बुधवार, 15 मार्च 2017

।। बद्रीनाथ की दुल्हनियाँ।।




बहुधा कम ऐसा होता है कि सुरुचिपूर्ण सिनेमा को एक दर्शक के रूप में देखते हुए आपका प्रवेश दिलचस्प तिलिस्म में हो जाये और वहाँ आप लगभग उतने समय सम्मोहित होकर उसकी अन्तःदीर्घाओं में घूमते रहें। जब आप सब कुछ देख चुकें, आपका काम हो जाये और आप बाहर आयें तो आपको सहज और हल्का महसूस हो और इतना तो कहते ही बने कि यार घाटे का सौदा नहीं था, फिल्म अच्छी थी......... बद्रीनाथ की दुल्हनियाँ देखकर मुझे ऐसा ही लगा है। सच कहूँ तो मुझे उसके पोस्टर ने आकर्षित किया। वह एक बड़े से घर के आगे खड़े कलाकार-किरदारों के माध्यम से एक ऐसा रंग-आकर्षण रचता है कि आपको उसमें कुछ मोहक नजर आने लगता है। मुम्बइया सिनेमा अपनी परिधि तोड़कर जब देश के दूसरे शहरों में कथा रचता है तो उसका प्रभाव अलग ही होता है। हालाँकि आंचलिकता और लोकभाषा की अपनी शुद्धता को लेकर समस्या आती है लेकिन दूसरे प्रभाव और गुण ऐसे होते हैं कि भूलों को आप देखते चलते हो और अपने से ही यह तय करते हो, कि बाद में देखेंगे।
यह एक रोमांटिक युवा की कहानी है जो बड़े परिवार का है और दसवीं पास करना उसके लिए विशेष योग्यता है। बाकी पिता और पिता का आर्थिक प्रबन्धन और साम्राज्य है ही। इसी के साथ वह प्रेम की परीक्षा देने निकलता है। कहानी झाँसी से कोटा आती-जाती है। नायिका एक रिश्ते में ठगी गयी है और वह इस हार से बड़ी एक सफलता की तलाश में है। उसकी बहन की शादी की उलझन और इस नायक का मिलना एक अलग से समीकरण बनाता है। कहानी यों बहुत छोटी होती लिहाजा मध्यान्तर में नायिका को उस पूरे मांगलिक दृश्य से हटा देना और फिर कहानी को अपेक्षाकृत कम सार्थक प्रतीत होने वाले स्वप्न से जोड़ना इसलिए बहुत प्रभावित नहीं करता क्योंकि फिल्म के अन्त में नायिका झाँसी में एयर होस्टेस के प्रशिक्षण वाला इन्स्टीट्यूट चलाना तय करती है। बेहतर होता, नायक शादी करके नायिका के साथ विदेश चला जाता। खैर करण जौहर ज्यादा समझदार हैं क्योंकि फिल्म बनाने में धन उन्होंने ही लगाया है, अपनी सलाह लगभग व्यर्थ की है.....
बद्रीनाथ की दुल्हनियाँ के अच्छे लगने के पीछे उसका मनोरंजन का सीधा-सादा सिद्धान्त है। कोई घुमाव-फिराव नहीं है। इसीलिए सीधी धारा पर कहानी चलती है। फिल्म में संवाद निरन्तर और दिलचस्प हैं। खासकर वाक्चातुर्य चरित्रों के व्यवहार में झलकता है, नायक वरुण धवन, नायिका आलिया भट्ट और दूसरे सहायक कलाकार। फिल्म को सहायक कलाकारों ने भी बखूबी जमाया है। शादी-ब्याह के मसले, पारिवारिक मांगलिक उल्लास, विसंगतियाँ, रूढ़ियाँ, अविश्वास इन सबके बीच से समय को देखने की कोशिश है। गाने निरर्थक हैं, ज्यादा हैं और पुराने गानों को दोहराने की भी आवश्यकता नहीं थी।
नयी पीढ़ी का जीवन को लेकर सोच, स्वप्न और यथार्थ के बीच जो घटित होता है, वह फिल्म के मूल में है। नायिका की माँ की भूमिका में कनुप्रिया शंकर पण्डित Kanupriya Shankar Pandit, पिता की भूमिका में स्वानंद किरकिरे, सहनायकों की भूमिकाओं में अपाशक्ति खुराना, नायक के मित्र की भूमिका में साहिल वैद आदि पूरक हैं और अपनी भूमिकाओं को बखूबी निबाहते हैं। मुम्बई से बनकर आने वाली फिल्मों में हम कई बार भ्रम और धोखे में अच्छी समझकर बुरी फिल्म को भुगत आया करते हैं, उस लिहाज से बद्रीनाथ की दुल्हनियाँ बेहतर फिल्म है। देख लेना चाहिए। यदि सितारा देना ही मापदण्ड है तो मानिए कि लगभग तीन सितारे देने योग्य है यह फिल्म, अपने बजट, अपनी सीमाओं, अपनी सितारा बिरादरी के साथ...........

मंगलवार, 14 मार्च 2017

फिर विस्थापन..............





पता नहीं विस्थापन क्यों होता है? अपने पास इसका ठीक ठीक उत्तर नहीं होता। विस्थापन जब होता है तो हमारे सामने विकल्प नहीं होता, सिवाय विस्थापन का अनुसरण करने के। एक विस्थापन न जाने कितने-कितने बदलाव करता है! शहर से लेकर समाज तक नवाचार करने, नया वातावरण गढ़ने, आधुनिकता की परिभाषा सूझने से लेकर उसको स्थापित करने या लाद देने तक कुछ पता नहीं होता। अमली जामा या कह लें खाका तैयार हो जाने के बाद हमें पता चलता है कि हमारे पीछे से दीवार हटा ली जा रही है। जितना अधिक असावधान होंगे, उतना ही तेजी से विचलित या हतप्रभ हो जायेंगे। सम्हलेंगे तो उस विस्थापना के समर्थन, स्वाभाविक तौर पर मन मारकर आप हो जायेंगे। चलो, उठो, पिछली बार यहाँ कब आये थे, कितना ठहरे रहे और अब कहाँ जाओगे तत्काल तो यह किसी को पता नहीं। दिषायें आपको कितना बदल देंगी, सिरहाना और पैताना बदला हुआ होगा। नये सिरे और पैरे का अभ्यस्त होने में फिर समय लग जायेगा। बदलाव आता है, बदलकर जाता है। थोड़ी-बहुत कतरब्यौंत के बाद आप भी प्रारब्ध के लिए तैयार होते हैं। यह बात अलग है कि आप कितना सहज होते हैं, कितना हँस रहे होते हैं, कितनी उदासी होती है, क्या भीतर-क्या बाहर, सिवा आपके कोई नहीं जानता। आपका हाल दरअसल उसे तो पता ही नहीं होता जिसकी आवाज मतलब का पूर्वरंग होती है और वह आपका हाल पूछ रहा होता है............

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

कलियों की ख्वाहिशऔर काँटों का हार.........

प्यासा : साठ साल पहले..........



एक संवेदनशील सिनेमा को देखते हुए संवेदनशील अनुभवों से गुजरना अपने आपमें अविस्मरणीय अनुभूति हुआ करती है। कुछ दिन पहले ध्यान आया कि महान फिल्मकार स्वर्गीय गुरुदत्त की मील का पत्थर मानी गयी फिल्म प्यासा के प्रदर्शन को इसी फरवरी माह में साठ साल हो रहे हैं तो न जाने क्यों एक बार उसे फिर से देखने और उतनी देर उसमें रमे रहने की इच्छा बलवती हो उठी। प्यासा को देखना सचमुच अपने आपमें सिहरे बने रहने की तरह है। हमारे सामने इस चलती फिल्म के माध्यम से जो कुछ भी घटित होता है वह साठ साल पहले का है, वातावरण, समाज, लोग आदि। आज हम बहुत सी बातों के लिए त्राहि-त्राहि किया करते हैं। अनेक स्थितियों की कल्पना करके आँख मूंद लिया करते हैं। अनेक अप्रिय घटनाक्रमों की चर्चा भी नहीं करना चाहते। लेकिन एक गुणी और गहरा फिल्मकार प्यासा के माध्यम से हमारे सामने व्यवहारिकी और अनुभवों का जैसा दृश्‍य-बिम्ब रच रहा है वह देश की आजादी के ठीक एक दशक बाद का आकलन है। छल, कपट, लोभ, लालच, अपने-पराये, प्रेम, बेचैनी और भी अनेक स्थितियाँ जैसे शीशे में दिखायी देता आज है। 

प्यासा को लेकर प्रदर्शन से लेकर इस पूरे समय में अनेक बार अनेक गहरे विश्‍लेषण हुए हैं। इस फिल्म पर ज्ञानियों ने बात करना चाही है। अपनी-अपनी तरह से फिल्म की एक प्रकार से गहन व्याख्या ही की है जिसके माध्यम से हमें इस फिल्म के मर्म को समझने में सहजता हुई है। आज की बात नहीं कही जा सकती लेकिन हाँ कल की बात करते हुए इतना कहा जा सकता है कि हर सिनेमा मनोरंजन के लिए नहीं हुआ करता था और न ही बना करता था। सिनेमा को यदि जीवन का हिस्सा माना जाता है, सिनेमा को यदि समाज का प्रतिबिम्ब माना जाता है तो यह स्थितियों को गढ़ने में देर नहीं किया करता था। फिल्मकारों ने अपनी संवेदना, दृष्टि और अनुभवों को सर्जनात्मक अभिव्यक्ति का आधार बीसवीं शताब्दी की इस सबसे चमत्कारी विधा के माध्यम से बनाया। इसीलिए सिने-इतिहास की अनेक फिल्म लैण्डमार्क मानी जाती हैं।

प्यासा की गणना सौ साल की दस श्रेष्ठ फिल्मों में सहजतापूर्वक की जाती है। यह उस काल की फिल्म है जब आसपास संगठित अपराध को लेकर फिल्में बना करती थीं, रोमांटिक ट्विस्ट को लेकर फिल्में बना करती थीं, सपने देखने, उसे बोलकर बताने और उसे साकार करने को लेकर फिल्में बना करती थीं और हाँ सपने टूटने को लेकर भी। गुरुदत्त ऐसे वातावरण में कुछ अलग सी बात करने जैसे आये थे। एक तरफ वे दूसरे निर्माताओं की फिल्मों में बड़े अलग से रोमांटिक नायक बनकर नायिका के साथ रोमांस करने और अफसाने गढ़ने का काम कर रहे थे वहीं दूसरी ओर उनका फिल्मकार एक अलग पथ पर जाने की साहसिक पहल कर रहा था जिसका पहला सबसे पढ़ा जोखिम तो अस्वीकार या खारिज किया जाना ही था। लेकिन जैसी कि बात कहने में आयी साहसिक पहल, सो वे अपनी नजर और रचनाशीलता के हठ या आग्रहों के साथ होकर ही आगे बढ़े। प्यासा में वे उस नायक को बहुत सशक्त अर्थों में जीने में सफल रहे जो बहुत सारे भवनों, अट्टालिकाआेंं, महलों, के विद्रूप को छुपाने वाली चटाइयों-चिकों को उठाने में सफल होता है। प्यासा आदमी के चेहरे से भी परदा हटाती है और उसकी आँख के परदे की भी उतने ही साहस के साथ शल्य-क्रिया करती है। 

प्यासा को देखिए कितने बड़े लोग मिलकर एक महान फिल्म का रूप देते हैं......गुरुदत्त को खुद खैर केन्द्र में, ठीक है, वहीदा रहमान, रहमान, जॉनी वाकर, माला सिन्हा, मेहमूद, लीला मिश्रा वगैरह। फिल्म को लिखने वाले अबरार अलवी, श्वेत-श्‍याम सिनेमा को गहरे कलाबोध और शास्त्रीयता के साथ कैमरे की निगाह से देखने वाले सिनेमेटोग्राफर व्ही. के. मूर्ति, गीतकार साहिर, संगीतकार सचिन देव बर्मन, सम्पादक वाय. जी. चव्हाण, मोहम्मद रफी, गीता दत्त और हेमन्त कुमार जैसे स्वरों के सम्मोहक और भी प्रत्यक्ष तथा नेपथ्य में न नजर आने वाली अपनी अहम भूमिका और जवाबदारी से पल भर भी न डिगने वाले लोग। 

प्यासा, वास्तव में एक कवि कथा है। इस फिल्म को देखते हुए इसमें, जैसा कि तब हल्के-हल्के प्रचारित भी हो गया, गीतकार साहिर और फिल्मकार गुरुदत्त के जीवन से जैसे जतनपूर्वक, सूक्ष्मता और सावधानी के साथ कुछ अन्तर्वस्तु सर्जना के लिए जुटायी गयी हो, ऐसा लगता है। सिनेमा के आलोचक मनमोहन चड्ढा प्यासा के बारे में हिन्दी सिनेमा का इतिहास पुस्तक में लिखते हैं कि प्यासा की विषेषता यह है कि यह एक अनगढ़ फिल्म है। इसमें गुरुदत्त की पहली फिल्मों जैसा कसाव नहीं है, न ही इसमें, साँचे में ढली-ढलाई कथा ही है। इसीलिए कुछ हिस्से में यह फिल्म कमजोर लगती है लेकिन कुछ हिस्से दर्शक पर ऐसी छाप छोड़ते हैं कि वे उसकी स्मृति में हमेशा के लिए बस जाते हैं। प्यासा में साहिर लुधियानवी का कवि पूरी तरह हावी है। विशेषतया वेश्‍याओं के बाजार वाले दृश्‍यों में, जहाँ धुंधली आकृतियाँ, कोठे, उनके बीच घूमता कवि और उसकी कविता सभी आपस में घुलमिल जाते हैं और उसकी कविता शुद्ध चाक्षुष बिम्ब बन जाती है। ऐसा ही प्रभाव अन्तिम दृश्‍य का है जहाँ कवि विजय उसे श्रद्धांजलि देने के लिए आयी भीड़ में शामिल होता है। 

फिल्म का नायक विजय अपनी आँखों से जमाने की बात कह रहा है। उसकी उपेक्षा उसके परिवार से शुरू होती है जहाँ उसको सूझने-समझने वाला कोई नहीं है। उसका कवि होना, उसका निकम्मा होना परिवार के लिए बड़ा बोझ है। प्रकाशकों को उसकी कविताओं से लगाव इसलिए नहीं है क्योंकि वह आम आदमी के दुख दर्द की कविताएँ लिखता है। प्रकाशकों को रोमांटिक कविताएँ चाहिए। वह दृश्‍य बड़े हृदयविदारक हैं जब भाई विजय की कविताएँ, पाण्डुलिपि रद्दी वाले को बेच देते हैं और विजय को उसके तथाकथित निकम्मेपन के लिए आड़े हाथों लेते हैं। विजय का अपनी खो गयी कविताओं की तलाश में भटकना संवेदनशील दर्शक को व्यथित करता है। उसके चेहरे पर टूटती उम्मीदें, दर्षक को भी विचलित करती हैं। हताशे विजय के घर से चले जाने, लौटकर नहीं आने पर भाइयों की खुशी और उसके ठीक विपरीत माँ का बिलखना जैसे दर्षक के सारे उद्वेलन को बाहर ले आता है। प्यासा जिस तरह से दृश्‍य दर दृश्‍य जोड़े रखती है, इस तरह पैठ जाती है कि हम आसानी से अपने आपको उससे अलग नहीं कर पाते। प्यासा में तेल मालिश करने वाले जॉनी वाकर का किरदार और गाना भी भुलाया नहीं जा सकता, वह फिल्म में लगातार महसूस होने वाले भारीपन के बीच सहज करने के लिए एक खूबसूरत प्रयोग है। भरोसे, प्रेम और समर्पण से भरे दूसरे गाने भी आज सजन मोहे अंग लगा लो, हम आपकी आँखों में, ये हँसते हुए फूल, जाने क्या तूने कही यह कुछ पल के लिए हमें उस तनाव से परे हटाते हैं लेकिन अन्ततः प्यासा में दर्शक के लिए वह तनाव ही गढ़ा भी गया है। वैसे भी हर सिनेमा से आपको बाजारू मनोरंजन की अपेक्षाऍं करनी भी नहीं चाहिए। 

किसी भी सिनेमा का अर्थवान हो जाना अचानक सी कोई घटना नहीं होती। उसके पीछे बहुत बड़ी दृष्टि, बहुत बड़ा सर्जनात्मक परिश्रम काम करता है। गुरुदत्त एक छोटी जीवनआवृत्ति वाले ऐसे फिल्मकार के रूप में हमारे बीच आये और चले गये जिन्होंने अपनी दो-चार फिल्मों से ही वह अर्जित कर लिया था जिसके लिए लोग जीवनभर लगे रहते हैं। क्लैसिकी की उनकी अद्वितीय समझ को ही इस बात का श्रेय जाता है कि उनकी पहचान प्रमुख रूप से प्यासा, कागज के फूल और साहब बीवी और गुलाम से की जाती है। उन पर जितनी भी गहराई से बात करना हो, उनकी रचनाशीलता को जितने विस्तार से जानना हो, हम इन तीन फिल्मों पर एकाग्र होकर चाहे जितनी देर बात कर सकते हैं। गुरुदत्त के बारे में यह बात लगभग उनके नहीं रहने के बाद, उनकी अनुपस्थिति में स्थापित ही कर दी गयी थी कि वे नैरार्श्‍य के फिल्मकार थे या अवसाद को अपने में बनाये रखने वाले मनुष्य थे। स्वाभाविक रूप से गुरुदत्त इसका प्रतिवाद करने नहीं आ सकते थे लिहाजा यह बात अनेक जगह ज्यों की त्यों दर्ज होगी लेकिन प्यासा का विजय, एक किरदार अन्ततः एक विद्रोही युवक है जो अपनी भरपूर क्षमता के साथ दुनिया को धिक्कारता है। वह बहुत से लोगों को शर्मसार करके रख देता है जो भद्रता और बनावटीपन का आवरण ओढ़े, चेहरे की चाशनी बढ़ाये लेकिन शरीर का नमक घटाये हमारे आसपास विचरण करते हैं।

प्यासा दरअसल गला ही नहीं सुखाती, एक निरन्तर लड़ते और षडयंत्रों से परास्त होते भले इन्सान की आत्मा के भी सुखा जाने की बेचैनी को व्यक्त करने वाली फिल्म है। भारतीय सिनेमा की उपलब्धियों की चर्चा कभी भी इसके बगैर नहीं की जा सकती है।


रविवार, 5 फ़रवरी 2017

जीवन का मिलान........

ठीक-ठीक नहीं बता पाता, बहता किस तरह हूँ। बहना मेरे लिए उस तरह का रूमान शायद नहीं रहा है कि बाँह फैलाये डूबने के डर के बिना बह रहा होऊँ। मैं उस पूरे समय में जब बह रहा होता हूँ तैरने की चेष्टा नहीं करता। हो सकता है एक बड़ा सा आलस्य जिसे बहुत बार उपेक्षा की तरह भी ग्राहृय होते देखा है, इसका हिस्सा रहा हो। मुझे अपने वेग की चिन्ता जरूर रही है। इस बात की प्रतीति बनी रही है कि वेग अन्ततः मुझे मेरी चोट के लिए भी उत्तरदायी बनायेगा। मेरी मुट्ठी में कोमल रुमाल अपनी सलवटों और घुटन के बाद भी मुझे भरोसा देता है। 

मैं कागजों में एक-एक करके घटते समय को देखा करता हूँ। प्रत्येक दिन हस्ताक्षर करते हुए, पीछे किए हस्ताक्षरों से कुछ जीवन का मिलान करने का मन होता है। कभी हार कर, कभी साथ और पास में रखे हुए, कभी संचित के भरोसे से तो कभी कुछ भी अर्जित न हो पाने की निराशा के बीच भी मेरी धड़कनों का नाप सही रहा है। मुझे लगता है वो सब मेरे पास, दूर से मेरी नब्ज को थामे हुए हैं, शायद उस समय या उस दिन के बाद से यह ज्यादा ही हो गया है, पीछे मुड़कर देखता हूँ तो जैसे कल ही मेरी काया खण्डित हो गयी हो और नब्ज को छूने वालों ने आपस में ही एक-दूसरे के हाथ तक अपना हाथ कर दिया हो, एक-दूसरे के विखण्ड को और धराशायी होने से रोकने के लिए...........एक का हाथ दूसरा पकड़ता है, दूसरे का तीसरा और सबमें बँटा एक जीवन, सबमें ही आता-जाता है। 

स्वप्न बहुत अधूरी और मिथ्यानींद में भी निस्तब्धता में दौड़ती सुनायी देती एम्बुलेंस और किंचित पीड़ाओं या अव्यक्त व्यथाओं में विलाप करते श्वानों के प्रभाव में अपनी पटकथा बदलने को होते हैं। बहुत देर से जागना एक आदत या स्वभाव ही है लेकिन बहुत देर में जागने पर अकेलापन जीवन में स्थायीभाव की तरह आया जा रहा है...........सम्भवतः अपने जागने के समय पर अपना सवेरा घोर अप्राप्ति में प्राप्ति का भ्रम ही है...........

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

काबिल : केवल हृतिक का सम्मोहन


सोचता हूँ कुछ दिनों की अतिशय कार्यविधि के बाद सिनेमा देखने का आप-हठ इस तरह बुरा नहीं था कि काबिल फिल्म देख ली। अक्सर जो बैनर अपने मुखिया के नाम पर ही जाने जाते हैं वहाँ किसी दूसरे निर्देशक का फिल्म निर्देशित करना फ्लेवर बदलने जैसा शायद होता हो या एकरसता के विरुद्ध नवाचार का उपक्रम, फिर भी फिल्म क्राफ्ट और राकेश रोशन की, हृतिक रोशन की फिल्म वो संजय गुप्ता कर रहे हैं जिनकी एक्शन फिल्मों को देखने का अनुभव बहुत यादगार रहा है, मेरे लिए, काबिल में उससे बहुत कम एक्शन है, हालाँकि विषय प्रतिशोध का है वह भी एक नेत्रबाधित नायक का।
कहानी बहुत जल्दी ही अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर देती है जब हादसे की शिकार नायिका को कहानीकार मार देता है। नायक-नायिका दोनों ही देख नहीं सकते, दो में प्रेम होता है और शादी भी लेकिन मुहल्ले के ही एक ओछे अपराधीनुमा नेता के भाई की बुरी दृष्टि एक हादसे की वजह बनती है। नायक फिर उन्हीं को एक-एक करके अपनी चतुराई से मारता है। हृतिक रोशन को एक जबरदस्त हिट की जरूरत है जो फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही। काबिल भी वैसी नहीं है। वह सब छोड़ दें कि दो फिल्में एक दिन क्यों रिलीज की गयीं, बहरहाल कुछ हद तक काबिल अच्छी फिल्म इसलिए है क्योंकि वह एक नायक की निष्ठा और प्रेम को बड़ी भावात्मकता के साथ प्रस्तुत करती है। खालिस एक्शन फिल्म बनाने वाले संजय गुप्ता ने अरसे बाद कोई फिल्म निर्देशित की और वह उनके स्वभाव से अलग है, उस तरह से देखना रोचक लगता है कि निर्देशक ने कथ्य और उसके मर्म को समझने का प्रयास किया है।
काबिल की कहानी कमजोर है, यह बात मान लेनी चाहिए क्योंकि नायक-नायिका का रोमांस परिपाक तक पहुँचा ही नहीं, जल्दी ही विवाह घटित हो गया, जल्दी ही दुर्घटना भी फिर एक लम्बा और बोझिल निर्वाह अन्त तक पहुँचने का। ठीक मध्यान्तर पर फिल्म मोड़ लेती तो दर्शकीय दिलचस्पी बनी रहती। बहुत से दर्शक उसको साधारण नजरिए से लेते हैं। हमारे चुहलबाज दर्शकों को तो वेदना, विडम्बना और हादसे भी मूर्खतापूर्ण ढंग से सिनेमाहॉल में हँसाते हैं। हाँ, फिल्म में पुलिस इन्स्पेक्टर बने नरेन्द्र झा अपनी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में प्रभावित करते हैं। उनको जितने भी दृश्य मिले, उन्होंने अपने व्यक्तित्व और आवाज से उसको हासिल करने की कोशिश की। नायिका यामी गौतम के साथ तो खैर अन्याय हुआ ही। फिल्म में बड़ा सितारा तामझाम नहीं है सो कम लोगों में ही फिल्म सिमट गयी है। फिल्म के खलनायक थके हुए और शिथिल लगते हैं। रोहित राय भावशून्य मगर अतिआत्मविश्वास से भरा लेकिन उनकी कोई इमेज नहीं है। वैसे ही रोनित राय भी सारी दादागीरी स्वतःपस्त आदमी की तरह करते हैं जो न तो यह व्यक्त कर पाता है कि उसका व्यक्तित्व कितना वजनदार है और न ही यह साबित कर पाता है कि राजनैतिक रूप से वो कितना रसूखदार है!! ऐसे यह फिल्म दो स्टार से आगे नहीं बढ़ पाती।
जब आप एक संवेदनशील विषय अपनी फिल्म में लेकर चल रहे हों तो दो तरफ से जवाबदारी बनती है, एक फिल्मकार के रूप में अतिरिक्त संवेदना की और दूसरी दर्शकों की ओर से अधिकतम सोच को समझने की ताकि प्रयोग सतही न हो जाये। गाने याद नहीं रहेंगे, एक याराना का दोहराव है, सारा जमाना और राजेश रोशन के संगीत को लेकर कुछ भी विपरीत कहने की स्थिति मुश्किल से आती है क्योंकि वे समृद्ध इतिहास के व्यक्ति हैं, यहाँ जैसे वे कुछ कर ही न सके हैं।
काबिल, केवल हृतिक के सम्मोहन में एक बार देख ली जाने वाली फिल्म है क्योंकि वे पटकथाओं के मारे हैं, मोहन जोदारो में भी उम्मीद में सिनेमाघर बुला लेते हैं, अभी भी ऐसा ही हुआ है...........
#kaabil #hritikroshan #yamigautam #narendrajha #filmreview 

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

धैर्य-अधैर्य की परीक्षाएँ और आता हुआ 2017

उत्सवधर्मिता हमारा स्वभाव है और उससे चार कदम आगे बढ़कर जश्न हमारा उन्माद। पूर्णता के निकट पहुँचते हुए हमारा धीरज छूटने लगता है, शेष के प्रति हम लगभग आक्रामक हो उठते हैं। कई बार हमारे जीवन में वही शेष बहुत कठिन और जोखिम भरा होता दिखायी देता है, कई बार हो भी जाता है। अनुभवी, सदाशयी, गुणी और जानकार लोग इसीलिए सब्र या धीरज की बात कहते हैं। आज 2016 का आखिरी माह और आखिरी तारीख, सभी के जैसे धैर्य की परीक्षा लेने जा रही है। जो सुबह जागा है, उसे रात की चिन्ता है, जो दोपहर में है वह शाम को फलांगना चाहता है और रात को जीना चाहता है। कहने का आशय यह कि हम तैयार हैं.............
न जाने कितने वाहनों के टैंक फुल हो गये होंगे। कितने ही लोग दो-चार दिन पहले से कहीं-कहीं अपनी पसन्द की संगत में आज दिन तक आ गये होंगे, धीरे से उन सभी की जिन्दगी में कल भी आ ही जायेगा लेकिन दोहराता हूँ कि उन सबकी अपनी तैयारी होगी। विश्व में बड़े से बड़े होटल में आरक्षण हो चुका होगा, बैठने और नियंत्रण में बने रहने से लेकर नियंत्रण छूटने तक सब देख लिया जायेगानुमा। रात को बहुधा जनसंख्या और समाज जब सो रहा होगा तब रह-रहकर तेज रफ्तार की गाडि़यों की आवाज सुनायी देगी, पुलिस का सायरन और एम्बुमलन्स भी। आकाश रोशनी से पट पड़ेगा। आत्म प्रचार का एैब (एप-वाट्सअप) सन्देशों से भरता चला जायेगा, मेसेजेस भी। पढि़ए, न पढि़ए, खाली करते रहने की जद्दोजहद से जूझिए।
यह वैभवीयता महानगरों और रसूखदारों के उस संसार का एक भाग है जहाँ रुपए और आतिशबाजी एक बराबर है। ऐसे ही क्षण हमें उन सबकी कल्पना होती रहे, जिन्होंने इसी साल कोई अपना खोया है, गम्भीर बीमारी से जूझना जारी रखा है, अनेक मुश्किलों का सामना किया है, लक्ष्य अर्जित किए हैं, धोखे से गिरे हैं, कठिनाई से उठे हैं और अपनी धारा पर आये हैं। वाट्सअप के दौर में हम अपना बताने में इतना हठी हैं कि अपने ही किसी के हाल से अवगत होना लगभग भूल गये हैं। थोड़ी बहुत स्पेस संगियों के लिए भी जरूरी है। हम किस बड़े के बगल में खड़े थे, वह बगल वाला हमें अगले ही क्षण भूल चुका है, पता होता ही होगा हमको। कहाँ हो आये, क्या कर आये, ठीक है, समय रहते सब जान लेंगे।
हमारी आबोहवा हमें हर क्षण सतर्क रहने के लिए सचेत करती है। खानपान, रहन-सहन, परिवेश, सड़क पर निर्मम होकर तेज रफ्तार से जाती गाडि़याँ, लो-फ्लोर बसें, पटरी छोड़कर खेत में घुस जाने वाली रेलगाडि़याँ, चिकित्सा, आदतें, स्वभाव सब जगह वही जोखिम हैं और अपराधियों से हैं। बचपन में कई बार अपने आसपास अचानक हो जाती किसी की मृत्यु पर माँ बड़े धीरे से बतलाती थी, रात को बेतहाशा शराब पीकर लौटे थे, सोते ही रह गये या दोस्तों में जमकर पी या पिलायी, आग्रह और हठ करके ज्यादा हो गयी, मस्तिष्क या हृदय बैठ गया या फिर होश में नहीं थे, ऐसी गाड़ी चला रहे थे कि अंधेरे में कुछ नहीं दिखा, सामने से आती गाड़ी न दिखी और यह भयानक घट गया। ऐसे ही देखते देखते दृश्य बदल जाने की स्थितियों को निर्मित करने से बच सकें तो बचें। मन, मस्तिष्क, देह और चेष्टाओं से बिना अनियंत्रित, अराजक, मादक या विवश हुए भी नया साल आ जायेगा। अच्छी सुबह होगी, पंछियों का अलार्म होगा, वे आकाश में भोर में उड़ेंगे भी अपने पुरुषार्थ के लिए, उनके साथ जागने और उन्हीं के साथ भोर का हिस्सा बनने के अलग सुख हैं।
मैं मध्यप्रदेश कैडर की वरिष्ठ आय एस अधिकारी श्रीमती स्नेहलता श्रीवास्तव जो कि वर्तमान में भारत सरकार में सचिव हैं, कुछ वर्ष पहले वे संस्कृति विभाग की अविभावक थीं, उनका हम सबकी एक बड़ी बैठक में किया गया कथन भूल नहीं पाता जिसमें उन्हों ने सभी से कहा था कि आप लोग कितना काम करते हैं, वर्षों से आपके अनुभवों को समृद्ध होते देखा है, देश-दुनिया के कलाकारों के साथ जुड़ने के इस रचनात्मक काम को आप बहुत सारा समय देकर अंजाम देते हैं। मेरा आप सभी से यह अनुरोध है कि अपनी सेहत, तबियत का ख्याल रखा करें, अपने परिवार का ख्याल रखा करें, जो स्वस्थ हैं, वे सदैव स्वस्थ रहें यह कामना है लेकिन जो दवाइयाँ खाते हैं, वे समय पर दवाइयाँ जरूर खाते रहा करें, अपने मन को ऐसे ही सहज बनाये रखें क्योंकि आपके परिवार को आपकी बहुत जरूरत है..................इतना कहते हुए वे बिल्कुल माँ की तरह भावुक हो गयीं..........मैं उनकी इस बात को आज तक नहीं भूल पाया और इतनी आत्मीयता के साथ जो जगह उन्होंने मन में बनायी है, परमस्थायी है। ये बातें, इस 2016-2017 की मन:स्थितियों के आसपास भी उतनी मौजूँ हैं मित्रों.............#happynewyear #snehlatashrivastava #lifestyle #mordanity #thinking

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

दुनिया सदा ही हसींं है.........

गुलशन बावरा का व्यक्तित्व अत्यन्त सहज और आत्मीय था। छोटी उम्र की एक भयानक घटना ने उनके पूरे व्यक्तित्व को एक डरे-सहमे मनुष्य में तब्दील कर दिया था लेकिन पतली छरहरी काया में ये जीने और संघर्ष करने का हौसला भी खुद इकट्ठा करने में कामयाब हुए थे। यह सच है कि पश्चिम पाकिस्तान के शेखपुरा में अब से लगभग सत्तर वर्ष पहले बैसाखी के दिन १३ अप्रैल को जन्मे गुलशन बावरा विभाजन के बाद जब हिस्दुस्तान आ रहे थे, तभी रास्ते में उनकी आँखों के सामने उनके माता-पिता को निर्मम ढंग से मार दिया गया था। इस घटना से सिहरे गुलशन की पूरी काया में वह भय ऐसा बैठा कि जीते-जी उसके प्रभाव उनके व्यक्तित्व और अभिव्यक्ति में महसूस किए जा सकते थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई जयपुर और फिर उसके बाद दिल्ली में हुई। 

गुलशन बावरा ने छठवें दशक में तकरीबन छः साल रेलवे में नौकरी भी की। बचपन से गीत और शेरो-शायरी के शौकीन गुलशन ने अपनी माँ विद्यावती के भजन और मौलिक गीत गाने से प्रेरणा लेकर अपनी इस रुचि का विस्तार किया। बाद में उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़ दी और फिल्मों में गीत लिखने के लिए संघर्ष करना शुरु किया। उनको पहला अवसर फिल्म चन्द्रसेना में मिला जिसका गीत ‘मैं क्या जानूँ कहाँ लागे ये सावन मतवाला रे’, उन्होंने लिखा जिसे लता मंगेशकर ने कल्याण जी-आनंद जी के निर्देशन में गाया था। कल्याण जी-आनंद जी के ही निर्देशन में उन्होंने फिल्म ‘सट्टा बाजार’ के लिए भी गीत लिखे, चाँदी के चन्द टुकड़ों के लिए, तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे और आँकड़े का धंधा। युवावस्था में जमाने और रुमान को लेकर उनकी दृष्टि भी खूब थी। बीस साल की उम्र में वे इतने अच्छे गीत लिख रहे थे। दुबले-पतले गुलशन को रंग-बिरंगे कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। अपनी गोल-मोल आँखें नचा-नचाकर ये अजब ढंग से बात करके सबको आकृष्ट कर लेते थे। एक वितरक शान्तिभाई पटेल ने गुलशन कुमार मेहता को गुलशन बावरा नाम दे दिया और तभी से वे इस नाम से लोकप्रिय हो गये।

एक गीतकार के रूप में उनको ख्याति दिलाने का काम उनके गीतों ने ही किया। मनोज कुमार की फिल्म उपकार में उनका लिखा गीत, मेरे देश की धरती, बीसवीं शताब्दी का एक अमर और यादगार देशभक्ति गीत है। सालों-साल यह गीत जवाँ होता है और अपने ही अर्थों से ऊर्जा प्राप्त करता है। अभिताभ बच्चन को स्थापित करने वाली फिल्म जंजीर में उन्होंने यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी और दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए जैसे बेहद सफल और लोकप्रिय गीत लिखे। कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन ने अपनी प्रिय फिएट कार जंजीर की सफलता पर गुलशन बावरा को तोहफे में दे दी थी, जिसे वे अभी तक सहेजकर रखे थे और शौक से चलाया करते थे।

गुलशन बावरा ने अपनी सक्रियता के निरन्तर समय में लगातार लोकप्रिय गीत लिखे। कल्याण जी-आनंद जी से उनकी ट्यूनिंग खूब जमती रही। लगभग सत्तर से भी ज्यादा गाने उन्होंने उनके लिए लिखे। बाद में उनका जुड़ाव राहुल देव बर्मन से भी हुआ। एक बार गुलशन उनकी टीम में क्या आये, गहरे मित्र बन गये। राहुल देव बर्मन को गुलशन सहित उनके तमाम दोस्त पंचम कहकर बुलाया करते थे। इस टीम ने भी अनेक सफल और लोकप्रिय फिल्मों में मधुर और अविस्मरणीय गीतों की रचना की। एक सौ पचास से ज्यादा गाने गुलशन और पंचम की जोड़ी की उपलब्धि है। जिन फिल्मों के लिए गुलशन बावरा ने गीत लिखे उनमे सट्टा बाजार, राज, जंजीर, उपकार, विश्वास, परिवार, कस्मे वादे, सत्ते पे सत्ता, अगर तुम न होते, हाथ की सफाई, पुकार ,सनम तेरी कसम, हकीकत, ये वादा रहा, झूठा कहीं का, जुल्मी आदि प्रमुख हैं। गुलशन बावरा ने पंचम के साथ उनकी फिल्म पुकार और सत्ते पे सत्ता में गानों में भी सुर मिलाए।

मेरे देश की धरती सोना उगले, यारी है ईमान मेरा, दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए, हमें और जीने की चाहत न होती अगर तुम न होते, प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया, जिन्दगी मिल के बिताएँगे हाल ए दिल गा के सुनाएँगे, कस्मे वादे निभाएँगे हम, वादा कर ले साजना, कितने भी तू कर ले सितम, जीवन के हर मोड़ पे मिल जायेंगे हमसफर, तू तो है वही दिल ने जिसे अपना कहा, आती रहेंगी बहारें जैसे गाने हमारे बीच जब-जब ध्वनित होंगे, गुलशन बावरा हमें बहुत याद आयेंगे।

एक गीतकार के रूप में खासे ख्यात रहे गुलशन बावरा की एक और विशेषता उनका छोटी-छोटी भूमिकाओं में कुछ-कुछ फिल्मों में दिखायी देना थी। वे शौकिया अभिनय करते थे। कई निर्देशक, जिनके लिए वे गीत लिखा करते थे, या न भी लिखा करते थे, वे उन्हें अपनी फिल्मों में एकाध कॉमिक रोल उन्हें देते थे, जिसे वे आत्मविश्वास के साथ निभाया करते थे। उपकार में सुन्दर और शम्मी के मूर्ख बेटों में मोहन चोटी के साथ एक वे भी थे। दोनों सोम-मंगल की भूमिका में थे। इसी तरह जंजीर में दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए, गाने का फिल्मांकन भी उन्हीं पर हुआ जिसमें वे एक नर्तकी के साथ हारमोनियम गले में बाँधे गाते दिखायी देते हैं। विश्वास, परिवार, गँवार, पवित्र पानी, लफंगे, ज्वार भाटा, जंगल में मंगल, हत्यारा, अगर तुम न होते, बीवी हो तो ऐसी, इन्द्रजीत और एक पंजाबी फिल्म सस्सी पुन्नू में उनकी ऐसी ही भूमिकाएँ पहचानी जा सकती हैं।

गुलशन बावरा फिल्मी दुनिया में रहने के बावजूद उस दुनिया के स्याह रंग का हिस्सा कभी नहीं बने। उनकी दोस्तियाँ बड़ी सीमित थीं। वे अड्डेबाजी का हिस्सा कभी नहीं रहे मगर राहुल देव बर्मन से उनकी दोस्ती खूब निभी। पंचम की स्मृतियों और गीतों की कम्पोजिशन के पहले की सृजनात्मक प्रक्रिया और घटनाक्रमों पर उनका एक ऑडियो सीडी भी दो वर्ष पहले जारी हुआ था। सारा जीवन वे चुस्त-दुरुस्त रहे। कोई बीमारी न हुई। सुबह-शाम घूमने का खूब शौक था। रात को समय पर खाना खाकर सो जाते थे। उनकी पत्नी अंजू उनका बड़ा ख्याल भी रखती थीं। कैंसर जैसी बीमारी उनको बमुश्किल छः माह पहले हुई और देखते ही देखते इस बीमारी ने उनके जीवन को अचानक ऐसा संक्षिप्त कर दिया कि वे अलस्सुबह अचानक चले गये। गुलशन बावरा को एक प्रेक्टिकल गीतकार कहना ठीक न होगा, वे एक संवेदनशील मनुष्य थे जिन्होंने जीवन के अर्थात को बड़ी गहराई से समझा था। मृत्यु से पहले ही देहदान का संकल्प और निर्णय ले चुके गुलशन बावरा आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं मगर अपने अनेक गानों के जरिए शब्द-माधुर्य रचकर वे ऐसा इन्तजाम कर गये हैं कि हम उनको कभी न भुला पाएँ।
#gulshanbawara #sunilmishr #film #lyrisist 

अनुपम वाणी में मर्म तक उतर जाने की क्षमता थी.........

हमारे आदरणीय और देश के विद्वान आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह जी का अनुपम मिश्र पर लगभग आधे पेज का आलेख आज सुबह, भोपाल के अखबार सुबह सवेरे में पढ़ा। दो दिन पहले नयी इण्डिया टुडे भी लाया था, उसमें अनुपम भाई साहब पर सोपान जोशी का एक पेज का लेख छपा था, उसे भी पढ़ा। उसके पहले आदरणीय श्री ओम थानवी की वाल पर जाकर उनकी लिखी टिप्पणियाँ भी पढ़ता रहा था। कितनी तरहों से, कितने गुणी और संजीदा लेखकों, विचारकों और जानकारों ने अनुपम जी को लिख-लिखकर याद किया है, याद कर रहे हैं, याद करते रहेंगे। इन टिप्पणियों में वह खिंचाव है जो अपने अव्यक्त में मानो यह कह रहा है, कौन कहता है कि तुम चले गये हो, तुम कहीं नहीं गये हो, सबमें तो हो, तुमको कौन जाने देगा................

आदरणीय ओम थानवी जी ने उस आखिरी रात पर लिखा था जिसकी सुबह ने व्याकुल करके रख दिया था। सोपान जोशी की टिप्पणी में वह बात कितनी अच्छी लिखी है कि कभी-कभी कुछ ऐसे मानसिक रोगी अनुपम जी के पास आते थे जिनको उनके अपने घर परिवार ने तज दिया होता था, अनुपम जी उनसे बात करने के लिए गम्‍भीर से गम्भीर मंत्रणा तक छोड़कर उनसे कुछ खुफिया बात करने बाहर चले जाते। जब वापस आते तो याद दिलाते, मानसिक असन्तुलन एक लॉटरी है, किसी भी दिन, किसी की भी खुल सकती है........

डॉ विजय बहादुर सिंह ने लेख में उस समय जब वे पं. भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली पर गहरा काम करने में जुटे थे, एक लम्बा संवाद अनुपम जी से चाहते थे जिसका मौसम ही नहीं बन रहा था। लेख में उन्होंने याद किया कि अनुपम के बड़े भाई अमिताभ ने उनसे कहा था कि वो बातें शुरू करेगा तो बमुश्किल उसकी बातें खत्म होंगी। विजय बहादुर जी ने भवानी दादा की एक कविता की पंक्ति को अनुपम जी के साथ इस तरह उल्लेख में याद किया है कि भवानी दादा ने कहा था कि हर व्यक्ति/ फूल नहीं हो सकता/ किन्तु खुश्बू सब फैला सकते हैं........अनुपम वाणी में मर्म तक उतर जाने की क्षमता थी.........

अनुपम भाई साहब के साथ कई बार मिलना याद आता है, वहीं पिछले एक साल न मिल पाना झुंझलाहट भी देता है, जो कि अब वह भी किसी काम की नहीं रही। वही उनका कहना कि केवल हमें भर देखने के लिए यहाँ तक आने की जरूरत नहीं है...........वे बस ऐसे ही हालचाल लेने/पूछने का मन होने पर फोन किया करते थे। वे एक छोटे से पास पड़े कागज पर घर का पता लिख देने को कहते थे और फिर गांधी मार्ग का चन्दा जमा करके अंक भिजवाना शुरू कर देते थे। किताबों की पार्सल-पै‍किंग में उनकी सफाई, बच रह गये कागज, पुट्ठे-गत्ते के टुकड़े और ऐसी ही अनेक चीजों का इस सृृष्‍टा के पास पुनर्जीवन का मंत्र था। ऐसा सृृष्‍टा कहाँ जा सकता है, कहीं नहीं......आपको कौन जाने देगा भाई साहब...........#anupammishra #gandhishantipratishthan 

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

दंगल : एक स्‍वप्‍नद्रष्‍टा की जिन्‍दगी को घटित होते देखना........


दंगल फिल्म को लेकर सिनेमाप्रेमियों में बहुत जिज्ञासा रही है। ट्विटर में बहुत सारे कलाकार और सिनेमा से जुडे़ लोगों ने कल फिल्म प्रदर्शित होने के बाद अपनी प्रतिक्रियाओं को लगातार जारी रखा है। जाहिर है, एक स्वर में तारीफ है। तारीख सच्ची है। तारीफ के अलावा कोई चारा भी नहीं क्योंकि देश में फिल्म को बड़े पैमाने पर स्वीकार कर लिया गया है। फिल्म विषयवस्तु और उसके पीछे के सार्थक उद्देश्यों के कारण आरम्भ से ही चर्चा का विषय रही है। सत्यमेव जयते प्रस्तुत करते हुए आमिर खान न केवल सिनेमा बल्कि अपनी खुद की भूमिका के प्रति और ज्यादा गम्भीर हुए हैं। दंगल उसी का एक प्रशंसनीय रचनात्मक परिणाम है।

कहानी यही है कि पहलवानी छोड़े, एक सरकारी नौकरी कर रहे नेशनल चेम्पियन का स्वप्न विश्व स्तर पर पहलवानी के लिए मैडल लाना था जो अधूरा रह गया। वह स्वप्न अब होने वाले बेटे पर अवलम्बित है। चार बेटियों का पिता बनने के बाद अपने स्वप्न के प्रति गुमसुम पिता तब जाग्रत होता है जब अपनी दो बड़ी बेटियों के द्वारा गाँव के दो लुच्चों की पिटायी करने की शिकायत घर तक आती है। यहीं से उसका स्वप्न फिर हरा हो जाता है। दंगल फिल्म इसी स्वप्न को साकार करने आगे चलती है। फिर सिनेमा है तो ड्रामा है, संघष है, अभाव हैं तो रास्ते हैं, हताशा है, आशा है और बहुत सारे द्वन्द्वों के बाद जीत भी जिसका अर्थ है स्वप्न का साकार होना।

दंगल जैसी फिल्म का बड़ा सीधा सा सन्देश यही है कि असाधारण काम और उपलब्धियाँ भी इस धरा के मनुष्य से सम्भव होती हैं। कठिन अभ्यास, आराम का त्याग और लक्ष्य के प्रति सबकुछ छोड़कर जुटना उसके लिए जरूरी तत्व हैं। इन सबसे मनुष्य की देह से लेकर दिमाग तक सब खुल जाता है। मिल्खा, सुल्तान और दंगल फिल्में क्रमशः हम सबके बीच अनेक विरोधाभासों, झंझावातों और मुश्किलों के बाद सफलता की हवा पसीने से भीगे माथे पर उड़ाती हैं। दंगल उल्लेख में आयी दो फिल्मों से अधिक बेहतर इसलिए है क्योंकि इसमें वो महानायक है जो लक्ष्य और चुनौतियों का सीमा में बने रहने वाला ऐसा प्रतीक बनकर फ्रेम में दिखायी देता है जो खुद कुछ नहीं कर रहा है। आमिर खान पूरी फिल्म में जरा से भी हीरो नहीं हैं। सब काम लड़कियाँ कर रही हैं या परिस्थितियाँ, वह केवल एक बड़े स्वप्न के केन्द्र में है, यह एक महानायक की बड़ी दृढ़ता, अपनी छबि के साथ बड़े त्याग और जोखिम और इन सबके साथ अपनी दृष्टि का लोहा मनवा लेने का कौशल है।

फिल्म के कलाकार एक कैप्टनशिप के अनुसरण में हैं सो सब अनुशासित और परिश्रम करके दिखाते हैं। सहायक कलाकारों का गढ़न फिल्म के तनाव को सहज किए रहता है, भतीजा अपारशक्ति खुराना, आयुष्मान के भाई की कमाल संगत है, वे फिल्म के नैरेटर भी हैं। आमिर खान तो खैर पूरी फिल्म में, पूरी देह में एक द्वन्द्व लेकर चलते हैं। उनको उस रूप में देखकर बहुत अच्छा लगता है। अधूरे लक्ष्य और उससे जुड़े स्वप्न में खोये हुए कहें या जीते हुए, वे खाना खाते हुए, रात को बिस्तर पर सोते हुए, उठकर बेचैनी में बैठ जाते हुए बेहद सच्चे नजर आते हैं। 

फिल्‍म के क्‍लायमेक्‍स में जब बेटी का कोच अपने श्रेय की क्षुद्रता में पिता को स्‍टेडियम के एक कमरे में बन्‍द करवा देता है और लड़ती हुई बेटी दर्शकों में अपने पिता की जगह खाली देखकर परेशान और हतोत्‍साहित होती है तब पूर्वदीप्ति में बेटी काे पिता की बचपन में उस वक्‍त दी शिक्षा याद आती है जब एक सुबह वह दोनों बेटियों को गाँव की नदी में छलांग लगवाता है और पानी के भीतर डूब रही बेटी तक पुल पर से चिल्‍लाकर अपनी आवाज पहुँचाता है कि मैं हर वक्‍त तेरे साथ या तेरे सामने नहीं रहूँगा। तुझे जीत अपने हौसले और हिम्‍मत से ही मिलेगी। इस स्‍मरण के साथ वह प्रतिस्‍पर्धी से भिड़ती है और जीतती है। फिल्‍म का यह सबसे सशक्‍त दृश्‍य है। 

नितेश तिवारी, इटारसी के रहने वाले हैं, गर्व है कि मध्यप्रदेश मूल के फिल्मकार ने इतनी अच्छी फिल्म बनायी है। पटकथा के अनुरूप एक-एक शॉट बहुत सधा हुआ और प्रभाव और तकनीकी दृष्टि से बहुत अप टू द मार्क है। दोनों बेटियों का पिता से संवाद दिलचस्प लगता है, वहीं तीसरी और चौथी बेटियाँ बीच में एक ओर साक्षी और एक ओर आमिर लेटे हुए हैं, सोती बच्चियों के साथ यह दृश्य कमाल का है, अनुभव करो तो लगता है कि बच्चियों के रूप में सोये स्वप्न बस जागने को हैं.................

गाने, एक-एक जैसे लोकेशन पर बैठकर लिखा हुआ, संगीत कमाल का, अमिताभ भट्टाचार्य और प्रीतम ने गढ़ दिया सचमुच और दलेर का टाइटिल ट्रेक - माँ के पेट से मरघट तक तेरी कहानी पग पग प्यारे दंगल दंगल और ऐसे ही एक दो गाने सूफियाना और शाश्वत रचनाएँ हैं। निहायत व्यक्तिगत रूप से लगता है कि ऐसी फिल्म को बिना आवेदन की प्रतीक्षा किए राज्य करमुक्त कर सकते हैं, खासतौर पर बेटियों के लिए अभियान और योजनाओं में शीर्ष पर आये राज्य............#dangal #amirkhan #niteshtiwari #niteshtivari #kiranrao #filmreview

बुधवार, 23 नवंबर 2016

एम बालमुरलीकृष्‍ण का जाना.......


लगभग सोलह वर्ष पहले की ही बात होगी, डॉ एम बालमुरलीकृष्‍ण, मध्‍यप्रदेश शासन का राष्‍ट्रीय कालिदास सम्‍मान ग्रहण करने भोपाल आये थे। हवाई अड्डे पर उनको लेने मैं ही गया था और शाम साढ़े चार बजे जिस विमान के आने का समय था वह तीन बजकर चालीस मिनट पर आ चुका था। एयरपोर्ट पर जब यह मालूम हुआ तो मैं सहम गया था, मुझे लगा बहुत नाराज होंगे लेकिन जब प्रवेश टिकिट लेकर अन्‍दर गया तो बड़े इत्‍मीनान से एक कुर्सी पर प्रतीक्षा करते, मुस्‍कुराते हुए मिले वे। पैर छूकर क्षमा मांगी तो हँसने लगे। रात को गरिमामय समारोह में सम्‍मान ग्रहण किया और उसके बाद अपना गायन प्रस्‍तुत किया। अगले दिन सुबह उसी सहजता से वे चले भी गये............
एम बालमुरलीकृष्‍ण, मिले सुर मेरा तुम्‍हारा का एक अहम स्‍वर और उपस्थिति थे। कर्नाटक संगीत और पक्‍के रागों को अनुशासित और शुद्ध पवित्र भाव से गाने की उनकी दक्षता अनूठी थी। एक पूरा जीवन उन्‍होंने सच्‍चे और विनम्र साधक की भाँति संगीत को दिया। वे भारतीय सांस्‍कृतिक परम्‍परा की विलक्षण धरोहर थे। उनको सन्‍त कहना ज्‍यादा सार्थक होगा क्‍योंकि धर्म से लेकर चेतना तक उनमें संगीत ही व्‍याप्‍त रहा था सदैव। मुझे महान फिल्‍मकार जी वी अय्यर की उन दोनों महत्‍वपूर्ण फिल्‍मों आदिशंकराचार्य और भगवतगीता देखने का सौभाग्‍य मिला जिनका संगीत एम बालमुरलीकृष्‍ण ने सिरजा था। उनका निधन एक बड़ी क्षति है। हमारी संस्‍कृति और परम्‍परा से ऐसे सन्‍तों की चिरविदायी अत्‍यन्‍त दुखद है.......

शनिवार, 19 नवंबर 2016

सुविख्यात चित्रकार प्रमोद गणपत्ये का जाना.........


भाई लोकेन्द्र त्रिवेदी जी ने सुविख्यात चित्रकार भाई प्रमोद गणपत्ये के नहीं रहने की सूचना फेसबुक पर दी है। प्रमोद जी को जानने और चाहने वालों के लिए यह बड़ी शोक की खबर है। मैं उनके कृतित्व के प्रति आकृष्ट रहा करता था, अनेक प्रतिक्रियाओं में उनका उत्तर और कई बार सिनेमा सम्बन्धी मेरी टिप्पणियों को अपने अनुभवों और जानकारी से उनका परिष्कृत कर देना मुझे बहुत सुहाता था।

कुछ महीने पहले एक कला शिविर में वे भोपाल आये थे, कुछ दिन रहे थे। उसके बाद ही से उनसे वचन हो गया था कि जल्द ही एक दिन दिल्ली आऊँगा और पूरा दिन साथ रहूँगा। इसके लिए उनके एक और मित्र बालू भैया को भी संगत के लिए मनाया लेकिन हम सबके भाग्य में वह संगत नहीं थी। कुछ दिन पहले प्रमोद जी से बात हुई तब वे कह भी रहे थे कि जल्दी मिल जाओ नहीं तो किसी दिन तस्वीर पर हार चढ़ जायेगा। तब मैंने कहा था कि भाई साहब जल्दी ही मिलता हूँ।

इच्छाशक्ति की कमी कह लूँ या अपना आलस्य-प्रमाद या भोपाल में निरन्तर आपाधापियों में यह सब अनमोल छूटना, प्रमोद जी से मिल न सका। कल कुछ घण्टे दिल्ली में था लेकिन उसका आधा समय वहाँ की ट्रैफिक और सड़क में गसी हुई गाड़ियों के बीच ऊँघते हुए और शेष नियत कार्य तथा वापसी में पूरा हुआ। 

दिल्ली के मित्रों ने कल मुझे दिल्ली जानकर खूब चिढ़ अपनेपन में जाहिर की है, एक से मैंने दिन में ही प्रमोद जी की बात करते हुए कहा भी कि उनसे अपरिहार्य मिलना भी न हो पाया और कुछ ही घण्टों में मैं उनकी नहीं रहने के सच को जान पा रहा हूँ। स्वाभाविक रूप से खूब व्यथित हूँ और अपनी लचरता पर झल्लाया हुआ..........

प्रमोद गणत्ये जी की सबसे बड़ी खूबी उनका देशजपन था जो व्यक्तित्व से लेकर कृतित्व में भी झलकता था। वर्षों से वे दिल्ली में थे लेकिन उज्जैन और मालवा को, परम्परा, संस्कृति को, जीवन और उसकी आंचलिक सहजता को, रंग से लेकर वस्त्र, श्रृंगार और समय तथा अनुभवों के साथ स्थूल हो चली देह को कितनी ही जीवन्त स्मृतियों में वे अपनी कलाकृतियों में चित्रित करते थे। उसी मर्म और संवेदना ने मुझे उनके काम को लेकर गहरी जिज्ञासा जगायी थी। मुझे दुख है कि निरर्थक कारणों से होते रहे विलम्ब के कारण मैं उनसे नहीं मिल सका और वे चले गये..................

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

।। बाबा के झोले में बच्चे.......... ।।

अक्सर इस बात से मैं रोमांचित होता रहा हूँ बचपन से जरा डरपोक किस्म का था भी, घर के सामने भिक्षा मांगने वाले ऐसे बाबा आते थे जिनको देखकर डर लगता था। छुटपन में बाहर सीढ़ियों में बैठा रहता था तो भीतर भाग जाता था। पलंग के नीचे छुपकर लगता था कि बच गये। मुहल्ले के बड़े भाई, पास-पड़ोस के लोग डराया भी करते थे कि बाबा के झोले में बच्चे पड़े रहते हैं। वो बच्चों को पकड़कर ले जाया करते हैं। बाबा के कंधे पर बड़ा सा बोरेनुमा झोला होता था जिसमें वे आटा वगैरह इकट्ठा किया करते थे।
बाबा तरह-तरह के आया करते थे। बाबा होगा तो दाढ़ी होगी ही, बड़े से बाल होंगे ही, मूँछ होगी ही। बोरा, हाथ में लाठी भी। कुछ बाबा ऐसे होते थे जो शारीरिक व्याधियों के कारण अपनी चाल-ढाल से भी डराते थे। कुछ बाबाओं का दरवाजे पर शंख बजाना ही पेशाब छुटा देता था लेकिन फिर भी उनको छुपकर देखने का अपना आकर्षण भी होता था। जब तक बाबा दूर के घरों में मांग रहा होता, अपन सीढ़ियों पर बैठे होते, जैसे ही अपने घर की तरफ आता तो भाग जाते। मम्मी हमारी छाती पर हाथ रखकर कहतीं, कैसा धड़-धड़ कर रहा है। फिर यह भी कहतीं, कैसा सिंघ की कोख में सियार पइदा भा.........
आज सुबह ऐसे पाँच-छः बाबाओं का समूह मुहल्ले में आया तो उनकी बुलन्द आवाजों से कुत्ते भैरा गये, बच्चे भागने लगे। मुझे बचपन का स्मरण पल भर में हो आया और अपने आप में हँसी आ गयी, मम्मी का गुस्से वाला डायलॉग भी। मैं बाहर खड़ा अलग-अलग घरों में खड़े उन बाबाओं को देखने लगा। यकायक अपनी स्मृतियों और बाबागणों के मनोविज्ञान पर सोचने लगा। सभी बाबा प्रौढ़ उम्र के थे औसतन, बड़े-बड़े शंख हाथ में लिए, बेहद बुलन्द आवाज में मांग करते हुए, बड़े-बड़े धुले स्वच्छ सफेद से शंख और उसकी आवाज।
हँसी आयी कि बच्चे आज भी बाबाओं के झोले में अपनी तरह के शरारत करने वाले या माता-पिता की नहीं सुनने वाले बच्चों को कैद सोचा करते होंगे और उसी भय में अपनी जिद थोड़ी कम किया करते होंगे, चार बातें भी मान जाया करते होंगे।
बाबाओं और बच्चों का यह रिश्ता कितना रोचक और हर पीढ़ी की स्मृतियों से भरा है, है न.......................!

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

वो किले स्‍मृतियों में आज भी हैं.........

चार-पाँच साल की उम्र की दीवाली याद आती है। छत्तीस बटे चौबीस में रहते थे। मम्मी के नाम आवंटित सरकारी मकान में। तब दीवाली में घर-घर किले बनाने का खूब चलन था। हमारे पड़ोस में सहाय मौसी बहुत सुन्दर सा किला बनाया करती थीं, दीवाली के एक दिन पहले तक। बाहर घर के आंगन में गोबर, मिट्टी, लाल मुरम, कुछ सूखी लकड़ियाँ और खपच्चियाँ, पुरानी दफ्तियाँ, सफेद चूना, नील और कुछ रंग जो आसानी से मिल जाया करते। इतने सामान में किला बन जाता। मैं उनको बनाते हुए देखता तो उनसे कहता मौसी (तब चलन में आंटी शब्द नहीं आया था) हमारे घर में भी किला बना दो तो वे कहतीं, अपनी मम्मी से हमको मजूरी दिलवाओ तो हम बनाने आ जायेंगे। अपन मम्मी से जिद करते। फिर मम्मी कहतीं मौसी के पास यही काम भर रह गया है क्या, लेकिन मम्मी भी दीवाली आते-आते मेरी खातिर एक सुन्दर सा किला बना देतीं। वो कम से कम तीन मंजिल का छोटा सा किला होता जिसमें नीचे तीन-चार द्वार, सामने बाउण्ड्री, एक तरफ से ऊपर की मंजिल में जाने की सीढ़ी, फिर दूसरी मंजिल में दो दरवाजों वाले कमरे और उसके ऊपर एक मंजिल।

किला बनाना आसान काम तो न होता। गोबर, मिट्टी और भूसे को मिलाकर गीला करके साना जाता। ईंट जमाकर स्वरूप बनाया जाता। मिट्टी थाप-थोपकर उसकी फिनिशिंग की जाती। हाँ प्रत्येक मंजिल पर कंगूरे भी बनाये जाते। सूख जाने पर गोबर से पूरा लीपा जाता। जब वह सूख जाता तब चूना, नील, मुरम और रंगों से उसको सुन्दर बनाया जाता। बन जाने के बाद किला बड़ा सुन्दर लगता। शायद एक किले का कुछ क्षेत्रफल दो गुणा तीन होता होगा लेकिन तब हर घर के बाहर के आँगन में हम जैसे हर बच्चों की माँ किला बनाया करतीं। दीवाली की रात हम लोग उसमें दीये भी लगाते। रात में रोशन किला क्या खूब लगता।

पता नहीं कब यह स्मृतियों से छूट गया। बाद में धीरे-धीरे दीपावली के त्यौहार में किले बनाये जाने का चलन खत्म होता गया। अब तो यह किले हमउम्र लोगों की स्मृतियों में होंगे। इसका कारण यह है कि धीरे-धीरे परम्पराएँ सब छूटती चली गयीं हैं। त्यौहारों की पारम्परिकता, उसको अपने जीवन के आनंद का उत्सव बनाने के लिए पुरखों और पूर्वजों द्वारा स्थापित और संरक्षित किए गये लोकाचार अब नहीं दिखायी देते।

हमारी दादी, नानी, बुआ, मौसी, माँ के घरेलू पकवानों का जैसे दौर ही जा चुका है। अब बाजार में वे घरेलू पकवान सामान्य मिठाइयों और खाद्य पदार्थों से ज्यादा महत्व के साथ प्रदर्शित हैं, अधिक महँगे दाम में। हमारे लिए अब वह एक एलीट और पॉलिश्ड आकर्षण का काम करता है...............इन्हें थोड़ा-बहुत ला और खाकर हम अपनी स्मृतियों को ताजा करते हैं...........