थान पर सबको ले गये जहाँ खाने-पीने के लिए अथाह प्राकृतिक और वानस्पतिक सम्पदा थी। 

दोनों भाई अपनी प्रजा के तीन-चार साथियों के माध्यम से नियमित रूप से अपनी माँ के लिए खाद्य सामग्री, फल वगैरह भेजकर निश्चिंत हो जाया करते थे। उनको नहीं पता था कि वे दुष्ट बन्दर रास्ते में सबकुछ खा जाते हैं और माँ भूखी-प्यासी हड्डी का ढांचा बनकर रह गयी है। एक दिन जब वे इस बात को जान पाते हैं तो अपने साथियों से अलग हो जाते हैं और दल को छोड़ देते हैं और अपनी माँ की सेवा का संकल्प करते हैं। कुछ दिन अच्छे से व्यतीत होते हैं कि एक व्याघ्र, शिकारी की दृष्टि उन पर पड़ती है। वह नन्दीय और चुलनन्दीय की माँ को मारकर शिकार करना चाहता है। इस पर नन्दीय आकर उसको रोकता है और कहता है कि बूढ़ी, रुग्ण और अंधी माँ को मारकर क्या होगा, उसे जीवित रहने दो भले मुझे मार लो। व्याघ्र नन्दीय पर तीर चलाकर उसे मार देता है और फिर बूढ़ी माँ पर तीर तान देता है। तब चुलनन्दीय आकर अपने को प्रस्तुत करता है। निर्मम व्याघ्र उसे भी मारकर फिर वृद्ध बन्दरिया को भी मार देता है। जब वह तीनों को मारकर घर ले जाता है जो अपने घर में हुए वज्रपात से उसका दिल काँप उठता है, वह देखता है कि घर जलकर खाक हो गया है और आग में परिवार भी समाप्त हो गया, वह बचाने गया तो वह भी। यह शिकारी वाराणसी का छात्र था जो तक्षशिला में ज्ञान प्राप्त करने गया था मगर अपने दुष्ट आचरण की वजह से निष्काषित कर दिया गया था। उसके बाद वह ऐसी हिंसक वृत्ति का हो गया। लेकिन उसको अपनी करनी का फल मिला। 

जातक कथाओं की प्रेरणाएँ अनन्त हैं। तथागत बुद्ध के अनेक जन्मों की कथा जिनमें वे अलग-अलग प्राणी के रूप आये, अनेक हिंसक प्राणियों की योनि में जन्म लेकर भी वृत्ति के विपरीत करुणा, संवेदना और आपसी साहचर्य का स्वभाव और जीवन जीकर आदर्श स्थापित किया और कृतघ्न मनुष्य को सीख दी। मनुष्य इन जातक कथाओं के मर्म को जाने तो वह आज भी अपने जीवन को सँवार सकता है और अपने होने को धन्य कर सकता है। वैशाली गुप्ता ने इस प्रस्तुति का तानाबाना बड़े और बाल कलाकारों के साथ मिलकर कुशलता के साथ बुना और अनेक सुन्दर और मर्मस्पर्शी दृश्यबन्धों के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया। जंगल में विभिन्न प्राणियों के बीच आपसी प्रेम, सद्भाव और समरसता को नाटक में प्रस्तुत किया गया। नन्दीय और चुलनन्दीय के पिता महानन्दीय और उनके मित्र घोटक (वनमानुष) की परिकल्पना व्याघ्र की प्रवृत्ति का घोर प्रतिवाद है जिसने प्रस्तुति को एक अलग प्रभाव दिया। 

कलाकारों में प्रथम भार्गव नन्दीय, समक्ष जैन चुलनन्दीय, मेघा ठाकुर बूढ़ी माँ, भगत सिंह घोटक, हर्ष राव व्याघ्र, निधि वत्स व्याघ्र की पत्नी के रूप में प्रमुख भूमिकाओं में हैं जबकि पक्षियों और प्राणियों की भूमिकाओं में कृष्णा, किरण, हनी, अमृत कौर, देवांग, निमित, आनंदी, हितैषी, निमित आदि। संगीत परिकल्पना सुश्रुत गुप्ता की है। गीत संयोजन भी उन्हीं का। यह नाटक समान रूप से बड़ी उम्र के दर्शकों के साथ बच्चों के लिए भी प्रेरक है। 

#वृत्तिनाशक #जातककथाऍं  

शुक्रवार, 17 मई 2019

परदे का समाज हो जाना और नायक का यथावत् बने रहना


राजनीति में सितारे


बात ऐसी कोई बहुत नयी तो नहीं ही हुई जिसकी बात करने जा रहे हैं लेकिन विषय हमेशा ही ज्वलन्त है। जो नायक लम्बे समय हमारे बीच रहकर सिनेमा के माध्यम से अपनी एक छबि स्थापित करता है, एक समय बाद या उत्तरार्ध में तेजी से समाज की सेवा के लिए उत्कट हो उठता है। अचानक ऐसा लगता है कि जैसे एक तरह की उद्विग्नता उसे जनता के बीच सेवा के लिए ले आयी है। पूरे देश में सिनेमा की व्यापकता जहाँ-जहाँ है, वहाँ-वहाँ देर-सवेर नायकों को, नायिकाओं को, खलनायकों को, निर्देशकों को यह उद्विग्नता हुई है। इसका सबसे बड़ा आकर्षण हमारे सामने दक्षिण से ही आता है जहाँ से बहुत बड़े-बड़े नाम समय-समय पर उभरे और स्थापित हुए। ऐसे भी नाम हुए जो राज्य के मुखिया के रूप में स्थापित हुए बल्कि लम्बे समय स्थापित रहे और कीर्तिमान बनाया।

यह कम रोचक और दिलचस्प नहीं था कि एक तरफ जनता ने जिस महानायक को परदे पर लम्बे समय विभिन्न सकारात्मक चरित्रों को निबाहते हुए देखा, बात-बात पर जनता के हित के लिए खड़े होते और लड़ते देखा वही महानायक जब ग्लैमर और सारी चकाचौंध को छोड़कर जनता के बीच हाथ जोड़ता हुआ समाज सेवा के संकल्प से समर्थन मांगने आया तो जनता ने उसको उसी तरह का प्रतिसाद दिया जिस तरह का प्रतिसाद परदे पर नायक रहते हुए वह टिकिट खिड़की पर दिया करती थी।


यह सचमुच बहुत गहरी चीज है कि कैसे हम सबके बीच कोई नायक या महानायक बनता है और अपनी जगह बनाता है। हमको परदे पर उसका चरित्र भाता है, हम उसको अपने मन में जगह देते हैं, हमारी वही उदारता उसके लिए और अधिक अनमोल बन जाती है जब उसको अपनी भूमिका का विस्तार करना होता है। दक्षिण के राज्यों में जब-जब सितारे राजनेता बने और जनता के समर्थन में बड़े-बड़े पोर्टफोलियो सम्हालने लायक सौभाग्य प्राप्त कर सके, उनको इस बात का निरन्तर भान रहा कि वे इसी तरह के आमजन के नायक या महानायक हैं जिनको परदे पर देखने आम आदमी, गरीब और अभाव से भरा आदमी टिकिट खिड़की पर बड़े से बड़ा संघर्ष करने पर उतारू हो जाता है। दर्शक पौराणिक फिल्म में किसी भी अभिनेता को महान चरित्र का निर्वाह करते देखता है तो उसकी श्रद्धा का वजन वही का वही रहता है जब उसका महानायक अपने आपको समाज सेवा के रूप में प्रस्तुत करता है तब भी वह सब कुछ उस पर उड़ेल देना चाहता है।

दर्शक के लिए तो उसका महानायक, परदे का देवता मर्यादा पुरुषोत्तम या योगेश्वर से कम न होगा और उसको लगने लगेगा कि अब उसका कल्याण हो जायेगा क्योंकि परदे का महानायक अब समाज नायक है, वह ंउसके दुख दर्द समझेगा और उनसे निजात दिलायेगा। आज के समय में भी दक्षिण के तीन बड़े सितारे इस समय चुनाव और राजनीति के वातावरण में अपने आपको आजमाने में लगे हैं। कभी ये सितारे सत्ता कौन सम्हालेगा, इसकी हवा बनाने का काम किया करते थे। ये जिसकी तरफ जाकर खड़े हो, इनके वे सीनियर को गद्दी मिलना तय हो जाता था। बाद में इस तरह की भूमिका से ये सितारे ऊब गये और समय के साथ वे सितारे राजनेता भी आपस की कलह और कुटैव में एक-दूसरे के विरुद्ध अपनी लड़ाइयों को दूर तक लग गये। दक्षिण में दृश्य ऐसा है कि एक बार फिर सत्ता, विपक्ष और राजनीति सिताराविहीन है ऐसे में बड़े और अपेक्षाकृत अपनी पारी लगभग पूरी कर चुके सितारे खाँटी राजनीतिज्ञों के सामने मैदान में आ गये हैं।


इधर उत्तर भारत सहित शेष भारत में मुम्बइया सितारों का आकर्षण हिन्दी दर्शकों में एक अलग तरह की दीवानगी का सबब बना रहता है। हमारा दर्शक अब आटोग्राफ से हटकर सेल्फी की ललक और ख्वाहिशों में भर गया है। सितारे यह तो चाहते हैं कि दर्शक उनकी फिल्म जमकर देखे, जमकर कमायी दे लेकिन वे दर्शक से मौका पड़ने पर संवाद नहीं करना चाहते। हिन्दी सिनेमा के कलाकारों को समाज के बीच जाते ही अपने दर्शक से आँखें न मिलाना पड़ें उससे पहले काला चश्मा चढ़ा लेते हैं। लालायित दर्शक पीछे-पीछे चलने लगता है तो सितारों को नागवार गुजरता है, इच्छा के विपरीत सेल्फी लेने लगता है तो उसके साथ जो व्यवहार होता है, वह दर्शक का अप्रिय अनुभव होता है। ऐसे सितारे जब राजनीति में आते हैं तो राजनीति के गैरसिनेमायी वज्र पुरुष उनको यही समझाने की कोशिश करते हैं कि काला चश्मा उतार कर अपने दर्शकों को देखो, वही जनता है। लेकिन तब भी हमारे दर्शक के अनुभव, अपने उसी अभिनेता से बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहते जो परदे पर आता है तो वे सीटियाँ बजाते हैं, तालियाँ बजाते हैं, आँसू बहाते हैं।


हमारे हिन्दी के महानायक भी अपनी सारी की सारी साख दाँव पर लगाकर राजनीति करने पहुँचे थे लेकिन उसके बाद जिस तरह उन्होंने राजनीति से किनाराकशी की, उस पर बात करने के लिए शायद उनको किताब ही लिखनी पड़े लेकिन अपने परिवार से कोई राजनीति में बना रहे इससे परहेज नहीं है। इस बार हम और भी चेहरे देख रहे हैं जो लगभग इस पल राजनीति में आते हैं और अगले ही पल नामांकन भर रहे होते हैं। परदे और समाज का सामना और फर्क भी कम विचित्र नहीं है। नायक को परदे और समाज का फर्क कितना मालूम है, यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि नायक की जिन्दगी स्टूडियो से लेकर आउटडोर तक इतनी व्यस्त हो गयी है कि वह समाज का हिस्सा ही नहीं रह गया है। भीड़ उसके प्रति आसक्त भी है और धीरज छूटने पर आक्रामक भी इसीलिए वह छत, छज्जे और काँच की दीवार के पीछे से अपने चाहने वालों को टा टा करता हुआ मिलता है।

नायक वही रहता है लेकिन परदा कब समाज हो जाता है पता नहीं चलता। परदे पर विविध चरित्रों को निबाहते हुए लेकिन सड़क और समाज में उतने ही अन्तर्मुखी और लगभग नीची निगाह किए एयरपोर्ट से निकलकर दौड़कर गाड़ी में बैठ हवा हो जाने वाले, बाउन्सरों के समर्थन से ही सड़क पर चार कदम चल पाने वाले जब खुली गाड़ियों में हजारों की भीड़ के बीच हाथ हिलाते, टा टा करते दिखायी देते हैं तब लगता है कि परदे का नायक न जाने कैसे समाज के नायक की भूमिका का निर्वाह कर सकेगा?

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

Film Review / kalank

।। अब कलंक धोने का जिम्‍मा बेचारे दर्शकों पर ।।



अभिषेक वर्मन, करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शन में कुछ समय पहले टू स्टेट्स निर्देशित करने आये थे। करण ने उनको कलंक निर्देशित करने का एक बड़ा जिम्मा देकर इस दौर में मल्टी स्टार कास्ट फिल्मों के दौर की व्यतीत स्मृति को भरपूर बजट के साथ बड़े लाभ के रूप में लौटा लाने का विफल प्रयत्न किया है। आज इस फिल्म को देखकर यह लगा कि हमारे निर्माता एक साथ इकट्ठा होकर कुछ चिट फण्ड टाइप का पैसा बहाऊ खेल भरपूर धन कमाने के लिए खेलते हैं लेकिन उनके पास वह दृष्टि और समझ नहीं है जिसकी वजह या सहायता से फिल्में हिट होती हैं।

कलंक आधा दरजन सितारों से लदी-फँदी फिल्म है, संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, वरुण धवन, आदित्य रॉय कपूर, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, कुणाल खेमू वगैरह। कहानी जिस तरह शुरू होती है, आरम्भ में दुनिया भर के स्पष्टीकरण के साथ जिसमें यह सबसे बड़ा कि काल्पनिक कहानी है। हम और हमारे पूर्वज विभाजन और बँटवारे के बारे में जितना जानते हैं और उससे जुड़े अप्रिय घटनाक्रम, उसकी ही छाया में यह कहानी कुछ अजीब ढंग से घटित होती है जिसमें भयावह बीमारी से मृत्यु के मुख में जाती सोनाक्षी सिन्हा, एक गरीब गुणी गायक पिता की तीन बेटियों में से एक को अपने पति के साथ विवाह के लिए राजी करने चली आयी है। गरीब पिता की बड़ी बेटी आलिया भट्ट अपनी उम्र को जीती, बहनों के साथ शरारत करती, पतंग उड़ाती और लूटती पाँच मिनट में एक गम्भीर चेहरा और त्याग से भरी हो जाती है। 

लाहौर के हुस्नाबाद में उसका उस महलनुमा घर में कुछ समय सोनाक्षी के साथ रहना, फिर सोनाक्षी की मृत्यु उसके बाद आलिया भट्ट का अचानक संगीत की तरफ रुझान होना, शहर की बड़ी तवायफ माधुरी दीक्षित की सोहबत और फिर उसी की सन्तान वरुण धवन से मोहब्बत हो जाना कहानी के मूल में है। आलिया का पति आदित्य और ससुर संजय दत्त कुछ चार लोगों के साथ अखबार किस तरह चलाते हैं जिसके नागरिक ही खिलाफ हैं। इसी में अदावत, हिसाब चुकाने के लक्ष्य, दबे षडयंत्र आदि के साथ अन्त में वरुण का मोहब्बत पर कुरबान होना ही लाजमी था। माधुरी दीक्षित के नाचते-गाते जिस तरह फिर हिंसक अन्त को परवान चढ़ती है वह अकल्पनीय है। अन्त में एक अनगढ़ सी पूर्वदीप्ति का दृश्य भी अंजाम पाता है क्योंकि आलिया किसी लेखक को अपनी कहानी सुना रही है। इस समय केवल आलिया, आदित्य और संजय ही जीवित हैं और आदित्य ने पिता संजय को माफ कर दिया है। आखिरी में जिस तरह से दुपट्टा हटाकर माधुरी हँसकर नाचती-गातीं है और और बूढ़े संजय दत्त अपनी प्रेमिका को याद करके मुस्कराते हैं, लगता है प्रेम इनका ही अमर हुआ है, शेष सब फनाह हो गये।

कलंक, आराम से एक खूबसूरत कहानी हो सकती थी, वरुण धवन और आलिया भट्ट की लेकिन निर्देशक जो पटकथाकार भी है, उसने इनके आसपास जिस तरह के चरित्र खड़े कर दिए उससे पूरी कहानी बोझिल हो गयी। शुरू में जिस तरह आलिया भट्ट का घर, पिता और बहन नजर आये थे, वो बाद में दोबारा नहीं आते, जिनके लिए आलिया ने यह त्याग किया है। सोनाक्षी अपने पति पर यह उपकार और आलिया के गरीब पिता और उनके अच्छे संसार पर यह वज्रपात करने क्यों आयी है यह भी पता नहीं। इधर वरुण धवन दृश्य में आये तो एकदम लेडी किलर की तरह जो सोने और सुलाने के हुनर को अपनी वीरता की तरह प्रदर्शित करता है। वह माधुरी और संजय का बेटा है यह रहस्य जल्दी ही खुल जाता है। अखबार मालिक संजय और उनके बेटे का शहर में जीना क्यों दूभर है इसको ढंग से निर्देशक स्थापित नहीं कर पाया। यह बात गले नहीं उतरती कि अखबार मशीनों के आने से विकास की सम्भावना देखता है और लाहौर के लोहारों को यह उनके रोजगार पर हमला लगता है। यह भी दिलचस्प है कि लोहारों के काम के प्रतीक के रूप में वरुण और उसके चार सहयोगी लोहा पीटते रहते हैं और चाकू, छूरी और तलवार ही बनाया करते हैं। 

कमजोर पटकथा पर तार्किक और दार्शनिक संवाद अपना असर उस तरह नहीं छोड़ पाते जैसी उम्मीद की जाती है। गाने अच्छे हैं, संगीत भी अच्छा है पर फिर भी याद न रहेंगे। चूँकि फिल्म प्रभावहीन है इसलिए उसका लम्बा होना अखर जाता है। वरुण धवन की माँ बनी अधेड़ माधुरी दीक्षित को खुश करने के लिए अन्त में उनको भरपूर स्पेस दिया गया है। भारी हिंसा के बीच उनका अपनी सखियों के साथ प्यार मोहब्बत के फलसफे को गा-गाकर उच्श्रृंखल होना शोभा नहीं देता क्योंकि उस समय एक नायक मारा जा रहा है, आग लगी हुई है, मारकाट मची है और बीच-बीच में माधुरी बुझे चेहरे के साथ नाचे जा रही हैं। संजय दत्त थके हुए लगते हैं। सधकर संवाद बोलते हैं, चेहरा तो जाहिर है उनका कुछ बोलता भी नहीं और अब उम्र भी खूब दीखती है। फिल्म वरुण धवन को बेहतर ढंग से पेश करती है, उन्होंने मेहनत भी की है, उनके साथ आलिया का कण्ट्रास्ट मैच करता है। आदित्य रॉय कपूर के लिए भी फिल्म व्यर्थ ही है।

भव्य सेट्स, आसपास का वातावरण, कलात्मक वैभव ऐसा कि अतिरेक ही होता चला गया है। बाग-तड़ाग-पक्षी-सरोवर-कमल-पत्ते-झूमर-आभूषण-वस्त्र सबको डेढ़ सौ परसेण्ट महकता हुआ कर दिया है यही इस फिल्म का ड्रा-बैक है। फिल्म के चरित्रों में से कितने कलंक मिटा सके, कितने कलंकित रह गये वह बात और है लेकिन दर्शकों के लिए आखिरी आधे घण्टे का अनुभव बहुत बुरा रहा होगा।

मित्रों से.......................तब भी फिल्म देखिए और सहिए क्योंकि एक बुरी फिल्म को बनाने में भी कितने सारे मस्तिष्क काम करते हैं और कोई भी आपस के किसी को भी सावधान नहीं करता, समझाता या सही राह नहीं दिखाता। हमारे सिनेमा की यही विडम्बना है। #filmreviewkalank

मंगलवार, 26 मार्च 2019

27 मार्च : विश्व रंगमंच दिवस





रंगमंच को चाहिए एक सार्थक आकलन

 

हमारे देश में रंग सक्रियता हाल के कुछ वर्षों में एक नयी करवट लेकर देखने में आयी है। जीनियस निर्देशकों की पीढ़ी उम्र के उस दौर में है जब ऊर्जा, सक्रियता और क्षमता के मान से उनका काम लगभग पूरा हो चुका है। वे अपनी क्षमताओं का श्रेष्ठ अर्जित भी कर चुके हैं और प्रदर्शित भी। वे अब अपने सुनहरे समय के स्मरण या संस्मरण के साथ आज सक्रिय पीढ़ी के कामकाज को देख रहे हैं, संवाद कर रहे हैं और अपने अनुभव साझा करने को उपलब्ध हैं। नयी पीढ़ी भी गुरु-शिष्य परम्परा और रचनात्मक तथा सर्जनात्मक क्षेत्र में अनुभवसिद्ध और गुणी पुरुषों का यथासम्भव मान किया करती है और उनके अनुभवों, आशीर्वाद और मार्गदर्शन से जुड़ी रहना चाहती है। कल तक वे जीनियस मंच पर थे और उनके पास अपने समय के सापेक्ष परिस्थितियाँ थीं। अवसरों में सीमाएँ थीं और मेहनत भी उतनी ही ज्यादा थी। सामूहिक रंगमंच को अपनी श्रेष्ठता और उत्कृष्टता के अनुरूप अपने-अपने योगदान से बनाये रखने और श्रेष्ठ को प्रकाशित या मंचित किए रहने की निरन्तरता में बहुत सारे नाम देश भर से हमारे बीच साधक के रूप में, धुनी और जुनूनी की तरह सामने आते रहे हैं। फिर भी भारतीय रंगमंच जिन महान रंगकर्मियों का ऋणी रहेगा उनमें इब्राहिम अल्काजी, शौकत आजमी, बलराज साहनी, पृथ्वीराज कपूर, कावलम नारायण पणिक्कर, रतन थियम, एम एस सथ्यू, रेखा जैन, नीलम मानसिंह चौधरी, ऊषा गांगुली, उत्त्रा बावकर, के.वी. सुब्बन्ना, श्यामानंद जालान, तापस सेन, विजया मेहता, ब व कारन्त, हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर, शंभु मित्र, गिरीश कर्नाड, सत्यदेव दुबे, जोहरा सहगल आदि अनेक नाम प्रमुख रूप से कौंधते हैं।

तत्काल स्मरण में सम्भव है और बड़े मूर्धन्य रंगसाधकों का उल्लेख न हो पाये, उससे उनके योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता। दरअसल जो एक धरातल, जो एक आत्मविश्वास, एक जमीन या कह लें पटरी अथवा सड़क ऐसे मूर्धन्य संघर्षशील सृजनधर्मियों ने रंगसमाज और आने वाली पीढ़ियों को उपलब्ध करायी वह बड़ी पक्की है। उसके बाद की धारा जिसमें प्रौढ़ और युवा रंगकर्मियों की भागीदारी ने एक अलग सा दृश्य हमारे सामने उपस्थित किया है। स्थूल रूप से हम इस सदी के रंगकर्म की बात कर सकते हैं जिसके माध्यम से करीब-करीब दो दशक बराबर समय के परिदृश्य पर विचार किया जा सकता है। इन सारी बातों को करते हुए हमें इस बात को प्राथमिकता के साथ ही जोड़ लेना चाहिए कि बहुत सारे उतार-चढ़ावों के बावजूद आधुनिक भारतीय रंगमंच की प्रामाणिक जगह को लेकर बात करने लायक बेहतर अवसर जुटाने में देश के लोक मंच की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके लिए हम बाकायदा कावलम नारायण पणिक्कर से लेकर ब व कारन्त, हबीब तनवीर और रतन थियम की भूमिकाओं का स्मरण कर सकते हैं। इसके साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों में अनेक मुश्किलों और कठिनाइयों के साथ संघर्ष करते हुए भी अपनी अस्मिता बचाये रखने में माच, नाचा, नौटंकी, तमाशा, ख्याल, जात्रा, चिण्डू भागवतम, यक्षगान, कथकली आदि का योगदान रहा है। न तो इनको छोड़ा जा सकता है और इनके उल्लेख के बिना भारतीय रंगमंच को शहरी और आधुनिक पहचान वाले रंगमंच को अवदान से बढ़कर चमकाये जाने की जरूरत भी नहीं है। 



भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की परिकल्पना अंधेर नगरी से होते हुए रंगमंच पारसी थिएटर के रास्ते रामलीला, रासलीला के समृद्ध परम्परा वाली पगडण्डी से सदियों की एक लम्बी यात्रा करके हम तक उसी तरह आया है जिस तरह हम किसी कालजयी नदी के उद्गम की अवधारणा को पुराणकथा से जोड़ते हैं और फिर उसकी अन्तहीन और अनन्त यात्रा को रेखांकित करते हैं जिसमें न तो एक बार उद्गम की चर्चा करने से बात समाप्त होती है और न ही उसके हिन्द महासागर में मिल जाने की बात कहकर इतिश्री की जा सकती है क्योंकि यह सदियों की अनवरत परम्परा है और सदियों ही चलती भी रहने वाली है।

लम्बे समय तक भारतीय कलाएँ, स्वाभाविक रूप से जिसमें रंगमंच भी शामिल है, अपने स्थापत्य को लेकर संघर्षरत रहा है। अभाव, खतरे और मुश्किलों के बीच रंगमंच को जिन्दा रखे रहने की अनेक सच्ची कहानियाँ हैं जिनको सुनकर सचमुच यह अचरज होता है कि इतने के बाद भी रंगमंच होता रहा तो इसके पीछे जरूर आदमी की जिजीविषा काम कर रही होगी। संघर्ष और जिजीविषा की स्थितियाँ तो आज भी हैं। रंगमंच के स्वप्न को साकार करने के पीछे जो सबसे बड़ी जरूरत होती है वह धन की है। मनोरंजन का यह ऐसा माध्यम है जिसमें व्यय हुआ धन लौटकर नहीं आता। इसीलिए घर फूँक तमाशा और घर में ही अपने प्रति बनते बढ़ते विरोधी वातावरण के बीच रंगमंच प्रत्येक सक्रिय या काम करने वाले कलाकार-रंगकर्मी से परवान चढ़ता है। ऐसे अनेक रंगकर्मी और रंग संस्थाएँ हैं जो कलाकारों की सामूहिकता और एकजुट होकर निरन्तर काम करते रहने की आदी हो चुके हैं। दूसरे उस तरह के रंगकर्मी हैं जो आवश्यकतानुसार कलाकारों को जोड़ा करते हैं। इन सबके बीच काम करते रहने के लिए अनुदान, मंच प्रदर्शन के पारिश्रमिक या समय-समय पर प्रोत्साहित करते पुरस्कार और स्मृति चिन्हों का अपना महत्व है लेकिन इससे एक अनिश्चितता साथ चला करती है जो रंगकर्मी का कमोवेश चैन छीनकर रखती है।

भारतीय रंगमच के अनेकानेक आयामों के साथ ही उसकी सार्थकता को लेकर हमेशा ही बात की जाती है। हमारी कलाएँ कितनी समाज सापेक्ष हैं, कितना उनका जन सरोकार है इसको लेकर अक्सर विचारों में विविधता से लेकर भेद तक होते हैं। रंगमंच ने किसी आदमी भर की नहीं बल्कि सम्पूर्ण मनुष्यता के स्वर को बहुत साहस के साथ, बहुत निर्भीक होकर अभिव्यक्ति के धरातल पर अपने होने के अर्थ को प्रस्तुत किया है। क्या कारण है कि हमारा दर्शक या रंगप्रेमी जिन्दगी में पच्चीसों नाटक देखने के बाद किसी एक नाटक से ऐसे बिंध जाता है कि उसके साथ ही वह घर भी लौटता है और उद्वेग में लम्बे समय उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता। मंच पर प्रतिबद्ध और सच्चा कलाकार, अपने पात्र को सार्थक करने के लिए जिस तरह रीडिंग से लेकर पूर्वाभ्यास तक और उसके बाद कास्ट्यूम धारण करने से लेकर मेकअप तक आते हुए जब अपनी टाइमिंग पर जाता है उस समय उसके तनाव की कल्पना की जा सकती है। हमारे श्रेष्ठ नाटकों में गहरे सन्देश अन्तर्निहित होते हैं जो आपको सोचने के लिए विवश करते हैं। दर्शक ताली बजायें या कहकहे या उनकी बड़ी हँसी अथवा ठहाके सभागार में गूँजें, वह तारतम्य मंच से ही होकर उन तक आता है। हृदय को झकझोर देने वाले दृश्य में एक कलाकार जब अपने पात्र के साथ पूरे वातावरण को जी रहा होता है तब कैसे गहरी चुप्पी और सन्नाटा खिंचा चला आता है! यह आसान नहीं है। रंगमंच में हर उस एक-एक छोटे से छोटे आदमी का योगदान है जो मंच पर तलुओं से कंकर का आभास होने पर उसे उठाकर दूर फेंककर आता है ताकि किसी दूसरे कलाकार को वह न गड़े। इतने गहरे जाकर हमें इस परम्परा को देखने की जरूरत है।

रंगमंच ने छोटे स्तर की दकियानूसी, ओछी किस्म की क्षुद्रता से लेकर षडयंत्र, कुटैव, विरोधाभासों से लेकर युद्ध तक को लक्षित किया है और सामाजिक सहभागिता में अपनी उत्तरदायी भूमिका का निर्वहन किया है। भारतीय मानस समय के साथ पतित होते समय, समाज, राजनीति, अपराध, दुनिया के देशों में आपसी वैमनस्य, एक-दूसरे को हराने, एक-दूसरे से जीतने की खूँखार महात्वाकांक्षा और उसके दुष्परिणामों को भी रंगमंच पर जिस तरह से समय-समय पर देखा गया है, वह उसकी प्रशंसनीय और साहसिक भूमिका को रेखांकित करता है। स्मरण हो आते हैं रतन थियम के नाटक जो महाभारत काल से लेकर आज तक मानवीयता पर मण्डराते युद्ध के खतरे और युद्ध से होने वाले विनाश की बात करते हुए केन्द्रित करते हैं स्त्रियों और बच्चों को जो कि इसका सबसे बुरा खामियाजा भुगतने को विवश होते हैं और उनकी परवाह कोई नहीं करता। हम कल्पना कर सकते हैं शहीद फौजियों के घर-परिवारों की स्त्री, बच्चों, बुजुर्गों की जो किसी न किसी रिश्ते में बंधे हुए हैं और ऐसी शहादत के बाद उनके घर जाकर देखने वाला कोई नहीं है। रंगमंच आपको झकझोरता है, घोर निर्मम और अमानवीय होते समय में आपकी सुप्त चेतना पर थप्पड़ देने का साहस रखता है। हर काल में, हर समय में रंगमंच को इतना ही जिम्मेदार और साहसी होने की जरूरत भी है।

नयी पीढ़ी के लिए संसार खुला हुआ है। अलग-अलग संस्थाओं, कलाकारों और संस्थानों में अब रंगमंच का प्रशिक्षण राज्यों के लिए भी आकर्षण हो गया है। भले ही पूर्वाभ्यास की समस्या का रंगकर्मियों और रंग संस्थाओं के लिए कोई स्वाभाविक समाधान न निकल सका हो लेकिन प्रदर्शन के कोई न कोई अवसर मिला करते ही हैं। इसी बीच आपस में एक साथ काम करते, परस्पर या समानान्तर रूप से संस्था के साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते समूहों में आपसी दूरियाँ भी खूब हैं। एक-दूसरे का काम देखने, सच्चे मन से अपना पक्ष रखने, सराहना या आलोचना करने की स्थितियाँ अच्छी नहीं हैं। इसी प्रकार स्वाभाविक आकलन का क्षेत्र एक अलग तरह की उदारता देने में लगा है। बेहतर समीक्षा या आलोचना लगभग अनुपस्थित है। हर काम श्रेष्ठ है। समीक्षक हैं नहीं और हैं तो किसी भी नाटक का धैर्यपूर्वक आकलन करने और विश्लेषण करने के लिए समय नहीं मिलता। समीक्षक और विश्लेषक के नाम पर उच्च कोटि में भी एक अजीब सा अनुराग, विराग, प्रतिराग और खुंदक चल रही है कि लगभग आशीर्वचन की तरह चाहने वाले के प्रति न तो वह समीक्षा कोई काम आने वाली है और खुंदक में लपेट दी गयी, निपटा दी गयी या खारिज कर दी गयी भाषावली का कोई नुकसान या दूरगामी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि बहुत से राडार निष्पक्ष नहीं रह गये हैं और शायद ऐसा भी कि वे अब अपने ही तरीके का एक सा कहते-कहते थक भी गये हैं।

ऐसे में फिर बात वही रंगमंच पर उसकी स्थितीयता पर आकर ठहर जाती है कि दो दशक में हमारा रंगमंच आधुनिक तकनीक, प्रचार-प्रसार, वेबसाइट, सोवेनियर, ब्रोशर, स्मारिका, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, ट्विटर और वाट्सएप के साथ हर मस्तक पर दस्तक तो हो गया है पर इस सबके बीच सशक्त रंगमंच, सशक्त कलाकार, दाँतों तले उंगली दबा लेने वाली या चकित करके रख देने वाली रंग-अभिव्यक्ति और वैसे जीनियस जिनका आरम्भ में जिक्र हुआ, अब के दौर में फिर उभरकर सामने आयेंगे, इसका भरोसा जरा मुश्किल ही लगता है।
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बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

गली बॉय

झेंपते हुए युवक की जिन्‍दगी से......

 

क्या किसी फिल्म को उसकी श्रेष्ठता में अनगढ़ तरीके से देखा जा सकता है! क्या एक जगह बैठकर हम उस जीवन की कल्पना कर सकते हैं जहाँ बहुत सारी कठिनाइयाँ हैं, दुख हैं, पीड़ाएँ हैं, घुटन दिखायी देती है, असहनीयता धुँआ धुँआ दीखती है! क्या हमें उम्मीद होती है कि कोई रास्ता वहाँ की घोर बेचैनी के बीच से भी निकल सकता है! बहुत सारे नकारात्मक उत्तरों के बावजूद कोई फिल्म हमको बांधकर रखती है। बांधकर रखती इसलिए है क्योंकि अनचाहे ही बेखबरी में हम उस फिल्म के किरदारों में अपने को पहचान जाते हैं और उनका हाथ थामकर चल पड़ते हैं। यही किसी फिल्म की सच्ची सफलता भी है बल्कि सराहना पहले है, सफलता बाद में है।

लेखक और शायर पिता, लेखिका और निर्देशिका माँ की बेटी जोया अख्तर अपनी यह तीसरी अहम फिल्म गली बॉय को एक निर्देशक के रूप में, रीमा कागती के साथ एक पटकथाकार के रूप में बहुत कोमलता से बुनकर प्रस्तुत करती हैं। रीमा कागती से उनकी पिछले रचनात्मक सरोकार हैं, दोनों ने मिलकर तलाश फिल्म की रचना की थी जिसे आमिर खान की एक खास फिल्म कहा जाता है। यह गली बॉय मुम्बई महानगर की एक बड़ी झोपड़पट्टी में एक छोटे से घर, गलियों और मोहल्ले में घटती है। बड़े सजीव और वास्तविक सेट्स के बीच कम से कम जगह में नियति से अधिक से अधिक उदारता लेकर जीने के जज्बे को यहाँ देखा जा सकता है।

यहीं एक युवा सपना देख रहा है। प्रेम कर रहा है। डरता है मगर छोटे-मोटे गुनाह भी कर रहा है। पारिवारिक स्थितियों, अख्खड़ पिता की एकतरफा आक्रामकता, दूसरा विवाह और हिंसा को स्वयं भी सह रहा है, माँ को भी सहते देख रहा है। आधुनिक संसार में तकनीकी आविष्कार, विकास, आकर्षण, ग्लैमर के रास्ते बाकी दकियानूसी पूछताछ या आधारकार्ड नहीं देखा करते। कोई-कोई जगह किस्मत का जादू बस्ती के बीच से अचानक प्रकाशित होने वाले रॉकेट की तरह आवाज करता है और ऊँचा उड़ जाता है। यह राकेट मुराद अहमद किस तरह है, यह देखना ही गली बॉय फिल्म के अर्थ को समझना है। मदद करने वाले दोस्तों का भी संसार खूब होता है। अपराधी दोस्त अपनी ही भाषा में पुलिस के द्वारा खूब तोड़ा जाता है लेकिन नायक का नाम नहीं लेता। नायक जब सफल हो जायेगा, पैसा बना लेगा तब जमानत भी ले लेगा, यह भरोसा है।

रणवीर सिंह के जीवन और कैरियर की पहली अच्छी फिल्म है जिसमें न वह सिम्बा टाइप छिछोरा है और न ही खिलजी जैसा वीभत्स। वह एकदम मुराद अहमद है। दब्बू, झेंपू, डरने वाला, सहमा सा लेकिन एक अजीब सी सनकी लड़की से प्यार करने वाला जो आये दिन शक-शुबहा में नायक के जीवन में आने वाली लड़कियों से मारपीट किया करती है। वह अपनी होने वाली सास को यह पूछने पर कि खाना बनाना जानती हो, उत्तर देती है कि एक घण्टे में आपका लिवर ट्रांसप्लाण्ट कर सकती हूँ। फिल्म में अच्छे मानवीय रंग हैं सौतेली माँ को नायक का गाना पसन्द आना, माँ को बेटे का गाना पसन्द आना जैसे कई अच्छे पंच हैं।

सपनों को साकार करने का संघर्ष एक अलग ही पथ का रागी बनाता है मनुष्य को। नकारात्मकता अतिरेक से पहले ही परास्त हो जाती है दृढ़ इच्छाशक्ति और हौसले के आगे। आत्मबल और जुनून जीवन में बदलाव के मील के पत्थर ठहर-ठहर कर गाड़ते हैं, दूरी-दूरी पर गाड़ते हैं पर उन तक पहुँचने का पथ भी प्रशस्त करते हैं, गली बॉय यही बात अपने आपमें एक फिल्म की तरह एक प्रतिभाशाली निर्देशक के माध्यम से सफलतापूर्वक कह जाती है.............